भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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पृष्ठ 350
  • प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *

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म्लेच्छ और पैशाचधर्मका अनुयायी महामोद राजनीया नामक नगरीका अधिपति था, उसने बहुत-से देशोंको लूटकर धन एकत्र किया था। वह कुम्भपालके पास गया। उसने कुम्भपालको बहुत-सा धन दिया। बुद्धिमान् कुम्भपालने बीस वर्षोंतक राज्य किया। उसका पुत्र देवपाल हुआ।

देवपालने अनंगपाल नामक राजाकी कन्या चन्द्रकान्तिके साथ विधिपूर्वक विवाह किया। देवपालने कान्यकुब्ज प्राप्तकर अनेक राजाओंको जीतकर अपने पिताके समान राज्य किया। उसे जयचन्द्र और रत्नभानु नामके दो पुत्र हुए। जयचन्द्रने पूर्व और रत्नभानुने उत्तर दिशामें आर्यदेशको जीतकर वैष्णवराज्यको प्राप्त किया। रत्नभानुका

पुत्र लक्षण नामसे विख्यात हुआ। वह कुरुक्षेत्रमें युद्ध करता हुआ दिवंगत हो गया। बुद्धिमान् वैश्यपाल, कुम्भपाल और शुक्लवंश समाप्त हो गया। विष्ण्वसेनके कुलमें उत्पन्न होनेवाले राजा विष्ण्वसेनवंशीय, विसेनके कुलमें उत्पन्न होनेवाले विसेनवंशीय क्षत्रिय, गुहिलके कुलमें उत्पन्न होनेवाले गौहिल क्षत्रिय, राष्ट्रपालके कुलमें उत्पन्न होनेवाले राष्ट्रपालवंशीय क्षत्रिय कहलाये। शुक्लवंशके धुरंधर लक्षणके मरनेके बाद सभी प्रधान क्षत्रिय राजा कुरुक्षेत्रमें समाप्त हो गये। शेष छोटे-छोटे राजा वर्णसंकर तथा म्लेच्छोंसे दूषित होकर भयानक म्लेच्छ-राज्यमें स्थित हो गये।

(अध्याय ३)

परिहारवंश और बंगालके शूरवंश आदिका वर्णन

सूतजी बोले—हे भृगुश्रेष्ठ शौनक! अब आप परिहारवंशके राजाओंका वर्णन सुनें। अथर्ववेदवेत्ता परिहारने सभी बौद्धोंको जीतकर सर्वशक्तिमयी देवीकी श्रद्धापूर्वक आराधना की। सर्वशक्तिमयी देवीने प्रसन्न होकर चित्रकूट पर्वतके ऊपर डेढ़ योजन विस्तृत एक नगरका निर्माण किया। देवताओंके प्रिय इस नगरमें कलिको बंदी बना लिया गया था और यहाँ कलिका कभी प्रवेश नहीं होता, इसलिये यह नगर 'कलिंजर' नामसे इस पृथ्वीपर प्रसिद्ध हुआ*। परिहारने उस कलिंजर नामके नगरमें बारह वर्षोंतक राज्य किया। उसका पुत्र गौरवर्मा हुआ। गौरवर्माने अपने पिताके समान ही राज्य किया। उसने प्रसन्नतापूर्वक अपने छोटे भाई घोरवर्माको कलिंजरका राज्य सौंप दिया। अनन्तर वह गौड़देशमें चला आया और वहाँ राज्य करने लगा। गौरवर्माका पुत्र सुपर्ण अपने पिताके बाद वहाँका राजा हुआ।

उसका पुत्र रूपण हुआ और रूपणका पुत्र कारवर्मा (कामवर्मा) हुआ।

इधर शक नामके राजाने महालक्ष्मी सनातनी देवीकी आराधना की। तीन वर्षके अन्तमें उस देवीने कामाक्षीका रूप धारण कर अपने भक्तका पालन करनेके लिये वहाँ निवास किया। कामवर्माने पचास वर्षतक राज्य किया। कामवर्माके भोगवर्मा नामका पुत्र और भोगवती नामकी कन्या उत्पन्न हुई। उस राजाने भोगवती नामकी अपनी कन्या विक्रमको प्रदान की और अपना राज्य अपने पुत्र भोगवर्माको दे दिया। भोगवर्माका पुत्र कालिवर्मा हुआ।

कालिवर्माने भक्तिपूर्वक महाकालीकी उपासना की। उससे प्रसन्न होकर वर देनेके लिये भगवती काली स्वयं उपस्थित हुई। भगवती कालीने प्रसन्न होकर अनेक पुष्पोंकी कलियोंकी वर्षा की, जिससे

  • नगरं चित्रकूटाद्वा चकार कलिनिर्जरम्। कलिर्नरं भवेद्द्वो अतः कलिंजरो नाम्ना प्रसिद्धोऽभून्महीतले।

नगरेऽस्मिन् सुरप्रिये॥

(प्रतिसर्गपर्व ४।४।३-४)

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