भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 375, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
वसुदेवता कुबेर अपने अंशसे पृथ्वीपर धरदत्त वैश्यके पुत्र होकर त्रिलोचन नामसे मथुरामें उत्पन्न हुए। सभी द्रव्योंको हर्षपूर्वक तीर्थोंमें खर्चकर काशीपुरीमें आकर वैष्णव रामानन्दको नमस्कारकर त्रिलोचन उनके शिष्य हो गये। गुरुकी आज्ञासे वे पुनः अपने घरपर आकर रामभक्तिपरायण होकर साधु-सेवामें तत्पर हो गये। भगवान् राम उनके घरमें सभी अभीष्ट फलको देनेवाले दासके रूपमें तेरह मासतक स्थित रहे। वे उनके घरमें मणि, रत्न, विविध वस्त्र, विविध व्यञ्जन देते थे, जिसे भक्त त्रिलोचन स्वयं ब्राह्मणों, वैष्णवों और यतियोंको
भी सभी मनोवाञ्छित वस्तु प्रदान करते थे। भगवान् श्रीरामने त्रिलोचनसे कहा—‘वत्स! मैं राम हूँ, दास नहीं। मैंने तुम्हारी भक्तिसे प्रसन्न होकर तुम्हारे घरमें दासके रूपमें निवास किया है। हे वैश्य! आजसे मैं तुम्हारे हृदयमें निवास करूँगा।’ यह कहकर वे अन्तर्हित हो गये। यह सुनकर वह वैश्य बहुत प्रसन्न हुआ। उसने स्त्री-पुत्र सभीका परित्याग कर दिया और वह परम वैराग्यके साथ श्रीरामके ध्यानमें तत्पर रहकर सरयूतटपर निवास करने लगा*।
(अध्याय १५)
रामानन्दजीके शिष्य नामदेव, भक्त रंकण (राँका) एवं यंकणा (बाँका)-का चरित्र, वरुणदेव और पराम्बाकी महिमा
देवगुरु बृहस्पतिने कहा—देवेन्द्र! संसारमें जो जलको एक जगहसे दूसरी जगह पहुँचाता है, वही आपव कहलाता है। उसीका दूसरा नाम वरुण है। वे जलों तथा समुद्रोंके अधिपति हैं। दैत्योंके बन्धनके लिये ब्रह्माने उन्हें पाश प्रदान किया। पाश प्राप्त होनेपर महात्मा वरुणका नाम पाशी हो गया।
वे वरुण पहले शक्तिके पूजक एक ब्राह्मण थे और उनका नाम था आपव। वे भद्रकालीके प्रिय भक्त थे, प्रतिदिन उनके पूजनमें तत्पर रहते थे। अनेक प्रकारके रक्त पुष्पोंकी मालाओंको बनाकर, रक्त चन्दनसे संयुक्तकर मन्त्रोंद्वारा भद्रकालीको समर्पित करते थे। नवार्णजपमें तत्पर हो धूप-दीप-नैवेद्य, ताम्बूल, ऋतुफल आदिसे सनातनी महालक्ष्मी भद्रकालीकी पूजा करते रहते। तिल, शर्करायुक्त मधुसे हवन भी करते थे। वे दुर्गासप्तशतीके
मध्यम चरित्रका पाठकर नवार्णमन्त्र-जपमें तत्पर हो तीन वर्षतक पूजामें संलग्न रहे। अनन्तर सर्वमङ्गला भगवतीदेवी प्रसन्न हुई और बोली—‘द्विजसत्तम! तुम वर माँगो।’ देवीके इस प्रिय वचनको सुनकर नम्रधी द्विज आपवने उन्हें दण्डवत् प्रणाम कर उन भद्रकाली सनातनीदेवीकी अनेक प्रकारसे स्तुति की।
फिर देवी भद्रकालीने प्रसन्न होकर आपवसे कहा—द्विज! प्रलयके आने तथा स्थावर-जंगमके विनष्ट हो जानेपर एकार्णवमें मेरी कृपासे तुम सुखी होओगे। यह कहकर वे देवी अन्तर्लीन हो गयीं और वे ब्राह्मण वरुणदेवके रूपमें विशेष समादृत हुए।
सूतजी बोले—मुने! देवगुरुके इन वाक्योंको सुनकर द्वितीय वसु भगवान् वरुणने अपने मुखसे पृथ्वीपर एक तेज उत्पन्न किया। वह तेज देहलीमें
- रामानन्दजीकी शिष्य-परम्पराके भक्तों—त्रिलोचन वैश्य, नामदेव, रंकण-यंकणा (राँका-बाँका), कबीर, नरसी मेहता तथा सधन कसाई आदिका उदात्त चरित्र एवं आचार्योंके महनीय चरित्र गीताप्रेससे प्रकाशित ‘भक्तचरितार्द्ध’ में विस्तारसे दिये गये हैं। उससे भी लाभ उठाना चाहिये।
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