भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 370, कुल 654 में से

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पृष्ठ 370
  • प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *

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सर्वज्ञ ब्रह्म प्रकृतिके पाँचों मुखोंमें प्रविष्ट हो गया। वह ब्रह्म पुरुषत्वको प्राप्तकर स्वयम्भू नामसे प्रसिद्ध हुआ और अव्यक्त प्रकृतिसे उत्पन्न होनेके कारण वे अव्यक्तजन्मा कहे गये। उनके निमित्त वरदा, लोकरूपिणी अष्टादश भुजाओंसे युक्त देवी महालक्ष्मी उत्पन्न हुई। वे संसारकी रक्षा करने लगीं। उनके अद्भुत रूपको देखकर स्वयम्भू आश्चर्यचकित हो गये। अनेक रूपोंमें प्रवेश करके भी स्वयम्भू उनके अन्तको प्राप्त नहीं कर सके। बृहत् और बहुरूप होनेके कारण वे ब्रह्मा नामसे विख्यात हुए। थककर भगवान् ब्रह्मा सत्यलोकमें चले आये। उन्होंने मुखसे आविर्भूत वेदोंसे शंकरकी दीर्घकालतक स्तुति की। उनके अङ्गसे नदी-नद उत्पन्न हुए। पुनः जलमय समुद्र हो जानेसे वहाँ स्वयं प्रभुने शयन किया। अव्यक्त स्वयम्भूने सहस्रयुगपर्यन्त वहाँ निवासकर सत्यलोकमें आकर पुनः सृष्टि आरम्भ कर दी। गणरूपा अनन्त सृष्टियाँ पृथक्-पृथक् उत्पन्न हुई। उससे महालक्ष्मीमय व्यक्त जगत् हुआ। महासनातनी महालक्ष्मीदेवी सृष्टिके अनेकत्वको देखकर आश्चर्यचकित हो गयीं और सर्वेश्वर भगवान्के पास आयीं तथा अव्यक्त मङ्गलरूप विष्णुको नमस्कारकर कहने लगीं— 'भगवन्! आप नित्य और शुद्धात्मा हैं, संसारमें बहुत-से प्राणी हो गये हैं, मैं इन लोगोंकी गणना कैसे कर सकती हूँ।' महालक्ष्मीके इस वचनको सुनकर वे ब्रह्म दो रूपोंमें विभक्त हो गये। पूर्वार्धसे रक्ताङ्ग और परार्धसे गौराङ्ग। रक्ताङ्ग और गौराङ्ग दोनों चतुर्भुज हुए। सम्पूर्ण सृष्टिगणोंका स्वामी रक्ताङ्ग गणेश हुआ, वही ईश्वर कहलाता है। परार्धसे उत्पन्न गौरवर्ण जो चतुर्भुजी है उसका ध्यान योगीलोग करते हैं, वह निरञ्जन है।

एक बार पार्वतीवल्लभ भगवान् शिवने एक हजार वर्षतक प्रयत्नपूर्वक गणेशकी पूजा की। तब

शर्वपूजक भगवान् गणेशने प्रसन्न होकर पार्वतीसहित हरको वर माँगनेके लिये कहा। इसपर भगवान् शंकरने उनकी भक्तिपूर्वक इस प्रकार स्तुति की—

नमो विष्णुस्वरूपाय गणेशाय परात्मने। चतुर्भुजाय रक्ताय यज्ञपूर्णकराय च॥ विघ्नहन्त्रे जगद्भद्रं सर्वानन्दप्रदायिने। सिद्धीनां पतये तुभ्यं निधीनां पतये नमः॥ प्रसन्नो भव देवेश पुत्रो भव मम प्रियः।

(प्रतिसर्गपर्व ४।१२।१०—१२)

'विष्णुस्वरूप परात्मा गणेशको नमस्कार है। चतुर्भुजधारी, रक्तवर्ण, यज्ञमूर्ति, विघ्नहन्ता, जगत्का धारण-पोषण करनेवाले, सभीके आनन्ददाता, निधिपति तथा सिद्धिपति भगवान् गणेश! आपको नमस्कार है। देवेश! आप प्रसन्न हों, मेरे प्रिय पुत्रके रूपमें उत्पन्न हों।' इसपर गणेशजी पार्वतीजीके तेजोमय शरीरसे उत्पन्न हुए। इन्द्रके साथ सभी देवगण कैलासशिखरपर उनका मङ्गलमय दर्शन करनेके लिये आये। वहाँ सर्वसुखद महोत्सव हो रहा था। इसी समय क्रूरदृष्टि कालात्मा, सूर्यपुत्र शनिदेव मण्डपमें आये। उनके दर्शनमात्रसे वह बालक मस्तकविहीन हो गया। तब गुह्यकोंके निवासस्थान उस कैलासमें महान् हाहाकार मच गया। वह कटा हुआ सिर सूर्यके तुला राशिस्थ होनेपर चन्द्रलोकमें स्थित हो सताईस दिनतक पृथ्वीपर प्रकाशित होता है। सभी देवताओंसे विनिन्दित भयंकर शनिदेवने एक दाँतवाले गजके रँगें हुए मस्तकको काटकर उस बालकके स्कन्धपर जोड़ दिया और ब्रह्माने उसकी माताके द्वारा स्तुति किये जानेपर कर्कटके सिरको गजके ऊपर स्थितकर गजयोनिवाला बना दिया और कर्कटको बिना सिरका कर दिया। इस प्रकार साक्षात् ईश्वरस्वरूप गजानन गणेश उत्पन्न हुए।

सूतजीने कहा—बृहस्पतिसे ऐसा सुनकर भगवान्

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