भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

गणेशने अपने मुखसे स्कन्ध उत्पन्न किया और वही ईश्वररूप स्कन्ध काशीमें एक दैवज्ञ द्विजके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुआ और महीतलमें दुंदिराजके नामसे प्रसिद्ध हुआ। फलितज्योतिषके 'जातकाभरण'

नामक ग्रन्थका निर्माण कर वह वेदकी रक्षाके लिये शंकराचार्यके पास आया। वह प्रसन्नतामा उनका शिष्य होकर गुरुसेवामें तत्पर हो गया। (अध्याय १२)

अघोरपंथी भैरव तथा बालशर्माकी उत्पत्तिकी कथामें रावण तथा हनुमान्जीका चरित्र

सूतजी बोले—शौनक! भगवान् कपाली शिव अपने अंशसे काशीमें अयोनिजरूपसे उत्पन्न हुए। वे कपालमोचनकुण्डसे पृथ्वीपर आकर यतिरूप वेदनिधि भैरव नामसे प्रख्यात हुए और उन्होंने दुष्कर अघोरमार्गका अपने शिष्योंमें प्रवर्तन किया। फिर वे शंकराचार्यके पास आकर उनके शिष्य हो गये। उन्होंने मन्त्रमय डामरतन्त्रका प्रवर्तन किया और कीलित मन्त्रोंके उत्कीलनका मार्ग बतलाया।

बृहस्पतिजीने कहा—देवेन्द्र! मय दानवकी पुत्री मन्दोदरी त्रिपुरके अधिपति मायीकी बहन थी। त्रिपुरके नष्ट होनेपर वह देवी मन्दोदरी सनातन महाविष्णुको गुप्तभावसे निरन्तर संतुष्ट करती रहती थी। भगवान् विष्णुमें भक्तिभावना करनेसे मन्दोदरीको उत्तम योग प्राप्त हुआ और वह भयंकर विन्ध्याद्रिकी गुफामें विलीन हो गयी। उसकी समाधिमें चारों युग दो सौ बार बीत गये। वैवस्वत मन्वन्तरके बारहवें सत्ययुगमें ब्रह्माजीके पुत्र पुलस्त्य हुए, जिनसे विश्रवा नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। सौ वर्षतक विश्रवामुनिने तपस्याकर सुमाली दैत्यकी पुत्री कैकसीके साथ विवाह किया और उससे रावण और कुम्भकर्ण दो राक्षस पुत्र उत्पन्न हुए। रावण मातृभक्त था और भाई कुम्भकर्ण पितृभक्त। वरकी कामनासे उन दोनोंने हजार वर्षोंतक घोर तपस्या की। भगवान् परमेश्वी पितामहने प्रसन्न होकर उन दोनोंको देव और दानवोंसे अजेय होनेका वर दिया। उन दोनोंने वर प्राप्तकर क्रुद्ध हो श्रेष्ठ

पुष्पकयानको ग्रहणकर देवताओंसे युद्ध किया। उन दोनोंसे पराजित देवताओंने सुखप्रद स्वर्गको छोड़कर पार्थिवार्चनके द्वारा कैलासमें स्थित भगवान् शिवकी ग्यारह वर्षोंतक आराधना की और उनसे वर प्राप्तकर वे सभी निर्भय हो गये।

इधर गौतम-ऋषिके शरीरसे उत्पन्न केशरीकी पत्नी अञ्जनाके गर्भसे हनुमान्जीके रूपमें भगवान् शंकरने भी अपने अंशसे अवतार लिया और आकाशमें उगते हुए लाल सूर्यको देख फल समझकर निगल लिया। अन्धकार देखकर इन्द्रने उनकी टुट्टी (हनु)- पर अपने वज्रसे प्रहार किया। इसी बीच रावण भी उनकी पूँछ पकड़कर लटक गया, फिर भी उन्होंने सूर्यको नहीं छोड़ा। रावणसे एक वर्षतक मुष्टियुद्ध होता रहा। अन्तमें थका हुआ रावण रुद्ररूपी हनुमान्से भयभीत हो इधर-उधर भागा। इसी समय ऋषि विश्रवा वहाँ आये और वेदमय स्तोत्रोंसे परावाणीद्वारा हनुमान्को प्रसन्न किया। प्रसन्न हो रुद्ररूपी हनुमान्ने संसारको रूलानेवाले रावणको छोड़ दिया। फिर बलवान् केशरीपुत्र पम्पापुरके तटपर निवास करने लगे और अचलरूपसे स्थित होनेके कारण स्थाणु नामसे प्रसिद्ध हुए। संसारको रूलानेवाले तथा देवताओंको मारनेवाले रावणको मुष्टिकासे हनन करनेके कारण इनका नाम हनुमान् पड़ गया*। हनुमान्जीकी तपस्यासे प्रसन्न हो भगवान् ब्रह्मने कहा—'तपोनिधे रुद्र! आप मेरी बात सुनें। वैवस्वत मन्वन्तर अट्टाईसवें त्रेतायुगके प्रथम चरणमें

  • निवृत्तं च सुरान् मुख्यान् रावणं लोकरावणम् ॥ निहन्ति मुष्टिर्भयः स हनुमानिति विश्वतः ॥ (प्रतिसर्गपर्व ४।१३।४४-४५)

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