भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

प्रिय हैं और अधर्मका पक्ष लेनेवाले उस धीमान्के वैरी हैं। अतः अधर्मके पक्षपाती होनेके कारण ही तुम्हारे पुत्रोंकी मृत्यु हुई। इसलिये धर्मप्रिये! तुम अपने विचारको शुद्ध करो। तुम्हें महाबलशाली, चिरञ्जीवी, बुद्धिमान् पुत्र होगा।' यह सुनकर दितिदेवी कश्यपके द्वारा उत्तम गर्भ धारण कर व्रत-आचारपूर्वक जीवन-यापन करने लगी। उसके गर्भ धारण करनेके कारण भयभीत देवराज इन्द्र देवगुरुकी आज्ञासे दितिकी व्रत-परिचर्यामें लग गये। गर्भके सात मास बीत जानेपर शक्रकी मायासे विमोहित वह दितिदेवी अपने घरमें अपवित्ररूपसे सो गयी। उसी समय अङ्गुष्ठमात्रका रूप बनाकर वज्रके साथ भगवान् महेन्द्रने दितिके उदरमें प्रविष्ट हो उस गर्भके पहले सात और फिर एक-एकके सात-सात खण्ड-खण्ड कर डाले। महेन्द्रने उन लोगोंको नम्रीभूत देखकर उनके साथ गर्भसे बाहर आकर दितिको प्रणाम किया। दितिने प्रसन्न होकर महेन्द्रको उन देवताओंको दे दिया। इस प्रकार वे उनचास मरुद्गण शक्रके सेवक हो गये।

वे मरुत् पूर्व भवमें लोकविश्रुत अनिल नामक वेदज्ञ ब्राह्मण हुए।

उस विप्रने पावकको स्तुतियोंद्वारा संतुष्ट किया। वह अपने सिरको काट-काटकर अग्निको चढ़ाता था और पुनः उसका सिर उत्पन्न हो जाता था। इस प्रकार आराधना करनेपर धनञ्जयदेव प्रसन्न हुए और बोले कि तुम उनचास मरुद्गणोंके रूपमें हो जाओगे, तब मैं तुम्हारा मित्र होकर तुम्हारी कामनाको पूर्ण करूँगा। जैसे भगवान् कुबेर छब्बीस वरुणदेवोंके प्रिय हैं, वैसे उनचास रूपधारी तुम्हारा मैं मित्र होऊँगा। इस प्रकार दितिके उदरमें पावकके प्रिय मित्रके रूपमें वायु नामसे उत्पन्न हुए।

सूतजीने कहा—मुने! देवगुरु बृहस्पतिसे इतनी कथा सुननेके बाद वही वायु वैश्यजातीय धान्यपालके

घरमें मूलगण्डान्तमें उत्पन्न हुआ। पिता और माताने काशीके विन्ध्यवनमें उसे छोड़ दिया। वहाँपर एक निःसंतान अलिक नामका वस्त्रनिर्माता (जुलाहा) व्यक्ति आया और उस बालकको लेकर अपने घर आ गया। वह सुन्दर मुखवाला बालक 'कबीर' नामसे प्रसिद्ध हुआ। गोदुग्ध-पान करनेवाले उस बालकने सात वर्षकी अवस्थामें रामानन्दको गुरु माना और वह भगवान् श्रीरामके ध्यानमें परायण हो गया। वह अपने हाथसे भोजन निर्माणकर भगवान् विष्णुको समर्पित करता था। उसका प्रिय करनेके लिये भगवान् साक्षात् उसकी इच्छाएँ पूरी करने लगे।

देवगुरु बृहस्पतिजी बोले—देवेन्द्र! प्राचीन कालमें उत्तानपाद नामके एक क्षत्रिय राजा थे। उनका पुत्र ध्रुव नामसे विख्यात हुआ। पिता-मातासे परित्यक्त उस पाँच वर्षके बालक ध्रुवने देवर्षि नारदजीके उपदेशसे गोवर्धन पर्वतपर आकर महान् व्रत धारणकर छः महीनेतक भगवान्का ध्यान किया। भगवान् विष्णुने प्रसन्न होकर आकाशमण्डलमें उसे नभोमय स्थान दिया।

यह ध्रुव पूर्व भवमें माधव नामक एक ब्राह्मण था, साठ वर्षांतक उसने प्रातःकाल तीर्थोंमें स्नान किया था। तीर्थ-सेवनके पुण्य-प्रतापसे वह भगवान् माधवका प्रिय पात्र बन गया। वह माधव भगवान्की भक्ति एवं तपस्याके फलसे अगले जन्ममें सुनीतिके गर्भसे ध्रुवरूपमें उत्पन्न हुआ। छत्तीस वर्षतक राज्यकर ध्रुव नभोमण्डलमें स्थित हो गया।

सूतजीने कहा—मुने! बृहस्पतिकी बात सुनकर पाँचवाँ वसु वह ध्रुव अपने अंशसे गुजरात प्रान्तमें भक्त नरश्री (नरसी मेहता)-के रूपमें उत्पन्न हुआ। भगवान् शंकरके अनुग्रहसे इन्होंने वृन्दावनमें भगवान्की दिव्य रासलीलाओंका दर्शन किया था। इनके पुत्री-पुत्रके विवाहके समय भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्ण

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