भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 349, कुल 654 में से

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

नामक पुत्र हुआ। कृष्णवर्माको उदय नामका पुत्र हुआ। उदयने वनके बीचमें एक सुन्दर 'उदयपुर' नामका नगर बसाया। उसका पुत्र वाप्यकर्मा हुआ। वाप्यकर्माने अनेक वापी-कूप, तड़ाग, सुन्दर-सुन्दर महल आदि बनवाये। वह धर्मात्मा सदा धर्मकार्यमें संलग्न रहता था।

उसी समय एक लाख सैन्यसे युक्त महामदके अनुयायी बीरबलद नामक एक राजाने वाप्यकर्मापर चढ़ाई कर दी, परंतु वाप्यकर्माने पैशाचों और म्लेच्छोंको जीतकर भगवान् कृष्णका कृष्णोत्सव मनाया। वाप्यकर्माको गुहिल नामक पुत्र हुआ और उसका पुत्र कालभोज हुआ। कालभोजका पुत्र हुआ राष्ट्रपाल। राष्ट्रपालने अपने पैतृक स्थानका परित्याग कर सभी मङ्गलोंको प्रदान करनेवाली शारदादेवीकी आराधना की। राष्ट्रपालको वैष्णवी शक्ति प्राप्त हुई। उसके तपसे प्रसन्न हो शारदादेवीने मणिदेवसे रक्षित अत्यन्त रमणीय 'महावती' नामकी पुरी प्रदान की। उस बुद्धिमान् राजा राष्ट्रपालने उस पुरीमें दस वर्षोंतक राज्य किया।

राजा राष्ट्रपालको विजय और प्रजय नामके दो पुत्र प्राप्त हुए। प्रजयने अपने माता-पिताको त्यागकर गङ्गातटपर जाकर बारह वर्षोंतक शारदादेवीकी कठोर तपस्या की। शारदादेवी एक कन्याके रूपमें वेणुवादन करती हुई घोड़ेपर सवार हो राजाके सामने उपस्थित हुई और हँसकर बोली—'राजपुत्र! तुम किसलिये शिवाकी आराधना कर रहे हो? तुम्हें तपस्याका फल मेरे द्वारा शीघ्र ही प्राप्त होगा।' यह सुनकर प्रजयने कहा—'देवि! आपको नमस्कार है, आप मुझे एक नवीन नगर प्रदान करें।' यह सुनकर देवीने प्रजयको

एक सुन्दर घोड़ा प्रदान किया और वे वेणु-वादन करती हुई दक्षिण दिशाकी ओर चली गयीं। वह राजा भी उस अक्षरपर चढ़कर उनके पीछे-पीछे नेत्र बंदकर पश्चिम दिशाकी ओर आया। इसके बाद वह जहाँ मर्कण नामका पक्षिराट् था, वहाँ गया। उसे देखकर वह भयभीत हो गया। तब उस राजाने दोनों नेत्रोंको खोल लिया और कन्याके द्वारा रचित एक शुभ नगरको देखा। उस नगरके उत्तरी भागमें गङ्गा, दक्षिणमें पाण्डुरा, पश्चिममें ईशसरिता तथा पूर्वमें मर्कण पक्षीका स्थान था। यह स्थान कुछ कुब्ज (टेढ़ा) था। कन्याद्वारा निर्मित होने एवं कुछ कुब्ज (टेढ़ा) होनेके कारण यह स्थान कान्यकुब्ज नामसे प्रसिद्ध हुआ*।

राष्ट्रपालके पुत्र जयपालने दस वर्षोंतक राज्य किया। वेणुवादन करनेके कारण उसको वेणुक नामका पुत्र प्राप्त हुआ। राजा वेणुके देवीके द्वारा प्रदत्त मनोहर कन्यामती नामकी कन्याके साथ विवाह किया। कन्यामतीसे उसे सात पुत्रियाँ उत्पन्न हुई। वे मातृकाओंकी मङ्गल-कलासे समुद्भूत थीं। उनके नाम इस प्रकार हैं—शीतला, पार्वती, कन्या, पुष्पवती, गोवर्धनी, सिन्दूरा तथा काली। ये ही क्रमशः ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी और चामुण्डा नामसे प्रसिद्ध हुई। अनन्तर उस रानीसे यशोविग्रह नामक पुत्र हुआ। वह बहुत बलवान् धर्मात्मा तथा आर्यदेशका मालिक था। यशोविग्रहने बीस वर्षोंतक इस पृथ्वीपर राज्य किया। उसका पुत्र हुआ महीचन्द्र। महीचन्द्रने भी अपने पिताके समान ही राज्य किया। उसका पुत्र चन्द्रदेव हुआ, चन्द्रदेवका पुत्र मन्दपाल राजा हुआ। उसने दस वर्षोंतक राज्य किया। उसका पुत्र कुम्भपाल हुआ।

  • ददर्श नगरं रम्यं कन्याया रचितं शुभम् । उत्तरे तस्य वै गङ्गा दक्षिणेनास पाण्डुरा ॥

पश्चिमे ईशसरिता पूर्व पक्षी स मर्कणः । कुब्जभूतमभूदुर्गमं कान्यकुब्ज इति स्मृतः ॥

(प्रतिसर्गपर्व ४।३।५०-५१)

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