भारतकोश
संग्रह पर लौटें

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ
  • प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *

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भगवान्से चारों वर्णोंकी उत्पत्ति, चारों युगोंमें भगवान्के अवतारों एवं चारों युगोंके मनुष्योंकी आयुका निरूपण

सूतजी बोले—शौनक! अय्यक्जन्मा ब्रह्माके मध्याह्नकाल आनेपर चाक्षुषान्तर (मन्वन्तर)-में बड़ा भारी झंझावात आया। यहाँतक कि उसके प्रभावसे हिमालय पर्वत भी काँपने लगा। इससे प्रायः सृष्टिके अधिकांश प्राणियोंका विनाश हो गया। सप्तद्वीपा वसुमती और समुद्र जलमय हो गये। बस उत्तर दिशास्थित लोकालोक पर्वत मात्र शेष रह गया। मुने! मन्वन्तरके लय होनेपर सम्पूर्ण भूमिका लय हो गया। एक हजार वर्षतक पृथ्वी जलके मध्यमें स्थित रही। तब भगवान् विष्णुने शंकर तथा ब्रह्माके साथ आकाशमें शिशुमारचक्रको स्थित किया और सभी नक्षत्र-मण्डल तथा ग्रहोंको पूर्ववत् यथास्थान स्थित किया। उन ज्योतिश्चक्रोंके द्वारा पृथ्वीका जल सूख गया और पृथ्वी भी सुस्थिर हो गयी। एक अयुत वर्ष बीतनेके पश्चात् पृथ्वी स्थलके रूपमें दिखायी दी। तब भगवान् ब्रह्माने अपने मुखसे महामनीषी एवं सर्वविद्याविशारद द्विजराज सोमको उत्पन्न किया, दोनों भुजाओंसे महाबलशाली, राजनीतिमें पारङ्गत क्षत्रियराज सूर्यको उत्पन्न किया तथा ऊरुओंसे सरिताओंके पति रत्नाकर वैश्यराज समुद्रको उत्पन्न किया एवं पैरोंसे कलाविशारद, शास्त्रविहित कर्म करनेवाले, उत्तम विश्वके रचयिता शुद्रराज दक्षको उत्पन्न किया। सोमसे ब्राह्मणों, सूर्यसे क्षत्रियों, समुद्रसे सभी वैश्यों और दक्षसे शुद्रोंकी उत्पत्ति हुई। सूर्यमण्डलसे स्वयं वैवस्वत मनु उत्पन्न हुए। उनका सभी प्राणियोंपर राज्य हुआ। विश्वरूप भगवान् विष्णु पूर्वार्धसे तथा वामन परार्धसे उत्पन्न हुए। सत्ययुगमें जो भगवान् सनातन विष्णु विश्वरूपमें अवतार लेते

हैं, वे बालस्वरूपमें रहते हैं। उस समय मनुष्योंकी परम आयु चार सौ वर्ष थी। त्रेतामें युवावस्था-प्राप्त श्रीहरि पूर्वार्धसे अवतरित हुए। इस युगमें मनुष्यकी परम आयु तीन सौ वर्ष थी। द्वापरमें वार्धक्यभावप्राप्त देव श्रीहरि हुए। इस समय मनुष्यकी आयु दो सौ वर्ष थी। कलियुगमें विश्वरूप भगवान् मरणधर्मारूपमें थे और धर्मशील व्यक्तियोंकी परम आयु सौ वर्ष हो गयी।

ब्रह्माके परार्धमें जब वामनका अवतार हुआ, तब वे भगवान् विष्णु महेन्द्र (इन्द्र)-के अनुज वामन बने। वे चार भुजाधारी, श्यामवर्ण एवं गरुड़के ऊपर विराजमान थे। विश्वरूपके हितके लिये ये त्रियुगी बने। सत्ययुगमें वामनके अर्धभागसे साक्षात् त्रियुगीनारायण श्वेतरूप हरि 'हंस' नामसे उत्पन्न हुए। त्रेतामें भगवान् यज्ञ रत्नरूप धारणकर उत्पन्न हुए। द्वापरमें स्वर्णगर्भ हरि पीतवर्ण-रूपमें उत्पन्न हुए। द्वापरयुगकी संध्यामें कलियुगके आनेपर विष्णुकी तथा वामनकी सभी कलाओंके एकीभूत होनेपर साक्षात् विष्णु देवकीके गर्भसे वसुदेवके घर मथुरामें उत्पन्न हुए। ब्रह्मा आदिने सनातन ब्रह्मकी स्तुति की। उस समय प्रसन्न हो भगवान्ने देवताओंसे यह कहा—'देवगणो! देवोंके हित और दैत्योंके विनाशके लिये मैं कलियुगमें उत्पन्न होऊँगा और कलियुगमें भूतलपर स्थित सूक्ष्म रमणीय दिव्य वृन्दावनमें रहस्यमय एकान्त-क्रीडा करूँगा। घोर कलियुगमें सभी श्रुतियाँ गोपीके रूपमें आकर रासमण्डलमें मेरे साथ रासक्रीडा करेंगी। कलियुगके अन्तमें राधासे प्रार्थित मैं इस रहस्यमयी क्रीडाको समाप्त कर कल्किके रूपमें अवतीर्ण होऊँगा*।

  • सर्वे वेदाः कली घोर गोपीभूताः समन्तः । रंयन्ते हि मया सार्धं त्यक्त्वा भूमण्डलं तदा ॥

राधया प्रार्थितोऽहं वै यदा कलियुगान्तके । समाप्य च रहः क्रीडां कल्कीं च भवितास्यहम् ॥ (प्रतिसर्गपर्व ४।५।२७-२८)

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

कलियुगके अन्तमें प्रलयके बाद पुनः सत्ययुगमें सत्यधर्मके रूपमें प्रतिष्ठित होऊँगा।' यह सुनकर देवगण वहीं अन्तर्लीन हो गये।

मुने! इस प्रकार युग-युगमें भगवान् श्रीहरिकी क्रीडाएँ होती रहती हैं। विश्वव्यापक भगवान्के

इस रहस्यको विष्णुभक्त ही जानते हैं। विष्णुकी इच्छाके अनुसार ही सनातनी विष्णुमाया विविध लोकोंकी रचना कर महाकाली हो सम्पूर्ण चराचर विश्वको कालकवलित कर महागौरीके रूपमें हो जायँगी। (अध्याय ५)

दिल्ली नगरपर पठानोंका शासन और तैमूरलंगका उत्पात

महर्षि शौनकने पूछा—सूतजी महाराज! पृथ्वीराजके बाद कौन-कौन राजा उत्पन्न हुए? इसे आप बतायें।

सूतजीने कहा—मुने! पैशाच (पठान) राजा कुतुकोदीन (कुतुबुद्दीन) दिल्लीका शासक था और अति सुरम्य वलीगढ़ यादवोंसे रक्षित था। कुतुकोदीन दस हजार सैनिकोंको साथ लेकर युद्धके लिये वहाँ गया और वीरसेनके पौत्र श्रेष्ठ भूपसेनको जीतकर दिल्ली नगरमें राज्य करने लगा। इसी समय अनेक देशोंके राजागण वहाँ आये। उन लोगोंने कुतुकोदीनको जीतकर देशसे बाहर कर दिया। इस समाचारको सुनकर सहोद्दीन (शहाबुद्दीन) पुनः (गौरसे) दिल्ली पहुँच गया। उस दैत्यराजने राजाओंको जीतकर अनेक मूर्तियों और देवमन्दिरोंको खण्डित कर दिया। इसके बाद बहुत-से म्लेच्छ वहाँ आकर रहने लगे। पाँच-छः अथवा सात वर्षोंतक राज्यकर वे दिवंगत हो गये।

मुनिगणो! इन सभी म्लेच्छ राजाओंने अनेक मन्दिरोंको तोड़ा है, सभी तीर्थों और आश्रमोंको दूषित कर दिया है, अतः आपलोग मेरे साथ हिमालयके ऊपर बदरीवनकी ओर प्रस्थान कीजिये। यह सुनकर नैमिषारण्यवासी सभी ऋषिगण दुःखी होकर सूतजीके साथ नैमिषको छोड़कर बदरीक्षेत्र चले गये। वहाँ सभी लोग समाधिस्थ होकर सर्वमय श्रीहरिके ध्यानमें स्थित हो गये।

कुछ समय बाद समाधिसे जगनेपर ऋषियोंने

सूतजी महाराजसे पुनः कल्पके इतिहासके विषयमें जिज्ञासा प्रकट की।

सूतजीने पुनः कहा—श्रेष्ठ मुनिगण! मैंने योगनिद्रामें जो देखा है, उस कल्पके वृत्तान्तको कह रहा हूँ। उसे आपलोग सुनिये। अनन्तर मुकुल (मुगलवंशी) म्लेच्छ राजा हुआ। वह म्लेच्छराज तिमिरिलङ्ग (तैमूरलंग) मध्यदेशमें आया। उस कालस्वरूप म्लेच्छ राजाने सभी आर्यों तथा म्लेच्छ राजाओंको जीतकर देहली नगरीमें बहुत उपद्रव किया और उसने आर्योंको बुलाकर कहा—'तुम सभी मूर्तिपूजक हो। शालग्राम तो पत्थर है, उसका पूजन कैसे उचित है? तुम सब उसे विष्णु मानते हो, वह विष्णु तो है नहीं, अतः तुम सभीके जितने वेद-शास्त्र हैं, उन्हें मुनियोंने संसारको ठगनेके लिये बनाया है।' ऐसा कहकर तैमूरलंगने शालग्रामकी मूर्तिको जबरदस्ती छीन लिया और जलती हुई आगमें फेंक दिया तथा पूजित सभी शालग्रामशिलाओंको ऊँटोंपर लादकर वह अपने देश चला गया। उसने तैत्तिर (तातार) देशमें आकर अपना एक सुदृढ़ किला बनवाया। अपने सिंहसनपर आरोहण करनेके लिये शालग्रामशिलाका पादपीठ बनवाया।

यह देखकर सभी देवता दुःखी होकर देवराज इन्द्रके पास गये और विलाप करते हुए इन्द्रसे बोले—'भगवन्! हमलोगोंकी स्थिति तो शालग्राम-शिलामें है, परंतु म्लेच्छराज तैमूरलंगने शालग्रामको पादपीठ बनवा लिया है।' देवताओंकी बात सुनकर

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  • प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *

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कूट्ट हो देवराज इन्द्रने हाथमें वज्र उठा लिया और बड़े वेगसे तैत्तिर देशकी ओर फँका। उस वज्रके घोर शब्दसे उसका सारा देश टुकड़े-टुकड़े होकर खण्डित हो गया और वह म्लेच्छ अपने सभी सभासदोंके साथ मृत्युको प्राप्त हो गया। अनन्तर प्रसन्न हो देवताओंने उन सभी शालग्रामशिलाओंको ग्रहणकर गण्डकी नदीमें छोड़ दिया। पुनः वे सभी स्वर्गलोक चले आये। इन्द्रने देवताओंके साथ देवपूज्य बृहस्पतिसे कहा—‘भगवन्! कलियुगके आनेपर बहुत दैत्य उत्पन्न हो गये हैं। वे वेदधर्मका उल्लंघन करके हमलोगोंके विनाशके लिये तैयार हो गये हैं, अतः आप हमारी रक्षा करें।’

बृहस्पति बोले—महेन्द्र! तुम्हारी जो श्रेष्ठ शची नामकी पत्नी है, उसे भगवान् विष्णुने वर दिया है कि ‘कलियुगमें मैं तुम्हारे पुत्ररूपमें अवतरित होऊँगा। तुम्हारे आदेशसे वह देवी शची गौड़देशमें गङ्गाके किनारे शान्तिपुरमें ब्राह्मणीके रूपमें तथा तुम स्वयं ब्राह्मणरूपमें अवतरित होकर देवकार्यको सिद्ध करो।’ यह सुनकर देवराज इन्द्र एकादश रुद्रों, अष्ट वसुओं तथा अश्विनीकुमारोंके साथ सूर्यके अत्यन्त प्रिय तीर्थराज प्रयागमें आये और उन्होंने माघमें मकरमें सूर्य होनेपर भगवान् सूर्यकी आराधना की। बृहस्पतिने आकर उन्हें भगवान् सूर्यका माहात्म्य बतलाया। (अध्याय ६)

भगवान् सूर्यके तेजसे आचार्य ईश्वरपुरी, आचार्य रामानन्द और निम्बार्काचार्यका आविर्भाव *

ऋषियोंने पूछा—सूतजी महाराज! देवगुरु बृहस्पतिने देवताओंको मण्डलस्थ भगवान् सूर्यका कौन-सा माहात्म्य बतलाया, उसे आप बतलानेकी कृपा करें।

सूतजीने कहा—ऋषियो! प्रयागमें जब देवगुरु बृहस्पति अपने आसनपर आसीन थे, उस समय देवताओंके साथ इन्द्रने भगवान् सूर्यके तत्काल प्रसन्न होनेके लिये जिस माहात्म्यको बतलाया था, उसे आप सुनें।

बृहस्पतिने देवताओंसे कहा—देवगणो! बहिष्मती (बिदूर) नगरमें धातुशर्मा नामक एक ब्राह्मणने पुत्रप्राप्तिके लिये तपस्या कर प्रजापति ब्रह्माको संतुष्ट किया। पाँच वर्षमें भगवान् प्रजापति संतुष्ट हुए और उन्होंने पुत्र, कन्या एवं पुनः पुत्र इस प्रकार तीन संतान प्राप्त करनेका वर प्रदान किया। धातुशर्माको एक वर्षके अन्तरसे तीनों संतानों उत्पन्न हुई। पुत्रोंके लालन-पालनसे धातुशर्मा बहुत आनन्दित हुआ। धीरे-धीरे वे बड़े होने लगे। धातुशर्माको

इनके विवाहकी चिन्ता होने लगी। तब इन लोगोंके उत्तम विवाहके लिये उसने गन्धर्वपति तुम्बुरुको हवन आदिसे संतुष्ट किया। तुम्बुरुने आकर उनके मनोरथकी पूर्तिका वरदान दिया। धातुशर्मा वधू और जामाताको देखकर बहुत प्रसन्न हुआ, किंतु इन लोगोंके विविध अलंकारों और धन, वस्त्र आदिकी प्राप्तिके लिये वह चिन्तित हो गया। वह साठ वर्षका हो गया। उसने पुनः धनपति कुबेरकी विधिबत् पूजा की। प्रसन्न हो भगवान् कुबेरने उसे बहुत धन दिया और स्वर्ण प्रदान करनेवाली विद्या (मन्त्र) भी उसे प्रदान की। धीरे-धीरे समय बीतनेपर वह बीमार हो मरणासन्न हो गया। अपनी यह दशा देखकर उसने भगवान् शंकरको स्तुतियोंसे संतुष्ट किया। भगवान् शंकरने एक मासमें ही उसे ज्ञान प्रदान किया। नम्रबुद्धि धातुशर्मने रविवारके व्रतके द्वारा मोहनाशक भास्करकी आराधना की। पाँच वर्षमें उसके भक्तिभावसे संतुष्ट हो भगवान् सूर्यने कहा—‘वत्स! तुम क्या वर चाहते हो,

  • इन आचार्योंकी विशेष जानकारीके लिये ‘कल्याण’ के २६वें वर्षके विशेषाङ्कको देखना चाहिये।

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

कहो।' इसपर धातुशर्माने कहा—' भगवन्! आपको बार-बार प्रणाम है, आप मुझे मोक्ष प्रदान करनेकी कृपा करें।' भगवान् सूर्यने ज्ञानी द्विज धातुशर्मासे कहा—'विप्र! मोक्ष चार प्रकारके हैं—तपसे उत्पन्न सालोक्य, भक्तिसे उत्पन्न सामीप्य, ध्यानसे उत्पन्न सारूप्य और ज्ञानसे उत्पन्न सायुज्य। इन चतुर्विध मोक्षोंके अधिष्ठाता परम परमेश्वर हैं। भगवान् विष्णुके उस परम पदको प्राप्त करनेपर पुनः आगमन नहीं होता। विप्रेन्द्र! तुमको सायुज्य-मोक्षकी प्राप्ति होगी और मन्वन्तरपर्यन्त तुम्हारा वह मोक्ष वर्तमान रहेगा।' ऐसा कहकर भगवान् भास्कर अन्तर्धान हो गये और विप्रको मोक्ष-प्राप्तिका वर प्राप्त हो गया।

सूतजीने कहा —मुने! इस प्रकार चैत्र मासमें देवाधिदेव दिवाकरने अपने स्वरूपका उन्हें दर्शन कराया और कहा — 'वंगदेशमें अपने अंशसे उत्पन्न होकर मैं देवकार्य सम्पन्न करूँगा।' यह कहकर दिवाकरने अपने मुखसे तेजको उत्पन्न किया और अपनी भक्त सुकन्या जो द्विज-पत्नी थी, उसके कल्याणके लिये उसे प्रदान किया। धातुशर्मा ब्राह्मण जिसने सूर्यकी आराधना कर मोक्ष प्राप्त किया था, वही उस तेजसे सम्पन्न होकर काव्यकर्ताके घरमें ईश्वरपुरी नामसे उत्पन्न हुआ। उसने वैदिक विप्रोंको शास्त्रार्थमें जीतकर महान् कीर्ति प्राप्त की।

ऋषियो! बृहस्पतिने जैसा मुझसे कहा था, वैसा ही मैंने आपसे कहा। पुनः बृहस्पतिद्वारा कही गयी एक अन्य रमणीय कथा सुनें।

मायावती (हरिद्वार) नगरीमें मित्रशर्मा नामका एक ब्राह्मण रहता था। वह काव्यप्रिय, विद्यापरायण और रसिक था। हरिद्वारमें कुम्भराशिपर बृहस्पतिके आनेपर महोत्सवके समय अनेक राजा उस स्थानपर आये। उस महोत्सवमें अनेक अलंकारोंसे अलंकृत मित्रशर्मा एवं असंख्य स्त्री-पुरुष आये।

वहीं दक्षिणात्य राजा कामसेनकी चित्रिणी नामकी एक कन्या भी आयी। उसकी अवस्था बारह वर्षकी थी। उसे मित्रशर्मासे बड़े ध्यानसे देखा। श्रेष्ठ मित्रशर्माको देखकर चित्रिणीके हृदयमें भी उसके प्रति प्रीति उत्पन्न हो गयी। घर आकर वह उसे प्राप्त करनेके लिये प्रतिदिन भगवान् भास्करकी श्रद्धापूर्वक आराधना करने लगी। इधर मित्रशर्मा भी वैशाख मासमें गङ्गामें स्नानकर जलके मध्य स्थित होकर भगवान् सूर्यका ध्यान करते हुए 'आदित्यहृदयस्तोत्र' का प्रतिदिन पाठ करने लगा। एक मास बाद भगवान् सूर्यने प्रसन्न होकर उसे मनोरथ पूर्ण होनेका वर प्रदान किया। वर प्राप्तकर वह अपने घर लौट आया। चित्रिणीने भी भगवान् भास्करसे अपने मनोऽनुकूल वर प्राप्त कर लिया। राजा कामसेनको भी भगवान् सूर्यने स्वप्नमें कहा कि 'तुम अपनी कन्याका विवाह मित्रशर्मासे कर दो', तब राजाने ऐसा ही किया।

विवाहके बाद दोनों ही भगवान् सूर्यका प्रतिदिन व्रत रखते थे और ताम्रपात्रपर सूर्ययन्त्र लिखकर रक्त पुष्पोंसे नित्य उनका श्रद्धा-भक्तिपूर्वक पूजन भी करते थे। उनकी अवस्था प्रायः सौ वर्षकी हो गयी, किंतु वे नीरोग रहे, उनका जीवन देवमय हो गया। मृत्युके अनन्तर उन्होंने भगवान् सूर्यकी सामीप्यता प्राप्त की। इन्हींके पुत्ररूपमें कान्यकुब्जमें देवल ब्राह्मणके घरमें भगवान् सूर्य अवतरित हुए। ये ही काशीमें रामानन्दके नामसे विख्यात हुए। बाल्यावस्थासे ही ये ज्ञानी, रामनाम-जप-परायण एवं रामभक्तिमें रत थे। पिता-माताका परित्याग कर ये राघवानन्द यतिकी शरणमें आये। उस समय भगवान् सीतापति श्रीराम उनके हृदयमें सहसा विराजमान हो गये। इस प्रकार भगवान् मित्रदेव (सूर्यदेव)-के अंशसे बलवान्, हरिभक्त रामानन्दका आविर्भाव हुआ।

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  • प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *

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बृहस्पतिने पुनः कहा—देवेन्द्र! ज्येष्ठ मासके सूर्यकी रमणीय कथा आप सुनें। प्राचीन कालमें सत्ययुगमें अर्यमा नामका एक विप्र उत्पन्न हुआ था, वह धर्मशास्त्रपरायण तथा वेद-वेदाङ्गोंके तत्त्वोंका ज्ञाता था। राजा श्राद्धयज्ञकी पितृमती नामकी पुत्री उसकी पत्नी थी। वह अतिशय साध्वी थी। उसने धर्मशास्त्रपरायण सात पुत्रोंको जन्म दिया। किसी समय उस बुद्धिमान् ब्राह्मण अर्यमाने हृदयमें भलीभाँति विचारकर धनकी कामनासे अनेक प्रकारकी उपासनाओंसे भगवान् भास्करको प्रसन्न किया। ज्येष्ठ मासमें भगवान् सूर्यने उसे एक दिव्य मणि प्रदान की। उसके प्रभावसे एक प्रस्थ स्वर्ण प्रतिदिन उत्पन्न होता था। उसने उस धनसे धर्मकार्यार्थ—वापी, कूप, तडाग, सुन्दर भवन आदिका निर्माण कराया। अन्तमें उसने सूर्यदेवकी कृपासे एक हजार वर्षतक निर्विघ्न जरा रहित जीवन बिताकर रमणीय सूर्यलोकको प्राप्त किया। वहाँ एक लक्ष वर्षतक सूर्यरूपमें निवास किया। देवेन्द्र! इस प्रकार मैंने भास्करके माहात्म्यको आपसे कहा। इसलिये देवताओंके साथ आप भी मण्डलस्थ भगवान् सूर्यकी पूजा करें।

ज्येष्ठ मासमें देवताओंने श्रद्धासम्पन्न हो भगवान् सूर्यको स्तुतियोंसे संतुष्ट किया। प्रसन्न हो भगवान् सूर्यने उपस्थित होकर कहा—‘देवगणो! द्वारके अन्तमें श्रीकृष्णकी आज्ञासे सुदर्शनका जन्म होगा, वह निम्बादित्य (निम्बार्कार्य) नामसे प्रसिद्ध होगा और क्षीण होते हुए धर्मकी रक्षा करेगा।’

सूतजीने कहा—ऋषियो! अब आप महात्मा निम्बार्कके चरित्रको सुनें, जिसको भगवान् श्रीकृष्णने कहा था। भगवान् श्रीकृष्णने सुदर्शनसे कहा था कि मेरी आज्ञासे आप देवकार्य सम्पन्न करें। मेरुके दक्षिण दिशामें नर्मदाके तटपर देवताओं और ऋषियोंसे सेवित तैलङ्ग नामक एक देश है। वहाँ आप अवतीर्ण होकर देवर्षि नारदसे उपदेश

प्राप्तकर मथुरा, नैमिषारण्य, द्वारावती, सुदर्शनान्त्रम आदि स्थानोंमें स्थित होकर धर्मका प्रचार करें। इस आदेशको ‘ओम्’ के द्वारा स्वीकारकर भक्तोंकी अभिलाषाको पूर्ण करनेवाले भगवान् श्रीसुदर्शन पृथ्वीतलपर अवतीर्ण हुए।

पवित्र सुदर्शनान्त्रममें भृगुवंशमें उत्पन्न वेदवेदाङ्ग-पारङ्गत अरुण नामके एक महामनस्वी द्विजश्रेष्ठ मुनि रहते थे। उनकी भार्याका नाम था जयन्ती। अरुणमुनिने ध्यानद्वारा भगवान् विष्णुके सुदर्शनचक्रके तेजको धारण किया और उस तेजको पतिपरायणा जयन्तीदेवीने मनसे धारण किया। उस तेजके प्रभावसे देवी जयन्ती चन्द्रमाके समान सुशोभित होने लगी। परम शुभ समय उपस्थित हुआ। दिशाएँ निर्मल हो गयीं। कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी पूर्णिमामें जब चन्द्रमा वृषराशिपर स्थित थे, कृतिका नक्षत्र था, पाँच ग्रह अपने उच्च स्थानपर स्थित थे, उस समय सायंकालमें मेघलग्नमें जयरूपिणी जयन्तीदेवीसे जगदीश्वर निम्बादित्य प्रादुर्भूत हुए, जिन्होंने इस विश्वको वेदधर्ममें नियोजित किया।

एक समय निम्बार्कके आश्रममें भगवान् विरिञ्चि पधारे। उन्होंने कहा—‘मैं भूखसे व्याकुल होकर आपके पास आया हूँ। जबतक आकाशमें भगवान् सूर्य स्थित हैं, तबतक ही मुझे भोजन करा दीजिये। विरिञ्चिकी इस बातको सुनकर निम्बार्कने उन्हें भोजन दिया। परंतु भगवान् सूर्य अस्ताचलपर पहुँच गये थे। तब निम्बार्कमुनिने अपने तेजसे भगवान् सुदर्शनके तेजको निकटस्थ एक निम्ब वृक्षपर प्रतिष्ठित कर दिया। ब्रह्मा सूर्यके समान उस तेजको देखकर आश्चर्यमें पड़ गये और एक-दूसरे सूर्यके समान उस बालमुनिको दण्डवत् प्रणाम कर उसे संतुष्ट किया और बार-बार साधुवाद देते हुए कहा कि आजसे आप सारी पृथ्वीपर निम्बादित्य नामसे प्रसिद्ध होंगे।’ (अध्याय ७)

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

आचार्य मध्व, श्रीधरस्वामी, विष्णुस्वामी, वाणीभूषण, भट्टोजिदीक्षित तथा वराहमिहिर आदिके आविर्भावकी कथा

देवगुरु बृहस्पतिजीने कहा—देवेन्द्र! त्रेतायुगमें अयोध्यानगरीमें शक्रशर्मा नामके एक देवोपासक ब्राह्मण रहते थे। वे अश्विनीकुमार, रुद्र, वसु, सूर्य आदिकी पृथक्-पृथक् मन्त्रोंसे विधिपूर्वक पूजा, हवन आदि करते थे। उनकी श्रद्धा-भक्तिसे की गयी आराधनाद्वारा प्रसन्न होकर तैंतीसों देवता अपने गणोंके साथ उनके दुर्लभ मनोरथको भी सुलभ कर देते थे। वे विघ्न एवं जरारहित हो दस हजार वर्षांतक देवाराधन करते रहे। देहावसानके बाद उन्होंने सूर्य-सायुज्य प्राप्त किया। उनकी ऐसी शुभ गतिको देखकर देवताओंके साथ देवराज इन्द्र (आप)-ने भी भगवान् सूर्यकी आराधना की। आषाढ़ पूर्णिमाको पृथ्वीपर भगवान् भास्कर प्रत्यक्षरूपसे आये और उन्होंने देवताओंसे कहा—‘मैं कलियुगमें अतिशय रमणीय वृन्दावनमें द्विजरूपमें जन्म ग्रहण करूँगा और वह सूर्यरूपसे देवताओंका कार्य सिद्ध करेगा तथा वही द्विज माधव ब्राह्मणका वेदमार्गपरायण पुत्र मधु (मध्वाचार्य) नामसे प्रसिद्ध होगा।’ यह कहकर भगवान् सूर्य देवताओंके कार्यके लिये उद्यत हो गये। उन्होंने अपने अङ्गसे तेजको उत्पन्न कर वृन्दावन भेजा। वे माधवके पुत्र पृथ्वीपर मध्वाचार्यके नामसे प्रसिद्ध हुए। उन्होंने मधुर वचनोंद्वारा वेदमार्गसे विमुखोंको सभी तरहसे वशमें कर लिया और उन्हें भुक्ति-मुक्ति देनेवाली वैष्णवी शक्ति भी प्रदान की।

देवेन्द्र! द्वापरमें कृषिकार्यसे जीवनयापन करनेवाले मेघशर्मा नामके एक ब्राह्मण थे। वे ज्ञानी, बुद्धिमान्, धार्मिक तथा वेदमार्गपरायण थे। प्रतिदिन अपने धनके दशांशसे सभी देवताओंकी भक्तिपूर्वक पूजा करते थे। एक बार शंतनूके राज्यकालमें पाँच वर्षांतक अनावृष्टि हो गयी। केवल एक कोसपर्यन्त ही वृष्टि

होती थी। उस समय धान्यका भाव एक मुद्रामें द्रोणमात्र हो गया। केवल मेघशर्मा नामका वह ब्राह्मण सूर्यकी कृपासे धन-धान्यसम्पन्न था। अन्य पीड़ित प्रजागण राजाकी शरणमें गये। दुःखित राजाने मेघशर्माको बुलाया और प्रणामकर कहा—‘द्विजश्रेष्ठ! आप मेरे गुरु हैं। आप कोई ऐसा उपाय करें, जिससे मेरे राज्यमें सुवृष्टि हो।’ इसपर मेघशर्माने कहा—‘राजन्! श्रावण मासमें बारह ब्राह्मणोंद्वारा विधिपूर्वक सूर्य-मन्त्रका जप, हवन, तर्पण, ब्राह्मण-भोजन आदिद्वारा सूर्यकी आराधना करनेसे आपके राज्यमें सुवृष्टि होगी।’ राजाने वैसा ही किया। भगवान् सूर्यकी कृपासे प्रचुर वृष्टि हुई और सूर्यव्रतपरायण राजा शंतनु उस व्रतद्वारा अतिशय पुण्यवान् नृपश्रेष्ठ हो गये। जिस किसी वृद्ध पुरुषको भी वे अपने हाथसे स्पर्श कर देते थे, वह युवा एवं नीरोग हो जाता था। सूर्यदेवके प्रभावसे मेघशर्मा भी युवक हो गया। वह वृद्धावस्थासे रहित होकर सभी विघ्नोंसे शून्य हो पाँच सौ वर्षांतक जीवित रहा। अन्तमें प्राणका परित्याग कर उसने सूर्यलोक प्राप्त किया। अनन्तर वह ब्रह्मलोक चला गया। पुनः भगवान् सूर्यने प्रयागमें आकर पर्जन्यके रूपमें अपना दर्शन कराया और प्रसन्नचित्त होकर देवताओंसे कहा—‘देवगणो! घोर कलियुगमें स्लेच्छ-राज्य होगा, उस समय मैं वृन्दावनमें आकर देवकार्य करूँगा।’ यह कहकर भगवान् सूर्य वृन्दावन चले गये और वेदशर्माके पुत्र होकर ‘श्रीधर’ नामसे विख्यात हुए। उन्होंने श्रीमद्भागवतकी भक्तिपूर्ण भावार्थदीपिका टीका लिखी और भागवतकी अपार महिमा बतलाई।

बृहस्पतिजीने पुनः कहा—देवेन्द्र! कलियुगमें प्रोशुशर्मा नामके एक ब्राह्मण थे। वे नित्य वेदशास्त्र-परायण तथा देवता और अतिथिके पूजक, सत्यवादी,

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  • प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *

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अतिशय साधु, चोरी और हिंसासे रहित थे। वे भिक्षावृत्तिसे अपने पुत्र और स्त्रीकी रक्षा करते थे। एक दिन भिक्षाके लिये मार्गमें जाते समय उन्होंने मायावी कलिको देखा। कलिन एक मनोहर वाटिकाका निर्माण कर ब्राह्मणका वेश बनाया और प्रांशुशर्मासे कहा—‘प्रांशुशर्मा! मेरी बात सुनो। मेरी यह रमणीय वाटिका है। इसमें जाकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करो।’ विप्रकी यह वाणी सुनकर प्रांशुशर्मा वाटिकाके अंदर आये। दुष्ट कलिन वाटिकामें आकर सुन्दर फलोंको तोड़कर उसे भोजनके लिये दिया और अञ्जलि बाँधकर प्रणत हो प्रांशुशर्मासे कहा—‘विप्र! मेरे साथ सुन्दर कलिन्दका फल खाओ।’ यह सुनकर उन्होंने हँसते हुए मधुर स्वरमें कहा—‘विद्वानोंने बताया है कि बहेड़ेके वृक्षपर और कलिन्दके फलमें कलि रहता है, अतः मैं इसे नहीं खाऊँगा। यदि तुम अतीव श्रद्धा-भक्तिके साथ ब्राह्मण-सेवाके उद्देश्यसे इस फलको खानेके लिये दे ही रहे हो तो मैं भगवान् शालग्रामको निवेदित करनेके बाद ही इस फलको ग्रहण कर सकता हूँ, क्योंकि शालग्राम सच्चिदानन्दविग्रहस्वरूप स्वयं ब्रह्म हैं। यह निश्चित बात है कि भगवान्की जिसपर दृष्टि पड़ जाती है, वह अभक्ष्य भी भक्ष्य बन जाता है।’ यह सुनकर कलि लज्जित होकर निराश हो गया। ब्राह्मण उस फलको लेकर भूमिग्राममें चले आये। पुनः कलियुग राजाके वेशमें प्रांशुशर्माके पास आया और उसने प्रसन्न होकर कहा—‘ब्राह्मण देवता! क्या तुमने फल ग्रहण कर लिया, उसे मुझे शीघ्र दिखलाओ।’ यह सुनकर प्रांशुशर्माने वत्समुण्डके समान उस फलको लाकर उसे दिखला दिया। इसपर क्रुद्ध हो उस कलिन ब्राह्मणको बैतोंसे मारकर लौहमय कारागारमें बंद कर दिया।

प्रातःकाल सूर्योदय होनेपर दुःखी प्रांशुशर्माने भगवान् भास्करको ऋग्वेदके सूक्तोंसे संतुष्ट किया। प्रसन्न हो साक्षात् सनातन रविने आकाशवाणीसे विप्रके कानमें यह वाक्य कहा—‘महाभाग विप्र! कालरूप स्वयं हरिने विश्वके पालन आदिके लिये चारों युगोंका निर्माण किया है। उन्होंने ही कलिको विश्वसमूहकी मृत्युके लिये रचा है। इसलिये घोर कलियुग आनेपर विष्णुमायासे विनिर्मित कलिंजर नगरमें जाकर आनन्दपूर्वक जीवन बिताओ।’ भगवान् सूर्यने ऐसा कहकर उस ब्राह्मणकी रक्षाके लिये उसे कलिंजर भेज दिया। ब्राह्मण प्रांशुशर्मा वहाँ एक सौ पचीस वर्षोंतक रहकर भगवान् सूर्यकी आराधना करते हुए पुत्र और पत्नीके साथ सूर्यलोक चला गया। वे ही प्रांशुशर्मा अट्टाईसवें कलियुगमें भाद्रपद मासकी पूर्णिमाको शिवदत्तके पुत्ररूपमें कलिंजरमें विष्णुशर्मा—विष्णुस्वामी* नामसे प्रसिद्ध हुए। वे वेदशास्त्र एवं कलाओंके ज्ञाता थे और देवताओंके पूजक तथा परम वैष्णव थे।

देवेन्द्र! पूर्वकालमें चैत्ररथ नामक स्थानमें मेधावीमुनिका मंजुघोषा अप्सरासे भगशर्मा नामका पुत्र हुआ। जन्म लेते ही माता-पिताने जब उसे छोड़ दिया, तब वह किसी प्रकार सौभाग्यसे भगवान् सूर्यकी आराधनामें तत्पर हो गया और तपह्वारा सौ वर्षोंतक उनकी निरन्तर आराधना करता रहा। अन्तमें सूर्यमण्डलकी अधिदेवता भगवती सावित्री उसपर प्रसन्न हो प्रकट हुई। आश्विन मासमें उन्होंने उस ब्राह्मणको मण्डलका राजा बना दिया और वह आश्विन मासमें सूर्यरूप होकर प्रकाशमान हो उठा। सारा संसार उसकी पूजा करने लगा, इसलिये हे इन्द्र! तुम भी उन्हीं सूर्यकी आराधना करो। वे तुम्हारा भी परम कल्याण करेंगे।

  • श्रीधरस्वामी और विष्णुस्वामीके विस्तृत चरित्र ‘भक्तमाल’ और ‘कल्याण’ के भक्तचरितार्द्धमें प्रकाशित हैं। दोनों भगवान्के परम श्रेष्ठ भक्त हुए हैं। श्रीधरस्वामीकी गीता, भागवत एवं विष्णुपुराणपर भक्तिपूर्ण टीकाएँ प्राप्त हैं।

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

अपने गुरु बृहस्पतिके वचनोंके अनुसार देवेन्द्रने भी आश्विन मासमें सूर्यकी आराधना की। भगवान् सूर्यने प्रत्यक्ष हो इन्द्रसे कहा—‘देवराज! कान्यकुब्जमें सत्यदेव ब्राह्मणके घरपर मैं उनके पुत्र-रूपमें ‘वाणीभूषण’ नामसे अवतार ग्रहण करूँगा। अनन्तर उन्होंने ऐसा ही किया और कालक्रममें वाणीभूषणने अपने नामसे छन्दःशास्त्रके ग्रन्थकी रचना की और पाखण्डियोंको परास्त किया। उन्होंने भगवान् विष्णुकी उपासनासे वैष्णवी शक्ति प्राप्त की थी।

बृहस्पति पुनः बोले— देवराज इन्द्र! किसी समय सरयू नदीके किनारे देवयाजी नामक एक ब्राह्मण रहते थे। वे सभी देवोंकी उपासना करनेवाले और नित्य वेदपाठी थे। उनके एक पुत्र उत्पन्न हुआ, किंतु उत्पन्न होते ही वह मृत्युको प्राप्त हो गया। यह जानकर दुःखी हो देवयाजीने भगवान् सूर्यकी आराधना की। भगवान् सूर्यकी कृपासे वह मृत बालक पुनः जीवित हो गया और उसका नाम पड़ा विवस्वान्। यह सोलह वर्षकी अवस्थामें ही सभी शास्त्रोंका प्रकाण्ड विद्वान् हो गया। यह धर्मपरायण तथा सूर्यव्रतपरायण था। इसका विवाह भी सम्पन्न हो गया। एक दिन शिवरात्रिका पुण्य पर्व था। विवस्वान्ने व्रत ग्रहण किया था। उस दिन पत्नी सुशीलासे कामवश सम्पर्क करनेके कारण वह भयंकर कुष्ठरोगसे ग्रस्त हो गया। वह बहुत दुःखी हो गया। पुनः किसीसे द्वादश रविवार-व्रतोंका उपदेश प्राप्तकर निराहार रहते हुए उसने जितेन्द्रिय होकर भगवान् सूर्यकी आराधना की। इस भक्तिसे तथा भगवान् सूर्यकी कृपासे उसका कुष्ठरोग दूर हो गया और उसकी सारी पीड़ा समाप्त हो गयी। इससे उसकी भगवान् सूर्यमें अत्यन्त श्रद्धा उत्पन्न हो गयी और वह ‘आदित्यहृदयस्तोत्र’ का पाठ करने लगा, इसके प्रभावसे वह कामदेवके समान सुन्दर रूपवान् हो

गया। पूर्वमें स्त्रियोंद्वारा भत्सित वही विवस्वान् अब उनका प्रियभाजन बन गया, किंतु विवस्वान् अखण्ड ब्रह्मचर्यव्रत धारणकर ब्रह्मध्यानपरायण हो गया। सौ वर्षोंतक वह नीरोग एवं ज्ञानवान् रहा। अन्तमें अपने प्राणोंका परित्याग कर वह सूर्यरूप हो गया और सूर्यमण्डलके बीचसे कार्तिक मासमें एक लाख वर्षतक प्रकाश करता रहा। हे महेन्द्र! तुम भी देवताओंके साथ उन भगवान् सूर्यकी पूजा करो।

सूतजीने कहा— मुने! देवराज इन्द्रने बृहस्पतिके वचनोंको सुनकर श्रद्धापूर्वक एक मासतक भगवान् सूर्यकी कार्तिक मासमें विधिवत् पूजा की। कार्तिक पूर्णिमामें भगवान् सूर्यने प्रकट होकर इन्द्रसे कहा—‘इन्द्र! मैं अवतार धारण कर देवकार्यको सिद्ध करूँगा। विद्याभिमानी भट्टोंने सूत्रपाठ तथा धातुपाठका अन्यथा अर्थ किया है, अर्थका अनर्थ किया है तथा स्वर और वर्णके अर्थको भ्रंश कर दिया है। मैं उन पाखण्डियोंको जीतकर वेदका उद्धार करूँगा।’ ऐसा कहकर वे भगवान् सूर्य काशीमें वेदशर्माके घरमें दीक्षित-वंशमें उत्पन्न हुए। वे यथानाम तथा-गुण थे। वे बारह वर्षकी अवस्थामें ही सभी शास्त्रोंमें पारङ्गत हो गये। भगवती पार्वतीके प्रिय तथा संसारके स्वामी भगवान् विश्वनाथकी उन्होंने आराधना की। तीन वर्षके बाद भगवान् शंकरने उन्हें महान् ज्ञान प्रदान किया। उस दिव्य ज्ञानके प्रभावसे उन्हें व्यक्त तथा अव्यक्तका सब ज्ञान स्पष्ट हो गया और उन्होंने सिद्धान्तकौमुदी नामक व्याकरणग्रन्थकी रचना की। पाखण्डों भट्टोंको उन्होंने परास्त कर जीत लिया था, इसलिये उनका ‘भट्टोजिदीक्षित’ नाम संसारमें विख्यात हुआ।

देवगुरु बृहस्पति बोले— देवराज इन्द्र! पूर्वकालमें काञ्चीपुरीमें एक दैवज्ञ ज्योतिषी ब्राह्मण रहता था। वह वेदमार्गानुगामी राजा सत्यदत्तका पुरोहित

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  • प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *

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था। किसी समय उस ज्योतिषीने राजा सत्यदत्तसे कहा—‘राजन् ! पुष्पनक्षत्रसे युक्त यह अभिजित् नामका मुहूर्त है। इस समय आप बाजार लगवायें, इसमें क्रय-विक्रय होनेसे आपको अतिशय लाभ होगा।’ तब राजाने डुगडुगी पिटवायी—‘बाजारमें जिसका सामान नहीं बिकेगा, उसे राजा खरीदेगा—यह हमारी सत्य घोषणा है।’ ऐसी घोषणा सुनकर बाजारमें अनेक वस्तुएँ बिकनेके लिये आ गयीं, परंतु दूसरे वणिक्-जनोंने उन सबको खरीद लिया। उसी समय एक लोहार लोहेका एक ‘दरिद्रपुरुष’ बनाकर बाजारमें लाया और उसका सौ रुपये मूल्य माँगा। परंतु उसे बाजारमें किसीने भी नहीं खरीदा। राजाने दरिद्रकी मूर्ति समझकर भी घोषणाके अनुसार उसे सौ रुपयेमें खरीद लिया और महलमें लाकर कोषागारमें रखवा दिया। उस मूर्तिके प्रभावसे रातमें राज्यसे सत्कर्म, धर्म और लक्ष्मी राजाके देखते-देखते जाने लगे। सत्यने पुरुषरूपमें राजासे कहा—‘राजन् ! जहाँ दरिद्रताका निवास रहता है, वहाँ कोई कर्मपरायण नहीं होता, कर्मके बिना पृथ्वीपर धर्म स्थिर नहीं हो सकता, धर्मके बिना लक्ष्मीकी कोई शोभा नहीं होती और लक्ष्मीके बिना मैं नहीं रह सकता।’ यह कहकर जानेकी इच्छा करते हुए सत्यको राजाने पकड़ा और नप्र वचनमें कहा—‘प्रभो ! मैंने आपका परित्याग नहीं किया है, मैंने सत्यका ही पालन किया है। अतः आप मेरा घर छोड़कर क्यों जा रहे हैं?’ यह सुनकर सत्यदेव पुनः राजाके घरमें चले गये, उनके पीछे-पीछे लक्ष्मी भी घरमें आने लगीं। राजाने लक्ष्मीसे कहा—‘देवि ! आप चञ्चला हैं, यदि अचल होकर रह सकती हैं तो मेरे घरमें आयें।’ यह सुनकर अचल होनेका वर प्रदान कर

लक्ष्मी भी राजाके घरमें प्रविष्ट हो गयीं।

राजा सत्यदत्तने पुनः अपने पुरोहित ज्योतिषीको बुलाकर उन्हें एक लक्ष मुद्रा प्रदान की और सभी बातें उनकी बता दीं। उस पुरोहितने पुत्रके जन्मके समय यह धन प्राप्त किया था, अतः उस सम्पूर्ण धनको श्रेष्ठ गणकने बालकके पालन-पोषणमें व्यय कर दिया और उसका ‘पूषा’ नाम रखा। पूषाने मार्गशीर्ष मासमें सूर्यकी आराधना की। उनकी कृपासे वह ज्योतिषशास्त्रमें पारङ्गत हो गया तथा सूर्यमें लीन हो गया। इसलिये हे देवेन्द्र ! तुम भी मार्गशीर्षमें भगवान् सूर्यकी पूजा करो।

सूतजी बोले—मुने ! बृहस्पतिके निर्देशानुसार इन्द्रने भी मार्गशीर्ष मासमें सूर्यकी आराधना की और प्रसन्न होकर पूषारूपमें भगवान् सूर्यने उसे प्रत्यक्ष दर्शन देकर कहा—‘देवगणो ! उज्जयिनीमें रुद्रपशुके घरपर मिहिंराचार्य (वराहमिहिर)-के नामसे मैं जन्म ग्रहण करूँगा। मैं ज्योतिषशास्त्रका प्रवर्तक होऊँगा। अनन्तर मूलगण्डान्त एवं अभिजित्के योगमें रुद्रपशु ब्राह्मणके घरपर एक बालकका जन्म हुआ। पिताने उत्पन्न पुत्रको काठकी पेटीमें रखकर रात्रिमें नदीमें बहा दिया। वह बहता हुआ समुद्रमें चला गया, पर वहाँ राक्षसियोंके द्वारा वह रक्षित हुआ। पुनः उसने लङ्कामें आकर ज्योतिषका अध्ययन किया। जातक, फलित, मूकप्रश्न आदि ज्योतिषके सभी अङ्गोंका भलीभाँति अध्ययन कर यह विभीषणके पास आया और इसने भक्तराज विभीषणको प्रणाम किया तथा कहा—‘मुझे राक्षसियोंने यहाँ पहुँचा दिया है, मैं आपकी शरणमें हूँ।’ विभीषणने उसे श्रेष्ठ वैष्णव समझकर उसकी जन्मभूमिमें भेज दिया। म्लेच्छोंके द्वारा विनष्ट ज्योतिषका इसने पुनः उद्धार किया। (अध्याय ८)

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

वैद्यराज धन्वन्तरि, सुश्रुत और भक्त कवि जयदेवजीका चरित्र

सूतजी बोले—मुने! देवगुरु बृहस्पतिने प्रयागमें भगवान् सूर्यके उत्तम माहात्म्यको इन्द्रादि देवताओंसे पुनः इस प्रकार कहा—हे देवेन्द्र! प्राचीन कालमें त्रेतायुगके अन्तमें जिस प्रकार भगवान् शंकरकी आज्ञासे भगवान् सूर्य रमणीय प्रतिष्ठानपुरमें प्रादुर्भूत हुए उसे आप सुनें।

त्रेतायुगके अन्तमें सिंहलद्दीपमें परीक्षित नामका एक राजा था, वह वेदधर्मपरायण तथा देवताओं एवं अतिथियोंका पूजक था। उसकी एक कन्या थी, जिसका नाम था भानुमती। वह सूर्यव्रतपरायणा थी। राजमहलमें वह प्रतिदिन भगवान् सूर्यकी आराधना कर उन्हें भोग निवेदित करती थी और उसकी भक्तिसे संतुष्ट होकर प्रत्येक मध्याह्नकालमें भगवान् सूर्य वहाँ आकर उस नैवेद्यको स्वीकार करते थे।

एक समयकी बात है, रविवारके दिन वह भानुमती स्नान करनेके लिये नलिनीसागरपर गयी और जलमें उतरकर स्नान करने लगी। उसी समय नारदमुनि उस जनशून्य प्रदेशमें पहुँचे और उन्होंने उस कन्यासे विवाह करनेकी इच्छा प्रकट की। परंतु कन्याने इसे अनुचित बताया। इससे देवर्षि नारद लज्जित हो गये और रोगसे भी ग्रस्त हो गये। देवर्षि नारदने भगवान् शंकरके पास आकर सारी घटना उनसे निवेदित की। तब शंकरने उनका रोग दूर करनेके लिये आराधनाद्वारा भगवान् भास्करको प्रसन्न किया। भगवान् सूर्यने प्रकट होकर देवर्षिका शरीर नीरोग एवं सुन्दर बना दिया और भगवान् शंकरसे कहा—‘हे प्रभो! मुझे आज्ञा दें, मैं आपका कौन-सा प्रिय कार्य

करूँ?’ भगवान् शंकरने कहा—‘भगवन्! आप ब्राह्मण होकर सविता नामसे मृत्युलोकमें जायँ और राजा परीक्षितकी कन्या भानुमतीसे विवाह करें।’ भगवान् सूर्यने वैसा ही किया। वे सविता भानुमतीके साथ भगवान् सूर्यकी आराधना करने लगे और उन्होंने सूर्यलोकको प्राप्त किया तथा वे ही पौष मासमें आकाशमें प्रकाशित होने लगे। महेन्द्र! तुम भी भगवान् सूर्यकी उपासना करो और देवताओंके कार्यको सिद्ध करो।’

सूतजीने कहा—मुने! बृहस्पतिकी बात सुनकर देवराज इन्द्रने देवताओंके साथ पौष मासमें भगवान् सूर्यकी आराधना की। प्रसन्न होकर सूर्य प्रकट हुए और उन्होंने कहा—‘देवगणो! मैं काशीमें धन्वन्तरि नामसे उत्पन्न होऊँगा और कलिके द्वारा निर्मित रोगोंसे पीड़ित संसारके प्राणियोंको रोगोंसे मुक्त करूँगा तथा वहाँ निवासकर देवताओंके कार्यको सिद्ध करूँगा।’ ऐसा कहकर भगवान् सूर्य काशीमें चले आये और कल्पदत्त ब्राह्मणके घरमें पुत्ररूपमें धन्वन्तरिनामसे उत्पन्न हुए। इन्होंने प्रौढ़ विद्वानोंके साथ राजपुत्र सुश्रुतको अपना शिष्य बनाया तथा कल्पवेद (आयुर्वेद—चिकित्साशास्त्र)-का प्रणयन किया। विद्वानोंने रोगोंद्वारा क्षीण होते हुए देहको ‘काल्प’ कहा है, इसीका ज्ञान इस तन्त्रमें निहित है, इसीलिये इसे कल्पवेद कहा गया है। कलियुगमें वे सूर्य ही भगवान् धन्वन्तरिके रूपमें प्रसिद्ध हुए, जिनके दर्शनमात्रसे ही समस्त रोग तत्काल नष्ट हो जाते हैं। आचार्य सुश्रुतने धन्वन्तरिप्रणीत कल्पवेदका अध्ययन करके सौ अध्यायोंवाले ‘सौश्रुत-तन्त्र’ का निर्माण किया।

१-अन्य पुराणों तथा आयुर्वेदग्रन्थोंमें काशिराज दिवोदासको समय समुद्रसे उत्पन्न हुए थे। स्कन्दपुराण काशीखण्डमें इनकी कथा बहुत विस्तारसे आयी है।

२-रोगेश्वर श्रयितं देहं काल्पमेतत् स्मृतं बुधैः। तस्य ज्ञानं च तन्त्रंऽस्मिन् कल्पवेदो ह्यतः स्मृतः ॥ (प्रतिसरूपपर्व ४। १। २१)

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  • प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *

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बृहस्पतिने पुनः कहा—देवराज! पूर्व समयमें रमणीय पम्पापुरमें हेली नामका एक ब्राह्मण रहता था। वह चौंसठ कलाओंका ज्ञाता और भगवान् सूर्यकी उपासनामें तत्पर रहता था। उसने प्रतिग्रह-वृत्तिका परित्याग कर हस्तकलासे वस्तुनिर्माणकी वृत्ति अपनायी। उसने लौह धातुकी एक सुन्दर मूर्ति बनाकर उसे अनेक चित्रकारीसे चित्रितकर पाँच हजार मुद्रामें बेचा। बेचनेसे उसे जो धन प्राप्त हुआ उस धनसे उसने माघ मासमें भगवान् सूर्यकी यज्ञोद्धारा आराधना की। हेलीने रमणीय पम्पासरोवरमें ज्योतिःस्वरूप एक उत्तम स्तम्भका निर्माण किया। भगवान् सूर्य भी उसकी भक्तिसे प्रसन्न होकर प्रत्येक मध्याह्नकालमें हेलीद्वारा निवेदित नैवेद्यका वहाँ भोग लगाते थे। भगवान् सूर्यकी कृपासे सहस्र वर्षपर्यन्त आयु भोगकर अपने प्राणोंका परित्याग कर वह हेली सूर्यस्वरूप हो गया और सूर्यमण्डलके बीच स्थित होकर माघ मासमें प्रकाशित होने लगा। देवेन्द्र! आप भी आदित्यमण्डलमें स्थित विश्वकर्मा भगवान् सूर्यकी उपासना कीजिये। वे आपका सब कार्य सम्पन्न कर देंगे। देवगुरुके इस वाक्यको सुनकर देवताओंके साथ इन्द्रने भगवान् सूर्यकी आराधना की। जिससे प्रसन्न हो भगवान् सूर्यने देवताओंसे कहा—‘देवगणो! मैं वंगदेशके बिलग्राम—बिल्वग्राममें निरुक्तकारके रूपमें उत्पन्न होऊँगा और कविशिरोमणि जयदेवके नामसे विख्यात होऊँगा।’

यह कहकर भगवान् सूर्य वंगदेशमें आये और कन्दुककी ब्राह्मणके घर पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए। वे पाँच वर्षकी अवस्थासे ही माता-पिताकी सेवामें विशेषरूपसे तत्पर रहने लगे। उन्होंने बारह वर्षतक माता-पिताकी बड़ी सेवा की। बारह वर्षकी अवस्थामें ही माता-पिताके मरणोपरान्त उनका उन्होंने विधिपूर्वक श्राद्ध-कृत्य किया और गयामें वे पितृरूपमें जयदेवके

सामने उपस्थित भी हुए तथा पुनः देवरूपमें स्वर्गमें प्रतिष्ठित हुए। अन्तमें जयदेवजीको वैराग्य उत्पन्न हो गया और वे वनमें रहकर भजन करने लगे। उनकी अवस्था तेईस वर्षकी हो गयी। इसी समय सत्यव्रत नामक ब्राह्मणने अपनी शुभ कन्या भगवान् जगन्नाथको समर्पित कर दी। पूजाके अन्तमें सनातन दारुब्रह्ममय भगवान्ने साक्षात् आकर उससे कहा—‘सत्यव्रत! जयदेव मेरी ही मूर्ति है, मेरी आज्ञासे अपनी पुत्री पद्मावती उसे प्रदान कर दो।’ यह सुनकर उस सत्यव्रत ब्राह्मणने अपनी कन्या पद्मावती वैरागी जयदेवके लिये बड़ी प्रसन्नतापूर्वक समर्पित कर दी, फिर वह सत्यव्रत अपने घर वापस आ गया।

पद्मावती अपने पति जयदेवकी आनन्दके साथ अनेक वर्षांतक सेवा करती रही। समाधिकालमें जयदेवने वेदाङ्गनिरुक्तकी रचना की। कलियुगमें नागवंशीय शूद्रोंने वैदिक प्रक्रियाएँ भ्रष्ट कर दी थीं। प्राकृत भाषाके रचयिता कलिप्रिय मूढ़ रचनाकारोंको उन्होंने जीतकर पाणिनिशास्त्रका उद्धार किया। कलियुगसे प्रेरित चोरोंने राजाद्वारा प्राप्त जयदेवकी सारी सम्पत्ति लूटकर उनका हाथ-पैर काटकर उन्हें गड्डेमें डाल दिया। पद्मावती अपने पतिकी यह दशा देखकर बहुत दुःखी हुई और रोती हुई उसने गड्डेसे पतिको निकालकर हाथसे सहलाकर उनकी पीड़ाको दूर किया।

एक दिन राजा धर्मपाल मृगया-प्रसंगमें वहाँ आया। उसने भक्त जयदेवको देखा और पूछा कि हाथ-पैरसे विहीन आपकी यह दशा किसने की है? जयदेवने कहा—‘महाराज! मैं अपने कर्मोंके फलस्वरूप ही इस दशाको प्राप्त हुआ हूँ। किसीने दुष्टता नहीं की है।’ इसपर राजा धर्मपाल जयदेवको पलीसहित शिविका (डोली)-में बैठाकर अपने महल ले आया। राजाने उनसे दीक्षा ग्रहणकर

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

उनके लिये एक धर्मशालाका निर्माण कराया। किसी समय कलिये प्रेरित वे ही चोर वैष्णवका वेश बनाकर राजा धर्मपालके महलमें आये और राजासे कहने लगे—‘प्रभो! हमलोग शास्त्रमें निपुण हैं और आपके घर आये हैं। राजन्! हमलोगोंद्वारा निर्मित भोज्य-पदार्थ शिलास्थित भगवान् विष्णु (शालग्राम) प्रतिदिन ग्रहण करते हैं। नृपश्रेष्ठ! आप उसे देखें।’ ऐसा कहकर उन कलिभक्तोंने अपनी मायासे चतुर्भुज विष्णुरूपको भोजन करते हुए राजाको दिखाया। आश्चर्यचकित हो धर्मपालने जयदेवसे कहा—‘गुरुदेव! मेरे घरपर विष्णुपरायण वैष्णव आये हैं। मैंने उनके प्रभावसे साक्षात् हरिका दर्शन किया है। इसलिये आप भी शीघ्र आयें।’ यह सुनकर जयदेव भी चकित हो राजदरबारमें आये। उस समय उन पाखण्डियोंने हँसते हुए राजासे कहा—‘राजन्! यह ब्राह्मण तो गौड़देशके राजाके यहाँ भोजन आदि बनानेका कार्य करता था। इसने धनके लोभसे छलकर भोजनमें विष

मिलाकर राजाको खिला दिया था। अतः यह दुष्ट व्यक्ति है। यह जानकर उस राजाने इस ब्राह्मणको शूलीपर चढ़ा दिया। इसी बीच हमलोग वहाँ पहुँचे। द्विजको पापी समझकर हमलोगोंने बहुत उपदेश दिया। उस राजाको भी हमलोगोंने बहुत समझाया, तब राजाने शूलीसे उतारकर इसके हाथ-पैर कटवा लिये। वह राजा भी हमारा शिष्य हो गया।’

उन चोरोंके ऐसा कहते (मिथ्या भाषण करते) ही दुःखित होकर पृथ्वी फट पड़ी और वे चोर पृथ्वीमें धँस गये। दयालु जयदेव चोरोंकी यह स्थिति देखकर रोने लगे। इनके रोते ही उनके कटे हाथ-पैर प्रकृतरूपमें हो गये। यह देखकर राजा धर्मपालको महान् आश्चर्य हुआ। उन्होंने जयदेवजीसे इसके विषयमें पूछा। तब जयदेवजीने सत्य-सत्य सारी घटना उन्हें बता दी। यह सुनकर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुआ। जयदेवद्वारा निर्मित ‘गीतगोविन्द’ पढ़कर उस राजाने मोक्ष प्राप्त किया। (अध्याय ९)

चैतन्य महाप्रभु, वाल्मीकि और शंकराचार्यके आविर्भावकी कथा

देवगुरु बृहस्पतिने कहा—देवेन्द्र! प्राचीन कालमें किसी समय वेदपारङ्गत विष्णुशर्मा नामके एक ब्राह्मण थे। वे प्रसन्नचित्तसे सर्वदेवमय विष्णुकी पूजा करते थे, इसलिये देवतालोग भी उनकी प्रतिष्ठा करते थे। वे भिक्षावृत्तिसे जीवननिर्वाह करते थे, उनकी स्त्री थी किंतु कोई पुत्र न था। एक समय उनके घरपर कोई अतिथि आया। दयालुहृदय उस महात्माने विष्णुशर्माकी स्त्रीकी आर्थिक स्थिति तथा नप्रता देख उसे तीन दिनोंके लिये एक पारसमणि दी और कहा कि इसके स्पर्शसे लोहा भी सोना हो जाता है। इतने दिनोंमें मैं सरयूमें स्नान कर तुम्हारे पास लौट आऊँगा। उसके जानेपर ब्राह्मणीने उस मणिसे पर्याप्त सोना

तैयार कर लिया। तबतक विष्णुशर्मा भी आ गये। उन्होंने अपार सुवर्णराशिसे सम्पन्न अपनी पत्नीको देखकर कहा—‘जहाँ वह पारसमणिका स्वामी गया है, तुम भी वहीं चली जाओ। मैं अकिञ्चन हूँ, विष्णुभक्त हूँ। चोर-डाकुओंके भयसे धनका संग्रह नहीं करता।’ इसपर उनकी पतिव्रता पत्नी डर गयी और पारसमणि उसे समर्पित कर पुनः उनकी सेवामें तत्पर हो गयी। ब्राह्मण विष्णुशर्माने उस सारे धन एवं पारसको घर्घरा—सरयू नदीमें फेंक दिया। तीन दिनोंके बाद उस अतिथिने आकर ब्राह्मणीसे पूछा कि क्या तुमने पारसमणिसे सोना नहीं बनाया? उसने कहा—‘मेरे पतिने उसे क्रोधपूर्वक ग्रहणकर घाघरामें फेंक दिया। उस

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  • प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *

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दिनसे मैं जिस-किसी प्रकार लोहेके बर्तनोंके अभावमें आगमें ही भोजन बना रही हूँ।'

यह सुनकर वह यति आश्चर्यचकित हो गया। दिनभर वहीं रुका रहा। संध्यासमय ब्राह्मणके आनेपर उसने रक्षस्वरमें कहा—'ब्राह्मण! तुम दैवद्वारा मोहित प्रतीत होते हो; क्योंकि तुम दरिद्र भी हो और धन भी संग्रह नहीं करना चाहते हो। अतः मेरा पारस शीघ्र ही लौटा दो, नहीं तो मैं अपना प्राण त्याग दूँगा।' यतिके इस प्रकार कहनेपर विष्णुशर्मा ने कहा—'तुम घाघराके किनारे जाओ, वहीं तुम्हारा पारस मिल जायगा।' यह कहकर यतिके साथ वहाँ जाकर उसने बहुत-से कंटकोंसे ढके अनेक पारसमणियोंको उसे दिखाया। उस यतिने ब्राह्मणको नमस्कार कर नम्रतापूर्वक कहा—'मैंने बारह वर्षांतक भलीभाँति शिवकी आराधना की, तब मैंने इस शुभ रत्नको प्राप्त किया। विप्रश्रेष्ठ! आपके दर्शनमात्रसे ही मुझ लोभात्माने आज अनेकों पारसमणियोंको प्राप्त कर लिया।' यह कहकर उससे शुभ ज्ञान प्राप्त कर मोक्ष प्राप्त कर लिया। इधर विष्णुशर्मा ने एक हजार वर्षांतक पृथ्वीपर रहकर सूर्यकी आराधना करके विष्णुलोकको प्राप्त किया। वे ही विष्णुशर्मा वैष्णव तेज धारणकर फाल्गुनके महीनेमें तीनों लोकोंमें तप रहे हैं और देवकार्य सिद्ध कर रहे हैं।

देवेन्द्र! फाल्गुन मासमें उन सूर्यकी आराधना कर तुम भी सुख प्राप्त करो। उन्होंने देवताओंके साथ ऐसा ही किया। प्रसन्न हो भगवान् सूर्य सूर्यमण्डलसे प्रकट होकर सभी देवताओंके देखते-देखते इन्द्रके शरीरमें प्रविष्ट हो गये। उस तेजसे इन्द्रने अपना शरीर अयोनिज विप्ररूपमें धारण किया और शचीदेवी भी पृथ्वीमें ब्राह्मणीके रूपमें अवतीर्ण हुई। एक वर्षके बाद शचीदेवीके गर्भसे भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षमें गुरुवारको द्वादशी तिथिमें ब्राह्मवेलामें एक दिव्य बालकका जन्म हुआ। जो

वास्तवमें भगवान् विष्णुके कलावतार थे। उस समय रुद्र, वसु, विश्वेदेव, मरुद्रण, साध्य, सिद्ध तथा भास्कर आदि देवोंने उस सनातन हरिरूप बालककी दिव्य स्तुति की और कलियुगमें दितिपुत्रोंद्वारा पीड़ित देवताओं तथा अधर्मसे दुःखी पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये प्रार्थना की। यही आगे चलकर श्रीकृष्णचैतन्यके नामसे विख्यात हुए।

सूतजी बोले—मुने! स्तुतिके अनन्तर सभी देवगण बृहस्पतिके पास आकर कहने लगे—महाभाग! हम सभी रुद्रगण, ये वसुगण तथा अश्विनीकुमार पृथ्वीपर किस-किस अंशरूपमें अवतरित होंगे, इसे आप बतलानेकी कृपा करें।

बृहस्पतिने कहा—देवगणो! इस विषयमें आप-लोगोंको मैं एक दूसरी बात बता रहा हूँ—प्राचीन कालमें मृगव्याध नामका एक अधम ब्राह्मण था। वह मार्गमें सदा धनुर्बाण धारणकर विप्रोंकी हिंसा किया करता था। वह महामूर्ख ब्राह्मणोंको मारकर उनके यज्ञोपवीतोंको ग्रहणकर उत्साहपूर्वक शोर मचाता था। वह दुष्ट द्विजाधम तीनों वर्णोंको, विशेषकर ब्राह्मणोंको मारता था। उस समय ब्राह्मणोंका विनाश देखकर देवगण भयभीत हो ब्रह्माके पास आये और सभी बातें उन्हें बतायीं। यह सुनकर दुःखी हो ब्रह्माने सभी लोकोंमें गमन करनेवाले सप्तर्षियोंसे कहा—'द्विजोत्तमो! आप सभी वहाँ जाकर मृगव्याधको समझाये।' यह सुनकर वसिष्ठ आदि ऋषियोंके साथ मरीचि मृगव्याधके वनमें गये। धनुर्बाणधारी महाबली मृगव्याधने उन लोगोंको देखकर भयंकर वचन कहा—'आज मैं तुमलोगोंको मारूँगा।' मरीचि आदिने हँसकर कहा—'तुम हमलोगोंको क्यों मारोगे? कुलके लिये मारोगे या अपने लिये, यह शीघ्र बताओ।' यह सुनकर उस मृगव्याधने कहा—'मैं अपने कुलके लिये और अपने कल्याणके लिये (तुमलोगोंको) मारूँगा।'

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३५४

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

यह सुनकर उन लोगोंने कहा—‘धनुर्धर ! अपने घरमें यह पूछकर शीघ्र आओ कि विग्रहत्यासे किये गये पापोंको कौन भोगेगा ? यह विचार करो ।’ यह सुनकर उस घोरात्माने अपने कुलवालोंसे पूछा—‘आजतक मैंने जो पाप अर्जित किया है, उसे तुमलोग भी वैसे ही ग्रहण करो, जैसे धनको ग्रहण किया है ।’ उस अधम ब्राह्मणके इस वचनको सुनकर उसके कुटुम्बियोंने कहा—‘हमलोग तुम्हारे किये गये पापको ग्रहण नहीं करेंगे, क्योंकि यह भूमि और ये सूर्य साक्षी हैं, हमलोगोंने कोई पाप नहीं किया है ।’ यह सुनकर उस मृगव्याधने मुनियोंके पास जाकर हाथ जोड़कर कहा—‘महात्माओ ! जिस प्रकार मेरे पापोंका क्षय हो, आपलोग वैसा उपाय बतायें ।’ मृगव्याधके यह कहनेपर ऋषियोंने कहा—‘एक उत्तम मन्त्र है, उसे सुनो—वह है ‘रामका नाम ।’ यह सभी प्रकारके पापोंको दूर करनेवाला है । अब हमलोग जा रहे हैं, जबतक वापस तुम्हारे पास न आ जायें, तबतक तुम इस महामन्त्र अर्थात् राम-नामका जप करो ।’ यह कहकर मुनिगण तीर्थान्तरोमें भ्रमण करने चले गये और वह मूर्ख व्याध विप्र ‘मरा-मरा’ का हजार वर्षतक निरन्तर जप करता रहा । उसके जपके प्रभावसे वह अरण्य उत्पलों (कमलों)–से परिव्याप्त हो गया और तभीसे वह स्थान पृथ्वीपर उत्पलारण्यके नामसे प्रसिद्ध हो गया१ ।

अनन्तर सप्तर्षि वल्मीक बने उस मृगव्याधके पास आये और उसकी मिट्टी हटाकर उसको शुद्ध विप्रके रूपमें देखकर आश्चर्यचकित होकर कहने लगे—‘वल्मीकसे निकलनेके कारण तुम वाल्मीकि कहे जाओगे । त्रिकालज्ञ महामति हे विप्र ! तुम इसी

नामसे प्रसिद्ध होओगे२ ।’ यह कहकर वे सप्तर्षि अपने-अपने स्थानपर चले गये । वाल्मीकिमुनिने अष्टादश कल्पसमन्वित शतकोटिविस्तृत तथा सभी पापोंका विनाशक निर्मल पद्यबद्ध रामायणका निर्माण किया । अनन्तर वे शिव होकर वहीं निवास करने लगे । देवगणों ! हरको प्रिय लगनेवाले उस मृगव्याध शिवके चरित्रको आपलोग सुनें ।

वैवस्वत मन्वन्तरके आद्य सत्ययुगमें ब्रह्माने उत्पलारण्यमें आकर एक यज्ञ किया । उस समय वहाँपर सरस्वतीदेवी नदी होकर आ गयीं । अनन्तर ब्रह्माने अपने मुखसे कल्याणकारी ब्राह्मणों, बाहुओंसे क्षत्रियों, ऊरुसे उत्तम वैश्यों और पैरोंसे शुभाचारसम्पन्न शूद्रोंको उत्पन्न किया । द्विजराज सोम (चन्द्रमा), सूर्य, तेज-वीर्यकी रक्षा करनेवाले कश्यप, मरीचि, रत्नाकर अर्थात् समुद्र एवं प्रजापति आदिको भी उत्पन्न किया । दक्षके मनसे अनेक कन्याएँ उत्पन्न हुईं । विष्णुमायाके प्रभावसे वे कलाओंके रूपमें पृथ्वीपर स्थित हुईं । भगवान् ब्रह्माने अश्विनी आदि सताईस नक्षत्र लोककी अभिवृद्धिके लिये सोमको तथा तेरह अदिति आदि कन्याएँ कश्यपको और कीर्ति आदि कन्याएँ धर्मको प्रदान कीं । उन्होंने वैवस्वत मन्वन्तरमें अनेक सृष्टियाँ कीं । ब्रह्माकी आज्ञाके अनुसार पृथ्वीपर दक्ष उन लोगोंके प्रजापति हुए । यज्ञमें तत्पर दक्ष प्रजापतिने स्वयं वहाँ निवास किया । सभी देवगण दक्षको नमस्कार कर वहाँ विचरण करते थे, किंतु भूतनाथ महादेवने कभी उनको नमस्कार नहीं किया । इससे क्रुद्ध होकर दक्षने यज्ञमें उन्हें भाग नहीं दिया । मृगव्याध शिव क्रुद्ध होकर वीरभद्रके रूपमें प्रकट हो गये । उनके

१-रामनाम हि तज्ञेयं सर्वाधोघविनाशनम् । (प्रतिसर्गपर्व ४।१०।५२)

२-मरामरामरेत्येवं सहस्राब्दं जजाप ह ॥

जपप्रभावादभवद्वनमुत्पलसंकुलम्

। तत्स्थानमुत्पलारण्यं प्रसिद्धमभवदभुवि ॥ (प्रतिसर्गपर्व ४।१०।५३-५४)

३-वल्मीकाग्निःसुतो यस्मात् तस्माद्वाल्मीकिरुतमम् । तव नाम भवेद्विप्र त्रिकालज्ञ महामते ॥ (प्रतिसर्गपर्व ४।१०।५६)

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  • प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *

३५५

साथ त्रिशिरा, त्रिनेत्र और त्रिपद शिवगण भी वहाँ आये। वीरभद्र आदिके द्वारा देव, मुनिगण और पितृगण पीड़ित होने लगे। उस समय यज्ञपुरुष भयभीत हो मृग होकर शीघ्रतासे भागने लगा। तब शिवने व्याधरूपको धारण किया। रुद्ररूपी व्याधके द्वारा वह मृग छिन्न-भिन्न अङ्गवाला हो गया। तब भगवान् ब्रह्मणे मधुर स्तुतियोंसे रुद्रव्याधको संतुष्ट किया। संतुष्ट मृगव्याधने दक्षके यज्ञको पूर्ण कराया। तुलाराशिमें सूर्यके आनेपर उस रुद्रको सताईस नक्षत्रवाले चन्द्रमण्डलमें स्थापित कर

स्वयं ब्रह्मा सत्यलोकको चले गये और रुद्र चन्द्रके समान रूपवान् हो गये। वीरभद्र रुद्रने यह सुनकर प्रसन्नचित्त हो अपने शरीरसे एक तेजको उत्पन्न कर भैरवदत्त नामक विप्रके घरमें भेजा। घोर कलियुगमें वही शिव शंकर (शंकराचार्य) नामसे उसके पुत्ररूपमें अवतरित हुए। वह बालक गुणवान्, सकल शास्त्रवेत्ता एवं ब्रह्मचारी हुआ। उसने शंकरभाष्यकी रचना कर शैवमतको प्रतिष्ठित किया और त्रिपुण्ड्र, अक्ष (रुद्राक्ष)-माला और पञ्चाक्षर-मन्त्र प्रदान किया। (अध्याय १०)

गिरिशर्मा, वनशर्मा तथा पुरीशर्माके आविर्भावका आख्यान

देवगुरु बृहस्पति बोले—देवेन्द्र! प्राचीन कालमें नैमिषारण्यमें अजगर नामका एक ब्राह्मण था। वह वेदान्तशास्त्रमें विशारद, ज्ञानवान् और भगवान् शंकरका उपासक था। उसने बारह वर्षमें पार्थिव-पूजाके द्वारा भगवान् रुद्रको संतुष्ट किया। भगवान् शिवने उसे ज्ञान प्रदानकर जीवन-मुक्ति प्रदान की। पुनः उस द्विजोत्तमने संकर्षणकी आराधना कर अनेक स्तुतियोंद्वारा उन्हें प्रसन्न किया। भगवान् संकर्षणने उसे सायुज्य प्रदान किया और अन्तमें वह भगवान्का आभूषण सर्प बन गया। वह हजार फणोंसे युक्त गौराङ्ग—गौरविग्रह था। उसका स्थान क्षीरसागरमें था। ब्रह्माजीने स्वयं आकर सूर्यके कर्कराशिस्य होनेपर चन्द्रमाके नक्षत्रमण्डलमें उस रुद्रको स्थापित किया और वह चन्द्रमाके रूपमें हो गया।

इस प्रकार गुरुके द्वारा कहे गये वचनोंको सुनकर शेषनाग रुद्रने प्रसन्नचित्त हो अपने मुखसे तेज उत्पन्न कर विन्ध्याद्रिमें देवदत्त ब्राह्मणके घरपर स्थापित किया और वही गिरिशर्मा विप्रके रूपमें उत्पन्न हुआ। वह विद्वानोंको जीतकर काशीपुरीमें आया और शंकरका शिष्य हो गया।

सूतजी बोले—मुने! अब आप देवगुरु बृहस्पतिद्वारा देवताओंसे कही गयी एक अन्य कथा सुनें। बृहस्पतिजीने कहा था—‘देवेन्द्र! पूर्वकालमें प्रयागमें नैऋत नामका एक प्रसिद्ध ब्राह्मण था, वह दरिद्रतासे दुःखी तथा मन्दभाग्य था। बहुत कष्टसे दिनभर माँगनेके बाद उसे भिक्षा प्राप्त होती थी। पुत्र-पत्नीके बाद वह नैऋत नित्य दरिद्रतासे पीड़ित रहता था। एक समय वैष्णवप्रिय देवर्षि नारद उसके पास आये और कहने लगे—विप्रश्रेष्ठ! यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड देवमय है और सभीके स्वामी भव (शंकर) हैं। इसलिये तुम भी शीघ्र ही भवका भजन करो। वे तुम्हारे कार्यको सिद्ध कर देंगे। देवर्षि नारदसे यह उपदेश पाकर नैऋतने परम भक्तिसे वर्षपर्यन्त पार्थिवार्चनद्वारा भगवान् शिवको संतुष्ट किया। भगवान् महेश्वरने प्रसन्न होकर कुबेरके समान उसे दिव्य विपुल धन प्रदान किया। उसने उस धनसे धर्म-कार्य सम्पन्न किया। इस कारण वह पुण्यात्माओंमें प्रसिद्ध हुआ। शिवभक्तिके प्रभावसे वह अकंटक द्रव्य प्राप्तकर हजार वर्षतक जीवित रहकर अन्तमें प्राण परित्यागकर स्वर्गमें चला गया और वृषराशिमें सूर्यके स्थित

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

रहनेपर चन्द्रके समान सुशोभित होकर सर्वजनप्रिय नैऋत रुद्रके नामसे विख्यात हुआ।'

सूतजीने कहा—शौनक! वही नैऋत अपने अंशसे पृथ्वीपर आकर गिरिनालगिरिके वनमें वनवासी सिद्ध सांख्ययोगीके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुआ और वेदशास्त्रपरायण वनशर्माके नामसे विख्यात हुआ। उसने बारह वर्षकी अवस्थामें अनेक विद्वानोंको जीत लिया। पुनः तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिकी अभिलाषासे काशीमें आकर श्रेष्ठ शंकराचार्यको प्रणाम कर उनका शिष्य हो गया।

बृहस्पतिजीने पुनः कहा—देवेन्द्र! माहिष्मतीमें एक शिवभक्त वसुशर्मा नामक ब्राह्मण रहता था। वह पुत्रकी कामनासे पार्थिवार्चनमें विशेषरूपसे तत्पर रहता था। अनेक प्रयत्न करनेके बाद भगवान् शंकरने प्रकट होकर वर माँगनेको कहा। तब उस विप्रने कहा—'शरणागतवत्सल! आप मुझे पुत्र प्रदान करें।' इसपर शंकरने कहा—'वत्स! तुम्हारे भाग्यमें पुत्र नहीं लिखा है, फिर भी मैं तुम्हें अपने अंशसे एक तेजस्वी पुत्र दे रहा हूँ।' ऐसा कहकर उन्होंने

एक तेज प्रकट किया और उसी तेजसे उसे एक सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ। उस पुत्रका एक पैर मनुष्यके समान और दूसरा पैर अजके समान था। अतः पृथ्वीपर वह अजैकपाद नामसे विख्यात हुआ। चार सौर वर्ष बीतनेपर मृत्युदेवता अपने गणोंके साथ वहाँ आये। अजैकपादके साथ उनका भयंकर युद्ध हुआ। अन्तमें अजैकपाद युद्धमें विजयी होकर मृत्युञ्जय नामसे पृथ्वीपर प्रसिद्ध हुए। उससे पराजित एवं दुःखी होकर मृत्युदेवताने अपना कष्ट ब्रह्माजीसे कहा, तब भगवान् ब्रह्माने सभी देवोंके साथ सूर्यके कुम्भस्थ होनेपर उस ब्राह्मणको भयहारी रुद्रके रूपमें चन्द्रमण्डलका अधिपति बनाया।

सूतजी बोले—मुने! अनन्तर वही अजैकपाद माहिष्मतीपुरीमें आकर कलिको शुद्धि प्रदान करनेवाले प्रभुके रूपमें पुरीशर्माके नामसे विख्यात हुआ और यतिदत्तके पुत्रके रूपमें पुनः अवतीर्ण हुआ। उसने सोलह वर्षमें वेदपारङ्गत विद्वानोंको जीतकर शंकराचार्यके पास आकर उनका शिष्यत्व स्वीकार किया। (अध्याय ११)

भारती, नाथशर्मा, क्षेत्रशर्मा तथा ढुंडिराजकी उत्पत्ति-कथा

बृहस्पतिजी बोले—देवेन्द्र! पूर्वकालमें संसारके लिये कंटक बना हुआ हिर्बु नामका एक दानव था। वह निकुम्भकी वंशपरम्परामें उत्पन्न हुआ था और इन्द्रके समान पराक्रमी था। जब हजार वर्षतक तपस्या करके उसने देवताओंको पराजित किया, तब लोकरक्षाके लिये उद्यत लोकपति ब्रह्माने उससे वर माँगनेको कहा। उसने उन्हें प्रणाम कर विश्वके सभी प्राणिपदार्थोंसे 'मैं मारा न जा सकूँ' यह वर माँगा। 'ऐसा ही होगा' यह कहकर ब्रह्मा ब्रह्मलोक चले गये। वर प्राप्तकर उस भयंकर दैत्यने देवताओंको जीतकर स्वर्गसे भगा दिया

और दैत्योंको वहाँ बसाया। इस प्रकार देवताओंने भीषण यन्त्रणा भोगी। उनकी दुर्दशा देखकर नारदजीने कहा—'देवगणो! आपलोग शंकरकी उपासना करें। भगवान् शंकर ब्रह्माण्डके स्वामी हैं तथा विपत्तियोंके नाशक हैं।' यह सुनकर देवताओंने देवदेव भगवान् उमापतिकी पार्थिवपूजा प्रारम्भ कर दी। पूजा करते हुए ग्यारह वर्ष व्यतीत होनेपर लोककल्याणकारी भगवान् शिव प्रसन्न हो गये और ज्योतिर्लिङ्गमय होकर देवभक्तोंको छोड़ शेष सभी असुरोंको दग्ध करने लगे। इससे प्रसन्न होकर ब्रह्माने विष्णुके साथ आनन्दपूर्वक सामसूक्तोंसे महारुद्रको प्रसन्न

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  • प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *

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किया। सूर्यके मिथुन राशिमें स्थित होनेपर हिर्बु दैत्यका विनाश करनेवाले महारुद्रको देवताओंके कल्याणके लिये शशिमण्डलका राजा बनाया। यह महारुद्र देवकार्यके लिये तत्पर हो गया। अनन्तर यही महारुद्र रमणीय हिमालयपर्वतपर साधकर्मके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुआ और बादमें कलाओंका ज्ञाता भारतीय नामसे प्रसिद्ध हुआ। विद्वत्समुदायको जीतकर फिर वह काशी नगरीमें चला आया और शंकराचार्यका शिष्य हो गया।

बृहस्पतिजीने पुनः कहा— देवेन्द्र ! मयका एक पुत्र था मायी, वह एक पैरपर खड़ा होकर एक हजार वर्षोंतक घोर तपस्या करता रहा। उसने अपनी तपस्याके द्वारा संसारके सभी प्राणियोंको संतप्त कर दिया। अनन्तर भगवान् परमेशी पितामहने प्रसन्न होकर तीन गाँवों (तीन पुरों—त्रिपुर) को उसके भोगके लिये निर्मित किया। सोलह योजनावाले विस्तृत स्वर्गके समान सुवर्णमय, उसके नीचे भुवलोकके समान एक योजन विस्तृत रजतमय तथा उसके नीचे भूलोकके समान एक योजन विस्तृत लौहमय तीन पुर बनवाये। इस प्रकार उस त्रिपुरमें सौ करोड़ दैत्य तथा दैत्यपत्नियाँ निवास करने लगीं। वे देवताओंके यज्ञभागको ग्रहणकर देवताओंके समान हो गये। यज्ञभाग न मिलनेके कारण निर्बल देवगण भूखसे पीड़ित हो भगवान् विष्णुके पास गये और उनकी स्तुति कर कहने लगे—‘ भगवन् ! प्रभो ! मयपुत्र मायीके द्वारा प्राप्त दुःखोंको भोगते हुए हमें बहुत ही दीर्घ समय हो गया है, हम सभी अधिकारविहीन होकर रह रहे हैं। स्वर्गमें मायी दैत्यका ही राज्य है। देवताओंकी बात सुनकर भगवान् मधुसूदन संस्कृतवार्ता करनेवाले त्रिपुरस्थित धर्मपरायण दैत्योंको देखकर भयानक कलियुगमें बौद्धरूपमें अजिन द्विजके पुत्र होकर उत्पन्न हुए। उस बौद्धने वेदधर्मपरायण विप्रोंको

मोहित कर दिया। तामस मन्वन्तरमें तीनों वर्ण वेदविहीन, कर्मरहित तथा वैराग्यसम्पन्न हो गये। सोलहवें कलिकी प्राप्ति होनेपर वे सभी यज्ञरहित हो गये। इस कारण त्रिपुरनिवासियोंको यज्ञभाग मिलना बंद हो गया, अतः सभी त्रिपुरनिवासी दैत्यगण क्रोधाविष्ट हो वेदरहित तथा यज्ञशून्य उन मनुष्योंको पीड़ित करने लगे। कल्पान्तमें दैत्योंसे भक्षित हो सभी मनुष्य विनष्ट हो गये।

पुनः सत्यलोकके आनेपर देवताओंने कैलासमें सभी लोगोंका कल्याण चाहनेवाले भगवान् शम्भुकी आराधना की। भगवान् शंकर ज्योतिर्लिङ्गरूप धारण कर वहाँ अवस्थित हो गये। इस कारण देवता प्रसन्न हो गये। उन्होंने भूमिके सारको ग्रहणकर विधिपूर्वक एक रथका निर्माण किया। चन्द्र और सूर्यके सारसे रथके दो चक्र बनाये। इसी प्रकार सुमेरुके सारसे रथका ध्वज बनाकर वह स्यन्दनरूपी यान भगवान् शिवको प्रदान किया। भगवान् ब्रह्मा स्वयं यहाँ आकर रथके सारथि बने। उन देवाधिदेवके रथके घोड़े चारों वेद हुए। उनका धनुष लोकालोक पर्वतका सार—तत्त्व ही आजगव नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह घोर शब्द करनेवाला था। भगवान् शंकर जब प्रत्यञ्चा बनाकर धनुषपर चढ़ाने लगे तब देवाधिदेवके क्रोधके कारण वह चाप टूट गया। यह देखकर भगवान् विष्णु आश्चर्यचकित हो गये। तदनन्तर उन्होंने स्वर्गके सारको ग्रहण कर पिनाक नामक एक दिव्य धनुषका निर्माण किया। रुद्रने पुनः उस धनुषकी प्रत्यञ्चा चढ़ायी। वह धनुष दूढ़ था, अतः भग्रीभूत नहीं हुआ। इस कारण ब्रह्मादि देवताओंने प्रसन्नचित्तसे उनकी स्तुति की और तबसे भगवान् महेश्वर ‘पिनाकी’ नामसे प्रसिद्ध हुए। शेषनाग उस चापकी डोरी थे और इन्द्र बाणरूप बने। बाणके पक्षपर वहि और वायु तथा शल्यपर सनातन विष्णु स्थित हुए। उस

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

धनुष-बाणसे करोड़ों दैत्य आकाशमें मारे गये। भगवान् शिवने मायीसे पालित उस त्रिपुरको जला दिया।

उस भयंकर त्रिपुरके भस्मीभूत होनेपर लोकपति ब्रह्माने मीन राशिमें रविके स्थित होनेपर पिनाकी महारुद्रको चन्द्रमण्डलका राजा बनाया और तामस मन्वन्तरमें देवताओंने अपने-अपने अधिकारको पुनः प्राप्त कर लिया।

सूतजीने कहा— मुने! अनन्तर पिनाकीने अपने मुखसे अपने उत्तम अंशको उत्पन्न कर हरिद्वारमें अवस्थित मच्छन्द* नामक योगीके मुखमें अपने तेजको प्रविष्ट कराया। वह मच्छन्द भगवान् शम्भुकी पूजा करनेवाला तथा गोरखका गुरु था। उस तेजसे नाथशर्मा नामक एक बड़ा विद्वान्, श्रेष्ठ एवं सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ। वह पृथ्वीके सभी विद्वानोंको जीतकर काशीपुरीमें चला आया और शंकराचार्यका शिष्य हो गया।

देवेन्द्र! चाक्षुष मन्वन्तरके बारहवें द्वारमें तालजंघवंशमें उत्पन्न क्षत्रियोंके द्वारा भृगुवंशमें उत्पन्न ब्राह्मणोंका कुरुक्षेत्रमें विनाश हुआ और उनके प्रचुर धनको लेकर वे क्षत्रिय दैत्योंके पक्षपाती हो गये। उसी समय किसी ब्राह्मणकी गर्भवती स्त्री डरकर तपस्याके प्रभावसे सौ वर्षोंतक अपने गर्भको धारण किये रह गयी। इसे सहन न कर गर्भस्थ शिशु माताके ऊरुप्रदेशको विदीर्णकर पृथ्वीपर आ गया। उसके तेजसे सम्पूर्ण जगत् भस्मीभूत होने लगा। तब सभी देवगण प्रजापतिको आगे कर भयसे आतुर हो उसके पास आये। उस बालकने पितरों और देवताओंकी आज्ञासे उस लोकनाशकारी तेजको जलके बीचमें फेंक दिया। जलदेवीने वडवा-स्वरूप धारणकर उस उत्तम तेजका पान कर लिया, किंतु रौद्र तेजसे पीड़ित

हो उसने उस तेजका वमन कर दिया। ब्रह्माजीने त्रिकुटगिरिपर आकर उसके नीचे घोर सागरमें लोककी रक्षाकी दृष्टिसे उस तेजको स्थापित कर दिया। पुनः परमेष्ठी पितामहने मेघ राशिमें सूर्यके आनेपर उस रौद्र तेजको रुद्ररूपमें शशिमण्डलके स्वामीके रूपमें स्थापित किया। वह ऊरुसे उत्पन्न होनेके कारण वीर्य, संसारका दहन करनेके कारण दहन और वडवाके मुखसे उत्पन्न होनेके कारण वाडव नामसे प्रसिद्ध हुआ।

सूतजी बोले— मुने! उस दहनेने अपने मुखसे तेज उत्पन्न किया और वही कुरुक्षेत्रनिवासी सारस्वत ब्राह्मणके घरमें क्षेत्रशर्माके नामसे विख्यात हुआ। वह विद्वानोंमें श्रेष्ठ हुआ। शंकराचार्यसे पराजित हो उनका शिष्य हुआ और ब्रह्मचर्यव्रत धारणकर भगवान् शंकरकी उपासना करता हुआ काशीमें स्थित हो गया।

बृहस्पतिने पुनः कहा— देवेन्द्र! पूर्वकालमें सारे संसारके एकार्णव हो जाने तथा स्थावर और जंगम सभीके नष्ट हो जानेपर एवं अव्यक्तजन्मा ब्रह्माके सौ वर्ष बीतनेपर मायारूपी प्रकृतिने आनन्दपूर्वक उस जलका पान कर लिया। फिर तमोमयी महाकाली उस दारुण प्राकृत जगत्में एकाकी उत्पन्न हुई। अनन्तर नित्य शुद्ध सनातन प्रकृति स्वेच्छासे महागौरीके रूपमें परिणत हो गयी। उनके पाँच मुख, दस भुजाएँ तथा तीन नेत्र थे। वह शिवा नामवाली हुई। ललाटस्थ नेत्रद्वारा उस माताने सूक्ष्म तेजका दर्शन किया। वह तेज नित्य, अविकारी, निरञ्जन तथा सर्वत्र दिशाओंमें परिव्याप्त था। उस ब्रह्मको प्रकृतिने ग्रहण करनेकी इच्छा की, परंतु समर्थ न हो सकी। आश्चर्यचकित हो उस प्रकृतिने अपने पाँचों मुखोंसे भक्तिपूर्वक प्रार्थनाकर परात्पर पूर्ण ब्रह्मको प्रसन्न किया। वह

  • इस कथानकमें नाथसम्प्रदायका इतिहास अन्तर्निहित दीखता है।

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  • प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *

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सर्वज्ञ ब्रह्म प्रकृतिके पाँचों मुखोंमें प्रविष्ट हो गया। वह ब्रह्म पुरुषत्वको प्राप्तकर स्वयम्भू नामसे प्रसिद्ध हुआ और अव्यक्त प्रकृतिसे उत्पन्न होनेके कारण वे अव्यक्तजन्मा कहे गये। उनके निमित्त वरदा, लोकरूपिणी अष्टादश भुजाओंसे युक्त देवी महालक्ष्मी उत्पन्न हुई। वे संसारकी रक्षा करने लगीं। उनके अद्भुत रूपको देखकर स्वयम्भू आश्चर्यचकित हो गये। अनेक रूपोंमें प्रवेश करके भी स्वयम्भू उनके अन्तको प्राप्त नहीं कर सके। बृहत् और बहुरूप होनेके कारण वे ब्रह्मा नामसे विख्यात हुए। थककर भगवान् ब्रह्मा सत्यलोकमें चले आये। उन्होंने मुखसे आविर्भूत वेदोंसे शंकरकी दीर्घकालतक स्तुति की। उनके अङ्गसे नदी-नद उत्पन्न हुए। पुनः जलमय समुद्र हो जानेसे वहाँ स्वयं प्रभुने शयन किया। अव्यक्त स्वयम्भूने सहस्रयुगपर्यन्त वहाँ निवासकर सत्यलोकमें आकर पुनः सृष्टि आरम्भ कर दी। गणरूपा अनन्त सृष्टियाँ पृथक्-पृथक् उत्पन्न हुई। उससे महालक्ष्मीमय व्यक्त जगत् हुआ। महासनातनी महालक्ष्मीदेवी सृष्टिके अनेकत्वको देखकर आश्चर्यचकित हो गयीं और सर्वेश्वर भगवान्के पास आयीं तथा अव्यक्त मङ्गलरूप विष्णुको नमस्कारकर कहने लगीं— 'भगवन्! आप नित्य और शुद्धात्मा हैं, संसारमें बहुत-से प्राणी हो गये हैं, मैं इन लोगोंकी गणना कैसे कर सकती हूँ।' महालक्ष्मीके इस वचनको सुनकर वे ब्रह्म दो रूपोंमें विभक्त हो गये। पूर्वार्धसे रक्ताङ्ग और परार्धसे गौराङ्ग। रक्ताङ्ग और गौराङ्ग दोनों चतुर्भुज हुए। सम्पूर्ण सृष्टिगणोंका स्वामी रक्ताङ्ग गणेश हुआ, वही ईश्वर कहलाता है। परार्धसे उत्पन्न गौरवर्ण जो चतुर्भुजी है उसका ध्यान योगीलोग करते हैं, वह निरञ्जन है।

एक बार पार्वतीवल्लभ भगवान् शिवने एक हजार वर्षतक प्रयत्नपूर्वक गणेशकी पूजा की। तब

शर्वपूजक भगवान् गणेशने प्रसन्न होकर पार्वतीसहित हरको वर माँगनेके लिये कहा। इसपर भगवान् शंकरने उनकी भक्तिपूर्वक इस प्रकार स्तुति की—

नमो विष्णुस्वरूपाय गणेशाय परात्मने। चतुर्भुजाय रक्ताय यज्ञपूर्णकराय च॥ विघ्नहन्त्रे जगद्भद्रं सर्वानन्दप्रदायिने। सिद्धीनां पतये तुभ्यं निधीनां पतये नमः॥ प्रसन्नो भव देवेश पुत्रो भव मम प्रियः।

(प्रतिसर्गपर्व ४।१२।१०—१२)

'विष्णुस्वरूप परात्मा गणेशको नमस्कार है। चतुर्भुजधारी, रक्तवर्ण, यज्ञमूर्ति, विघ्नहन्ता, जगत्का धारण-पोषण करनेवाले, सभीके आनन्ददाता, निधिपति तथा सिद्धिपति भगवान् गणेश! आपको नमस्कार है। देवेश! आप प्रसन्न हों, मेरे प्रिय पुत्रके रूपमें उत्पन्न हों।' इसपर गणेशजी पार्वतीजीके तेजोमय शरीरसे उत्पन्न हुए। इन्द्रके साथ सभी देवगण कैलासशिखरपर उनका मङ्गलमय दर्शन करनेके लिये आये। वहाँ सर्वसुखद महोत्सव हो रहा था। इसी समय क्रूरदृष्टि कालात्मा, सूर्यपुत्र शनिदेव मण्डपमें आये। उनके दर्शनमात्रसे वह बालक मस्तकविहीन हो गया। तब गुह्यकोंके निवासस्थान उस कैलासमें महान् हाहाकार मच गया। वह कटा हुआ सिर सूर्यके तुला राशिस्थ होनेपर चन्द्रलोकमें स्थित हो सताईस दिनतक पृथ्वीपर प्रकाशित होता है। सभी देवताओंसे विनिन्दित भयंकर शनिदेवने एक दाँतवाले गजके रँगें हुए मस्तकको काटकर उस बालकके स्कन्धपर जोड़ दिया और ब्रह्माने उसकी माताके द्वारा स्तुति किये जानेपर कर्कटके सिरको गजके ऊपर स्थितकर गजयोनिवाला बना दिया और कर्कटको बिना सिरका कर दिया। इस प्रकार साक्षात् ईश्वरस्वरूप गजानन गणेश उत्पन्न हुए।

सूतजीने कहा—बृहस्पतिसे ऐसा सुनकर भगवान्

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

गणेशने अपने मुखसे स्कन्ध उत्पन्न किया और वही ईश्वररूप स्कन्ध काशीमें एक दैवज्ञ द्विजके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुआ और महीतलमें दुंदिराजके नामसे प्रसिद्ध हुआ। फलितज्योतिषके 'जातकाभरण'

नामक ग्रन्थका निर्माण कर वह वेदकी रक्षाके लिये शंकराचार्यके पास आया। वह प्रसन्नतामा उनका शिष्य होकर गुरुसेवामें तत्पर हो गया। (अध्याय १२)

अघोरपंथी भैरव तथा बालशर्माकी उत्पत्तिकी कथामें रावण तथा हनुमान्जीका चरित्र

सूतजी बोले—शौनक! भगवान् कपाली शिव अपने अंशसे काशीमें अयोनिजरूपसे उत्पन्न हुए। वे कपालमोचनकुण्डसे पृथ्वीपर आकर यतिरूप वेदनिधि भैरव नामसे प्रख्यात हुए और उन्होंने दुष्कर अघोरमार्गका अपने शिष्योंमें प्रवर्तन किया। फिर वे शंकराचार्यके पास आकर उनके शिष्य हो गये। उन्होंने मन्त्रमय डामरतन्त्रका प्रवर्तन किया और कीलित मन्त्रोंके उत्कीलनका मार्ग बतलाया।

बृहस्पतिजीने कहा—देवेन्द्र! मय दानवकी पुत्री मन्दोदरी त्रिपुरके अधिपति मायीकी बहन थी। त्रिपुरके नष्ट होनेपर वह देवी मन्दोदरी सनातन महाविष्णुको गुप्तभावसे निरन्तर संतुष्ट करती रहती थी। भगवान् विष्णुमें भक्तिभावना करनेसे मन्दोदरीको उत्तम योग प्राप्त हुआ और वह भयंकर विन्ध्याद्रिकी गुफामें विलीन हो गयी। उसकी समाधिमें चारों युग दो सौ बार बीत गये। वैवस्वत मन्वन्तरके बारहवें सत्ययुगमें ब्रह्माजीके पुत्र पुलस्त्य हुए, जिनसे विश्रवा नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। सौ वर्षतक विश्रवामुनिने तपस्याकर सुमाली दैत्यकी पुत्री कैकसीके साथ विवाह किया और उससे रावण और कुम्भकर्ण दो राक्षस पुत्र उत्पन्न हुए। रावण मातृभक्त था और भाई कुम्भकर्ण पितृभक्त। वरकी कामनासे उन दोनोंने हजार वर्षोंतक घोर तपस्या की। भगवान् परमेश्वी पितामहने प्रसन्न होकर उन दोनोंको देव और दानवोंसे अजेय होनेका वर दिया। उन दोनोंने वर प्राप्तकर क्रुद्ध हो श्रेष्ठ

पुष्पकयानको ग्रहणकर देवताओंसे युद्ध किया। उन दोनोंसे पराजित देवताओंने सुखप्रद स्वर्गको छोड़कर पार्थिवार्चनके द्वारा कैलासमें स्थित भगवान् शिवकी ग्यारह वर्षोंतक आराधना की और उनसे वर प्राप्तकर वे सभी निर्भय हो गये।

इधर गौतम-ऋषिके शरीरसे उत्पन्न केशरीकी पत्नी अञ्जनाके गर्भसे हनुमान्जीके रूपमें भगवान् शंकरने भी अपने अंशसे अवतार लिया और आकाशमें उगते हुए लाल सूर्यको देख फल समझकर निगल लिया। अन्धकार देखकर इन्द्रने उनकी टुट्टी (हनु)- पर अपने वज्रसे प्रहार किया। इसी बीच रावण भी उनकी पूँछ पकड़कर लटक गया, फिर भी उन्होंने सूर्यको नहीं छोड़ा। रावणसे एक वर्षतक मुष्टियुद्ध होता रहा। अन्तमें थका हुआ रावण रुद्ररूपी हनुमान्से भयभीत हो इधर-उधर भागा। इसी समय ऋषि विश्रवा वहाँ आये और वेदमय स्तोत्रोंसे परावाणीद्वारा हनुमान्को प्रसन्न किया। प्रसन्न हो रुद्ररूपी हनुमान्ने संसारको रूलानेवाले रावणको छोड़ दिया। फिर बलवान् केशरीपुत्र पम्पापुरके तटपर निवास करने लगे और अचलरूपसे स्थित होनेके कारण स्थाणु नामसे प्रसिद्ध हुए। संसारको रूलानेवाले तथा देवताओंको मारनेवाले रावणको मुष्टिकासे हनन करनेके कारण इनका नाम हनुमान् पड़ गया*। हनुमान्जीकी तपस्यासे प्रसन्न हो भगवान् ब्रह्मने कहा—'तपोनिधे रुद्र! आप मेरी बात सुनें। वैवस्वत मन्वन्तर अट्टाईसवें त्रेतायुगके प्रथम चरणमें

  • निवृत्तं च सुरान् मुख्यान् रावणं लोकरावणम् ॥ निहन्ति मुष्टिर्भयः स हनुमानिति विश्वतः ॥ (प्रतिसर्गपर्व ४।१३।४४-४५)

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