भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

रहकर तपस्या भी की है। अतः हे भगवन्! अब आप शिवा—पार्वतीके साथ विवाह करें।'

शिवने कहा—देवगणो! आपकी बात अनुचित प्रतीत होती है, क्योंकि हमसे ज्येष्ठ ज्योतिसे उत्पन्न दस रुद्र अभी अविवाहित हैं, मैं उन सबसे छोटा भव नामक रुद्र हूँ, मैं उनके विवाहसे पूर्व ही कैसे विवाह कर सकता हूँ? दूसरी बात यह है कि वे साक्षात् अव्यक्तरूपा पराम्बा हैं, उनसे सम्पूर्ण चराचर ब्रह्माण्ड परिव्याप्त है। योगीश्वर! मैं मातुरूपा भगवतीका वरण कैसे कर सकता हूँ? अतः आपलोगोंके कल्याणके लिये मैं अपनी शक्ति आपलोगोंको देता हूँ, वह आपलोगोंकी कामना पूर्ण करेगी। अनन्तर भगवान् शंकर अपनी शक्ति अग्निको समर्पित कर स्वयं पुनः समाधिस्थ हो गये। वहिके साथ इन्द्रादि देवगणोंने सत्यलोकमें आकर ब्रह्माको सम्पूर्ण वृत्तान्त सूचित किया। पुनः देवताओंके समुद्योग तथा गिरिजाकी तपस्यासे भगवान् शंकर प्रसन्न हो गये। उन्होंने पार्वतीको पाणिग्रहण करनेका वर प्रदान किया। इसपर भगवती पार्वतीने नमस्कार कर कहा—'देव! मैं पिता-माताकी आज्ञाके अनुसार ही कार्य करनेवाली हूँ, अतः विवाहके लिये उनकी अनुमति चाहिये।'

भगवान् शंकरने ससर्पियोंको बुलाकर सबकी सम्मतिसे हिमवान्के पास संदेश भेजा और विधिपूर्वक विवाह भी सम्पन्न हो गया। उस विवाहमें बारतियोंकी

सेवाके लिये पार्वतीने अपनी तपःसिद्धिसे ऋद्धि-सिद्धिको उत्पन्न कर यथाविधि सेवा-सत्कार कर सबको संतुष्ट किया। यह देखकर ब्रह्मादि देवगण आश्चर्यमें पड़ गये और उन्होंने अनेक प्रकारसे उनकी स्तुति तथा दैत्योंसे रक्षाकी प्रार्थना भी की। पार्वतीदेवीने प्रसन्न होकर उन्हें अभय-दान दिया। विवाहके पश्चात् भगवान् शिव पार्वतीके साथ कैलास चले आये और हजार वर्षांतक आनन्दमें निमग्न रहे। काम—प्रद्युम्नकी धृष्टता देखकर भगवान् शंकरने उसे भस्म कर अनङ्गरूपमें कर दिया। उसकी पत्नी रतिकी प्रार्थनापर भगवान्ने कहा—'तुम प्राणियोंके हृदयमें निवास करोगी। यह स्वारोचिष मन्वन्तर है। वैवस्वत मन्वन्तरके अट्टाईसवें द्वापरमें भगवान् श्रीकृष्णके पुत्र प्रद्युम्नको तुम पतिरूपमें प्राप्त करोगी। ऐसा कहकर भगवान् शंकर अन्तर्धान हो गये।' (बादमें कुमारस्वामी स्कन्दकी उत्पत्ति हुई, जिन्होंने तारकासुरका वधकर देवताओंको शान्त एवं प्रसन्न किया तथा सम्पूर्ण संसारके साथ स्वर्गको सुस्थिर कर दिया।)

सूतजीने कहा—मुने! देवगुरु बृहस्पतिसे यह सुनकर भगवान् भवने अपने मुखसे अपने उत्तम अंशको उत्पन्न कर गोदावरीके किनारे आचार्यशर्माके पुत्ररूपमें जन्म ग्रहण किया। वे आचार्य रामानुजके नामसे विख्यात हुए और रामशर्माके अनुज हुए। (अध्याय १४)

वसुदेवताओंके अंशसे कुबेर आदिकी उत्पत्ति, रामायणकी संक्षिप्त कथा एवं त्रिलोचन भक्तका वृत्तान्त

सूतजी बोले—भृगुश्रेष्ठ शौनक! बृहस्पतिने देवराज इन्द्रसे वसुदेवताओंका जो माहात्म्य कहा था, उसे कहता हूँ, आप सुनें। वैवस्वत मन्वन्तरके आदि सत्ययुगमें विश्वामुनिकी इल्वला नामकी पत्नी थी। वह सती पार्थिवार्चनसे शिवकी आराधना

करती थी। इसी समय दीक्षितकुलमें उत्पन्न यक्षशर्मा नामक एक द्विज यक्षिणी—पूजनमें रत था। वह धूर्त अपने मित्रकी पुत्रवधूके साथ दुःसम्बन्ध रखनेके कारण कुष्ठरोगसे ग्रस्त हो गया। उस कुष्ठी द्विजको त्यागकर मन्त्रवत्सला यक्षिणीदेवी

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