भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
३५६
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
रहनेपर चन्द्रके समान सुशोभित होकर सर्वजनप्रिय नैऋत रुद्रके नामसे विख्यात हुआ।'
सूतजीने कहा—शौनक! वही नैऋत अपने अंशसे पृथ्वीपर आकर गिरिनालगिरिके वनमें वनवासी सिद्ध सांख्ययोगीके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुआ और वेदशास्त्रपरायण वनशर्माके नामसे विख्यात हुआ। उसने बारह वर्षकी अवस्थामें अनेक विद्वानोंको जीत लिया। पुनः तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिकी अभिलाषासे काशीमें आकर श्रेष्ठ शंकराचार्यको प्रणाम कर उनका शिष्य हो गया।
बृहस्पतिजीने पुनः कहा—देवेन्द्र! माहिष्मतीमें एक शिवभक्त वसुशर्मा नामक ब्राह्मण रहता था। वह पुत्रकी कामनासे पार्थिवार्चनमें विशेषरूपसे तत्पर रहता था। अनेक प्रयत्न करनेके बाद भगवान् शंकरने प्रकट होकर वर माँगनेको कहा। तब उस विप्रने कहा—'शरणागतवत्सल! आप मुझे पुत्र प्रदान करें।' इसपर शंकरने कहा—'वत्स! तुम्हारे भाग्यमें पुत्र नहीं लिखा है, फिर भी मैं तुम्हें अपने अंशसे एक तेजस्वी पुत्र दे रहा हूँ।' ऐसा कहकर उन्होंने
एक तेज प्रकट किया और उसी तेजसे उसे एक सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ। उस पुत्रका एक पैर मनुष्यके समान और दूसरा पैर अजके समान था। अतः पृथ्वीपर वह अजैकपाद नामसे विख्यात हुआ। चार सौर वर्ष बीतनेपर मृत्युदेवता अपने गणोंके साथ वहाँ आये। अजैकपादके साथ उनका भयंकर युद्ध हुआ। अन्तमें अजैकपाद युद्धमें विजयी होकर मृत्युञ्जय नामसे पृथ्वीपर प्रसिद्ध हुए। उससे पराजित एवं दुःखी होकर मृत्युदेवताने अपना कष्ट ब्रह्माजीसे कहा, तब भगवान् ब्रह्माने सभी देवोंके साथ सूर्यके कुम्भस्थ होनेपर उस ब्राह्मणको भयहारी रुद्रके रूपमें चन्द्रमण्डलका अधिपति बनाया।
सूतजी बोले—मुने! अनन्तर वही अजैकपाद माहिष्मतीपुरीमें आकर कलिको शुद्धि प्रदान करनेवाले प्रभुके रूपमें पुरीशर्माके नामसे विख्यात हुआ और यतिदत्तके पुत्रके रूपमें पुनः अवतीर्ण हुआ। उसने सोलह वर्षमें वेदपारङ्गत विद्वानोंको जीतकर शंकराचार्यके पास आकर उनका शिष्यत्व स्वीकार किया। (अध्याय ११)
भारती, नाथशर्मा, क्षेत्रशर्मा तथा ढुंडिराजकी उत्पत्ति-कथा
बृहस्पतिजी बोले—देवेन्द्र! पूर्वकालमें संसारके लिये कंटक बना हुआ हिर्बु नामका एक दानव था। वह निकुम्भकी वंशपरम्परामें उत्पन्न हुआ था और इन्द्रके समान पराक्रमी था। जब हजार वर्षतक तपस्या करके उसने देवताओंको पराजित किया, तब लोकरक्षाके लिये उद्यत लोकपति ब्रह्माने उससे वर माँगनेको कहा। उसने उन्हें प्रणाम कर विश्वके सभी प्राणिपदार्थोंसे 'मैं मारा न जा सकूँ' यह वर माँगा। 'ऐसा ही होगा' यह कहकर ब्रह्मा ब्रह्मलोक चले गये। वर प्राप्तकर उस भयंकर दैत्यने देवताओंको जीतकर स्वर्गसे भगा दिया
और दैत्योंको वहाँ बसाया। इस प्रकार देवताओंने भीषण यन्त्रणा भोगी। उनकी दुर्दशा देखकर नारदजीने कहा—'देवगणो! आपलोग शंकरकी उपासना करें। भगवान् शंकर ब्रह्माण्डके स्वामी हैं तथा विपत्तियोंके नाशक हैं।' यह सुनकर देवताओंने देवदेव भगवान् उमापतिकी पार्थिवपूजा प्रारम्भ कर दी। पूजा करते हुए ग्यारह वर्ष व्यतीत होनेपर लोककल्याणकारी भगवान् शिव प्रसन्न हो गये और ज्योतिर्लिङ्गमय होकर देवभक्तोंको छोड़ शेष सभी असुरोंको दग्ध करने लगे। इससे प्रसन्न होकर ब्रह्माने विष्णुके साथ आनन्दपूर्वक सामसूक्तोंसे महारुद्रको प्रसन्न
In Public Domain. Digitized by S. Chandrabhatia, Bhavishya Puran_Section_13_2_Back
- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
३५७
किया। सूर्यके मिथुन राशिमें स्थित होनेपर हिर्बु दैत्यका विनाश करनेवाले महारुद्रको देवताओंके कल्याणके लिये शशिमण्डलका राजा बनाया। यह महारुद्र देवकार्यके लिये तत्पर हो गया। अनन्तर यही महारुद्र रमणीय हिमालयपर्वतपर साधकर्मके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुआ और बादमें कलाओंका ज्ञाता भारतीय नामसे प्रसिद्ध हुआ। विद्वत्समुदायको जीतकर फिर वह काशी नगरीमें चला आया और शंकराचार्यका शिष्य हो गया।
बृहस्पतिजीने पुनः कहा— देवेन्द्र ! मयका एक पुत्र था मायी, वह एक पैरपर खड़ा होकर एक हजार वर्षोंतक घोर तपस्या करता रहा। उसने अपनी तपस्याके द्वारा संसारके सभी प्राणियोंको संतप्त कर दिया। अनन्तर भगवान् परमेशी पितामहने प्रसन्न होकर तीन गाँवों (तीन पुरों—त्रिपुर) को उसके भोगके लिये निर्मित किया। सोलह योजनावाले विस्तृत स्वर्गके समान सुवर्णमय, उसके नीचे भुवलोकके समान एक योजन विस्तृत रजतमय तथा उसके नीचे भूलोकके समान एक योजन विस्तृत लौहमय तीन पुर बनवाये। इस प्रकार उस त्रिपुरमें सौ करोड़ दैत्य तथा दैत्यपत्नियाँ निवास करने लगीं। वे देवताओंके यज्ञभागको ग्रहणकर देवताओंके समान हो गये। यज्ञभाग न मिलनेके कारण निर्बल देवगण भूखसे पीड़ित हो भगवान् विष्णुके पास गये और उनकी स्तुति कर कहने लगे—‘ भगवन् ! प्रभो ! मयपुत्र मायीके द्वारा प्राप्त दुःखोंको भोगते हुए हमें बहुत ही दीर्घ समय हो गया है, हम सभी अधिकारविहीन होकर रह रहे हैं। स्वर्गमें मायी दैत्यका ही राज्य है। देवताओंकी बात सुनकर भगवान् मधुसूदन संस्कृतवार्ता करनेवाले त्रिपुरस्थित धर्मपरायण दैत्योंको देखकर भयानक कलियुगमें बौद्धरूपमें अजिन द्विजके पुत्र होकर उत्पन्न हुए। उस बौद्धने वेदधर्मपरायण विप्रोंको
मोहित कर दिया। तामस मन्वन्तरमें तीनों वर्ण वेदविहीन, कर्मरहित तथा वैराग्यसम्पन्न हो गये। सोलहवें कलिकी प्राप्ति होनेपर वे सभी यज्ञरहित हो गये। इस कारण त्रिपुरनिवासियोंको यज्ञभाग मिलना बंद हो गया, अतः सभी त्रिपुरनिवासी दैत्यगण क्रोधाविष्ट हो वेदरहित तथा यज्ञशून्य उन मनुष्योंको पीड़ित करने लगे। कल्पान्तमें दैत्योंसे भक्षित हो सभी मनुष्य विनष्ट हो गये।
पुनः सत्यलोकके आनेपर देवताओंने कैलासमें सभी लोगोंका कल्याण चाहनेवाले भगवान् शम्भुकी आराधना की। भगवान् शंकर ज्योतिर्लिङ्गरूप धारण कर वहाँ अवस्थित हो गये। इस कारण देवता प्रसन्न हो गये। उन्होंने भूमिके सारको ग्रहणकर विधिपूर्वक एक रथका निर्माण किया। चन्द्र और सूर्यके सारसे रथके दो चक्र बनाये। इसी प्रकार सुमेरुके सारसे रथका ध्वज बनाकर वह स्यन्दनरूपी यान भगवान् शिवको प्रदान किया। भगवान् ब्रह्मा स्वयं यहाँ आकर रथके सारथि बने। उन देवाधिदेवके रथके घोड़े चारों वेद हुए। उनका धनुष लोकालोक पर्वतका सार—तत्त्व ही आजगव नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह घोर शब्द करनेवाला था। भगवान् शंकर जब प्रत्यञ्चा बनाकर धनुषपर चढ़ाने लगे तब देवाधिदेवके क्रोधके कारण वह चाप टूट गया। यह देखकर भगवान् विष्णु आश्चर्यचकित हो गये। तदनन्तर उन्होंने स्वर्गके सारको ग्रहण कर पिनाक नामक एक दिव्य धनुषका निर्माण किया। रुद्रने पुनः उस धनुषकी प्रत्यञ्चा चढ़ायी। वह धनुष दूढ़ था, अतः भग्रीभूत नहीं हुआ। इस कारण ब्रह्मादि देवताओंने प्रसन्नचित्तसे उनकी स्तुति की और तबसे भगवान् महेश्वर ‘पिनाकी’ नामसे प्रसिद्ध हुए। शेषनाग उस चापकी डोरी थे और इन्द्र बाणरूप बने। बाणके पक्षपर वहि और वायु तथा शल्यपर सनातन विष्णु स्थित हुए। उस
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
३५८
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
धनुष-बाणसे करोड़ों दैत्य आकाशमें मारे गये। भगवान् शिवने मायीसे पालित उस त्रिपुरको जला दिया।
उस भयंकर त्रिपुरके भस्मीभूत होनेपर लोकपति ब्रह्माने मीन राशिमें रविके स्थित होनेपर पिनाकी महारुद्रको चन्द्रमण्डलका राजा बनाया और तामस मन्वन्तरमें देवताओंने अपने-अपने अधिकारको पुनः प्राप्त कर लिया।
सूतजीने कहा— मुने! अनन्तर पिनाकीने अपने मुखसे अपने उत्तम अंशको उत्पन्न कर हरिद्वारमें अवस्थित मच्छन्द* नामक योगीके मुखमें अपने तेजको प्रविष्ट कराया। वह मच्छन्द भगवान् शम्भुकी पूजा करनेवाला तथा गोरखका गुरु था। उस तेजसे नाथशर्मा नामक एक बड़ा विद्वान्, श्रेष्ठ एवं सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ। वह पृथ्वीके सभी विद्वानोंको जीतकर काशीपुरीमें चला आया और शंकराचार्यका शिष्य हो गया।
देवेन्द्र! चाक्षुष मन्वन्तरके बारहवें द्वारमें तालजंघवंशमें उत्पन्न क्षत्रियोंके द्वारा भृगुवंशमें उत्पन्न ब्राह्मणोंका कुरुक्षेत्रमें विनाश हुआ और उनके प्रचुर धनको लेकर वे क्षत्रिय दैत्योंके पक्षपाती हो गये। उसी समय किसी ब्राह्मणकी गर्भवती स्त्री डरकर तपस्याके प्रभावसे सौ वर्षोंतक अपने गर्भको धारण किये रह गयी। इसे सहन न कर गर्भस्थ शिशु माताके ऊरुप्रदेशको विदीर्णकर पृथ्वीपर आ गया। उसके तेजसे सम्पूर्ण जगत् भस्मीभूत होने लगा। तब सभी देवगण प्रजापतिको आगे कर भयसे आतुर हो उसके पास आये। उस बालकने पितरों और देवताओंकी आज्ञासे उस लोकनाशकारी तेजको जलके बीचमें फेंक दिया। जलदेवीने वडवा-स्वरूप धारणकर उस उत्तम तेजका पान कर लिया, किंतु रौद्र तेजसे पीड़ित
हो उसने उस तेजका वमन कर दिया। ब्रह्माजीने त्रिकुटगिरिपर आकर उसके नीचे घोर सागरमें लोककी रक्षाकी दृष्टिसे उस तेजको स्थापित कर दिया। पुनः परमेष्ठी पितामहने मेघ राशिमें सूर्यके आनेपर उस रौद्र तेजको रुद्ररूपमें शशिमण्डलके स्वामीके रूपमें स्थापित किया। वह ऊरुसे उत्पन्न होनेके कारण वीर्य, संसारका दहन करनेके कारण दहन और वडवाके मुखसे उत्पन्न होनेके कारण वाडव नामसे प्रसिद्ध हुआ।
सूतजी बोले— मुने! उस दहनेने अपने मुखसे तेज उत्पन्न किया और वही कुरुक्षेत्रनिवासी सारस्वत ब्राह्मणके घरमें क्षेत्रशर्माके नामसे विख्यात हुआ। वह विद्वानोंमें श्रेष्ठ हुआ। शंकराचार्यसे पराजित हो उनका शिष्य हुआ और ब्रह्मचर्यव्रत धारणकर भगवान् शंकरकी उपासना करता हुआ काशीमें स्थित हो गया।
बृहस्पतिने पुनः कहा— देवेन्द्र! पूर्वकालमें सारे संसारके एकार्णव हो जाने तथा स्थावर और जंगम सभीके नष्ट हो जानेपर एवं अव्यक्तजन्मा ब्रह्माके सौ वर्ष बीतनेपर मायारूपी प्रकृतिने आनन्दपूर्वक उस जलका पान कर लिया। फिर तमोमयी महाकाली उस दारुण प्राकृत जगत्में एकाकी उत्पन्न हुई। अनन्तर नित्य शुद्ध सनातन प्रकृति स्वेच्छासे महागौरीके रूपमें परिणत हो गयी। उनके पाँच मुख, दस भुजाएँ तथा तीन नेत्र थे। वह शिवा नामवाली हुई। ललाटस्थ नेत्रद्वारा उस माताने सूक्ष्म तेजका दर्शन किया। वह तेज नित्य, अविकारी, निरञ्जन तथा सर्वत्र दिशाओंमें परिव्याप्त था। उस ब्रह्मको प्रकृतिने ग्रहण करनेकी इच्छा की, परंतु समर्थ न हो सकी। आश्चर्यचकित हो उस प्रकृतिने अपने पाँचों मुखोंसे भक्तिपूर्वक प्रार्थनाकर परात्पर पूर्ण ब्रह्मको प्रसन्न किया। वह
- इस कथानकमें नाथसम्प्रदायका इतिहास अन्तर्निहित दीखता है।
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
३५९
सर्वज्ञ ब्रह्म प्रकृतिके पाँचों मुखोंमें प्रविष्ट हो गया। वह ब्रह्म पुरुषत्वको प्राप्तकर स्वयम्भू नामसे प्रसिद्ध हुआ और अव्यक्त प्रकृतिसे उत्पन्न होनेके कारण वे अव्यक्तजन्मा कहे गये। उनके निमित्त वरदा, लोकरूपिणी अष्टादश भुजाओंसे युक्त देवी महालक्ष्मी उत्पन्न हुई। वे संसारकी रक्षा करने लगीं। उनके अद्भुत रूपको देखकर स्वयम्भू आश्चर्यचकित हो गये। अनेक रूपोंमें प्रवेश करके भी स्वयम्भू उनके अन्तको प्राप्त नहीं कर सके। बृहत् और बहुरूप होनेके कारण वे ब्रह्मा नामसे विख्यात हुए। थककर भगवान् ब्रह्मा सत्यलोकमें चले आये। उन्होंने मुखसे आविर्भूत वेदोंसे शंकरकी दीर्घकालतक स्तुति की। उनके अङ्गसे नदी-नद उत्पन्न हुए। पुनः जलमय समुद्र हो जानेसे वहाँ स्वयं प्रभुने शयन किया। अव्यक्त स्वयम्भूने सहस्रयुगपर्यन्त वहाँ निवासकर सत्यलोकमें आकर पुनः सृष्टि आरम्भ कर दी। गणरूपा अनन्त सृष्टियाँ पृथक्-पृथक् उत्पन्न हुई। उससे महालक्ष्मीमय व्यक्त जगत् हुआ। महासनातनी महालक्ष्मीदेवी सृष्टिके अनेकत्वको देखकर आश्चर्यचकित हो गयीं और सर्वेश्वर भगवान्के पास आयीं तथा अव्यक्त मङ्गलरूप विष्णुको नमस्कारकर कहने लगीं— 'भगवन्! आप नित्य और शुद्धात्मा हैं, संसारमें बहुत-से प्राणी हो गये हैं, मैं इन लोगोंकी गणना कैसे कर सकती हूँ।' महालक्ष्मीके इस वचनको सुनकर वे ब्रह्म दो रूपोंमें विभक्त हो गये। पूर्वार्धसे रक्ताङ्ग और परार्धसे गौराङ्ग। रक्ताङ्ग और गौराङ्ग दोनों चतुर्भुज हुए। सम्पूर्ण सृष्टिगणोंका स्वामी रक्ताङ्ग गणेश हुआ, वही ईश्वर कहलाता है। परार्धसे उत्पन्न गौरवर्ण जो चतुर्भुजी है उसका ध्यान योगीलोग करते हैं, वह निरञ्जन है।
एक बार पार्वतीवल्लभ भगवान् शिवने एक हजार वर्षतक प्रयत्नपूर्वक गणेशकी पूजा की। तब
शर्वपूजक भगवान् गणेशने प्रसन्न होकर पार्वतीसहित हरको वर माँगनेके लिये कहा। इसपर भगवान् शंकरने उनकी भक्तिपूर्वक इस प्रकार स्तुति की—
नमो विष्णुस्वरूपाय गणेशाय परात्मने। चतुर्भुजाय रक्ताय यज्ञपूर्णकराय च॥ विघ्नहन्त्रे जगद्भद्रं सर्वानन्दप्रदायिने। सिद्धीनां पतये तुभ्यं निधीनां पतये नमः॥ प्रसन्नो भव देवेश पुत्रो भव मम प्रियः।
(प्रतिसर्गपर्व ४।१२।१०—१२)
'विष्णुस्वरूप परात्मा गणेशको नमस्कार है। चतुर्भुजधारी, रक्तवर्ण, यज्ञमूर्ति, विघ्नहन्ता, जगत्का धारण-पोषण करनेवाले, सभीके आनन्ददाता, निधिपति तथा सिद्धिपति भगवान् गणेश! आपको नमस्कार है। देवेश! आप प्रसन्न हों, मेरे प्रिय पुत्रके रूपमें उत्पन्न हों।' इसपर गणेशजी पार्वतीजीके तेजोमय शरीरसे उत्पन्न हुए। इन्द्रके साथ सभी देवगण कैलासशिखरपर उनका मङ्गलमय दर्शन करनेके लिये आये। वहाँ सर्वसुखद महोत्सव हो रहा था। इसी समय क्रूरदृष्टि कालात्मा, सूर्यपुत्र शनिदेव मण्डपमें आये। उनके दर्शनमात्रसे वह बालक मस्तकविहीन हो गया। तब गुह्यकोंके निवासस्थान उस कैलासमें महान् हाहाकार मच गया। वह कटा हुआ सिर सूर्यके तुला राशिस्थ होनेपर चन्द्रलोकमें स्थित हो सताईस दिनतक पृथ्वीपर प्रकाशित होता है। सभी देवताओंसे विनिन्दित भयंकर शनिदेवने एक दाँतवाले गजके रँगें हुए मस्तकको काटकर उस बालकके स्कन्धपर जोड़ दिया और ब्रह्माने उसकी माताके द्वारा स्तुति किये जानेपर कर्कटके सिरको गजके ऊपर स्थितकर गजयोनिवाला बना दिया और कर्कटको बिना सिरका कर दिया। इस प्रकार साक्षात् ईश्वरस्वरूप गजानन गणेश उत्पन्न हुए।
सूतजीने कहा—बृहस्पतिसे ऐसा सुनकर भगवान्
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
३६०
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
गणेशने अपने मुखसे स्कन्ध उत्पन्न किया और वही ईश्वररूप स्कन्ध काशीमें एक दैवज्ञ द्विजके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुआ और महीतलमें दुंदिराजके नामसे प्रसिद्ध हुआ। फलितज्योतिषके 'जातकाभरण'
नामक ग्रन्थका निर्माण कर वह वेदकी रक्षाके लिये शंकराचार्यके पास आया। वह प्रसन्नतामा उनका शिष्य होकर गुरुसेवामें तत्पर हो गया। (अध्याय १२)
अघोरपंथी भैरव तथा बालशर्माकी उत्पत्तिकी कथामें रावण तथा हनुमान्जीका चरित्र
सूतजी बोले—शौनक! भगवान् कपाली शिव अपने अंशसे काशीमें अयोनिजरूपसे उत्पन्न हुए। वे कपालमोचनकुण्डसे पृथ्वीपर आकर यतिरूप वेदनिधि भैरव नामसे प्रख्यात हुए और उन्होंने दुष्कर अघोरमार्गका अपने शिष्योंमें प्रवर्तन किया। फिर वे शंकराचार्यके पास आकर उनके शिष्य हो गये। उन्होंने मन्त्रमय डामरतन्त्रका प्रवर्तन किया और कीलित मन्त्रोंके उत्कीलनका मार्ग बतलाया।
बृहस्पतिजीने कहा—देवेन्द्र! मय दानवकी पुत्री मन्दोदरी त्रिपुरके अधिपति मायीकी बहन थी। त्रिपुरके नष्ट होनेपर वह देवी मन्दोदरी सनातन महाविष्णुको गुप्तभावसे निरन्तर संतुष्ट करती रहती थी। भगवान् विष्णुमें भक्तिभावना करनेसे मन्दोदरीको उत्तम योग प्राप्त हुआ और वह भयंकर विन्ध्याद्रिकी गुफामें विलीन हो गयी। उसकी समाधिमें चारों युग दो सौ बार बीत गये। वैवस्वत मन्वन्तरके बारहवें सत्ययुगमें ब्रह्माजीके पुत्र पुलस्त्य हुए, जिनसे विश्रवा नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। सौ वर्षतक विश्रवामुनिने तपस्याकर सुमाली दैत्यकी पुत्री कैकसीके साथ विवाह किया और उससे रावण और कुम्भकर्ण दो राक्षस पुत्र उत्पन्न हुए। रावण मातृभक्त था और भाई कुम्भकर्ण पितृभक्त। वरकी कामनासे उन दोनोंने हजार वर्षोंतक घोर तपस्या की। भगवान् परमेश्वी पितामहने प्रसन्न होकर उन दोनोंको देव और दानवोंसे अजेय होनेका वर दिया। उन दोनोंने वर प्राप्तकर क्रुद्ध हो श्रेष्ठ
पुष्पकयानको ग्रहणकर देवताओंसे युद्ध किया। उन दोनोंसे पराजित देवताओंने सुखप्रद स्वर्गको छोड़कर पार्थिवार्चनके द्वारा कैलासमें स्थित भगवान् शिवकी ग्यारह वर्षोंतक आराधना की और उनसे वर प्राप्तकर वे सभी निर्भय हो गये।
इधर गौतम-ऋषिके शरीरसे उत्पन्न केशरीकी पत्नी अञ्जनाके गर्भसे हनुमान्जीके रूपमें भगवान् शंकरने भी अपने अंशसे अवतार लिया और आकाशमें उगते हुए लाल सूर्यको देख फल समझकर निगल लिया। अन्धकार देखकर इन्द्रने उनकी टुट्टी (हनु)- पर अपने वज्रसे प्रहार किया। इसी बीच रावण भी उनकी पूँछ पकड़कर लटक गया, फिर भी उन्होंने सूर्यको नहीं छोड़ा। रावणसे एक वर्षतक मुष्टियुद्ध होता रहा। अन्तमें थका हुआ रावण रुद्ररूपी हनुमान्से भयभीत हो इधर-उधर भागा। इसी समय ऋषि विश्रवा वहाँ आये और वेदमय स्तोत्रोंसे परावाणीद्वारा हनुमान्को प्रसन्न किया। प्रसन्न हो रुद्ररूपी हनुमान्ने संसारको रूलानेवाले रावणको छोड़ दिया। फिर बलवान् केशरीपुत्र पम्पापुरके तटपर निवास करने लगे और अचलरूपसे स्थित होनेके कारण स्थाणु नामसे प्रसिद्ध हुए। संसारको रूलानेवाले तथा देवताओंको मारनेवाले रावणको मुष्टिकासे हनन करनेके कारण इनका नाम हनुमान् पड़ गया*। हनुमान्जीकी तपस्यासे प्रसन्न हो भगवान् ब्रह्मने कहा—'तपोनिधे रुद्र! आप मेरी बात सुनें। वैवस्वत मन्वन्तर अट्टाईसवें त्रेतायुगके प्रथम चरणमें
- निवृत्तं च सुरान् मुख्यान् रावणं लोकरावणम् ॥ निहन्ति मुष्टिर्भयः स हनुमानिति विश्वतः ॥ (प्रतिसर्गपर्व ४।१३।४४-४५)
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
३६१
साक्षात् भगवान् राम अवतीर्ण होंगे। उनकी भक्ति प्राप्तकर आप कृतकृत्य हो जायेंगे। देवेन्द्र! ऐसा कहकर ब्रह्माजीने भाद्रपद मासके चन्द्रमाके प्रकाशरूपमें उन्हें प्रतिष्ठित किया और इधर मयपुत्री मन्दोदरीका विवाह रावणके साथ करा दिया। वह रावण नैऋत दिशाका दिक्पाल हुआ। भगवान् हरिने रामरूपमें अवतरित होकर रावणको मारा।'
सूतजी बोले—मुने! अनन्तर वे ही हनुमान् पुनः मनुष्य-शरीर धारणकर पृथ्वीपर कदलीवनमें आकर बालशर्मा नामसे प्रसिद्ध हुए और काशी नगरीमें मणिकर्णिकापर रहने लगे। वे शंकराचार्य यतिके शिष्य होकर गुरुसेवामें तत्पर हो गये और उन्होंने तन्त्र-मन्त्रशास्त्रका निर्माण किया।
(अध्याय १३)
रुद्रमाहात्म्य, भवके अंशसे रामानुजाचार्यका आविर्भाव
देवगुरु बृहस्पतिजीने कहा—देवेन्द्र! सृष्टिके प्रारम्भमें विराट् पुरुषकी नाभिसे एक विस्तृत कमल उत्पन्न हुआ। जिससे कमलासन ब्रह्मा उत्पन्न हुए। वे दो भुजा, चार मुख और दो पैरोंवाले थे। उन्हें चिन्ता हुई कि मैं कौन हूँ, कहाँसे आया हूँ और मेरा उत्पत्तिकर्ता कौन है? इस प्रकार चिन्तित होते ही हृदयस्थ देवताने कहा—'तुम तप करो।' यह सुनकर ब्रह्माजीने महान् तप किया। चतुर्भुज, योगगम्य सनातन विष्णुका कमलासन ब्रह्माने हजार वर्षतक समाधिस्थ होकर ध्यान किया। इसी समय नवीन मेघके समान श्यामल, चतुर्भुज भगवान् विष्णु आयुध एवं दिव्य अलंकारोंसे अलंकृत होकर बालकरूपमें ब्रह्माके सामने प्रकट हुए। समाधिसे जागकर ब्रह्मा उन्हें देखकर चकित हो गये। भगवान् विष्णुने हँसकर कहा—'वत्स! मैं ही तुम्हारा पिता हूँ।' ब्रह्मा स्वयंको उनका पिता मानते थे। इस प्रकार दोनोंमें विवाद होने लगा। उसी समय तमोमय रुद्र ज्योतिर्लिङ्गरूपमें प्रकट हुआ। हंसरूपमें ब्रह्मा और वराहरूपमें हरि सौ वर्षतक क्रमशः ऊपर-नीचे आते-जाते रहे, परंतु उसका अन्त न पाकर असफल हो उन दोनोंने लौटकर भगवान् शिवकी स्तुति की। प्रसन्न हो भगवान् भव दर्शन देकर कैलास चले गये और वहाँ समाधिमें योगी रुद्रके दिव्य पाँच युग बीत गये। इसी बीच तारकासुर
नामके भयंकर दानवने हजार वर्ष तपकर ब्रह्मासे वर प्राप्त किया कि 'भवसे उत्पन्न पुत्रसे ही तुम्हारी मृत्यु होगी।' वर प्राप्तकर तारकासुरने देवताओंको जीतकर महेन्द्रका स्थान ग्रहण कर लिया। दुःखी देवगणोंने कैलासमें जाकर रुद्रकी स्तुति की। शिवने कहा—'वर माँगो।' उन लोगोंने नतमस्तक हो प्रणामपूर्वक कहा—'भगवन्! भगवान् ब्रह्माने तारकको यह वर प्रदान किया है कि शिव-शक्तिसे उत्पन्न पुत्र ही तुम्हें मारेगा। इसलिये भगवन्! आप हमलोगोंकी रक्षा करें और विवाह करें। स्वायम्भुव मन्वन्तरमें दक्षप्रजापतिकी साठ कन्याएँ हुई। उनमें एक सती नामकी भी कन्या थी। उसने एक वर्षतक आपकी पार्थिव पूजा की। उस सतीको आपने वर प्रदान किया और वह आपकी प्रिया हुई। उसके पिता दक्षने आपका अपमान किया और दक्षसे उत्पन्न शरीरको सतीने यज्ञमें समर्पित कर दिया। उस सतीका दिव्य तेज हिमालयमें प्रविष्ट हुआ। अब वह अपना शरीर छोड़कर हिमालय तथा मेनाकी पुत्री पार्वतीके रूपमें उत्पन्न हुई है। वे गौरी उत्पन्न होते ही नौ वर्षकी हो गयीं। आपकी प्रासिके निमित्त उन्होंने सौ वर्षतक जलमें रहकर, सौ वर्ष पञ्चाग्रिका सेवनकर, सौ वर्षतक वायुमात्रका पानकर और सौ वर्षतक बिना साँस लिये आकाश-मण्डल तथा चन्द्रमण्डल आदिमें
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
३६२
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
रहकर तपस्या भी की है। अतः हे भगवन्! अब आप शिवा—पार्वतीके साथ विवाह करें।'
शिवने कहा—देवगणो! आपकी बात अनुचित प्रतीत होती है, क्योंकि हमसे ज्येष्ठ ज्योतिसे उत्पन्न दस रुद्र अभी अविवाहित हैं, मैं उन सबसे छोटा भव नामक रुद्र हूँ, मैं उनके विवाहसे पूर्व ही कैसे विवाह कर सकता हूँ? दूसरी बात यह है कि वे साक्षात् अव्यक्तरूपा पराम्बा हैं, उनसे सम्पूर्ण चराचर ब्रह्माण्ड परिव्याप्त है। योगीश्वर! मैं मातुरूपा भगवतीका वरण कैसे कर सकता हूँ? अतः आपलोगोंके कल्याणके लिये मैं अपनी शक्ति आपलोगोंको देता हूँ, वह आपलोगोंकी कामना पूर्ण करेगी। अनन्तर भगवान् शंकर अपनी शक्ति अग्निको समर्पित कर स्वयं पुनः समाधिस्थ हो गये। वहिके साथ इन्द्रादि देवगणोंने सत्यलोकमें आकर ब्रह्माको सम्पूर्ण वृत्तान्त सूचित किया। पुनः देवताओंके समुद्योग तथा गिरिजाकी तपस्यासे भगवान् शंकर प्रसन्न हो गये। उन्होंने पार्वतीको पाणिग्रहण करनेका वर प्रदान किया। इसपर भगवती पार्वतीने नमस्कार कर कहा—'देव! मैं पिता-माताकी आज्ञाके अनुसार ही कार्य करनेवाली हूँ, अतः विवाहके लिये उनकी अनुमति चाहिये।'
भगवान् शंकरने ससर्पियोंको बुलाकर सबकी सम्मतिसे हिमवान्के पास संदेश भेजा और विधिपूर्वक विवाह भी सम्पन्न हो गया। उस विवाहमें बारतियोंकी
सेवाके लिये पार्वतीने अपनी तपःसिद्धिसे ऋद्धि-सिद्धिको उत्पन्न कर यथाविधि सेवा-सत्कार कर सबको संतुष्ट किया। यह देखकर ब्रह्मादि देवगण आश्चर्यमें पड़ गये और उन्होंने अनेक प्रकारसे उनकी स्तुति तथा दैत्योंसे रक्षाकी प्रार्थना भी की। पार्वतीदेवीने प्रसन्न होकर उन्हें अभय-दान दिया। विवाहके पश्चात् भगवान् शिव पार्वतीके साथ कैलास चले आये और हजार वर्षांतक आनन्दमें निमग्न रहे। काम—प्रद्युम्नकी धृष्टता देखकर भगवान् शंकरने उसे भस्म कर अनङ्गरूपमें कर दिया। उसकी पत्नी रतिकी प्रार्थनापर भगवान्ने कहा—'तुम प्राणियोंके हृदयमें निवास करोगी। यह स्वारोचिष मन्वन्तर है। वैवस्वत मन्वन्तरके अट्टाईसवें द्वापरमें भगवान् श्रीकृष्णके पुत्र प्रद्युम्नको तुम पतिरूपमें प्राप्त करोगी। ऐसा कहकर भगवान् शंकर अन्तर्धान हो गये।' (बादमें कुमारस्वामी स्कन्दकी उत्पत्ति हुई, जिन्होंने तारकासुरका वधकर देवताओंको शान्त एवं प्रसन्न किया तथा सम्पूर्ण संसारके साथ स्वर्गको सुस्थिर कर दिया।)
सूतजीने कहा—मुने! देवगुरु बृहस्पतिसे यह सुनकर भगवान् भवने अपने मुखसे अपने उत्तम अंशको उत्पन्न कर गोदावरीके किनारे आचार्यशर्माके पुत्ररूपमें जन्म ग्रहण किया। वे आचार्य रामानुजके नामसे विख्यात हुए और रामशर्माके अनुज हुए। (अध्याय १४)
वसुदेवताओंके अंशसे कुबेर आदिकी उत्पत्ति, रामायणकी संक्षिप्त कथा एवं त्रिलोचन भक्तका वृत्तान्त
सूतजी बोले—भृगुश्रेष्ठ शौनक! बृहस्पतिने देवराज इन्द्रसे वसुदेवताओंका जो माहात्म्य कहा था, उसे कहता हूँ, आप सुनें। वैवस्वत मन्वन्तरके आदि सत्ययुगमें विश्वामुनिकी इल्वला नामकी पत्नी थी। वह सती पार्थिवार्चनसे शिवकी आराधना
करती थी। इसी समय दीक्षितकुलमें उत्पन्न यक्षशर्मा नामक एक द्विज यक्षिणी—पूजनमें रत था। वह धूर्त अपने मित्रकी पुत्रवधूके साथ दुःसम्बन्ध रखनेके कारण कुष्ठरोगसे ग्रस्त हो गया। उस कुष्ठी द्विजको त्यागकर मन्त्रवत्सला यक्षिणीदेवी
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
३६३
कैलासपर शिवलोकको चली गयी। शुधासे व्याकुल यक्षशर्मा उत्तम शिवरात्रिके दिन शिवके दर्शन, पूजन और उपदेशसे संतुष्ट हुआ। प्रातःकाल होनेपर उस द्विजने पारण किया और वह कुष्ठि उसी शिवमन्दिरमें मर गया। उस पुण्यके प्रभावसे वह कर्णाटकदेशमें राजा हुआ। राजराजके नामसे प्रसिद्ध वह मण्डलीक राजा हुआ। प्रतिदिन उस महाबली राजाने शिवार्चन आदि मङ्गलकार्य ब्राह्मणोंसे कराये और सौ वर्षतक पृथ्वीपर राज्य किया। राजाने अपने श्रेष्ठ पुत्रको राज्याधिकार देकर काशी आकर भगवान् शिवको संतुष्ट किया। तीन वर्ष बीतनेपर ज्योतिर्लिङ्गसे महादेव प्रकट हुए। वे शिव राजराजेश्वरके नामसे प्रसिद्ध हुए। भगवान् शिवद्वारा पवित्र वह राजा प्राणोंका परित्याग कर इल्त्वलाके गर्भमें आकर घोर अन्धकारसे आच्छन्न रात्रिकी कुत्सित वेलामें पुत्रके रूपमें उत्पन्न हुआ। अतः वह कुबेर नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न था। उस बालकने तपके द्वारा परमेष्ठि (ब्रह्मा)-को प्रसन्न किया। भगवान् ब्रह्माने सुवर्णमय रमणीय सुन्दर लङ्कापुरीका निर्माण कराकर उसे दे दिया। कुबेर तीन करोड़ यक्षोंका स्वामी यक्षराट्के नामसे प्रसिद्ध हुआ। उसके आदेशमें निवास करनेवाले अनेक रूपवाले किन्नर थे। गुह्यकोंके स्वामी स्वयं भगवान् कुबेर थे। रावणको जब यह पता लगा कि लङ्का आरम्भसे राक्षसोंकी पुरी रही है और कुबेरने उसपर बलात् अधिकार जमाकर अपने सेवक यक्षोंको बसाया है तो उन्हें वहाँसे मारकर भगा दिया और स्वयं अपनी राजधानी बनाकर वहाँका राजा हो गया। इससे दुःखी हो कुबेरने दुःखनाशक शंकरकी शरण ली। भगवान् हरने कुबेरके साथ सुन्दर मैत्री कर ली और विश्वकर्माने अलका नामकी पुरीकी रचना की। सज्जनोंको
मङ्गल देनेवाले कुबेरने उसे सहर्ष प्राप्त किया। यह सुनकर संसारको रूलानेवाला राक्षसराज रावण कैलास पर्वतपर आकर भगवान् शंकरकी तपस्या करने लगा, तब अहंकारदेवता भगवान् रुद्र प्रसन्न होकर जैसे कुबेरके मित्र थे, वैसे ही रावणके भी मित्र हो गये और एक-एक सिरसे करोड़ों सिर उत्पन्न होनेका उसे वरदान दे दिया। देवाधिदेवके प्रसादसे उसका शरीर वज्र हो गया। इस प्रकार वह रावण वरदानके कारण भयंकर बली और उद्दण्ड हो गया। उस राक्षसद्वारा सम्पूर्ण विश्व दुःखसे संतप्त हो गया। यज्ञके अभावमें सभी देवता, प्राणी भूखे रहने लगे। ब्रह्माको आगेकर क्षीरसागरमें जाकर दुःखी सभी देवगणोंने एकत्र हो परमेश्वरको स्तुतियोंसे संतुष्ट किया। तब सगुण-निर्गुण हरिने प्रसन्न होकर देवताओंसे कहा—‘देवगणो! मेरी आज्ञासे आपलोग सनातनी विष्णुमायाकी शरणमें जाकर जगत्के कल्याणके लिये प्रार्थना करें।’
यह सुनकर देवताओंने परा प्रकृतिको स्तुतियोंसे संतुष्ट किया। ब्रह्म-ज्योतिर्मयी शिवादेवीने प्रसन्न होकर अपने शरीरको दो रूपोंमें विभक्त किया और सीता-रामके रूपमें पृथ्वीपर आर्यी। परा प्रकृति सीता मङ्गलदायिनी हुई। जगत्-कारणभूता वे सीता भूमिसे उत्पन्न हुई, अयोनिजा होनेपर भी वे सबकी माता हैं। सहस्र ‘राम’ नामके जपके समान सीताके एक बार नाम लेनेका फल जानना चाहिये*। परात्पर भगवान् रामने रावण आदि राक्षसोंको मारा तथा अपनी पवित्र कीर्तिको लोकमें प्रतिष्ठित कर पुष्पक विमान कुबेरको समर्पित कर दिया। ग्यारह हजार वर्षतक राज्यकर वे परम धामको चले गये।
सूतजीने कहा—शौनक! यह सुनकर प्रथम
- सहस्रं रामरामेति जपितं येन धीमता। सीतानाम्ना च तस्यैव फलं ज्ञेयं च तत्सम्म॥ (प्रतिसर्गपर्व ४। १५। ५७)
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
३६४
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
वसुदेवता कुबेर अपने अंशसे पृथ्वीपर धरदत्त वैश्यके पुत्र होकर त्रिलोचन नामसे मथुरामें उत्पन्न हुए। सभी द्रव्योंको हर्षपूर्वक तीर्थोंमें खर्चकर काशीपुरीमें आकर वैष्णव रामानन्दको नमस्कारकर त्रिलोचन उनके शिष्य हो गये। गुरुकी आज्ञासे वे पुनः अपने घरपर आकर रामभक्तिपरायण होकर साधु-सेवामें तत्पर हो गये। भगवान् राम उनके घरमें सभी अभीष्ट फलको देनेवाले दासके रूपमें तेरह मासतक स्थित रहे। वे उनके घरमें मणि, रत्न, विविध वस्त्र, विविध व्यञ्जन देते थे, जिसे भक्त त्रिलोचन स्वयं ब्राह्मणों, वैष्णवों और यतियोंको
भी सभी मनोवाञ्छित वस्तु प्रदान करते थे। भगवान् श्रीरामने त्रिलोचनसे कहा—‘वत्स! मैं राम हूँ, दास नहीं। मैंने तुम्हारी भक्तिसे प्रसन्न होकर तुम्हारे घरमें दासके रूपमें निवास किया है। हे वैश्य! आजसे मैं तुम्हारे हृदयमें निवास करूँगा।’ यह कहकर वे अन्तर्हित हो गये। यह सुनकर वह वैश्य बहुत प्रसन्न हुआ। उसने स्त्री-पुत्र सभीका परित्याग कर दिया और वह परम वैराग्यके साथ श्रीरामके ध्यानमें तत्पर रहकर सरयूतटपर निवास करने लगा*।
(अध्याय १५)
रामानन्दजीके शिष्य नामदेव, भक्त रंकण (राँका) एवं यंकणा (बाँका)-का चरित्र, वरुणदेव और पराम्बाकी महिमा
देवगुरु बृहस्पतिने कहा—देवेन्द्र! संसारमें जो जलको एक जगहसे दूसरी जगह पहुँचाता है, वही आपव कहलाता है। उसीका दूसरा नाम वरुण है। वे जलों तथा समुद्रोंके अधिपति हैं। दैत्योंके बन्धनके लिये ब्रह्माने उन्हें पाश प्रदान किया। पाश प्राप्त होनेपर महात्मा वरुणका नाम पाशी हो गया।
वे वरुण पहले शक्तिके पूजक एक ब्राह्मण थे और उनका नाम था आपव। वे भद्रकालीके प्रिय भक्त थे, प्रतिदिन उनके पूजनमें तत्पर रहते थे। अनेक प्रकारके रक्त पुष्पोंकी मालाओंको बनाकर, रक्त चन्दनसे संयुक्तकर मन्त्रोंद्वारा भद्रकालीको समर्पित करते थे। नवार्णजपमें तत्पर हो धूप-दीप-नैवेद्य, ताम्बूल, ऋतुफल आदिसे सनातनी महालक्ष्मी भद्रकालीकी पूजा करते रहते। तिल, शर्करायुक्त मधुसे हवन भी करते थे। वे दुर्गासप्तशतीके
मध्यम चरित्रका पाठकर नवार्णमन्त्र-जपमें तत्पर हो तीन वर्षतक पूजामें संलग्न रहे। अनन्तर सर्वमङ्गला भगवतीदेवी प्रसन्न हुई और बोली—‘द्विजसत्तम! तुम वर माँगो।’ देवीके इस प्रिय वचनको सुनकर नम्रधी द्विज आपवने उन्हें दण्डवत् प्रणाम कर उन भद्रकाली सनातनीदेवीकी अनेक प्रकारसे स्तुति की।
फिर देवी भद्रकालीने प्रसन्न होकर आपवसे कहा—द्विज! प्रलयके आने तथा स्थावर-जंगमके विनष्ट हो जानेपर एकार्णवमें मेरी कृपासे तुम सुखी होओगे। यह कहकर वे देवी अन्तर्लीन हो गयीं और वे ब्राह्मण वरुणदेवके रूपमें विशेष समादृत हुए।
सूतजी बोले—मुने! देवगुरुके इन वाक्योंको सुनकर द्वितीय वसु भगवान् वरुणने अपने मुखसे पृथ्वीपर एक तेज उत्पन्न किया। वह तेज देहलीमें
- रामानन्दजीकी शिष्य-परम्पराके भक्तों—त्रिलोचन वैश्य, नामदेव, रंकण-यंकणा (राँका-बाँका), कबीर, नरसी मेहता तथा सधन कसाई आदिका उदात्त चरित्र एवं आचार्योंके महनीय चरित्र गीताप्रेससे प्रकाशित ‘भक्तचरितार्द्ध’ में विस्तारसे दिये गये हैं। उससे भी लाभ उठाना चाहिये।
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
३६५
धर्मभक्तके घर उत्पन्न हुआ। उसकी विधवा कन्याने हरिके उस तेजको धारण किया। यह जानकर धर्मभक्त पुत्रकी उत्पत्तिसे अत्यन्त प्रसन्न हुआ। उसका नाम नामदेव हुआ। वह सांख्ययोगपरायण था। चराचर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड विष्णुमय है, यह जानकर और देखकर वे काशीमें हरिप्रिय रामानन्दके पास आये और उनकी शिष्यता ग्रहण कर वहाँ निवास किये। उस समय म्लेच्छपति सिकन्दरका देहलीमें राज्य था। उसने नामदेवको बुलाकर और भलीभाँति उनकी परीक्षाकर प्रसन्न हो पचास लाख मुद्राएँ दीं। नामदेवने उस द्रव्यसे काशीमें श्रेष्ठ शुभ्र शिलामय घाटका निर्माण कराया और अपने योगबलसे मेरे हुए दस ब्राह्मणों, पाँच राजाओं, पाँच वैश्यों तथा सौ गौओंको पुनः जीवित किया।
देवगुरु बृहस्पतिने कहा—देवेन्द्र! पूर्वकालमें विश्वानर नामका एक ब्राह्मण था। उसके पुत्र नहीं था। पुत्रकी प्राप्तिके लिये उसने आराधनाद्वारा ब्रह्माको संतुष्ट किया। एक वर्षमें ही भगवान् परमेश्वी पितामहने संतुष्ट होकर वर माँगनेको कहा। इसपर उसने कहा—‘भगवन्! आपको नमस्कार है। प्रकृतिसे भी जो परे है, वह मेरा पुत्र हो।’
यह सुनकर आश्चर्यचकित हो ब्रह्माने उस ब्राह्मणसे कहा—‘हे ब्राह्मण! वह तो नित्य सनातन पुरुष है, वह तुम्हारा पुत्र कैसे हो सकता है? इसलिये विश्वानर मुने! मायाभूत हरि स्वयं जनार्दन मेरे वरदानसे तुम्हारे पुत्ररूपमें आयेगे।’
यह कहकर ब्रह्मा अन्तर्धान हो गये और विश्वानरका पावक नामसे पुत्र उत्पन्न हुआ। वह पावक आठ वसुओंका पति हुआ और वैश्वानर नामसे प्रसिद्ध हुआ तथा स्वाहादेवीका स्वामी हुआ। यह वैश्वानर पुराकल्पमें अनल था और निषधका बुद्धिमान् ब्राह्मण था।
सूतजी बोले—मुने! बृहस्पतिके इन वचनोंको सुनकर भगवान् पावकने अपने मुखसे अपने अंशको उत्पन्न किया। वही पावकांश वसु होकर लक्ष्मीदत्तका पुत्र रंकण*। (रँका) नामसे प्रसिद्ध हुआ। कांचनपुर नगरमें वैश्यकुलमें उसकी उत्पत्ति हुई। उसकी पतिव्रता पत्नी यंकणा (बाँका) थी। वे दोनों धर्मकार्यमें अपने सभी द्रव्योंको खर्चकर काष्ठ बेचकर उससे उपाजित धनद्वारा भगवान्की पूजा करके प्रभुके प्रसादसे अपना जीवन-निर्वाह किया करते थे। महात्मा रंकणके गुरु रामानन्द थे। (अध्याय १६)
संत कबीर, भक्त नरसी मेहता, पीपा, नानक तथा साधु
नित्यानन्दजीके पूर्वजन्मोंकी कथा
देवगुरु बृहस्पतिजी बोले—देवेन्द्र! पूर्वकालमें दितिके पुत्र हिरण्यकशिपु एवं हिरण्याक्षका भगवान् विष्णुने क्रमशः नृसिंह एवं वराहरूप धारणकर वध किया था। दुःखी हो दितिने महर्षि कश्यपकी आराधना की। बारह वर्ष बाद कश्यपजीने उससे कहा—‘वरानने! वर माँगो।’ हर्षित होकर दितिने कहा—‘प्रभो! मेरी सपत्नी अदिति बारह पुत्रोंसे युक्त है।
मेरे दो ही पुत्र थे। वे भी अदितिपुत्र देवरक्षक विष्णुके द्वारा विनष्ट कर दिये गये। इस कारण मैं बहुत दुःखी हूँ। अतः मुझे द्वादशादित्य-विनाशक पुत्र प्रदान करें।’ यह भयंकर वाणी सुनकर कश्यपने कहा—‘ब्रह्माने संसारमें दो मार्ग बनाये—धर्ममार्ग और अधर्ममार्ग। जिन्हें क्रमशः परमार्ग और अपरमार्ग भी कहा गया है। धर्मका पक्ष लेनेवाले मनुष्य ब्रह्माके
- कल्याणके ‘भक्तचरिताङ्क’ में यह कथा कुछ अन्तरसे आयी है। धन-सम्पत्ति साधना और भक्तिभावनामें कितनी बाधक है, यह इनके चरित्रसे स्पष्ट हो जाता है।
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
३६६
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
प्रिय हैं और अधर्मका पक्ष लेनेवाले उस धीमान्के वैरी हैं। अतः अधर्मके पक्षपाती होनेके कारण ही तुम्हारे पुत्रोंकी मृत्यु हुई। इसलिये धर्मप्रिये! तुम अपने विचारको शुद्ध करो। तुम्हें महाबलशाली, चिरञ्जीवी, बुद्धिमान् पुत्र होगा।' यह सुनकर दितिदेवी कश्यपके द्वारा उत्तम गर्भ धारण कर व्रत-आचारपूर्वक जीवन-यापन करने लगी। उसके गर्भ धारण करनेके कारण भयभीत देवराज इन्द्र देवगुरुकी आज्ञासे दितिकी व्रत-परिचर्यामें लग गये। गर्भके सात मास बीत जानेपर शक्रकी मायासे विमोहित वह दितिदेवी अपने घरमें अपवित्ररूपसे सो गयी। उसी समय अङ्गुष्ठमात्रका रूप बनाकर वज्रके साथ भगवान् महेन्द्रने दितिके उदरमें प्रविष्ट हो उस गर्भके पहले सात और फिर एक-एकके सात-सात खण्ड-खण्ड कर डाले। महेन्द्रने उन लोगोंको नम्रीभूत देखकर उनके साथ गर्भसे बाहर आकर दितिको प्रणाम किया। दितिने प्रसन्न होकर महेन्द्रको उन देवताओंको दे दिया। इस प्रकार वे उनचास मरुद्गण शक्रके सेवक हो गये।
वे मरुत् पूर्व भवमें लोकविश्रुत अनिल नामक वेदज्ञ ब्राह्मण हुए।
उस विप्रने पावकको स्तुतियोंद्वारा संतुष्ट किया। वह अपने सिरको काट-काटकर अग्निको चढ़ाता था और पुनः उसका सिर उत्पन्न हो जाता था। इस प्रकार आराधना करनेपर धनञ्जयदेव प्रसन्न हुए और बोले कि तुम उनचास मरुद्गणोंके रूपमें हो जाओगे, तब मैं तुम्हारा मित्र होकर तुम्हारी कामनाको पूर्ण करूँगा। जैसे भगवान् कुबेर छब्बीस वरुणदेवोंके प्रिय हैं, वैसे उनचास रूपधारी तुम्हारा मैं मित्र होऊँगा। इस प्रकार दितिके उदरमें पावकके प्रिय मित्रके रूपमें वायु नामसे उत्पन्न हुए।
सूतजीने कहा—मुने! देवगुरु बृहस्पतिसे इतनी कथा सुननेके बाद वही वायु वैश्यजातीय धान्यपालके
घरमें मूलगण्डान्तमें उत्पन्न हुआ। पिता और माताने काशीके विन्ध्यवनमें उसे छोड़ दिया। वहाँपर एक निःसंतान अलिक नामका वस्त्रनिर्माता (जुलाहा) व्यक्ति आया और उस बालकको लेकर अपने घर आ गया। वह सुन्दर मुखवाला बालक 'कबीर' नामसे प्रसिद्ध हुआ। गोदुग्ध-पान करनेवाले उस बालकने सात वर्षकी अवस्थामें रामानन्दको गुरु माना और वह भगवान् श्रीरामके ध्यानमें परायण हो गया। वह अपने हाथसे भोजन निर्माणकर भगवान् विष्णुको समर्पित करता था। उसका प्रिय करनेके लिये भगवान् साक्षात् उसकी इच्छाएँ पूरी करने लगे।
देवगुरु बृहस्पतिजी बोले—देवेन्द्र! प्राचीन कालमें उत्तानपाद नामके एक क्षत्रिय राजा थे। उनका पुत्र ध्रुव नामसे विख्यात हुआ। पिता-मातासे परित्यक्त उस पाँच वर्षके बालक ध्रुवने देवर्षि नारदजीके उपदेशसे गोवर्धन पर्वतपर आकर महान् व्रत धारणकर छः महीनेतक भगवान्का ध्यान किया। भगवान् विष्णुने प्रसन्न होकर आकाशमण्डलमें उसे नभोमय स्थान दिया।
यह ध्रुव पूर्व भवमें माधव नामक एक ब्राह्मण था, साठ वर्षांतक उसने प्रातःकाल तीर्थोंमें स्नान किया था। तीर्थ-सेवनके पुण्य-प्रतापसे वह भगवान् माधवका प्रिय पात्र बन गया। वह माधव भगवान्की भक्ति एवं तपस्याके फलसे अगले जन्ममें सुनीतिके गर्भसे ध्रुवरूपमें उत्पन्न हुआ। छत्तीस वर्षतक राज्यकर ध्रुव नभोमण्डलमें स्थित हो गया।
सूतजीने कहा—मुने! बृहस्पतिकी बात सुनकर पाँचवाँ वसु वह ध्रुव अपने अंशसे गुजरात प्रान्तमें भक्त नरश्री (नरसी मेहता)-के रूपमें उत्पन्न हुआ। भगवान् शंकरके अनुग्रहसे इन्होंने वृन्दावनमें भगवान्की दिव्य रासलीलाओंका दर्शन किया था। इनके पुत्री-पुत्रके विवाहके समय भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्ण
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड
३६७
यादवोंके साथ आये और उनकी इच्छाओंको पूरा किया। परम वैष्णव भक्तराट् नरश्री काशीपुरीमें आकर रामानन्दके शिष्य हो गये।
बृहस्पतिजी बोले—देवेन्द्र! किसी समय गङ्गाके तटपर पतिव्रता अनसूयाके साथ भगवान् अत्रि आकर ध्यानमें समाधिस्थ हो गये। वहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेशने आकर कहा—‘वर माँगो।’ अत्रिमुनि परमात्माके ध्यानमें लीन थे। अतः कुछ भी नहीं बोले। वे तीनों उनके भावको समझकर उनकी पत्नी अनसूयादेवीके पास गये। पतिव्रताने देवोंके अन्यथा भावको समझकर पुत्ररूप होनेका शाप दे दिया। फलतः अत्रिके पुत्ररूपमें ब्रह्मा चन्द्रमा, शंकर दुर्वासा और विष्णु दत्तात्रेयके रूपमें बालक हो गये। बादमें ये ही क्रमशः अर्थात् चन्द्रमा सोम नामक छठे वसु, रुद्रांश दुर्वासा सातवें प्रत्यूप नामक वसु और विष्णु-अंश दत्तात्रेय प्रभास नामक आठवें वसु हुए।
सूतजीने कहा—मुने! बृहस्पतिकी यह बात
सुनकर वे तीनों वसु कलिकी शुद्धिके लिये अपने अंशसे पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए। छठे वसु अर्थात् भगवान् अत्रिपुत्र सोम दक्षिणमें वैश्यवंशमें राजा सुदेवके घर पीपा नामक पुत्र हुए। जैसे राजाने उस नगरमें राज्य किया था, वैसे ही इन्होंने भी राज्य किया और वे रामानन्दके शिष्य हो द्वारकामें चले आये। भगवान् कृष्णद्वारा प्रेततत्त्वविनाशिनी स्वर्णमयी हरिकी मुद्राको प्राप्तकर उसे उसने वैष्णवोंको प्रदान कर दिया।
अत्रिपुत्र रुद्रके अंश सप्तम वसु अर्थात् प्रत्यूप पाञ्चाल देशमें वैश्यजातिमें मार्गपालके पुत्र हो नानक नामसे प्रसिद्ध हुए। रामानन्दके पास आकर नानक उनके शिष्य हो गये। उन्होंने म्लेच्छोंको वशमें करके सूक्ष्ममार्ग दिखाया।
अष्टम वसु प्रभास शान्तिपुरमें ब्राह्मणजातिमें उत्पन्न हुए। वे शुक्लदत्तके पुत्र नित्यानन्दके नामसे प्रसिद्ध हुए। शौनक! इस प्रकार मैंने आपको वसुदेवताओंका माहात्म्य बतलाया। (अध्याय १७)
अश्विनीकुमारोंके अंशसे सधन ( सदन कसाई ) और रैदासकी उत्पत्ति-कथा
सूतजीने कहा—मुने! देवगुरु बृहस्पतिने प्रयागमें समागत महेंद्र आदि देवताओंसे द्वादशादित्यों, रुद्रों तथा अष्ट वसु देवताओंका माहात्म्य बतलाया और फिर वे अश्विनीकुमारोंकी ओर देखकर उनकी गाथाका इस प्रकार वर्णन करने लगे।
भगवान् विवस्वान्को संज्ञासे दिव्य तेजस्वी वैवस्वत मनु, यम और यमुना तीन संतानें उत्पन्न हुई। संज्ञा तेजःस्वरूप अपने पतिको जानकर अपनी ही छाया उत्पन्न कर तपस्या करने चली गयी। सावर्णि मनु, शनि और तपती—ये छायासे उत्पन्न हुए। भगवान् सूर्यने छायाद्वारा संतानोंमें असमान व्यवहार देखकर उसे माया-स्वरूपा नारी मानकर क्रुद्ध हो भस्म कर दिया। विवस्वान्को
क्रोधयुक्त समझकर सावर्णिमनु और शनि सूर्यके प्रति क्रुद्ध हो युद्ध करने लगे। उसी समय वे सूर्यके द्वारा भस्मभूत होने लगे। फिर वे दोनों हिमालय पर्वतपर आकर परम तप करने लगे। तीन वर्ष तप करनेपर भक्तवत्सला महाकालीने प्रसन्न हो उन्हें वर दिया। वर प्राप्तकर पुनः वे दोनों भगवान् सूर्यसे युद्ध करने आये। तपके द्वारा प्रभावशाली सूर्य उनसे भयभीत होकर वहाँसे चले गये। रमणीय कुरुखण्डमें वडवा (अश्वा) रूपको धारणकर उनकी प्रिया संज्ञा सूर्यको प्राप्त करनेके लिये तपस्यामें संलग्न थी। भगवान् सूर्य उसे दृढ़ते हुए वहाँ पहुँचे। उन्होंने संज्ञाको अश्विनीरूपमें देखकर स्वयं भी अश्वका रूप बना
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
३६८
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
लिया। पाँच वर्षतक सूर्य अश्वरूपमें वडवा (संज्ञा)-के साथ रहे। तदनन्तर वडवासे पराक्रमी एवं दिव्य स्वरूपवाले दो पुत्र (अश्विनीकुमार) उत्पन्न हुए। वे पिताके दुःखको देखकर सूर्यमण्डलमें स्थित हो गये। वडवापुत्र अश्विनीकुमार सावर्णि और शनिको जीतकर उनको बाँध करके पिताके पास ले आये। भगवान् सूर्यने शृङ्खलाबद्ध शत्रुओंको आया देख उन्हें लौह-दण्डसे मारा, जिससे वे पंगु हो गये। भगवान् सूर्यने प्रसन्नतापूर्वक वडवापुत्र अश्विनीकुमारोंसे कहा—‘जिस प्रकार जीव और ईश तथा नर और नारायण दो नाम होते हुए भी एक हैं और परस्पर मित्र हैं, उसी प्रकार एक ही नाम नासत्यसे आपलोग प्रसिद्ध होंगे। सोमकी शक्ति इडादेवी तुम्हारी ज्येष्ठपत्नी होगी और सूर्यकी शक्ति पिंगला लघुपत्नी होगी। तुम दोनोंमेंसे एक इडापति होगा और दूसरा पिंगलापति होगा। मनुष्यकी राशिसे बारहवें स्थानपर यदि शनैश्चरकी क्रूर दृष्टि पड़ती हो तो इसकी शान्तिके लिये इडापतिकी आराधना लाभदायक होगी और राशिसे दूसरे स्थानपर स्थित सावर्णि भ्रमकारक होगा, इसके लिये पिंगलापतिकी आराधना शान्तिकर होगी। जन्म-राशिमें स्थित देवी तपत्नी (तपती) तापकारिणी होगी, तब इडा तथा पिंगला शान्ति करनेवाली होंगी।’
इन वचनोंको सुनकर अश्विनीकुमार देववैद्य
हो गये। सावर्णि एवं शनि दूसरे अंशोंसे राहु और केतु हो गये। इनसे सूर्य डरकर भागे थे, अब भी ये ग्रहण-रूपमें उन्हें पीड़ा देते रहते हैं। इसीलिये इन सबके परिहार एवं शान्तिके लिये अश्विनीकुमारोंका आविर्भाव हुआ था। अश्विनीकुमारोंकी आराधनासे इनकी शान्ति होती है।
सूतजी बोले—शौनक! देवगुरु बृहस्पतिद्वारा यह कथा सुनकर देवश्रेष्ठ वे अश्विनीकुमार प्रसन्न हो गये और अपने अंशसे महीतलमें शूद्रयोनियोंमें उत्पन्न हुए। इडापति अज (बकरी)-को मारनेवाले चाण्डालके घरमें उत्पन्न हुए। वे सधन (सदन कसाई*) नामसे विख्यात होकर पितृ-मातृपरायण हुए। वे शालग्रामशिलासे तौलकर मांस बेचते थे। फिर वे कबीरके समीप आकर उनके शिष्य होकर निवास करने लगे। पूर्वमें वे सधन सत्यनिधि नामक एक ब्राह्मण थे, किंतु उन्होंने भयभीत गौको चाण्डालको दिखाया। फलतः राजाके दरबारमें सधनके हाथ काट दिये गये।
पिंगलापति चर्मकारके घर उत्पन्न हुए। वे मानदासके पुत्र रैदासके नामसे प्रसिद्ध हुए। वे काशीपुरी जाकर श्रीरामपरायण कबीरको वाद-विवादमें जीतकर शंकराचार्यके पास आये और उनसे पराजित होकर रैदास रामानन्दके पास आये तथा उनकी शिष्यता स्वीकार कर ली।
(अध्याय १८)
यज्ञांश चैतन्यमहाप्रभुका चरित्र एवं अन्य आचार्योंका भी उनके भक्ति-भावसे प्रभावित होना
सूतजीने कहा—मुने! इस प्रकार देवगुरु बृहस्पति देवताओंके उत्तम माहात्म्यको कहकर अपने मुखसे अपना अंश उत्पन्नकर ब्रह्मयोनियोंमें आविर्भूत हुए। इष्टिका नगरीमें वे गुरुदत्तके पुत्र
हुए, उनका नाम रोपण हुआ। वे ब्रह्ममार्गप्रदर्शक थे। उन्होंने सूतसे गूँथी गयी माला धारण करना, जल-निर्मित तिलक लगाना और वासुदेवके मन्त्रका जप करना आदिका जन-जनमें प्रचार
- विविध भक्तमालोंमें सदन कसाईकी कथा कुछ अन्तरसे प्राप्त होती है। कल्याणके ‘भक्तचरिताङ्क’ में भी इनका चरित्र अङ्कित है।
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
३६९
किया। वे कृष्णचैतन्यके पास आये और उनकी आज्ञासे उनका कम्बल ग्रहणकर अपनी नगरीमें आकर कृष्णके ध्यानमें रत हो गये।
हे मुने! अब आप भगवान् विष्णुका चरित्र सुनें, जिस चरित्रके सुननेसे घोर कलियुगमें भी भय नहीं होता, जब यज्ञांश कृष्णचैतन्यकी अवस्था पाँच वर्षकी हुई, उन दिनों बंगाल प्रान्तमें महात्मा ईश्वरपुरीका विशेष प्रभाव था। शारदाकी उपासनासे उनको विशेष सिद्धि प्राप्त थी, जिससे उनके मनमें अहंकार हो गया था। एक बार वे घूमते-फिरते शान्तिपुरमें आये तथा गङ्गाके तटपर रमणीय दिव्य स्तवकी रचना कर उसका पाठ करने लगे। उसी समय उधरसे चैतन्य महाप्रभु आ गये और उन्होंने स्तुति करते हुए महात्मा ईश्वरपुरीसे कहा—‘महात्मन्! आपकी रचना कुछ दोषयुक्त प्रतीत होती है।’ यह सुनकर वे विद्वान् ईश्वरपुरी आश्चर्यचकित हो गये। सर्वमङ्गला शारदाने अपने आत्मीयजन ईश्वरपुरीको लज्जित देखकर हँसते हुए कहा—‘यह साक्षात् यज्ञांश हरि कृष्णचैतन्य हैं।’ यह सुनकर ईश्वरपुरी उनके शिष्य होकर कृष्णमन्त्रके उपासक बन गये। वे वैष्णवोंमें श्रेष्ठ हुए और कृष्णचैतन्यके सेवक हो गये।
मुने! श्रीधर नामक एक शिवपूजक ब्राह्मण थे। पतननगरके राजाने उनसे श्रीमद्भागवत-सहाहकी कथा सुनी और उन्हें बहुत धन दिया। श्रीधर धन लेकर राजाके यहाँसे चलकर अपने ससुराल आये। वहाँ एक मासतक निवास करके स्त्रीके साथ पुनः घरकी ओर चल पड़े। उनके साथ-साथ सात चोर मैत्रीके विश्वासके लिये भगवान् रामकी शपथ लेकर (किंतु बुरी नीयतसे) चलने लगे। उन चोरोंने रास्तेमें एक वन मिलनेपर उसके अन्तिम छोरपर श्रीधरको
मार डाला और उनकी पत्नी एवं धनसहित बैलगाड़ीको लेकर भागने लगे। उनकी पत्नी बार-बार पीछे देखने लगी। चोरोंने कहा कि अब उधर क्या देख रही हो, तुम्हारा पति तो मर गया है। इसपर विप्रपत्नीने कहा कि ‘मैं उन भगवान् रामको देख रही हूँ, जिनकी तुम लोगोंने शपथ ली थी।’ इसपर सच्चिदानन्दविग्रह भगवान् श्रीराम प्रकट हो गये और उन्होंने उन सातों चोरोंको मार डाला तथा उस ब्राह्मणको जीवित कर वृन्दावनमें भेज दिया। उस दिनसे वे ब्राह्मण श्रीधर वैष्णव हो गये। यज्ञांश श्रीकृष्णचैतन्यके सातवें वर्षमें उन्होंने शान्तिपुरीमें चैतन्यदेवके पास जाकर ब्रह्मज्ञानको प्राप्त किया और उनके शिष्य हो गये। फिर उन्होंने श्रीमद्भागवतकी टीका की।
सूतजीने पुनः कहा—‘शौनक! काशीमें शंकरकी पूजामें तत्पर रामशर्मा नामक एक विद्वान् ब्राह्मण रहते थे। शिवरात्रिके समय उन्होंने अविमुक्तेक्षर स्थानमें एकाकी जागते हुए ध्यानपूर्वक शिवपञ्चाक्षरका जप किया। लोककल्याणकारी भगवान् शंकरने प्रसन्न होकर उस द्विजश्रेष्ठसे वर माँगनेको कहा। रामशर्माने भगवान् शिवको प्रणामकर कहा—‘प्रभो! आप जिसके ध्यानमें समाधिस्थ रहते हैं, वे देवता मेरे हृदयमें निवास करें।’ यह कहनेपर भगवान् महेश्वरने हँसते हुए कहा—‘मैं भगवान् राम-लक्ष्मणका तथा बलभद्रजीका सदा ही ध्यान-पूजन करता रहता हूँ, उनको प्राप्त कर तुम भी सुखी होओ।’ यह कहकर भगवान् शिव अन्तर्हित हो गये। अनन्तर रामशर्मा भगवान् रामके उपासक बन गये और जब कृष्णचैतन्य बारह वर्ष हो गये, तब उनके पास आकर शिष्य होकर उनके पूजक हो गये। इन्होंने कृष्णचैतन्यके आदेशपर अध्यात्मरामायणकी* रचना की।
- यद्यपि यहाँ अध्यात्मरामायणका रचयिता कोई रामशर्मा नामका व्यक्ति बताया गया है, किंतु प्रायः सभी विद्वान् इस ग्रन्थको व्यासदेवकी रचना मानते हैं। आनन्दरामायणमें भी इस ग्रन्थकी प्रशंसा उपलब्ध है।
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
३७०
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
मुने! जीवानन्द रूपानन्दके साथ चैतन्यमहाप्रभुके चरित्रको सुनकर शान्तिपुरीमें आया। सोलह वर्षवाले कृष्ण-चैतन्यको उन दोनोंने नमस्कार कर उनका शिष्यत्व स्वीकार किया। जीवानन्द (जीवगोस्वामी)-ने षट्संदर्भ ग्रन्थकी रचना की। भक्तिमार्गमें अधिक निष्ठा होनेसे वे दोनों सर्वपूज्य हो गये। उनकी आज्ञासे कृष्णचैतन्यकी पूजा करते हुए उन्होंने वहाँ निवास किया। महामुनि रूपानन्दने (रूपगोस्वामी) गुरु चैतन्यमहाप्रभुकी आज्ञा मानकर दस हजार श्लोकवाले पुराणाङ्गभूत कृष्णखण्डकी रचना की। गुरुसेवामें तत्पर राधाकृष्णका पूजक होकर उन्होंने भी वहीं निवास किया।
कुछ समय बाद विष्णुस्वामी भी रमणीय शान्तिपुरीमें आये। उन्नीस वर्षकी अवस्थावाले कृष्णचैतन्यको नमस्कारकर उस ब्राह्मणने कहा—‘इस ब्रह्माण्डमें सभी देवताओंके पूज्य कौन देवता हैं?’ यह सुनकर महाप्रभुने कहा—‘भक्तोंपर
अनुग्रह करनेवाले महादेव सभीके पूज्य हैं। विष्णु, रुद्र, ब्रह्मा आदि देवता भी सदा उनकी पूजा करते हैं। जो विष्णुभक्त शंकराचर्यमें तत्पर रहते हैं, वे शिवके प्रसादसे उत्तम वैष्णवी भक्ति प्राप्त करते हैं। वैष्णव पुरुष होकर जो लोककल्याणकारी शंकरकी पूजा नहीं करता वह सच्चा वैष्णव नहीं है।’
यह सुनकर विष्णुस्वामी भी उनके गुणोंसे आकृष्ट हो उनके शिष्य हो गये और कृष्णमन्त्रकी उपासना करते हुए वे शिवकी आराधनामें तत्पर हो गये एवं उनकी आज्ञासे उन्होंने वैष्णवीसंहिताका वर्णन किया।
सूतजीने पुनः कहा—मुने! कृष्णपरायण मध्वाचार्य भी महाप्रभुकी विशेषताओंको जानकर रमणीय शान्तिपुरीमें आये और उन्हें नमस्कारकर शिष्य होकर उनकी आराधनामें तत्पर हो गये। (अध्याय १९)
भक्तोंसहित चैतन्यमहाप्रभुकी जगन्नाथपुरी-यात्रा एवं साक्षात् भगवान्से वार्तालाप
सूतजी बोले—शौनक! शिवभक्तिपरायण शुद्धात्मा भट्टोजिदीक्षितने श्रीमहाप्रभु कृष्णचैतन्यके पास आकर उनको नमस्कारकर उनका शिष्यत्व स्वीकार किया और उन्होंने वेदके तृतीय अङ्ग व्याकरण, जो पाणिनिसे निर्मित हो चुका था, उसकी प्रक्रियात्मक व्याख्या की और फिर उनकी आज्ञासे सिद्धान्तकौमुदीका निर्माण कर वहीं निवास किया। सूर्यपरायण वराहमिहिर नामके विद्वान् महाप्रभु चैतन्यकी बाईस वर्षकी अवस्थामें उनके समीप आये और उनके शिष्य हो गये। उनकी आज्ञासे इन्होंने अनेकों ज्योतिष ग्रन्थोंका
निर्माण किया और वहीं रहने लगे।
शिवभक्तिपरायण छन्दःशास्त्रके रचयिता वाणीभूषणने तेईस वर्षकी अवस्थावाले कृष्णचैतन्यके पास आकर उनके शिष्य होकर वहाँ निवास किया और अपने नामसे छन्दःशास्त्रका निर्माण किया तथा उन्होंने परम श्रेष्ठ राधाकृष्णका जप करते हुए आनन्दमय जीवन-यापन किया।
सूतजी पुनः बोले—मुने! ब्रह्मभक्तिपरायण धन्वन्तरि नामके एक ब्राह्मण थे। उन्होंने कृष्णचैतन्यके पास आकर उनका शिष्यत्व स्वीकार किया और वहीं रहकर कल्पवेदस्वरूप वेदाङ्गकी
१-वराहमिहिर विक्रमादित्यके दरबारी थे और उनके ग्रन्थोंपर उत्पन्न भट्ट आदिकी प्राचीन टीकाएँ हैं। महाप्रभु चैतन्यका प्रायः समय चौदहवीं शती है। अतः यहाँ किसी अन्य विशिष्ट ज्योतिषीसे भाव निकालने चाहिये, जो वराहमिहिरके सिद्धान्तोंको मानते हों। २-धन्वन्तरिके सम्बन्धमें भी वराहमिहिर-जैसा ही समझना चाहिये, क्योंकि ये भी पूर्ववर्ती हैं।
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
३७१
रचना की। सुश्रुतके अतिरिक्त इनके और भी अनेक शिष्य हुए।
इसी प्रकार बौद्धमार्गपरायण जयदेव नामक ब्राह्मण पचीस वर्षकी अवस्थावाले कृष्णचैतन्यके समीप आये। उनसे कृष्ण चैतन्यने कहा—आपके परम उपास्य गुरु उद्धेश (उड़ीसा)-निवासी जगन्नाथ हैं। अतः मुझे भी शिष्योंके साथ वहीं जाना चाहिये।
यह सुनकर कृष्णचैतन्यके भक्तोंने अपने-अपने शिष्योंको बुलाकर उनके पीछे-पीछे जगन्नाथ-क्षेत्र (उड़ीसा)-की यात्रा की। निधियाँ तथा सभी सिद्धियाँ भी उनकी सेवाके लिये उपस्थित हुई। शैव और शाक्तोंके साथ दस हजार वैष्णवोंने महाप्रभु कृष्णचैतन्यको आगे कर जगन्नाथपुरीकी ओर प्रस्थान किया। उनके आगमनको देखकर भगवान् जगन्नाथ मुनिवेशमें एक ब्राह्मणका रूप धारण कर जहाँ महाप्रभु आदि थे वहाँ आये। कृष्णचैतन्यने उनको देखकर नमस्कार कर कहा—'इस भयानक कलियुगमें आप किस मतको उचित समझते हैं, मुझे कृपापूर्वक बतायें। मैं उसे तत्त्वतः सुनना चाहता हूँ।' यह सुनकर स्वयं जगन्नाथभगवान्ने लोक-कल्याणके लिये इस प्रकार
कहा—'काश्यपसे शासित मिश्र देशमें उत्पन्न म्लेच्छोंने सुसंस्कृत हो ब्राह्मणवर्णको प्राप्त किया है। उन्होंने शिक्षा-सूत्र धारणकर उत्तम श्रेष्ठ वेदका अध्ययन कर देवाधिदेव शचीपतिकी यज्ञोद्धार पूजा की है। इससे दुःखी हो भगवान् इन्द्र श्वेतद्वीपमें मेरी शरणमें आये और देवताओंके मङ्गलके लिये उन्होंने स्तुतिद्वारा मुझे उद्वुद्ध किया। तब मैंने संसारके कल्याणके लिये कलियुगमें अवतीर्ण होनेका वर प्रदान किया और इन्द्रादिको भी द्वादश आदित्यके रूपमें पृथ्वीपर अवतरित होनेके लिये कहा। मैं सिन्धुतटमें संसारकी हितकामनासे दारुपाषाणरूपमें अवतीर्ण हुआ हूँ। स्वर्गलोकसे आये हुए इन्द्रघुघ्र नामक राजाद्वारा रचित मन्दिरमें मैं प्रतिष्ठित होऊँगा। महाप्रभु चैतन्य यहाँके प्रसादकी महिमा बतलायेंगे। यह स्थान सभी वाञ्छित फलोंको देनेवाला एवं मोक्षप्रद है। यहाँ भक्तिकी महिमा अधिक है। वर्णाका भेदभाव भक्तिके प्रवाहसे दिखायी नहीं देता। एक योजनपर्यन्त यहाँ किसी व्रत आदिकी व्यवस्था नहीं है। मैं सम्पूर्ण पापोंका विनाशक हूँ और कलिकालमें मेरा दर्शन करके मनुष्य शुद्ध हो जायगा।' (अध्याय २०)
मुनिश्रेष्ठ कण्वके उपाध्याय, दीक्षित तथा पाठक आदि दस पुत्रोंकी उत्पत्ति, चैतन्यमहाप्रभु आदि आचार्योद्धार शुद्धिपूर्वक वैष्णवधर्मका विस्तार
सूतजीने कहा—देवेन्द्र! भगवान् जगन्नाथके इन वचनोंको सुनकर कृष्णचैतन्यने भी प्रसन्नतापूर्वक कहा—'भगवन्! प्राणियोंके कल्याणके लिये आप इस कथाको कुछ और विस्तारके साथ कहें।'
जगन्नाथजी बोले—महात्मन्! प्राचीन कालमें महर्षि कश्यपके पुत्र कण्वकी आर्यावती नामकी देवकन्या पत्नी हुई। इन्द्रकी आज्ञासे दोनों कुरुक्षेत्रवाहिनी सरस्वती नदीके तटपर गये और
कण्व चतुर्वेदमय सूक्तोंसे सरस्वतीदेवीकी स्तुति करने लगे। एक वर्ष बीत जानेपर वह देवी प्रसन्न हो वहाँ आयीं और आर्योंकी समृद्धिके लिये उन्हें वरदान दिया। वरके प्रभावसे कण्वके आर्य बुद्धिवाले दस पुत्र हुए—उपाध्याय, दीक्षित, पाठक, शुक्ल, मिश्र, अग्रिहोत्री, द्विवेदी, त्रिवेदी, पाण्ड्य और चतुर्वेदी। इन लोगोंका जैसा नाम था वैसा ही गुण। इन लोगोंने नतमस्तक हो सरस्वतीदेवीको
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
३७२
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
प्रसन्न किया। बारह वर्षकी अवस्थावाले उन लोगोंको भक्तवत्सला शारदादेवीने अपनी कन्याएँ प्रदान कीं। वे क्रमशः उपाध्यायी, दीक्षिता, पाठकी, शुक्लिका, मिश्राणी, अग्निहोत्रिणी, द्विवेदिनी, त्रिवेदिनी, पाण्डुयायनी और चतुर्वेदिनी कहलाईं। फिर उन कन्याओंके भी अपने-अपने पतिसे सोलह-सोलह पुत्र हुए। वे सब गोत्रकार हुए। जिनका नाम इस प्रकार है—कश्यप, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि, वसिष्ठ, वत्स, गौतम, पराशर, गर्ग, अत्रि, भृगु, अंगिरा, शृंगी, कात्यायन और याज्ञवल्क्य। इन नामोंसे सोलह-सोलह पुत्र जाने जाते हैं।
सरस्वतीकी आज्ञासे महर्षि कण्व मिक्षदेश आ गये और वहाँ दस हजार म्लेच्छोंको संस्कृत पढ़ाकर अपने वशमें कर लिया तथा स्वयं श्रेष्ठ ब्रह्मवर्तमें आ गये। उन लोगोंने सरस्वतीदेवीको तपस्यासे संतुष्ट किया। पाँच वर्षके बाद सरस्वतीदेवी प्रकट हुई और सपत्नीक उन म्लेच्छोंको शूद्रवर्णका बना दिया। वे सब कारुवृत्ति करनेवाले (शिल्पी) अनेक पुत्रोंसे समन्वित हुए। उनके मध्यमें दो हजार वैश्य हुए। उनके मध्यमें आचार्य पृथु नामका कश्यपसेवक था। उसने बारह वर्षतक तपस्याद्वारा महामुनिको संतुष्ट किया। महर्षि कण्वने प्रसन्न हो देवताओंके वरसे उन्हें क्षत्रिय राजा बनाया और उन्हें राजपुत्रपुर प्रदान किया। राजन्या नामकी उनकी पत्नी मागध नामक पुत्रको जन्म दिया। उनको कण्वने पूर्व दिशामें मागध देश दिया। तदनन्तर कश्यपपुत्र काश्यप स्वर्गलोक चले गये। उनके स्वर्ग चले जानेपर शूद्रवर्णवाले उन म्लेच्छोंने यज्ञोद्वारा देवाधिदेव शचीपति इन्द्रकी अर्चना की। इससे दुःखी होकर इन्द्र अपने बन्धुके साथ अपने अंशसे पुनः ब्रह्मयोनिमें पृथ्वीमें उत्पन्न हुए।
जिन नामका कोई विप्र था और उसकी पत्नीका
नाम था जयनी। वे दोनों कश्यपद्वारा अदितिसे कीकटदेशमें उत्पन्न हुए थे। उनके द्वारा लोककल्याणके लिये आदित्य उत्पन्न हुए। कर्मनाशा* नदीके तटपर बोधगया नामक एक नगरी है। वहाँपर उन्होंने बौद्धशास्त्रसे समन्वित हो शास्त्रार्थ किया और शूद्रोंसे वेदको ग्रहणकर विशाला (बदरीक्षेत्र) नगरी चले गये और वहाँ समाधिस्थ मुनियोंको जगाकर उन्हें वेद प्रदान किया। तभीसे सभी देवगण भूतलको छोड़कर स्वर्ग चले गये। म्लेच्छगण बौद्ध हो गये और शेष सभी वेदपरायण हो गये।
सरस्वतीकी कृपासे उन आर्योंकी संख्या बहुत बढ़ गयी। उन लोगोंने देवताओं और पितरोंको हव्य तथा कव्य समर्पित किया। इस प्रकार सभी लोग देवोपासनाद्वारा देवताओंको तृप्त करने लगे। सताईस सौ वर्ष कलियुगके बीतनेपर बलिके द्वारा प्रेषित मय नामका महान् असुर भूमिपर आया। वह अनेक मायाओंका प्रवर्तक शाक्यसिंह गुरुके नामसे प्रसिद्ध हुआ तथा गौतमाचार्य नामसे दैत्यपक्षको बढ़ानेवाला हुआ। उसने सभी तीर्थोंपर मायामय यन्त्रोंको स्थापित किया। उसके नीचे जो जाता वह बौद्ध हो जाता। फलतः चारों ओर बौद्ध परिव्याप्त हो गये। प्रायः दस करोड़के लगभग आर्य बौद्धधर्मावलम्बी हो गये। शेष पाँच लाख पर्वतशिखरपर चले गये। अग्निवंशमें उत्पन्न राजाओंने चतुर्वेदके प्रभावसे बौद्धोंको पराजित किया और आर्योंको सुसंस्कृतकर विन्ध्यपर्वतके दक्षिणमें स्थापित किया तथा विन्ध्यके उत्तरकी पुण्यभूमि आर्यावर्तमें पाँच लाख लोग अवस्थित हुए।
सूतजीने पुनः कहा—शौनक! चैतन्यमहाप्रभु भगवान् जगन्नाथकी वाणीको सुनकर उनके शिष्य हो गये और वेदमार्गपरायण हो गये। वे शुक्लदत्तके पुत्र स्वामी नित्यानन्दको पाकर अत्यन्त प्रसन्न हुए। वे भी जगन्नाथपदको नमस्कार कर उनके शिष्य
- बोधगया फल्गु नदीके तटपर स्थित है। कर्मनाशा आजकल रोहतास, गाजीपुर, भोजपुर और बनारस जिलेकी सीमा निर्धारित करती है।
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
३७३
हो गये। उषापति भगवान् अनिरुद्धने प्रसन्न हो उन दोनोंका अभिषेक कर महत्त्वमें प्रतिष्ठित किया। उस दिनसे उन लोगोंकी भूतलमें 'महत्त्व' पदवी हो गयी। दोनों गुरुभाइयों (महाप्रभु और नित्यानन्द) ने प्रसन्न होकर अपने शिष्योंसे कहा— 'जो यहाँ—जगन्नाथजीमें पद्मनाभि उषापति भगवान् जगन्नाथजीका दर्शन करेगा, वह स्वर्ग प्राप्त करेगा। जो यहाँके प्रसादको सादर ग्रहण करेगा, वह करोड़ जन्मतक वेदज्ञ एवं धनाढ्य द्विज होगा। मार्कण्डेयवटके पास कृष्णका दर्शन कर जो महान् इन्द्रद्युम्नसरमें स्नान करता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। श्रद्धा-भक्तिके साथ जो इस कथाको सुनेगा वह भी जगन्नाथपुरीमें जानेका फल प्राप्त कर लेगा।'
महाप्रभु चैतन्यने इस प्रकार भगवान् जगन्नाथकी महिमा बतलाई। भगवान् जगन्नाथने भी 'यज्ञांश-महाप्रभुकी बातें ठीक हैं' ऐसा कहा और वे वहाँ अन्तर्धान हो गये।
इसी बीचमें कलिन बलिसे प्रार्थना की। तब दुःखित हो बलिन मय दैत्यको बुलाकर कहा— 'दैत्येन्द्र! सुकन्दर नामक म्लेच्छपति हमलोगोंकी उन्नतिके लिये सदा तत्पर है। मेरी आज्ञाके अनुसार तुम उसकी सहायता करो।' बलिकी बात सुनकर ज्योतिर्विद्याविशारद वह दानव मय एक सौ दैत्योंके साथ कर्मभूमिमें आया और उसने दुष्ट म्लेच्छजातिको ज्योतिर्गणितसहित इक्कीस अध्यायवाले रेखागणितकी शिक्षा दी। तब ज्योतिर्विद्यामें पारङ्गत होकर उन म्लेच्छोंने सातों पुरियोंमें यन्त्रोंका निर्माण कराया। उन यन्त्रोंके प्रभावसे वहाँ जो लोग थे, वे सब म्लेच्छत्वको प्राप्त हो गये।
यह आदर्श देखकर सभी आर्य बहुत दुःखी
हुए, सर्वत्र महान् कोलाहल और हाहाकार मच गया। वह करुणक्रन्दन सुनकर कृष्णचैतन्यके सेवक सभी वैष्णव गुरुके दिव्य मन्त्रको ग्रहणकर म्लेच्छोंको निष्प्रभावी करनेके लिये अलग-अलग पुरियों आदि स्थानोंकी ओर चले गये। रामानन्द शिष्योंके साथ अयोध्या आ गये और उन्होंने म्लेच्छयन्त्रको उलटकर वहाँपर सभीको वैष्णव बना दिया। ललाटपर त्रिशूलके समान श्रीचिह्न बन गया, जो श्वेत-रक्तमय हुआ। कण्ठमें तुलसीकी माला और जिह्वा राममय हो गयी। इस प्रकार वे सभी म्लेच्छ रामानन्दके प्रभावसे वैष्णव हो गये*। वे संयोगी वैष्णव कहलाये। शेष आर्य मुख्य वैष्णवरूपमें अयोध्यामें स्थित हुए। बुद्धिमान् निम्बादित्य अपने शिष्योंके साथ काञ्चिकापुरी चले गये। वहाँ उन्होंने राजमार्गमें स्थित म्लेच्छयन्त्रको देखा। अपने गुरुके मन्त्रको विलोम करके वे वहाँ रहने लगे, जिससे म्लेच्छयन्त्र प्रभावशून्य हो गया। वे ललाटपर वंशपत्रके समान ऊर्ध्वरेखा, कण्ठमें माला और मुखमें गोपीवल्लभके मन्त्रसे सुशोभित हुए। उनके पास उपस्थित सभी म्लेच्छ वैष्णव हो गये और वे संयोगी वैष्णव कहलाये, शेष सभी आर्य वैष्णवमार्गके अनुयायी हो गये। अपने गणोंके साथ विष्णुस्वामी हरिद्वार गये। वहाँ स्थित म्लेच्छोंके महायन्त्रको उन्होंने विलोम कर दिया और जो लोग सेवामें आये वे सब-के-सब वैष्णव हो गये। ललाटमें दो रेखाओंसे समन्वित ऊर्ध्वपुण्ड्र और मध्यमें बिन्दु, कण्ठमें तुलसीगोलक और मुखमें कल्याणकारक माधवके मन्त्रसे सुशोभित होकर रहने लगे।
विष्णुभक्त मध्वाचार्य मथुरामें आये और उन्होंने राजमार्गमें स्थित म्लेच्छयन्त्रोंको देखकर विलोम
- इसका आशय सिकन्दर लोदीके द्वारा बलात् धर्मपरिवर्तित भारतीयोंको आचार्य रामानन्द तथा चैतन्यमहाप्रभुद्वारा पुनः शुद्धिपूर्वक सनातन हिन्दू बनानेमें है। जैसा कि इन लोगोंके ग्रन्थोंमें सनातन गोस्वामी आदिकी जीवनियोंसे स्पष्ट है। पीछे स्वामी दयानन्दने भी इसीका अनुसरण किया।
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
३७४
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
कर दिया। उनके समीप जो लोग आये, वे उनके पक्षगामी वैष्णव हो गये। उनके ललाटमें नासाधैके आधे भागतकर करवीरपत्रके समान शुभ तिलक, कण्ठमें तुलसीकी माला और मुखमें राधाकृष्णका शुभ नाम विराजमान था। शैवमार्गपरायण शंकराचार्य* भी रामानुजकी आज्ञासे अपने गणोंके साथ काशीपुरी आ गये। म्लेच्छयन्त्रको विलोम करके उनके अन्तर्गत आये सभी शैव हुए। इनके भालपर त्रिपुण्ड्र और कण्ठमें रुद्राक्षकी माला तथा मुखमें गोविन्दमन्त्र विराजमान था। रामानुज तोतादरी—तोताद्विमें जाकर सुखी हो गये। उस समय उनके ललाटमें दो ऊर्ध्वरेखाओंके बीचमें पीतिकावर्णकी सूक्ष्म रेखा और कण्ठमें तुलसीमाला विराजमान थी। गुणवान् वराहमिहिर उज्जयिनी आये और उन्होंने वहाँपर म्लेच्छयन्त्रोंको निष्फलकर सभी लोगोंको शैव बना लिया। उनके ललाटमें चिताभस्म, कण्ठमें रुद्राक्षकी माला और 'शिव' यह मङ्गलनाम मुखमें विराजमान हुआ। वाणीभूषण कन्याकुब्ज—कान्यकुब्जमें आये। अर्धचन्द्राकार पुण्ड्र, रक्त चन्दनकी माला और देवीका निर्मल नाम उनके मुखमें विराजमान था। धन्वन्तरिने प्रयागमें आकर म्लेच्छयन्त्रको विलोम कर दिया। जो उनके संनिकट आये, वे उनके
अनुयायी होकर ललाटपर अर्धपुण्ड्र और रक्तबिन्दुको धारण करनेवाले हुए। उनके कण्ठमें रक्त चन्दनकी मालाएँ शोभायमान हुईं। धीमान् भट्टोजि श्रेष्ठ उत्पलारण्य गये। इन्होंने मस्तकपर लाल त्रिपुण्ड्र और कण्ठमें रुद्राक्षकी माला धारण की एवं विश्वनाथ नामका सदा जप करने लगे। रोपण भी इष्टिका (एटा) आये। वहाँ उन्होंने म्लेच्छयन्त्रको निष्फलकर जन-जनमें ब्रह्ममार्गका प्रदर्शन किया। इसी प्रकार विष्णुभक्त जयदेव द्वारकामें आये, इससे वहाँपर उन म्लेच्छोंका यन्त्र निष्फल हो गया। उनके जो अनुयायी हुए उनके मस्तकपर एक लाल रेखा, कण्ठमें पद्माक्ष—कमलगट्टेकी माला और जिह्वापर 'गोविन्द' नाम विराजमान हुआ।
इस प्रकार वैष्णव, शैव और शाक्त अनेक संख्यामें हो गये। शाक्त निर्गुण थे और वैष्णव सगुण। जो निर्गुण और सगुण थे, वे शैव कहलाये। नित्यानन्द शान्तिपुरमें, नदीहापत्तन—नदियामें हरि, मागध (मगहर देश)—में कबीर, कलिंजरमें रैदास और सधन (सदन) नैमिषारण्यमें समाधिस्थ हो गये। आज भी यहाँ वैष्णवोंका महान् समुदाय वर्तमान है। इस प्रकारसे मय आदि दैत्य भी निष्फल होकर बलिके पास चले गये। (अध्याय २१)
अकबर आदि अन्तिम मुगल शासकोंका चरित्र; तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई, तानसेन तथा बीरबल आदिके पूर्वजन्मोंका वृत्तान्त; गुरुण्ड, मौन और सर्वत्र म्लेच्छराज्यका विस्तार
सूतजी बोले—शौनक! इस प्रकार दैत्योंने बलिके पास जाकर अपनी पराजयका वृत्तान्त बतलाया। दैत्यराज बलिने देवताओंकी महान् विजय सुनकर रोषण नामक दैत्येन्द्रको बुलाकर कहा—'तुम तिमिरलिङ्ग (तैमूरलंग)—के पुत्र होकर
सरुष नामसे प्रसिद्ध होगे। अतः तुम वहाँ जाकर दैत्योंके श्रेष्ठ कार्यका सम्पादन करो। इसपर उसने क्रुद्ध हो देहली आकर वेदमार्गस्थ पुरुषोंका नाश करना शुरू कर दिया। उसने पाँच वर्षतक राज्य किया। उसीका पुत्र बाबर हुआ, बीस वर्षतक
- यहाँ आदिशंकराचार्य आदि आचार्यगण अभिप्रेत न होकर कोई तत्कालीन शंकर आदि नामवाले महात्मा इष्ट प्रतीत होते हैं।
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
३७५
उसने राज्य किया। (कुछ वर्ष समरकन्दमें और कुछ दिन भारतमें।) उसका पुत्र होमायु (हुमार्यूँ) हुआ। मदान्ध होमायुने देवताओंका निरादर किया। तब देवताओंने नदीहाके उपवनमें स्थित कृष्णचैतन्यकी स्तुति की। स्तुति सुनकर हरि क्रुद्ध हुए और उन्होंने अपने तेजसे उसके राज्यमें विघ्न उत्पन्न किया। उनके सैन्योद्धार होमायुका पराजय हुआ। उस समय शेषशाक (शेरशाह) -ने रमणीय देहली नगरमें आकर पाँच वर्षतक अत्यन्त कुशलतापूर्वक राज्य किया। उन्हीं दिनोंकी बात है, शंकराचार्यके गोत्रमें उत्पन्न मुकुन्द नामक एक श्रेष्ठ ब्राह्मण अपने बीस शिष्योंके साथ प्रयागमें तप कर रहा था। 'म्लेच्छराज बाबरके द्वारा देवताओंकी प्रतिमाओं आदिको नष्ट-भ्रष्ट कर दिया गया है' यह जानकर ब्राह्मण मुकुन्दने दुःखी होकर अग्निये अपने प्राणोंकी आहुति दे दी। उसके बीस शिष्योंने भी गुरुके मार्गका ही अनुगमन किया। किसी समय ब्राह्मण मुकुन्दने गौके दूधके साथ गौके रोमका भी पान कर लिया था, इसी दोषके कारण वह दूसरे जन्ममें म्लेच्छयोनिमें उत्पन्न हुआ। जब हुमार्यू कश्मीर (अपने भाई मकरानके यहाँ काबुल-कश्मीरकी सीमा)-में निवास कर रहा था, तब उसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ और उसी समय यह आकाशवाणी हुई कि 'तुम्हारा पुत्र बड़ा प्रतापी और भाग्यशाली होगा। यह अकस्मात् (अक) प्राप्त वर (वरदान)-से उत्पन्न हुआ है, अतः इसका नाम 'अकबर' होगा और यह म्लेच्छ या पिशाचोंके मार्गका अनुसरण नहीं करेगा। यह श्रीधर, श्रीपति, शम्भु, वरेण्य, मधुव्रती, विमल, देववान्, सोम, वर्धन, वर्तक, रुचि, मान्धाता, मानकारी, केशव, माधव, मधु, देवापि, सोमपा, सूर तथा मदन—ये बीस जिसके शिष्य हैं, वही पूर्वजन्मका मुकुन्द ब्राह्मण भाग्यवश
तुम्हारे घरमें इस रूपमें आया है।'
ऐसी आकाशवाणी सुनकर प्रसन्नचित्त हुमार्यूने भूखसे पीड़ित व्यक्तियोंको दान दिया और प्रेमपूर्वक पुत्रका पालन किया। पुत्रकी दस वर्षकी अवस्था होनेपर वह देहलीमें आया और शेषशाकको पराजित कर वहाँका राजा हो गया। उसने एक वर्ष राज्य किया और बादमें उसका पुत्र अकबर राजा हुआ।
अकबर (मुकुन्द ब्राह्मण)-के राज्यप्राप्तिके बाद उसके पूर्वजन्मके सात प्रिय शिष्य (केशव, माधव, मधु, देवापि, सोमपा, सूर तथा मदन) इस जन्ममें भी पुनः उत्पन्न होकर अकबरके दरबारमें आये। मुकुन्द ब्राह्मणके शिष्य केशव अकबरके समयमें गानसेन (तानसेन) नामसे उत्पन्न हुए। पूर्वजन्मके माधव अकबरके समयमें वैजवाक् (बैजूबावरा) नामसे प्रसिद्ध हुए। पूर्वजन्मके मधु अकबरके समयमें सभी रागोंके ज्ञाता 'हरिदासगायक' नामसे विख्यात हुए। ये मध्वाचार्य-मतानुयायी प्रसिद्ध वैष्णव थे। पूर्वजन्मके देवापि अकबरके समयमें 'बीरबल' नामसे प्रसिद्ध हुए। वे पश्चिमी ब्राह्मण थे और उन्हें वाणीकी अधिष्ठात्री सरस्वतीदेवीका अभिमान था। पूर्वजन्मका गौतमवंशमें उत्पन्न सोमपा अकबरके समयमें 'मानसिंह' नामसे उत्पन्न हुआ और वह आर्यभूपशिरोमणि अकबरका सेनापति बना। पूर्वजन्मका शूर दक्षिण देशमें ब्राह्मण-कुलमें उत्पन्न हुआ, यह पण्डित था, इसका नाम हुआ 'बिल्वमंगल'। यह अकबरका मित्र बना। पूर्वजन्मका पूर्वदेशका ब्राह्मण मदन अकबरके समयमें 'चन्दल' नामसे प्रसिद्ध हुआ। यह नर्तक और रहःक्रीडाविशारद था।
ये सात राजा अकबरके दरबारमें स्थित हुए और पूर्वजन्मके श्रीधर आदि तेरह शिष्य दूसरे स्थानोंमें प्रतिष्ठित हुए। अकबरके समयमें अपनेके पुत्र श्रीधर ही पुराणोंमें निपुण तुलसीशर्मा (तुलसीदास)
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth