भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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पृष्ठ 368
  • प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *

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किया। सूर्यके मिथुन राशिमें स्थित होनेपर हिर्बु दैत्यका विनाश करनेवाले महारुद्रको देवताओंके कल्याणके लिये शशिमण्डलका राजा बनाया। यह महारुद्र देवकार्यके लिये तत्पर हो गया। अनन्तर यही महारुद्र रमणीय हिमालयपर्वतपर साधकर्मके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुआ और बादमें कलाओंका ज्ञाता भारतीय नामसे प्रसिद्ध हुआ। विद्वत्समुदायको जीतकर फिर वह काशी नगरीमें चला आया और शंकराचार्यका शिष्य हो गया।

बृहस्पतिजीने पुनः कहा— देवेन्द्र ! मयका एक पुत्र था मायी, वह एक पैरपर खड़ा होकर एक हजार वर्षोंतक घोर तपस्या करता रहा। उसने अपनी तपस्याके द्वारा संसारके सभी प्राणियोंको संतप्त कर दिया। अनन्तर भगवान् परमेशी पितामहने प्रसन्न होकर तीन गाँवों (तीन पुरों—त्रिपुर) को उसके भोगके लिये निर्मित किया। सोलह योजनावाले विस्तृत स्वर्गके समान सुवर्णमय, उसके नीचे भुवलोकके समान एक योजन विस्तृत रजतमय तथा उसके नीचे भूलोकके समान एक योजन विस्तृत लौहमय तीन पुर बनवाये। इस प्रकार उस त्रिपुरमें सौ करोड़ दैत्य तथा दैत्यपत्नियाँ निवास करने लगीं। वे देवताओंके यज्ञभागको ग्रहणकर देवताओंके समान हो गये। यज्ञभाग न मिलनेके कारण निर्बल देवगण भूखसे पीड़ित हो भगवान् विष्णुके पास गये और उनकी स्तुति कर कहने लगे—‘ भगवन् ! प्रभो ! मयपुत्र मायीके द्वारा प्राप्त दुःखोंको भोगते हुए हमें बहुत ही दीर्घ समय हो गया है, हम सभी अधिकारविहीन होकर रह रहे हैं। स्वर्गमें मायी दैत्यका ही राज्य है। देवताओंकी बात सुनकर भगवान् मधुसूदन संस्कृतवार्ता करनेवाले त्रिपुरस्थित धर्मपरायण दैत्योंको देखकर भयानक कलियुगमें बौद्धरूपमें अजिन द्विजके पुत्र होकर उत्पन्न हुए। उस बौद्धने वेदधर्मपरायण विप्रोंको

मोहित कर दिया। तामस मन्वन्तरमें तीनों वर्ण वेदविहीन, कर्मरहित तथा वैराग्यसम्पन्न हो गये। सोलहवें कलिकी प्राप्ति होनेपर वे सभी यज्ञरहित हो गये। इस कारण त्रिपुरनिवासियोंको यज्ञभाग मिलना बंद हो गया, अतः सभी त्रिपुरनिवासी दैत्यगण क्रोधाविष्ट हो वेदरहित तथा यज्ञशून्य उन मनुष्योंको पीड़ित करने लगे। कल्पान्तमें दैत्योंसे भक्षित हो सभी मनुष्य विनष्ट हो गये।

पुनः सत्यलोकके आनेपर देवताओंने कैलासमें सभी लोगोंका कल्याण चाहनेवाले भगवान् शम्भुकी आराधना की। भगवान् शंकर ज्योतिर्लिङ्गरूप धारण कर वहाँ अवस्थित हो गये। इस कारण देवता प्रसन्न हो गये। उन्होंने भूमिके सारको ग्रहणकर विधिपूर्वक एक रथका निर्माण किया। चन्द्र और सूर्यके सारसे रथके दो चक्र बनाये। इसी प्रकार सुमेरुके सारसे रथका ध्वज बनाकर वह स्यन्दनरूपी यान भगवान् शिवको प्रदान किया। भगवान् ब्रह्मा स्वयं यहाँ आकर रथके सारथि बने। उन देवाधिदेवके रथके घोड़े चारों वेद हुए। उनका धनुष लोकालोक पर्वतका सार—तत्त्व ही आजगव नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह घोर शब्द करनेवाला था। भगवान् शंकर जब प्रत्यञ्चा बनाकर धनुषपर चढ़ाने लगे तब देवाधिदेवके क्रोधके कारण वह चाप टूट गया। यह देखकर भगवान् विष्णु आश्चर्यचकित हो गये। तदनन्तर उन्होंने स्वर्गके सारको ग्रहण कर पिनाक नामक एक दिव्य धनुषका निर्माण किया। रुद्रने पुनः उस धनुषकी प्रत्यञ्चा चढ़ायी। वह धनुष दूढ़ था, अतः भग्रीभूत नहीं हुआ। इस कारण ब्रह्मादि देवताओंने प्रसन्नचित्तसे उनकी स्तुति की और तबसे भगवान् महेश्वर ‘पिनाकी’ नामसे प्रसिद्ध हुए। शेषनाग उस चापकी डोरी थे और इन्द्र बाणरूप बने। बाणके पक्षपर वहि और वायु तथा शल्यपर सनातन विष्णु स्थित हुए। उस

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