भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 369, कुल 654 में से

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

धनुष-बाणसे करोड़ों दैत्य आकाशमें मारे गये। भगवान् शिवने मायीसे पालित उस त्रिपुरको जला दिया।

उस भयंकर त्रिपुरके भस्मीभूत होनेपर लोकपति ब्रह्माने मीन राशिमें रविके स्थित होनेपर पिनाकी महारुद्रको चन्द्रमण्डलका राजा बनाया और तामस मन्वन्तरमें देवताओंने अपने-अपने अधिकारको पुनः प्राप्त कर लिया।

सूतजीने कहा— मुने! अनन्तर पिनाकीने अपने मुखसे अपने उत्तम अंशको उत्पन्न कर हरिद्वारमें अवस्थित मच्छन्द* नामक योगीके मुखमें अपने तेजको प्रविष्ट कराया। वह मच्छन्द भगवान् शम्भुकी पूजा करनेवाला तथा गोरखका गुरु था। उस तेजसे नाथशर्मा नामक एक बड़ा विद्वान्, श्रेष्ठ एवं सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ। वह पृथ्वीके सभी विद्वानोंको जीतकर काशीपुरीमें चला आया और शंकराचार्यका शिष्य हो गया।

देवेन्द्र! चाक्षुष मन्वन्तरके बारहवें द्वारमें तालजंघवंशमें उत्पन्न क्षत्रियोंके द्वारा भृगुवंशमें उत्पन्न ब्राह्मणोंका कुरुक्षेत्रमें विनाश हुआ और उनके प्रचुर धनको लेकर वे क्षत्रिय दैत्योंके पक्षपाती हो गये। उसी समय किसी ब्राह्मणकी गर्भवती स्त्री डरकर तपस्याके प्रभावसे सौ वर्षोंतक अपने गर्भको धारण किये रह गयी। इसे सहन न कर गर्भस्थ शिशु माताके ऊरुप्रदेशको विदीर्णकर पृथ्वीपर आ गया। उसके तेजसे सम्पूर्ण जगत् भस्मीभूत होने लगा। तब सभी देवगण प्रजापतिको आगे कर भयसे आतुर हो उसके पास आये। उस बालकने पितरों और देवताओंकी आज्ञासे उस लोकनाशकारी तेजको जलके बीचमें फेंक दिया। जलदेवीने वडवा-स्वरूप धारणकर उस उत्तम तेजका पान कर लिया, किंतु रौद्र तेजसे पीड़ित

हो उसने उस तेजका वमन कर दिया। ब्रह्माजीने त्रिकुटगिरिपर आकर उसके नीचे घोर सागरमें लोककी रक्षाकी दृष्टिसे उस तेजको स्थापित कर दिया। पुनः परमेष्ठी पितामहने मेघ राशिमें सूर्यके आनेपर उस रौद्र तेजको रुद्ररूपमें शशिमण्डलके स्वामीके रूपमें स्थापित किया। वह ऊरुसे उत्पन्न होनेके कारण वीर्य, संसारका दहन करनेके कारण दहन और वडवाके मुखसे उत्पन्न होनेके कारण वाडव नामसे प्रसिद्ध हुआ।

सूतजी बोले— मुने! उस दहनेने अपने मुखसे तेज उत्पन्न किया और वही कुरुक्षेत्रनिवासी सारस्वत ब्राह्मणके घरमें क्षेत्रशर्माके नामसे विख्यात हुआ। वह विद्वानोंमें श्रेष्ठ हुआ। शंकराचार्यसे पराजित हो उनका शिष्य हुआ और ब्रह्मचर्यव्रत धारणकर भगवान् शंकरकी उपासना करता हुआ काशीमें स्थित हो गया।

बृहस्पतिने पुनः कहा— देवेन्द्र! पूर्वकालमें सारे संसारके एकार्णव हो जाने तथा स्थावर और जंगम सभीके नष्ट हो जानेपर एवं अव्यक्तजन्मा ब्रह्माके सौ वर्ष बीतनेपर मायारूपी प्रकृतिने आनन्दपूर्वक उस जलका पान कर लिया। फिर तमोमयी महाकाली उस दारुण प्राकृत जगत्में एकाकी उत्पन्न हुई। अनन्तर नित्य शुद्ध सनातन प्रकृति स्वेच्छासे महागौरीके रूपमें परिणत हो गयी। उनके पाँच मुख, दस भुजाएँ तथा तीन नेत्र थे। वह शिवा नामवाली हुई। ललाटस्थ नेत्रद्वारा उस माताने सूक्ष्म तेजका दर्शन किया। वह तेज नित्य, अविकारी, निरञ्जन तथा सर्वत्र दिशाओंमें परिव्याप्त था। उस ब्रह्मको प्रकृतिने ग्रहण करनेकी इच्छा की, परंतु समर्थ न हो सकी। आश्चर्यचकित हो उस प्रकृतिने अपने पाँचों मुखोंसे भक्तिपूर्वक प्रार्थनाकर परात्पर पूर्ण ब्रह्मको प्रसन्न किया। वह

  • इस कथानकमें नाथसम्प्रदायका इतिहास अन्तर्निहित दीखता है।

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