भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 366, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
३५५
साथ त्रिशिरा, त्रिनेत्र और त्रिपद शिवगण भी वहाँ आये। वीरभद्र आदिके द्वारा देव, मुनिगण और पितृगण पीड़ित होने लगे। उस समय यज्ञपुरुष भयभीत हो मृग होकर शीघ्रतासे भागने लगा। तब शिवने व्याधरूपको धारण किया। रुद्ररूपी व्याधके द्वारा वह मृग छिन्न-भिन्न अङ्गवाला हो गया। तब भगवान् ब्रह्मणे मधुर स्तुतियोंसे रुद्रव्याधको संतुष्ट किया। संतुष्ट मृगव्याधने दक्षके यज्ञको पूर्ण कराया। तुलाराशिमें सूर्यके आनेपर उस रुद्रको सताईस नक्षत्रवाले चन्द्रमण्डलमें स्थापित कर
स्वयं ब्रह्मा सत्यलोकको चले गये और रुद्र चन्द्रके समान रूपवान् हो गये। वीरभद्र रुद्रने यह सुनकर प्रसन्नचित्त हो अपने शरीरसे एक तेजको उत्पन्न कर भैरवदत्त नामक विप्रके घरमें भेजा। घोर कलियुगमें वही शिव शंकर (शंकराचार्य) नामसे उसके पुत्ररूपमें अवतरित हुए। वह बालक गुणवान्, सकल शास्त्रवेत्ता एवं ब्रह्मचारी हुआ। उसने शंकरभाष्यकी रचना कर शैवमतको प्रतिष्ठित किया और त्रिपुण्ड्र, अक्ष (रुद्राक्ष)-माला और पञ्चाक्षर-मन्त्र प्रदान किया। (अध्याय १०)
गिरिशर्मा, वनशर्मा तथा पुरीशर्माके आविर्भावका आख्यान
देवगुरु बृहस्पति बोले—देवेन्द्र! प्राचीन कालमें नैमिषारण्यमें अजगर नामका एक ब्राह्मण था। वह वेदान्तशास्त्रमें विशारद, ज्ञानवान् और भगवान् शंकरका उपासक था। उसने बारह वर्षमें पार्थिव-पूजाके द्वारा भगवान् रुद्रको संतुष्ट किया। भगवान् शिवने उसे ज्ञान प्रदानकर जीवन-मुक्ति प्रदान की। पुनः उस द्विजोत्तमने संकर्षणकी आराधना कर अनेक स्तुतियोंद्वारा उन्हें प्रसन्न किया। भगवान् संकर्षणने उसे सायुज्य प्रदान किया और अन्तमें वह भगवान्का आभूषण सर्प बन गया। वह हजार फणोंसे युक्त गौराङ्ग—गौरविग्रह था। उसका स्थान क्षीरसागरमें था। ब्रह्माजीने स्वयं आकर सूर्यके कर्कराशिस्य होनेपर चन्द्रमाके नक्षत्रमण्डलमें उस रुद्रको स्थापित किया और वह चन्द्रमाके रूपमें हो गया।
इस प्रकार गुरुके द्वारा कहे गये वचनोंको सुनकर शेषनाग रुद्रने प्रसन्नचित्त हो अपने मुखसे तेज उत्पन्न कर विन्ध्याद्रिमें देवदत्त ब्राह्मणके घरपर स्थापित किया और वही गिरिशर्मा विप्रके रूपमें उत्पन्न हुआ। वह विद्वानोंको जीतकर काशीपुरीमें आया और शंकरका शिष्य हो गया।
सूतजी बोले—मुने! अब आप देवगुरु बृहस्पतिद्वारा देवताओंसे कही गयी एक अन्य कथा सुनें। बृहस्पतिजीने कहा था—‘देवेन्द्र! पूर्वकालमें प्रयागमें नैऋत नामका एक प्रसिद्ध ब्राह्मण था, वह दरिद्रतासे दुःखी तथा मन्दभाग्य था। बहुत कष्टसे दिनभर माँगनेके बाद उसे भिक्षा प्राप्त होती थी। पुत्र-पत्नीके बाद वह नैऋत नित्य दरिद्रतासे पीड़ित रहता था। एक समय वैष्णवप्रिय देवर्षि नारद उसके पास आये और कहने लगे—विप्रश्रेष्ठ! यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड देवमय है और सभीके स्वामी भव (शंकर) हैं। इसलिये तुम भी शीघ्र ही भवका भजन करो। वे तुम्हारे कार्यको सिद्ध कर देंगे। देवर्षि नारदसे यह उपदेश पाकर नैऋतने परम भक्तिसे वर्षपर्यन्त पार्थिवार्चनद्वारा भगवान् शिवको संतुष्ट किया। भगवान् महेश्वरने प्रसन्न होकर कुबेरके समान उसे दिव्य विपुल धन प्रदान किया। उसने उस धनसे धर्म-कार्य सम्पन्न किया। इस कारण वह पुण्यात्माओंमें प्रसिद्ध हुआ। शिवभक्तिके प्रभावसे वह अकंटक द्रव्य प्राप्तकर हजार वर्षतक जीवित रहकर अन्तमें प्राण परित्यागकर स्वर्गमें चला गया और वृषराशिमें सूर्यके स्थित
584 Sankshipta Bhavishya Puran_Section_13_2_Pm Digitized by Sarvagya Sharda Peeth