भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 376, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
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धर्मभक्तके घर उत्पन्न हुआ। उसकी विधवा कन्याने हरिके उस तेजको धारण किया। यह जानकर धर्मभक्त पुत्रकी उत्पत्तिसे अत्यन्त प्रसन्न हुआ। उसका नाम नामदेव हुआ। वह सांख्ययोगपरायण था। चराचर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड विष्णुमय है, यह जानकर और देखकर वे काशीमें हरिप्रिय रामानन्दके पास आये और उनकी शिष्यता ग्रहण कर वहाँ निवास किये। उस समय म्लेच्छपति सिकन्दरका देहलीमें राज्य था। उसने नामदेवको बुलाकर और भलीभाँति उनकी परीक्षाकर प्रसन्न हो पचास लाख मुद्राएँ दीं। नामदेवने उस द्रव्यसे काशीमें श्रेष्ठ शुभ्र शिलामय घाटका निर्माण कराया और अपने योगबलसे मेरे हुए दस ब्राह्मणों, पाँच राजाओं, पाँच वैश्यों तथा सौ गौओंको पुनः जीवित किया।
देवगुरु बृहस्पतिने कहा—देवेन्द्र! पूर्वकालमें विश्वानर नामका एक ब्राह्मण था। उसके पुत्र नहीं था। पुत्रकी प्राप्तिके लिये उसने आराधनाद्वारा ब्रह्माको संतुष्ट किया। एक वर्षमें ही भगवान् परमेश्वी पितामहने संतुष्ट होकर वर माँगनेको कहा। इसपर उसने कहा—‘भगवन्! आपको नमस्कार है। प्रकृतिसे भी जो परे है, वह मेरा पुत्र हो।’
यह सुनकर आश्चर्यचकित हो ब्रह्माने उस ब्राह्मणसे कहा—‘हे ब्राह्मण! वह तो नित्य सनातन पुरुष है, वह तुम्हारा पुत्र कैसे हो सकता है? इसलिये विश्वानर मुने! मायाभूत हरि स्वयं जनार्दन मेरे वरदानसे तुम्हारे पुत्ररूपमें आयेगे।’
यह कहकर ब्रह्मा अन्तर्धान हो गये और विश्वानरका पावक नामसे पुत्र उत्पन्न हुआ। वह पावक आठ वसुओंका पति हुआ और वैश्वानर नामसे प्रसिद्ध हुआ तथा स्वाहादेवीका स्वामी हुआ। यह वैश्वानर पुराकल्पमें अनल था और निषधका बुद्धिमान् ब्राह्मण था।
सूतजी बोले—मुने! बृहस्पतिके इन वचनोंको सुनकर भगवान् पावकने अपने मुखसे अपने अंशको उत्पन्न किया। वही पावकांश वसु होकर लक्ष्मीदत्तका पुत्र रंकण*। (रँका) नामसे प्रसिद्ध हुआ। कांचनपुर नगरमें वैश्यकुलमें उसकी उत्पत्ति हुई। उसकी पतिव्रता पत्नी यंकणा (बाँका) थी। वे दोनों धर्मकार्यमें अपने सभी द्रव्योंको खर्चकर काष्ठ बेचकर उससे उपाजित धनद्वारा भगवान्की पूजा करके प्रभुके प्रसादसे अपना जीवन-निर्वाह किया करते थे। महात्मा रंकणके गुरु रामानन्द थे। (अध्याय १६)
संत कबीर, भक्त नरसी मेहता, पीपा, नानक तथा साधु
नित्यानन्दजीके पूर्वजन्मोंकी कथा
देवगुरु बृहस्पतिजी बोले—देवेन्द्र! पूर्वकालमें दितिके पुत्र हिरण्यकशिपु एवं हिरण्याक्षका भगवान् विष्णुने क्रमशः नृसिंह एवं वराहरूप धारणकर वध किया था। दुःखी हो दितिने महर्षि कश्यपकी आराधना की। बारह वर्ष बाद कश्यपजीने उससे कहा—‘वरानने! वर माँगो।’ हर्षित होकर दितिने कहा—‘प्रभो! मेरी सपत्नी अदिति बारह पुत्रोंसे युक्त है।
मेरे दो ही पुत्र थे। वे भी अदितिपुत्र देवरक्षक विष्णुके द्वारा विनष्ट कर दिये गये। इस कारण मैं बहुत दुःखी हूँ। अतः मुझे द्वादशादित्य-विनाशक पुत्र प्रदान करें।’ यह भयंकर वाणी सुनकर कश्यपने कहा—‘ब्रह्माने संसारमें दो मार्ग बनाये—धर्ममार्ग और अधर्ममार्ग। जिन्हें क्रमशः परमार्ग और अपरमार्ग भी कहा गया है। धर्मका पक्ष लेनेवाले मनुष्य ब्रह्माके
- कल्याणके ‘भक्तचरिताङ्क’ में यह कथा कुछ अन्तरसे आयी है। धन-सम्पत्ति साधना और भक्तिभावनामें कितनी बाधक है, यह इनके चरित्रसे स्पष्ट हो जाता है।
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