भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

यह सुनकर उन लोगोंने कहा—‘धनुर्धर ! अपने घरमें यह पूछकर शीघ्र आओ कि विग्रहत्यासे किये गये पापोंको कौन भोगेगा ? यह विचार करो ।’ यह सुनकर उस घोरात्माने अपने कुलवालोंसे पूछा—‘आजतक मैंने जो पाप अर्जित किया है, उसे तुमलोग भी वैसे ही ग्रहण करो, जैसे धनको ग्रहण किया है ।’ उस अधम ब्राह्मणके इस वचनको सुनकर उसके कुटुम्बियोंने कहा—‘हमलोग तुम्हारे किये गये पापको ग्रहण नहीं करेंगे, क्योंकि यह भूमि और ये सूर्य साक्षी हैं, हमलोगोंने कोई पाप नहीं किया है ।’ यह सुनकर उस मृगव्याधने मुनियोंके पास जाकर हाथ जोड़कर कहा—‘महात्माओ ! जिस प्रकार मेरे पापोंका क्षय हो, आपलोग वैसा उपाय बतायें ।’ मृगव्याधके यह कहनेपर ऋषियोंने कहा—‘एक उत्तम मन्त्र है, उसे सुनो—वह है ‘रामका नाम ।’ यह सभी प्रकारके पापोंको दूर करनेवाला है । अब हमलोग जा रहे हैं, जबतक वापस तुम्हारे पास न आ जायें, तबतक तुम इस महामन्त्र अर्थात् राम-नामका जप करो ।’ यह कहकर मुनिगण तीर्थान्तरोमें भ्रमण करने चले गये और वह मूर्ख व्याध विप्र ‘मरा-मरा’ का हजार वर्षतक निरन्तर जप करता रहा । उसके जपके प्रभावसे वह अरण्य उत्पलों (कमलों)–से परिव्याप्त हो गया और तभीसे वह स्थान पृथ्वीपर उत्पलारण्यके नामसे प्रसिद्ध हो गया१ ।

अनन्तर सप्तर्षि वल्मीक बने उस मृगव्याधके पास आये और उसकी मिट्टी हटाकर उसको शुद्ध विप्रके रूपमें देखकर आश्चर्यचकित होकर कहने लगे—‘वल्मीकसे निकलनेके कारण तुम वाल्मीकि कहे जाओगे । त्रिकालज्ञ महामति हे विप्र ! तुम इसी

नामसे प्रसिद्ध होओगे२ ।’ यह कहकर वे सप्तर्षि अपने-अपने स्थानपर चले गये । वाल्मीकिमुनिने अष्टादश कल्पसमन्वित शतकोटिविस्तृत तथा सभी पापोंका विनाशक निर्मल पद्यबद्ध रामायणका निर्माण किया । अनन्तर वे शिव होकर वहीं निवास करने लगे । देवगणों ! हरको प्रिय लगनेवाले उस मृगव्याध शिवके चरित्रको आपलोग सुनें ।

वैवस्वत मन्वन्तरके आद्य सत्ययुगमें ब्रह्माने उत्पलारण्यमें आकर एक यज्ञ किया । उस समय वहाँपर सरस्वतीदेवी नदी होकर आ गयीं । अनन्तर ब्रह्माने अपने मुखसे कल्याणकारी ब्राह्मणों, बाहुओंसे क्षत्रियों, ऊरुसे उत्तम वैश्यों और पैरोंसे शुभाचारसम्पन्न शूद्रोंको उत्पन्न किया । द्विजराज सोम (चन्द्रमा), सूर्य, तेज-वीर्यकी रक्षा करनेवाले कश्यप, मरीचि, रत्नाकर अर्थात् समुद्र एवं प्रजापति आदिको भी उत्पन्न किया । दक्षके मनसे अनेक कन्याएँ उत्पन्न हुईं । विष्णुमायाके प्रभावसे वे कलाओंके रूपमें पृथ्वीपर स्थित हुईं । भगवान् ब्रह्माने अश्विनी आदि सताईस नक्षत्र लोककी अभिवृद्धिके लिये सोमको तथा तेरह अदिति आदि कन्याएँ कश्यपको और कीर्ति आदि कन्याएँ धर्मको प्रदान कीं । उन्होंने वैवस्वत मन्वन्तरमें अनेक सृष्टियाँ कीं । ब्रह्माकी आज्ञाके अनुसार पृथ्वीपर दक्ष उन लोगोंके प्रजापति हुए । यज्ञमें तत्पर दक्ष प्रजापतिने स्वयं वहाँ निवास किया । सभी देवगण दक्षको नमस्कार कर वहाँ विचरण करते थे, किंतु भूतनाथ महादेवने कभी उनको नमस्कार नहीं किया । इससे क्रुद्ध होकर दक्षने यज्ञमें उन्हें भाग नहीं दिया । मृगव्याध शिव क्रुद्ध होकर वीरभद्रके रूपमें प्रकट हो गये । उनके

१-रामनाम हि तज्ञेयं सर्वाधोघविनाशनम् । (प्रतिसर्गपर्व ४।१०।५२)

२-मरामरामरेत्येवं सहस्राब्दं जजाप ह ॥

जपप्रभावादभवद्वनमुत्पलसंकुलम्

। तत्स्थानमुत्पलारण्यं प्रसिद्धमभवदभुवि ॥ (प्रतिसर्गपर्व ४।१०।५३-५४)

३-वल्मीकाग्निःसुतो यस्मात् तस्माद्वाल्मीकिरुतमम् । तव नाम भवेद्विप्र त्रिकालज्ञ महामते ॥ (प्रतिसर्गपर्व ४।१०।५६)

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