भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 367, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
रहनेपर चन्द्रके समान सुशोभित होकर सर्वजनप्रिय नैऋत रुद्रके नामसे विख्यात हुआ।'
सूतजीने कहा—शौनक! वही नैऋत अपने अंशसे पृथ्वीपर आकर गिरिनालगिरिके वनमें वनवासी सिद्ध सांख्ययोगीके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुआ और वेदशास्त्रपरायण वनशर्माके नामसे विख्यात हुआ। उसने बारह वर्षकी अवस्थामें अनेक विद्वानोंको जीत लिया। पुनः तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिकी अभिलाषासे काशीमें आकर श्रेष्ठ शंकराचार्यको प्रणाम कर उनका शिष्य हो गया।
बृहस्पतिजीने पुनः कहा—देवेन्द्र! माहिष्मतीमें एक शिवभक्त वसुशर्मा नामक ब्राह्मण रहता था। वह पुत्रकी कामनासे पार्थिवार्चनमें विशेषरूपसे तत्पर रहता था। अनेक प्रयत्न करनेके बाद भगवान् शंकरने प्रकट होकर वर माँगनेको कहा। तब उस विप्रने कहा—'शरणागतवत्सल! आप मुझे पुत्र प्रदान करें।' इसपर शंकरने कहा—'वत्स! तुम्हारे भाग्यमें पुत्र नहीं लिखा है, फिर भी मैं तुम्हें अपने अंशसे एक तेजस्वी पुत्र दे रहा हूँ।' ऐसा कहकर उन्होंने
एक तेज प्रकट किया और उसी तेजसे उसे एक सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ। उस पुत्रका एक पैर मनुष्यके समान और दूसरा पैर अजके समान था। अतः पृथ्वीपर वह अजैकपाद नामसे विख्यात हुआ। चार सौर वर्ष बीतनेपर मृत्युदेवता अपने गणोंके साथ वहाँ आये। अजैकपादके साथ उनका भयंकर युद्ध हुआ। अन्तमें अजैकपाद युद्धमें विजयी होकर मृत्युञ्जय नामसे पृथ्वीपर प्रसिद्ध हुए। उससे पराजित एवं दुःखी होकर मृत्युदेवताने अपना कष्ट ब्रह्माजीसे कहा, तब भगवान् ब्रह्माने सभी देवोंके साथ सूर्यके कुम्भस्थ होनेपर उस ब्राह्मणको भयहारी रुद्रके रूपमें चन्द्रमण्डलका अधिपति बनाया।
सूतजी बोले—मुने! अनन्तर वही अजैकपाद माहिष्मतीपुरीमें आकर कलिको शुद्धि प्रदान करनेवाले प्रभुके रूपमें पुरीशर्माके नामसे विख्यात हुआ और यतिदत्तके पुत्रके रूपमें पुनः अवतीर्ण हुआ। उसने सोलह वर्षमें वेदपारङ्गत विद्वानोंको जीतकर शंकराचार्यके पास आकर उनका शिष्यत्व स्वीकार किया। (अध्याय ११)
भारती, नाथशर्मा, क्षेत्रशर्मा तथा ढुंडिराजकी उत्पत्ति-कथा
बृहस्पतिजी बोले—देवेन्द्र! पूर्वकालमें संसारके लिये कंटक बना हुआ हिर्बु नामका एक दानव था। वह निकुम्भकी वंशपरम्परामें उत्पन्न हुआ था और इन्द्रके समान पराक्रमी था। जब हजार वर्षतक तपस्या करके उसने देवताओंको पराजित किया, तब लोकरक्षाके लिये उद्यत लोकपति ब्रह्माने उससे वर माँगनेको कहा। उसने उन्हें प्रणाम कर विश्वके सभी प्राणिपदार्थोंसे 'मैं मारा न जा सकूँ' यह वर माँगा। 'ऐसा ही होगा' यह कहकर ब्रह्मा ब्रह्मलोक चले गये। वर प्राप्तकर उस भयंकर दैत्यने देवताओंको जीतकर स्वर्गसे भगा दिया
और दैत्योंको वहाँ बसाया। इस प्रकार देवताओंने भीषण यन्त्रणा भोगी। उनकी दुर्दशा देखकर नारदजीने कहा—'देवगणो! आपलोग शंकरकी उपासना करें। भगवान् शंकर ब्रह्माण्डके स्वामी हैं तथा विपत्तियोंके नाशक हैं।' यह सुनकर देवताओंने देवदेव भगवान् उमापतिकी पार्थिवपूजा प्रारम्भ कर दी। पूजा करते हुए ग्यारह वर्ष व्यतीत होनेपर लोककल्याणकारी भगवान् शिव प्रसन्न हो गये और ज्योतिर्लिङ्गमय होकर देवभक्तोंको छोड़ शेष सभी असुरोंको दग्ध करने लगे। इससे प्रसन्न होकर ब्रह्माने विष्णुके साथ आनन्दपूर्वक सामसूक्तोंसे महारुद्रको प्रसन्न
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