भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 372, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
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साक्षात् भगवान् राम अवतीर्ण होंगे। उनकी भक्ति प्राप्तकर आप कृतकृत्य हो जायेंगे। देवेन्द्र! ऐसा कहकर ब्रह्माजीने भाद्रपद मासके चन्द्रमाके प्रकाशरूपमें उन्हें प्रतिष्ठित किया और इधर मयपुत्री मन्दोदरीका विवाह रावणके साथ करा दिया। वह रावण नैऋत दिशाका दिक्पाल हुआ। भगवान् हरिने रामरूपमें अवतरित होकर रावणको मारा।'
सूतजी बोले—मुने! अनन्तर वे ही हनुमान् पुनः मनुष्य-शरीर धारणकर पृथ्वीपर कदलीवनमें आकर बालशर्मा नामसे प्रसिद्ध हुए और काशी नगरीमें मणिकर्णिकापर रहने लगे। वे शंकराचार्य यतिके शिष्य होकर गुरुसेवामें तत्पर हो गये और उन्होंने तन्त्र-मन्त्रशास्त्रका निर्माण किया।
(अध्याय १३)
रुद्रमाहात्म्य, भवके अंशसे रामानुजाचार्यका आविर्भाव
देवगुरु बृहस्पतिजीने कहा—देवेन्द्र! सृष्टिके प्रारम्भमें विराट् पुरुषकी नाभिसे एक विस्तृत कमल उत्पन्न हुआ। जिससे कमलासन ब्रह्मा उत्पन्न हुए। वे दो भुजा, चार मुख और दो पैरोंवाले थे। उन्हें चिन्ता हुई कि मैं कौन हूँ, कहाँसे आया हूँ और मेरा उत्पत्तिकर्ता कौन है? इस प्रकार चिन्तित होते ही हृदयस्थ देवताने कहा—'तुम तप करो।' यह सुनकर ब्रह्माजीने महान् तप किया। चतुर्भुज, योगगम्य सनातन विष्णुका कमलासन ब्रह्माने हजार वर्षतक समाधिस्थ होकर ध्यान किया। इसी समय नवीन मेघके समान श्यामल, चतुर्भुज भगवान् विष्णु आयुध एवं दिव्य अलंकारोंसे अलंकृत होकर बालकरूपमें ब्रह्माके सामने प्रकट हुए। समाधिसे जागकर ब्रह्मा उन्हें देखकर चकित हो गये। भगवान् विष्णुने हँसकर कहा—'वत्स! मैं ही तुम्हारा पिता हूँ।' ब्रह्मा स्वयंको उनका पिता मानते थे। इस प्रकार दोनोंमें विवाद होने लगा। उसी समय तमोमय रुद्र ज्योतिर्लिङ्गरूपमें प्रकट हुआ। हंसरूपमें ब्रह्मा और वराहरूपमें हरि सौ वर्षतक क्रमशः ऊपर-नीचे आते-जाते रहे, परंतु उसका अन्त न पाकर असफल हो उन दोनोंने लौटकर भगवान् शिवकी स्तुति की। प्रसन्न हो भगवान् भव दर्शन देकर कैलास चले गये और वहाँ समाधिमें योगी रुद्रके दिव्य पाँच युग बीत गये। इसी बीच तारकासुर
नामके भयंकर दानवने हजार वर्ष तपकर ब्रह्मासे वर प्राप्त किया कि 'भवसे उत्पन्न पुत्रसे ही तुम्हारी मृत्यु होगी।' वर प्राप्तकर तारकासुरने देवताओंको जीतकर महेन्द्रका स्थान ग्रहण कर लिया। दुःखी देवगणोंने कैलासमें जाकर रुद्रकी स्तुति की। शिवने कहा—'वर माँगो।' उन लोगोंने नतमस्तक हो प्रणामपूर्वक कहा—'भगवन्! भगवान् ब्रह्माने तारकको यह वर प्रदान किया है कि शिव-शक्तिसे उत्पन्न पुत्र ही तुम्हें मारेगा। इसलिये भगवन्! आप हमलोगोंकी रक्षा करें और विवाह करें। स्वायम्भुव मन्वन्तरमें दक्षप्रजापतिकी साठ कन्याएँ हुई। उनमें एक सती नामकी भी कन्या थी। उसने एक वर्षतक आपकी पार्थिव पूजा की। उस सतीको आपने वर प्रदान किया और वह आपकी प्रिया हुई। उसके पिता दक्षने आपका अपमान किया और दक्षसे उत्पन्न शरीरको सतीने यज्ञमें समर्पित कर दिया। उस सतीका दिव्य तेज हिमालयमें प्रविष्ट हुआ। अब वह अपना शरीर छोड़कर हिमालय तथा मेनाकी पुत्री पार्वतीके रूपमें उत्पन्न हुई है। वे गौरी उत्पन्न होते ही नौ वर्षकी हो गयीं। आपकी प्रासिके निमित्त उन्होंने सौ वर्षतक जलमें रहकर, सौ वर्ष पञ्चाग्रिका सेवनकर, सौ वर्षतक वायुमात्रका पानकर और सौ वर्षतक बिना साँस लिये आकाश-मण्डल तथा चन्द्रमण्डल आदिमें
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