भारतकोश
संग्रह पर लौटें

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

३६४

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

वसुदेवता कुबेर अपने अंशसे पृथ्वीपर धरदत्त वैश्यके पुत्र होकर त्रिलोचन नामसे मथुरामें उत्पन्न हुए। सभी द्रव्योंको हर्षपूर्वक तीर्थोंमें खर्चकर काशीपुरीमें आकर वैष्णव रामानन्दको नमस्कारकर त्रिलोचन उनके शिष्य हो गये। गुरुकी आज्ञासे वे पुनः अपने घरपर आकर रामभक्तिपरायण होकर साधु-सेवामें तत्पर हो गये। भगवान् राम उनके घरमें सभी अभीष्ट फलको देनेवाले दासके रूपमें तेरह मासतक स्थित रहे। वे उनके घरमें मणि, रत्न, विविध वस्त्र, विविध व्यञ्जन देते थे, जिसे भक्त त्रिलोचन स्वयं ब्राह्मणों, वैष्णवों और यतियोंको

भी सभी मनोवाञ्छित वस्तु प्रदान करते थे। भगवान् श्रीरामने त्रिलोचनसे कहा—‘वत्स! मैं राम हूँ, दास नहीं। मैंने तुम्हारी भक्तिसे प्रसन्न होकर तुम्हारे घरमें दासके रूपमें निवास किया है। हे वैश्य! आजसे मैं तुम्हारे हृदयमें निवास करूँगा।’ यह कहकर वे अन्तर्हित हो गये। यह सुनकर वह वैश्य बहुत प्रसन्न हुआ। उसने स्त्री-पुत्र सभीका परित्याग कर दिया और वह परम वैराग्यके साथ श्रीरामके ध्यानमें तत्पर रहकर सरयूतटपर निवास करने लगा*।

(अध्याय १५)

रामानन्दजीके शिष्य नामदेव, भक्त रंकण (राँका) एवं यंकणा (बाँका)-का चरित्र, वरुणदेव और पराम्बाकी महिमा

देवगुरु बृहस्पतिने कहा—देवेन्द्र! संसारमें जो जलको एक जगहसे दूसरी जगह पहुँचाता है, वही आपव कहलाता है। उसीका दूसरा नाम वरुण है। वे जलों तथा समुद्रोंके अधिपति हैं। दैत्योंके बन्धनके लिये ब्रह्माने उन्हें पाश प्रदान किया। पाश प्राप्त होनेपर महात्मा वरुणका नाम पाशी हो गया।

वे वरुण पहले शक्तिके पूजक एक ब्राह्मण थे और उनका नाम था आपव। वे भद्रकालीके प्रिय भक्त थे, प्रतिदिन उनके पूजनमें तत्पर रहते थे। अनेक प्रकारके रक्त पुष्पोंकी मालाओंको बनाकर, रक्त चन्दनसे संयुक्तकर मन्त्रोंद्वारा भद्रकालीको समर्पित करते थे। नवार्णजपमें तत्पर हो धूप-दीप-नैवेद्य, ताम्बूल, ऋतुफल आदिसे सनातनी महालक्ष्मी भद्रकालीकी पूजा करते रहते। तिल, शर्करायुक्त मधुसे हवन भी करते थे। वे दुर्गासप्तशतीके

मध्यम चरित्रका पाठकर नवार्णमन्त्र-जपमें तत्पर हो तीन वर्षतक पूजामें संलग्न रहे। अनन्तर सर्वमङ्गला भगवतीदेवी प्रसन्न हुई और बोली—‘द्विजसत्तम! तुम वर माँगो।’ देवीके इस प्रिय वचनको सुनकर नम्रधी द्विज आपवने उन्हें दण्डवत् प्रणाम कर उन भद्रकाली सनातनीदेवीकी अनेक प्रकारसे स्तुति की।

फिर देवी भद्रकालीने प्रसन्न होकर आपवसे कहा—द्विज! प्रलयके आने तथा स्थावर-जंगमके विनष्ट हो जानेपर एकार्णवमें मेरी कृपासे तुम सुखी होओगे। यह कहकर वे देवी अन्तर्लीन हो गयीं और वे ब्राह्मण वरुणदेवके रूपमें विशेष समादृत हुए।

सूतजी बोले—मुने! देवगुरुके इन वाक्योंको सुनकर द्वितीय वसु भगवान् वरुणने अपने मुखसे पृथ्वीपर एक तेज उत्पन्न किया। वह तेज देहलीमें

  • रामानन्दजीकी शिष्य-परम्पराके भक्तों—त्रिलोचन वैश्य, नामदेव, रंकण-यंकणा (राँका-बाँका), कबीर, नरसी मेहता तथा सधन कसाई आदिका उदात्त चरित्र एवं आचार्योंके महनीय चरित्र गीताप्रेससे प्रकाशित ‘भक्तचरितार्द्ध’ में विस्तारसे दिये गये हैं। उससे भी लाभ उठाना चाहिये।

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

  • प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *

३६५

धर्मभक्तके घर उत्पन्न हुआ। उसकी विधवा कन्याने हरिके उस तेजको धारण किया। यह जानकर धर्मभक्त पुत्रकी उत्पत्तिसे अत्यन्त प्रसन्न हुआ। उसका नाम नामदेव हुआ। वह सांख्ययोगपरायण था। चराचर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड विष्णुमय है, यह जानकर और देखकर वे काशीमें हरिप्रिय रामानन्दके पास आये और उनकी शिष्यता ग्रहण कर वहाँ निवास किये। उस समय म्लेच्छपति सिकन्दरका देहलीमें राज्य था। उसने नामदेवको बुलाकर और भलीभाँति उनकी परीक्षाकर प्रसन्न हो पचास लाख मुद्राएँ दीं। नामदेवने उस द्रव्यसे काशीमें श्रेष्ठ शुभ्र शिलामय घाटका निर्माण कराया और अपने योगबलसे मेरे हुए दस ब्राह्मणों, पाँच राजाओं, पाँच वैश्यों तथा सौ गौओंको पुनः जीवित किया।

देवगुरु बृहस्पतिने कहा—देवेन्द्र! पूर्वकालमें विश्वानर नामका एक ब्राह्मण था। उसके पुत्र नहीं था। पुत्रकी प्राप्तिके लिये उसने आराधनाद्वारा ब्रह्माको संतुष्ट किया। एक वर्षमें ही भगवान् परमेश्वी पितामहने संतुष्ट होकर वर माँगनेको कहा। इसपर उसने कहा—‘भगवन्! आपको नमस्कार है। प्रकृतिसे भी जो परे है, वह मेरा पुत्र हो।’

यह सुनकर आश्चर्यचकित हो ब्रह्माने उस ब्राह्मणसे कहा—‘हे ब्राह्मण! वह तो नित्य सनातन पुरुष है, वह तुम्हारा पुत्र कैसे हो सकता है? इसलिये विश्वानर मुने! मायाभूत हरि स्वयं जनार्दन मेरे वरदानसे तुम्हारे पुत्ररूपमें आयेगे।’

यह कहकर ब्रह्मा अन्तर्धान हो गये और विश्वानरका पावक नामसे पुत्र उत्पन्न हुआ। वह पावक आठ वसुओंका पति हुआ और वैश्वानर नामसे प्रसिद्ध हुआ तथा स्वाहादेवीका स्वामी हुआ। यह वैश्वानर पुराकल्पमें अनल था और निषधका बुद्धिमान् ब्राह्मण था।

सूतजी बोले—मुने! बृहस्पतिके इन वचनोंको सुनकर भगवान् पावकने अपने मुखसे अपने अंशको उत्पन्न किया। वही पावकांश वसु होकर लक्ष्मीदत्तका पुत्र रंकण*। (रँका) नामसे प्रसिद्ध हुआ। कांचनपुर नगरमें वैश्यकुलमें उसकी उत्पत्ति हुई। उसकी पतिव्रता पत्नी यंकणा (बाँका) थी। वे दोनों धर्मकार्यमें अपने सभी द्रव्योंको खर्चकर काष्ठ बेचकर उससे उपाजित धनद्वारा भगवान्की पूजा करके प्रभुके प्रसादसे अपना जीवन-निर्वाह किया करते थे। महात्मा रंकणके गुरु रामानन्द थे। (अध्याय १६)

संत कबीर, भक्त नरसी मेहता, पीपा, नानक तथा साधु

नित्यानन्दजीके पूर्वजन्मोंकी कथा

देवगुरु बृहस्पतिजी बोले—देवेन्द्र! पूर्वकालमें दितिके पुत्र हिरण्यकशिपु एवं हिरण्याक्षका भगवान् विष्णुने क्रमशः नृसिंह एवं वराहरूप धारणकर वध किया था। दुःखी हो दितिने महर्षि कश्यपकी आराधना की। बारह वर्ष बाद कश्यपजीने उससे कहा—‘वरानने! वर माँगो।’ हर्षित होकर दितिने कहा—‘प्रभो! मेरी सपत्नी अदिति बारह पुत्रोंसे युक्त है।

मेरे दो ही पुत्र थे। वे भी अदितिपुत्र देवरक्षक विष्णुके द्वारा विनष्ट कर दिये गये। इस कारण मैं बहुत दुःखी हूँ। अतः मुझे द्वादशादित्य-विनाशक पुत्र प्रदान करें।’ यह भयंकर वाणी सुनकर कश्यपने कहा—‘ब्रह्माने संसारमें दो मार्ग बनाये—धर्ममार्ग और अधर्ममार्ग। जिन्हें क्रमशः परमार्ग और अपरमार्ग भी कहा गया है। धर्मका पक्ष लेनेवाले मनुष्य ब्रह्माके

  • कल्याणके ‘भक्तचरिताङ्क’ में यह कथा कुछ अन्तरसे आयी है। धन-सम्पत्ति साधना और भक्तिभावनामें कितनी बाधक है, यह इनके चरित्रसे स्पष्ट हो जाता है।

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

३६६

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

प्रिय हैं और अधर्मका पक्ष लेनेवाले उस धीमान्के वैरी हैं। अतः अधर्मके पक्षपाती होनेके कारण ही तुम्हारे पुत्रोंकी मृत्यु हुई। इसलिये धर्मप्रिये! तुम अपने विचारको शुद्ध करो। तुम्हें महाबलशाली, चिरञ्जीवी, बुद्धिमान् पुत्र होगा।' यह सुनकर दितिदेवी कश्यपके द्वारा उत्तम गर्भ धारण कर व्रत-आचारपूर्वक जीवन-यापन करने लगी। उसके गर्भ धारण करनेके कारण भयभीत देवराज इन्द्र देवगुरुकी आज्ञासे दितिकी व्रत-परिचर्यामें लग गये। गर्भके सात मास बीत जानेपर शक्रकी मायासे विमोहित वह दितिदेवी अपने घरमें अपवित्ररूपसे सो गयी। उसी समय अङ्गुष्ठमात्रका रूप बनाकर वज्रके साथ भगवान् महेन्द्रने दितिके उदरमें प्रविष्ट हो उस गर्भके पहले सात और फिर एक-एकके सात-सात खण्ड-खण्ड कर डाले। महेन्द्रने उन लोगोंको नम्रीभूत देखकर उनके साथ गर्भसे बाहर आकर दितिको प्रणाम किया। दितिने प्रसन्न होकर महेन्द्रको उन देवताओंको दे दिया। इस प्रकार वे उनचास मरुद्गण शक्रके सेवक हो गये।

वे मरुत् पूर्व भवमें लोकविश्रुत अनिल नामक वेदज्ञ ब्राह्मण हुए।

उस विप्रने पावकको स्तुतियोंद्वारा संतुष्ट किया। वह अपने सिरको काट-काटकर अग्निको चढ़ाता था और पुनः उसका सिर उत्पन्न हो जाता था। इस प्रकार आराधना करनेपर धनञ्जयदेव प्रसन्न हुए और बोले कि तुम उनचास मरुद्गणोंके रूपमें हो जाओगे, तब मैं तुम्हारा मित्र होकर तुम्हारी कामनाको पूर्ण करूँगा। जैसे भगवान् कुबेर छब्बीस वरुणदेवोंके प्रिय हैं, वैसे उनचास रूपधारी तुम्हारा मैं मित्र होऊँगा। इस प्रकार दितिके उदरमें पावकके प्रिय मित्रके रूपमें वायु नामसे उत्पन्न हुए।

सूतजीने कहा—मुने! देवगुरु बृहस्पतिसे इतनी कथा सुननेके बाद वही वायु वैश्यजातीय धान्यपालके

घरमें मूलगण्डान्तमें उत्पन्न हुआ। पिता और माताने काशीके विन्ध्यवनमें उसे छोड़ दिया। वहाँपर एक निःसंतान अलिक नामका वस्त्रनिर्माता (जुलाहा) व्यक्ति आया और उस बालकको लेकर अपने घर आ गया। वह सुन्दर मुखवाला बालक 'कबीर' नामसे प्रसिद्ध हुआ। गोदुग्ध-पान करनेवाले उस बालकने सात वर्षकी अवस्थामें रामानन्दको गुरु माना और वह भगवान् श्रीरामके ध्यानमें परायण हो गया। वह अपने हाथसे भोजन निर्माणकर भगवान् विष्णुको समर्पित करता था। उसका प्रिय करनेके लिये भगवान् साक्षात् उसकी इच्छाएँ पूरी करने लगे।

देवगुरु बृहस्पतिजी बोले—देवेन्द्र! प्राचीन कालमें उत्तानपाद नामके एक क्षत्रिय राजा थे। उनका पुत्र ध्रुव नामसे विख्यात हुआ। पिता-मातासे परित्यक्त उस पाँच वर्षके बालक ध्रुवने देवर्षि नारदजीके उपदेशसे गोवर्धन पर्वतपर आकर महान् व्रत धारणकर छः महीनेतक भगवान्का ध्यान किया। भगवान् विष्णुने प्रसन्न होकर आकाशमण्डलमें उसे नभोमय स्थान दिया।

यह ध्रुव पूर्व भवमें माधव नामक एक ब्राह्मण था, साठ वर्षांतक उसने प्रातःकाल तीर्थोंमें स्नान किया था। तीर्थ-सेवनके पुण्य-प्रतापसे वह भगवान् माधवका प्रिय पात्र बन गया। वह माधव भगवान्की भक्ति एवं तपस्याके फलसे अगले जन्ममें सुनीतिके गर्भसे ध्रुवरूपमें उत्पन्न हुआ। छत्तीस वर्षतक राज्यकर ध्रुव नभोमण्डलमें स्थित हो गया।

सूतजीने कहा—मुने! बृहस्पतिकी बात सुनकर पाँचवाँ वसु वह ध्रुव अपने अंशसे गुजरात प्रान्तमें भक्त नरश्री (नरसी मेहता)-के रूपमें उत्पन्न हुआ। भगवान् शंकरके अनुग्रहसे इन्होंने वृन्दावनमें भगवान्की दिव्य रासलीलाओंका दर्शन किया था। इनके पुत्री-पुत्रके विवाहके समय भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्ण

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड

३६७

यादवोंके साथ आये और उनकी इच्छाओंको पूरा किया। परम वैष्णव भक्तराट् नरश्री काशीपुरीमें आकर रामानन्दके शिष्य हो गये।

बृहस्पतिजी बोले—देवेन्द्र! किसी समय गङ्गाके तटपर पतिव्रता अनसूयाके साथ भगवान् अत्रि आकर ध्यानमें समाधिस्थ हो गये। वहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेशने आकर कहा—‘वर माँगो।’ अत्रिमुनि परमात्माके ध्यानमें लीन थे। अतः कुछ भी नहीं बोले। वे तीनों उनके भावको समझकर उनकी पत्नी अनसूयादेवीके पास गये। पतिव्रताने देवोंके अन्यथा भावको समझकर पुत्ररूप होनेका शाप दे दिया। फलतः अत्रिके पुत्ररूपमें ब्रह्मा चन्द्रमा, शंकर दुर्वासा और विष्णु दत्तात्रेयके रूपमें बालक हो गये। बादमें ये ही क्रमशः अर्थात् चन्द्रमा सोम नामक छठे वसु, रुद्रांश दुर्वासा सातवें प्रत्यूप नामक वसु और विष्णु-अंश दत्तात्रेय प्रभास नामक आठवें वसु हुए।

सूतजीने कहा—मुने! बृहस्पतिकी यह बात

सुनकर वे तीनों वसु कलिकी शुद्धिके लिये अपने अंशसे पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए। छठे वसु अर्थात् भगवान् अत्रिपुत्र सोम दक्षिणमें वैश्यवंशमें राजा सुदेवके घर पीपा नामक पुत्र हुए। जैसे राजाने उस नगरमें राज्य किया था, वैसे ही इन्होंने भी राज्य किया और वे रामानन्दके शिष्य हो द्वारकामें चले आये। भगवान् कृष्णद्वारा प्रेततत्त्वविनाशिनी स्वर्णमयी हरिकी मुद्राको प्राप्तकर उसे उसने वैष्णवोंको प्रदान कर दिया।

अत्रिपुत्र रुद्रके अंश सप्तम वसु अर्थात् प्रत्यूप पाञ्चाल देशमें वैश्यजातिमें मार्गपालके पुत्र हो नानक नामसे प्रसिद्ध हुए। रामानन्दके पास आकर नानक उनके शिष्य हो गये। उन्होंने म्लेच्छोंको वशमें करके सूक्ष्ममार्ग दिखाया।

अष्टम वसु प्रभास शान्तिपुरमें ब्राह्मणजातिमें उत्पन्न हुए। वे शुक्लदत्तके पुत्र नित्यानन्दके नामसे प्रसिद्ध हुए। शौनक! इस प्रकार मैंने आपको वसुदेवताओंका माहात्म्य बतलाया। (अध्याय १७)

अश्विनीकुमारोंके अंशसे सधन ( सदन कसाई ) और रैदासकी उत्पत्ति-कथा

सूतजीने कहा—मुने! देवगुरु बृहस्पतिने प्रयागमें समागत महेंद्र आदि देवताओंसे द्वादशादित्यों, रुद्रों तथा अष्ट वसु देवताओंका माहात्म्य बतलाया और फिर वे अश्विनीकुमारोंकी ओर देखकर उनकी गाथाका इस प्रकार वर्णन करने लगे।

भगवान् विवस्वान्को संज्ञासे दिव्य तेजस्वी वैवस्वत मनु, यम और यमुना तीन संतानें उत्पन्न हुई। संज्ञा तेजःस्वरूप अपने पतिको जानकर अपनी ही छाया उत्पन्न कर तपस्या करने चली गयी। सावर्णि मनु, शनि और तपती—ये छायासे उत्पन्न हुए। भगवान् सूर्यने छायाद्वारा संतानोंमें असमान व्यवहार देखकर उसे माया-स्वरूपा नारी मानकर क्रुद्ध हो भस्म कर दिया। विवस्वान्को

क्रोधयुक्त समझकर सावर्णिमनु और शनि सूर्यके प्रति क्रुद्ध हो युद्ध करने लगे। उसी समय वे सूर्यके द्वारा भस्मभूत होने लगे। फिर वे दोनों हिमालय पर्वतपर आकर परम तप करने लगे। तीन वर्ष तप करनेपर भक्तवत्सला महाकालीने प्रसन्न हो उन्हें वर दिया। वर प्राप्तकर पुनः वे दोनों भगवान् सूर्यसे युद्ध करने आये। तपके द्वारा प्रभावशाली सूर्य उनसे भयभीत होकर वहाँसे चले गये। रमणीय कुरुखण्डमें वडवा (अश्वा) रूपको धारणकर उनकी प्रिया संज्ञा सूर्यको प्राप्त करनेके लिये तपस्यामें संलग्न थी। भगवान् सूर्य उसे दृढ़ते हुए वहाँ पहुँचे। उन्होंने संज्ञाको अश्विनीरूपमें देखकर स्वयं भी अश्वका रूप बना

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

३६८

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

लिया। पाँच वर्षतक सूर्य अश्वरूपमें वडवा (संज्ञा)-के साथ रहे। तदनन्तर वडवासे पराक्रमी एवं दिव्य स्वरूपवाले दो पुत्र (अश्विनीकुमार) उत्पन्न हुए। वे पिताके दुःखको देखकर सूर्यमण्डलमें स्थित हो गये। वडवापुत्र अश्विनीकुमार सावर्णि और शनिको जीतकर उनको बाँध करके पिताके पास ले आये। भगवान् सूर्यने शृङ्खलाबद्ध शत्रुओंको आया देख उन्हें लौह-दण्डसे मारा, जिससे वे पंगु हो गये। भगवान् सूर्यने प्रसन्नतापूर्वक वडवापुत्र अश्विनीकुमारोंसे कहा—‘जिस प्रकार जीव और ईश तथा नर और नारायण दो नाम होते हुए भी एक हैं और परस्पर मित्र हैं, उसी प्रकार एक ही नाम नासत्यसे आपलोग प्रसिद्ध होंगे। सोमकी शक्ति इडादेवी तुम्हारी ज्येष्ठपत्नी होगी और सूर्यकी शक्ति पिंगला लघुपत्नी होगी। तुम दोनोंमेंसे एक इडापति होगा और दूसरा पिंगलापति होगा। मनुष्यकी राशिसे बारहवें स्थानपर यदि शनैश्चरकी क्रूर दृष्टि पड़ती हो तो इसकी शान्तिके लिये इडापतिकी आराधना लाभदायक होगी और राशिसे दूसरे स्थानपर स्थित सावर्णि भ्रमकारक होगा, इसके लिये पिंगलापतिकी आराधना शान्तिकर होगी। जन्म-राशिमें स्थित देवी तपत्नी (तपती) तापकारिणी होगी, तब इडा तथा पिंगला शान्ति करनेवाली होंगी।’

इन वचनोंको सुनकर अश्विनीकुमार देववैद्य

हो गये। सावर्णि एवं शनि दूसरे अंशोंसे राहु और केतु हो गये। इनसे सूर्य डरकर भागे थे, अब भी ये ग्रहण-रूपमें उन्हें पीड़ा देते रहते हैं। इसीलिये इन सबके परिहार एवं शान्तिके लिये अश्विनीकुमारोंका आविर्भाव हुआ था। अश्विनीकुमारोंकी आराधनासे इनकी शान्ति होती है।

सूतजी बोले—शौनक! देवगुरु बृहस्पतिद्वारा यह कथा सुनकर देवश्रेष्ठ वे अश्विनीकुमार प्रसन्न हो गये और अपने अंशसे महीतलमें शूद्रयोनियोंमें उत्पन्न हुए। इडापति अज (बकरी)-को मारनेवाले चाण्डालके घरमें उत्पन्न हुए। वे सधन (सदन कसाई*) नामसे विख्यात होकर पितृ-मातृपरायण हुए। वे शालग्रामशिलासे तौलकर मांस बेचते थे। फिर वे कबीरके समीप आकर उनके शिष्य होकर निवास करने लगे। पूर्वमें वे सधन सत्यनिधि नामक एक ब्राह्मण थे, किंतु उन्होंने भयभीत गौको चाण्डालको दिखाया। फलतः राजाके दरबारमें सधनके हाथ काट दिये गये।

पिंगलापति चर्मकारके घर उत्पन्न हुए। वे मानदासके पुत्र रैदासके नामसे प्रसिद्ध हुए। वे काशीपुरी जाकर श्रीरामपरायण कबीरको वाद-विवादमें जीतकर शंकराचार्यके पास आये और उनसे पराजित होकर रैदास रामानन्दके पास आये तथा उनकी शिष्यता स्वीकार कर ली।

(अध्याय १८)

यज्ञांश चैतन्यमहाप्रभुका चरित्र एवं अन्य आचार्योंका भी उनके भक्ति-भावसे प्रभावित होना

सूतजीने कहा—मुने! इस प्रकार देवगुरु बृहस्पति देवताओंके उत्तम माहात्म्यको कहकर अपने मुखसे अपना अंश उत्पन्नकर ब्रह्मयोनियोंमें आविर्भूत हुए। इष्टिका नगरीमें वे गुरुदत्तके पुत्र

हुए, उनका नाम रोपण हुआ। वे ब्रह्ममार्गप्रदर्शक थे। उन्होंने सूतसे गूँथी गयी माला धारण करना, जल-निर्मित तिलक लगाना और वासुदेवके मन्त्रका जप करना आदिका जन-जनमें प्रचार

  • विविध भक्तमालोंमें सदन कसाईकी कथा कुछ अन्तरसे प्राप्त होती है। कल्याणके ‘भक्तचरिताङ्क’ में भी इनका चरित्र अङ्कित है।

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

  • प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *

३६९

किया। वे कृष्णचैतन्यके पास आये और उनकी आज्ञासे उनका कम्बल ग्रहणकर अपनी नगरीमें आकर कृष्णके ध्यानमें रत हो गये।

हे मुने! अब आप भगवान् विष्णुका चरित्र सुनें, जिस चरित्रके सुननेसे घोर कलियुगमें भी भय नहीं होता, जब यज्ञांश कृष्णचैतन्यकी अवस्था पाँच वर्षकी हुई, उन दिनों बंगाल प्रान्तमें महात्मा ईश्वरपुरीका विशेष प्रभाव था। शारदाकी उपासनासे उनको विशेष सिद्धि प्राप्त थी, जिससे उनके मनमें अहंकार हो गया था। एक बार वे घूमते-फिरते शान्तिपुरमें आये तथा गङ्गाके तटपर रमणीय दिव्य स्तवकी रचना कर उसका पाठ करने लगे। उसी समय उधरसे चैतन्य महाप्रभु आ गये और उन्होंने स्तुति करते हुए महात्मा ईश्वरपुरीसे कहा—‘महात्मन्! आपकी रचना कुछ दोषयुक्त प्रतीत होती है।’ यह सुनकर वे विद्वान् ईश्वरपुरी आश्चर्यचकित हो गये। सर्वमङ्गला शारदाने अपने आत्मीयजन ईश्वरपुरीको लज्जित देखकर हँसते हुए कहा—‘यह साक्षात् यज्ञांश हरि कृष्णचैतन्य हैं।’ यह सुनकर ईश्वरपुरी उनके शिष्य होकर कृष्णमन्त्रके उपासक बन गये। वे वैष्णवोंमें श्रेष्ठ हुए और कृष्णचैतन्यके सेवक हो गये।

मुने! श्रीधर नामक एक शिवपूजक ब्राह्मण थे। पतननगरके राजाने उनसे श्रीमद्भागवत-सहाहकी कथा सुनी और उन्हें बहुत धन दिया। श्रीधर धन लेकर राजाके यहाँसे चलकर अपने ससुराल आये। वहाँ एक मासतक निवास करके स्त्रीके साथ पुनः घरकी ओर चल पड़े। उनके साथ-साथ सात चोर मैत्रीके विश्वासके लिये भगवान् रामकी शपथ लेकर (किंतु बुरी नीयतसे) चलने लगे। उन चोरोंने रास्तेमें एक वन मिलनेपर उसके अन्तिम छोरपर श्रीधरको

मार डाला और उनकी पत्नी एवं धनसहित बैलगाड़ीको लेकर भागने लगे। उनकी पत्नी बार-बार पीछे देखने लगी। चोरोंने कहा कि अब उधर क्या देख रही हो, तुम्हारा पति तो मर गया है। इसपर विप्रपत्नीने कहा कि ‘मैं उन भगवान् रामको देख रही हूँ, जिनकी तुम लोगोंने शपथ ली थी।’ इसपर सच्चिदानन्दविग्रह भगवान् श्रीराम प्रकट हो गये और उन्होंने उन सातों चोरोंको मार डाला तथा उस ब्राह्मणको जीवित कर वृन्दावनमें भेज दिया। उस दिनसे वे ब्राह्मण श्रीधर वैष्णव हो गये। यज्ञांश श्रीकृष्णचैतन्यके सातवें वर्षमें उन्होंने शान्तिपुरीमें चैतन्यदेवके पास जाकर ब्रह्मज्ञानको प्राप्त किया और उनके शिष्य हो गये। फिर उन्होंने श्रीमद्भागवतकी टीका की।

सूतजीने पुनः कहा—‘शौनक! काशीमें शंकरकी पूजामें तत्पर रामशर्मा नामक एक विद्वान् ब्राह्मण रहते थे। शिवरात्रिके समय उन्होंने अविमुक्तेक्षर स्थानमें एकाकी जागते हुए ध्यानपूर्वक शिवपञ्चाक्षरका जप किया। लोककल्याणकारी भगवान् शंकरने प्रसन्न होकर उस द्विजश्रेष्ठसे वर माँगनेको कहा। रामशर्माने भगवान् शिवको प्रणामकर कहा—‘प्रभो! आप जिसके ध्यानमें समाधिस्थ रहते हैं, वे देवता मेरे हृदयमें निवास करें।’ यह कहनेपर भगवान् महेश्वरने हँसते हुए कहा—‘मैं भगवान् राम-लक्ष्मणका तथा बलभद्रजीका सदा ही ध्यान-पूजन करता रहता हूँ, उनको प्राप्त कर तुम भी सुखी होओ।’ यह कहकर भगवान् शिव अन्तर्हित हो गये। अनन्तर रामशर्मा भगवान् रामके उपासक बन गये और जब कृष्णचैतन्य बारह वर्ष हो गये, तब उनके पास आकर शिष्य होकर उनके पूजक हो गये। इन्होंने कृष्णचैतन्यके आदेशपर अध्यात्मरामायणकी* रचना की।

  • यद्यपि यहाँ अध्यात्मरामायणका रचयिता कोई रामशर्मा नामका व्यक्ति बताया गया है, किंतु प्रायः सभी विद्वान् इस ग्रन्थको व्यासदेवकी रचना मानते हैं। आनन्दरामायणमें भी इस ग्रन्थकी प्रशंसा उपलब्ध है।

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

३७०

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

मुने! जीवानन्द रूपानन्दके साथ चैतन्यमहाप्रभुके चरित्रको सुनकर शान्तिपुरीमें आया। सोलह वर्षवाले कृष्ण-चैतन्यको उन दोनोंने नमस्कार कर उनका शिष्यत्व स्वीकार किया। जीवानन्द (जीवगोस्वामी)-ने षट्संदर्भ ग्रन्थकी रचना की। भक्तिमार्गमें अधिक निष्ठा होनेसे वे दोनों सर्वपूज्य हो गये। उनकी आज्ञासे कृष्णचैतन्यकी पूजा करते हुए उन्होंने वहाँ निवास किया। महामुनि रूपानन्दने (रूपगोस्वामी) गुरु चैतन्यमहाप्रभुकी आज्ञा मानकर दस हजार श्लोकवाले पुराणाङ्गभूत कृष्णखण्डकी रचना की। गुरुसेवामें तत्पर राधाकृष्णका पूजक होकर उन्होंने भी वहीं निवास किया।

कुछ समय बाद विष्णुस्वामी भी रमणीय शान्तिपुरीमें आये। उन्नीस वर्षकी अवस्थावाले कृष्णचैतन्यको नमस्कारकर उस ब्राह्मणने कहा—‘इस ब्रह्माण्डमें सभी देवताओंके पूज्य कौन देवता हैं?’ यह सुनकर महाप्रभुने कहा—‘भक्तोंपर

अनुग्रह करनेवाले महादेव सभीके पूज्य हैं। विष्णु, रुद्र, ब्रह्मा आदि देवता भी सदा उनकी पूजा करते हैं। जो विष्णुभक्त शंकराचर्यमें तत्पर रहते हैं, वे शिवके प्रसादसे उत्तम वैष्णवी भक्ति प्राप्त करते हैं। वैष्णव पुरुष होकर जो लोककल्याणकारी शंकरकी पूजा नहीं करता वह सच्चा वैष्णव नहीं है।’

यह सुनकर विष्णुस्वामी भी उनके गुणोंसे आकृष्ट हो उनके शिष्य हो गये और कृष्णमन्त्रकी उपासना करते हुए वे शिवकी आराधनामें तत्पर हो गये एवं उनकी आज्ञासे उन्होंने वैष्णवीसंहिताका वर्णन किया।

सूतजीने पुनः कहा—मुने! कृष्णपरायण मध्वाचार्य भी महाप्रभुकी विशेषताओंको जानकर रमणीय शान्तिपुरीमें आये और उन्हें नमस्कारकर शिष्य होकर उनकी आराधनामें तत्पर हो गये। (अध्याय १९)

भक्तोंसहित चैतन्यमहाप्रभुकी जगन्नाथपुरी-यात्रा एवं साक्षात् भगवान्से वार्तालाप

सूतजी बोले—शौनक! शिवभक्तिपरायण शुद्धात्मा भट्टोजिदीक्षितने श्रीमहाप्रभु कृष्णचैतन्यके पास आकर उनको नमस्कारकर उनका शिष्यत्व स्वीकार किया और उन्होंने वेदके तृतीय अङ्ग व्याकरण, जो पाणिनिसे निर्मित हो चुका था, उसकी प्रक्रियात्मक व्याख्या की और फिर उनकी आज्ञासे सिद्धान्तकौमुदीका निर्माण कर वहीं निवास किया। सूर्यपरायण वराहमिहिर नामके विद्वान् महाप्रभु चैतन्यकी बाईस वर्षकी अवस्थामें उनके समीप आये और उनके शिष्य हो गये। उनकी आज्ञासे इन्होंने अनेकों ज्योतिष ग्रन्थोंका

निर्माण किया और वहीं रहने लगे।

शिवभक्तिपरायण छन्दःशास्त्रके रचयिता वाणीभूषणने तेईस वर्षकी अवस्थावाले कृष्णचैतन्यके पास आकर उनके शिष्य होकर वहाँ निवास किया और अपने नामसे छन्दःशास्त्रका निर्माण किया तथा उन्होंने परम श्रेष्ठ राधाकृष्णका जप करते हुए आनन्दमय जीवन-यापन किया।

सूतजी पुनः बोले—मुने! ब्रह्मभक्तिपरायण धन्वन्तरि नामके एक ब्राह्मण थे। उन्होंने कृष्णचैतन्यके पास आकर उनका शिष्यत्व स्वीकार किया और वहीं रहकर कल्पवेदस्वरूप वेदाङ्गकी

१-वराहमिहिर विक्रमादित्यके दरबारी थे और उनके ग्रन्थोंपर उत्पन्न भट्ट आदिकी प्राचीन टीकाएँ हैं। महाप्रभु चैतन्यका प्रायः समय चौदहवीं शती है। अतः यहाँ किसी अन्य विशिष्ट ज्योतिषीसे भाव निकालने चाहिये, जो वराहमिहिरके सिद्धान्तोंको मानते हों। २-धन्वन्तरिके सम्बन्धमें भी वराहमिहिर-जैसा ही समझना चाहिये, क्योंकि ये भी पूर्ववर्ती हैं।

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

  • प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *

३७१

रचना की। सुश्रुतके अतिरिक्त इनके और भी अनेक शिष्य हुए।

इसी प्रकार बौद्धमार्गपरायण जयदेव नामक ब्राह्मण पचीस वर्षकी अवस्थावाले कृष्णचैतन्यके समीप आये। उनसे कृष्ण चैतन्यने कहा—आपके परम उपास्य गुरु उद्धेश (उड़ीसा)-निवासी जगन्नाथ हैं। अतः मुझे भी शिष्योंके साथ वहीं जाना चाहिये।

यह सुनकर कृष्णचैतन्यके भक्तोंने अपने-अपने शिष्योंको बुलाकर उनके पीछे-पीछे जगन्नाथ-क्षेत्र (उड़ीसा)-की यात्रा की। निधियाँ तथा सभी सिद्धियाँ भी उनकी सेवाके लिये उपस्थित हुई। शैव और शाक्तोंके साथ दस हजार वैष्णवोंने महाप्रभु कृष्णचैतन्यको आगे कर जगन्नाथपुरीकी ओर प्रस्थान किया। उनके आगमनको देखकर भगवान् जगन्नाथ मुनिवेशमें एक ब्राह्मणका रूप धारण कर जहाँ महाप्रभु आदि थे वहाँ आये। कृष्णचैतन्यने उनको देखकर नमस्कार कर कहा—'इस भयानक कलियुगमें आप किस मतको उचित समझते हैं, मुझे कृपापूर्वक बतायें। मैं उसे तत्त्वतः सुनना चाहता हूँ।' यह सुनकर स्वयं जगन्नाथभगवान्ने लोक-कल्याणके लिये इस प्रकार

कहा—'काश्यपसे शासित मिश्र देशमें उत्पन्न म्लेच्छोंने सुसंस्कृत हो ब्राह्मणवर्णको प्राप्त किया है। उन्होंने शिक्षा-सूत्र धारणकर उत्तम श्रेष्ठ वेदका अध्ययन कर देवाधिदेव शचीपतिकी यज्ञोद्धार पूजा की है। इससे दुःखी हो भगवान् इन्द्र श्वेतद्वीपमें मेरी शरणमें आये और देवताओंके मङ्गलके लिये उन्होंने स्तुतिद्वारा मुझे उद्वुद्ध किया। तब मैंने संसारके कल्याणके लिये कलियुगमें अवतीर्ण होनेका वर प्रदान किया और इन्द्रादिको भी द्वादश आदित्यके रूपमें पृथ्वीपर अवतरित होनेके लिये कहा। मैं सिन्धुतटमें संसारकी हितकामनासे दारुपाषाणरूपमें अवतीर्ण हुआ हूँ। स्वर्गलोकसे आये हुए इन्द्रघुघ्र नामक राजाद्वारा रचित मन्दिरमें मैं प्रतिष्ठित होऊँगा। महाप्रभु चैतन्य यहाँके प्रसादकी महिमा बतलायेंगे। यह स्थान सभी वाञ्छित फलोंको देनेवाला एवं मोक्षप्रद है। यहाँ भक्तिकी महिमा अधिक है। वर्णाका भेदभाव भक्तिके प्रवाहसे दिखायी नहीं देता। एक योजनपर्यन्त यहाँ किसी व्रत आदिकी व्यवस्था नहीं है। मैं सम्पूर्ण पापोंका विनाशक हूँ और कलिकालमें मेरा दर्शन करके मनुष्य शुद्ध हो जायगा।' (अध्याय २०)

मुनिश्रेष्ठ कण्वके उपाध्याय, दीक्षित तथा पाठक आदि दस पुत्रोंकी उत्पत्ति, चैतन्यमहाप्रभु आदि आचार्योद्धार शुद्धिपूर्वक वैष्णवधर्मका विस्तार

सूतजीने कहा—देवेन्द्र! भगवान् जगन्नाथके इन वचनोंको सुनकर कृष्णचैतन्यने भी प्रसन्नतापूर्वक कहा—'भगवन्! प्राणियोंके कल्याणके लिये आप इस कथाको कुछ और विस्तारके साथ कहें।'

जगन्नाथजी बोले—महात्मन्! प्राचीन कालमें महर्षि कश्यपके पुत्र कण्वकी आर्यावती नामकी देवकन्या पत्नी हुई। इन्द्रकी आज्ञासे दोनों कुरुक्षेत्रवाहिनी सरस्वती नदीके तटपर गये और

कण्व चतुर्वेदमय सूक्तोंसे सरस्वतीदेवीकी स्तुति करने लगे। एक वर्ष बीत जानेपर वह देवी प्रसन्न हो वहाँ आयीं और आर्योंकी समृद्धिके लिये उन्हें वरदान दिया। वरके प्रभावसे कण्वके आर्य बुद्धिवाले दस पुत्र हुए—उपाध्याय, दीक्षित, पाठक, शुक्ल, मिश्र, अग्रिहोत्री, द्विवेदी, त्रिवेदी, पाण्ड्य और चतुर्वेदी। इन लोगोंका जैसा नाम था वैसा ही गुण। इन लोगोंने नतमस्तक हो सरस्वतीदेवीको

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

३७२

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

प्रसन्न किया। बारह वर्षकी अवस्थावाले उन लोगोंको भक्तवत्सला शारदादेवीने अपनी कन्याएँ प्रदान कीं। वे क्रमशः उपाध्यायी, दीक्षिता, पाठकी, शुक्लिका, मिश्राणी, अग्निहोत्रिणी, द्विवेदिनी, त्रिवेदिनी, पाण्डुयायनी और चतुर्वेदिनी कहलाईं। फिर उन कन्याओंके भी अपने-अपने पतिसे सोलह-सोलह पुत्र हुए। वे सब गोत्रकार हुए। जिनका नाम इस प्रकार है—कश्यप, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि, वसिष्ठ, वत्स, गौतम, पराशर, गर्ग, अत्रि, भृगु, अंगिरा, शृंगी, कात्यायन और याज्ञवल्क्य। इन नामोंसे सोलह-सोलह पुत्र जाने जाते हैं।

सरस्वतीकी आज्ञासे महर्षि कण्व मिक्षदेश आ गये और वहाँ दस हजार म्लेच्छोंको संस्कृत पढ़ाकर अपने वशमें कर लिया तथा स्वयं श्रेष्ठ ब्रह्मवर्तमें आ गये। उन लोगोंने सरस्वतीदेवीको तपस्यासे संतुष्ट किया। पाँच वर्षके बाद सरस्वतीदेवी प्रकट हुई और सपत्नीक उन म्लेच्छोंको शूद्रवर्णका बना दिया। वे सब कारुवृत्ति करनेवाले (शिल्पी) अनेक पुत्रोंसे समन्वित हुए। उनके मध्यमें दो हजार वैश्य हुए। उनके मध्यमें आचार्य पृथु नामका कश्यपसेवक था। उसने बारह वर्षतक तपस्याद्वारा महामुनिको संतुष्ट किया। महर्षि कण्वने प्रसन्न हो देवताओंके वरसे उन्हें क्षत्रिय राजा बनाया और उन्हें राजपुत्रपुर प्रदान किया। राजन्या नामकी उनकी पत्नी मागध नामक पुत्रको जन्म दिया। उनको कण्वने पूर्व दिशामें मागध देश दिया। तदनन्तर कश्यपपुत्र काश्यप स्वर्गलोक चले गये। उनके स्वर्ग चले जानेपर शूद्रवर्णवाले उन म्लेच्छोंने यज्ञोद्वारा देवाधिदेव शचीपति इन्द्रकी अर्चना की। इससे दुःखी होकर इन्द्र अपने बन्धुके साथ अपने अंशसे पुनः ब्रह्मयोनिमें पृथ्वीमें उत्पन्न हुए।

जिन नामका कोई विप्र था और उसकी पत्नीका

नाम था जयनी। वे दोनों कश्यपद्वारा अदितिसे कीकटदेशमें उत्पन्न हुए थे। उनके द्वारा लोककल्याणके लिये आदित्य उत्पन्न हुए। कर्मनाशा* नदीके तटपर बोधगया नामक एक नगरी है। वहाँपर उन्होंने बौद्धशास्त्रसे समन्वित हो शास्त्रार्थ किया और शूद्रोंसे वेदको ग्रहणकर विशाला (बदरीक्षेत्र) नगरी चले गये और वहाँ समाधिस्थ मुनियोंको जगाकर उन्हें वेद प्रदान किया। तभीसे सभी देवगण भूतलको छोड़कर स्वर्ग चले गये। म्लेच्छगण बौद्ध हो गये और शेष सभी वेदपरायण हो गये।

सरस्वतीकी कृपासे उन आर्योंकी संख्या बहुत बढ़ गयी। उन लोगोंने देवताओं और पितरोंको हव्य तथा कव्य समर्पित किया। इस प्रकार सभी लोग देवोपासनाद्वारा देवताओंको तृप्त करने लगे। सताईस सौ वर्ष कलियुगके बीतनेपर बलिके द्वारा प्रेषित मय नामका महान् असुर भूमिपर आया। वह अनेक मायाओंका प्रवर्तक शाक्यसिंह गुरुके नामसे प्रसिद्ध हुआ तथा गौतमाचार्य नामसे दैत्यपक्षको बढ़ानेवाला हुआ। उसने सभी तीर्थोंपर मायामय यन्त्रोंको स्थापित किया। उसके नीचे जो जाता वह बौद्ध हो जाता। फलतः चारों ओर बौद्ध परिव्याप्त हो गये। प्रायः दस करोड़के लगभग आर्य बौद्धधर्मावलम्बी हो गये। शेष पाँच लाख पर्वतशिखरपर चले गये। अग्निवंशमें उत्पन्न राजाओंने चतुर्वेदके प्रभावसे बौद्धोंको पराजित किया और आर्योंको सुसंस्कृतकर विन्ध्यपर्वतके दक्षिणमें स्थापित किया तथा विन्ध्यके उत्तरकी पुण्यभूमि आर्यावर्तमें पाँच लाख लोग अवस्थित हुए।

सूतजीने पुनः कहा—शौनक! चैतन्यमहाप्रभु भगवान् जगन्नाथकी वाणीको सुनकर उनके शिष्य हो गये और वेदमार्गपरायण हो गये। वे शुक्लदत्तके पुत्र स्वामी नित्यानन्दको पाकर अत्यन्त प्रसन्न हुए। वे भी जगन्नाथपदको नमस्कार कर उनके शिष्य

  • बोधगया फल्गु नदीके तटपर स्थित है। कर्मनाशा आजकल रोहतास, गाजीपुर, भोजपुर और बनारस जिलेकी सीमा निर्धारित करती है।

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

  • प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *

३७३

हो गये। उषापति भगवान् अनिरुद्धने प्रसन्न हो उन दोनोंका अभिषेक कर महत्त्वमें प्रतिष्ठित किया। उस दिनसे उन लोगोंकी भूतलमें 'महत्त्व' पदवी हो गयी। दोनों गुरुभाइयों (महाप्रभु और नित्यानन्द) ने प्रसन्न होकर अपने शिष्योंसे कहा— 'जो यहाँ—जगन्नाथजीमें पद्मनाभि उषापति भगवान् जगन्नाथजीका दर्शन करेगा, वह स्वर्ग प्राप्त करेगा। जो यहाँके प्रसादको सादर ग्रहण करेगा, वह करोड़ जन्मतक वेदज्ञ एवं धनाढ्य द्विज होगा। मार्कण्डेयवटके पास कृष्णका दर्शन कर जो महान् इन्द्रद्युम्नसरमें स्नान करता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। श्रद्धा-भक्तिके साथ जो इस कथाको सुनेगा वह भी जगन्नाथपुरीमें जानेका फल प्राप्त कर लेगा।'

महाप्रभु चैतन्यने इस प्रकार भगवान् जगन्नाथकी महिमा बतलाई। भगवान् जगन्नाथने भी 'यज्ञांश-महाप्रभुकी बातें ठीक हैं' ऐसा कहा और वे वहाँ अन्तर्धान हो गये।

इसी बीचमें कलिन बलिसे प्रार्थना की। तब दुःखित हो बलिन मय दैत्यको बुलाकर कहा— 'दैत्येन्द्र! सुकन्दर नामक म्लेच्छपति हमलोगोंकी उन्नतिके लिये सदा तत्पर है। मेरी आज्ञाके अनुसार तुम उसकी सहायता करो।' बलिकी बात सुनकर ज्योतिर्विद्याविशारद वह दानव मय एक सौ दैत्योंके साथ कर्मभूमिमें आया और उसने दुष्ट म्लेच्छजातिको ज्योतिर्गणितसहित इक्कीस अध्यायवाले रेखागणितकी शिक्षा दी। तब ज्योतिर्विद्यामें पारङ्गत होकर उन म्लेच्छोंने सातों पुरियोंमें यन्त्रोंका निर्माण कराया। उन यन्त्रोंके प्रभावसे वहाँ जो लोग थे, वे सब म्लेच्छत्वको प्राप्त हो गये।

यह आदर्श देखकर सभी आर्य बहुत दुःखी

हुए, सर्वत्र महान् कोलाहल और हाहाकार मच गया। वह करुणक्रन्दन सुनकर कृष्णचैतन्यके सेवक सभी वैष्णव गुरुके दिव्य मन्त्रको ग्रहणकर म्लेच्छोंको निष्प्रभावी करनेके लिये अलग-अलग पुरियों आदि स्थानोंकी ओर चले गये। रामानन्द शिष्योंके साथ अयोध्या आ गये और उन्होंने म्लेच्छयन्त्रको उलटकर वहाँपर सभीको वैष्णव बना दिया। ललाटपर त्रिशूलके समान श्रीचिह्न बन गया, जो श्वेत-रक्तमय हुआ। कण्ठमें तुलसीकी माला और जिह्वा राममय हो गयी। इस प्रकार वे सभी म्लेच्छ रामानन्दके प्रभावसे वैष्णव हो गये*। वे संयोगी वैष्णव कहलाये। शेष आर्य मुख्य वैष्णवरूपमें अयोध्यामें स्थित हुए। बुद्धिमान् निम्बादित्य अपने शिष्योंके साथ काञ्चिकापुरी चले गये। वहाँ उन्होंने राजमार्गमें स्थित म्लेच्छयन्त्रको देखा। अपने गुरुके मन्त्रको विलोम करके वे वहाँ रहने लगे, जिससे म्लेच्छयन्त्र प्रभावशून्य हो गया। वे ललाटपर वंशपत्रके समान ऊर्ध्वरेखा, कण्ठमें माला और मुखमें गोपीवल्लभके मन्त्रसे सुशोभित हुए। उनके पास उपस्थित सभी म्लेच्छ वैष्णव हो गये और वे संयोगी वैष्णव कहलाये, शेष सभी आर्य वैष्णवमार्गके अनुयायी हो गये। अपने गणोंके साथ विष्णुस्वामी हरिद्वार गये। वहाँ स्थित म्लेच्छोंके महायन्त्रको उन्होंने विलोम कर दिया और जो लोग सेवामें आये वे सब-के-सब वैष्णव हो गये। ललाटमें दो रेखाओंसे समन्वित ऊर्ध्वपुण्ड्र और मध्यमें बिन्दु, कण्ठमें तुलसीगोलक और मुखमें कल्याणकारक माधवके मन्त्रसे सुशोभित होकर रहने लगे।

विष्णुभक्त मध्वाचार्य मथुरामें आये और उन्होंने राजमार्गमें स्थित म्लेच्छयन्त्रोंको देखकर विलोम

  • इसका आशय सिकन्दर लोदीके द्वारा बलात् धर्मपरिवर्तित भारतीयोंको आचार्य रामानन्द तथा चैतन्यमहाप्रभुद्वारा पुनः शुद्धिपूर्वक सनातन हिन्दू बनानेमें है। जैसा कि इन लोगोंके ग्रन्थोंमें सनातन गोस्वामी आदिकी जीवनियोंसे स्पष्ट है। पीछे स्वामी दयानन्दने भी इसीका अनुसरण किया।

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

३७४

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

कर दिया। उनके समीप जो लोग आये, वे उनके पक्षगामी वैष्णव हो गये। उनके ललाटमें नासाधैके आधे भागतकर करवीरपत्रके समान शुभ तिलक, कण्ठमें तुलसीकी माला और मुखमें राधाकृष्णका शुभ नाम विराजमान था। शैवमार्गपरायण शंकराचार्य* भी रामानुजकी आज्ञासे अपने गणोंके साथ काशीपुरी आ गये। म्लेच्छयन्त्रको विलोम करके उनके अन्तर्गत आये सभी शैव हुए। इनके भालपर त्रिपुण्ड्र और कण्ठमें रुद्राक्षकी माला तथा मुखमें गोविन्दमन्त्र विराजमान था। रामानुज तोतादरी—तोताद्विमें जाकर सुखी हो गये। उस समय उनके ललाटमें दो ऊर्ध्वरेखाओंके बीचमें पीतिकावर्णकी सूक्ष्म रेखा और कण्ठमें तुलसीमाला विराजमान थी। गुणवान् वराहमिहिर उज्जयिनी आये और उन्होंने वहाँपर म्लेच्छयन्त्रोंको निष्फलकर सभी लोगोंको शैव बना लिया। उनके ललाटमें चिताभस्म, कण्ठमें रुद्राक्षकी माला और 'शिव' यह मङ्गलनाम मुखमें विराजमान हुआ। वाणीभूषण कन्याकुब्ज—कान्यकुब्जमें आये। अर्धचन्द्राकार पुण्ड्र, रक्त चन्दनकी माला और देवीका निर्मल नाम उनके मुखमें विराजमान था। धन्वन्तरिने प्रयागमें आकर म्लेच्छयन्त्रको विलोम कर दिया। जो उनके संनिकट आये, वे उनके

अनुयायी होकर ललाटपर अर्धपुण्ड्र और रक्तबिन्दुको धारण करनेवाले हुए। उनके कण्ठमें रक्त चन्दनकी मालाएँ शोभायमान हुईं। धीमान् भट्टोजि श्रेष्ठ उत्पलारण्य गये। इन्होंने मस्तकपर लाल त्रिपुण्ड्र और कण्ठमें रुद्राक्षकी माला धारण की एवं विश्वनाथ नामका सदा जप करने लगे। रोपण भी इष्टिका (एटा) आये। वहाँ उन्होंने म्लेच्छयन्त्रको निष्फलकर जन-जनमें ब्रह्ममार्गका प्रदर्शन किया। इसी प्रकार विष्णुभक्त जयदेव द्वारकामें आये, इससे वहाँपर उन म्लेच्छोंका यन्त्र निष्फल हो गया। उनके जो अनुयायी हुए उनके मस्तकपर एक लाल रेखा, कण्ठमें पद्माक्ष—कमलगट्टेकी माला और जिह्वापर 'गोविन्द' नाम विराजमान हुआ।

इस प्रकार वैष्णव, शैव और शाक्त अनेक संख्यामें हो गये। शाक्त निर्गुण थे और वैष्णव सगुण। जो निर्गुण और सगुण थे, वे शैव कहलाये। नित्यानन्द शान्तिपुरमें, नदीहापत्तन—नदियामें हरि, मागध (मगहर देश)—में कबीर, कलिंजरमें रैदास और सधन (सदन) नैमिषारण्यमें समाधिस्थ हो गये। आज भी यहाँ वैष्णवोंका महान् समुदाय वर्तमान है। इस प्रकारसे मय आदि दैत्य भी निष्फल होकर बलिके पास चले गये। (अध्याय २१)

अकबर आदि अन्तिम मुगल शासकोंका चरित्र; तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई, तानसेन तथा बीरबल आदिके पूर्वजन्मोंका वृत्तान्त; गुरुण्ड, मौन और सर्वत्र म्लेच्छराज्यका विस्तार

सूतजी बोले—शौनक! इस प्रकार दैत्योंने बलिके पास जाकर अपनी पराजयका वृत्तान्त बतलाया। दैत्यराज बलिने देवताओंकी महान् विजय सुनकर रोषण नामक दैत्येन्द्रको बुलाकर कहा—'तुम तिमिरलिङ्ग (तैमूरलंग)—के पुत्र होकर

सरुष नामसे प्रसिद्ध होगे। अतः तुम वहाँ जाकर दैत्योंके श्रेष्ठ कार्यका सम्पादन करो। इसपर उसने क्रुद्ध हो देहली आकर वेदमार्गस्थ पुरुषोंका नाश करना शुरू कर दिया। उसने पाँच वर्षतक राज्य किया। उसीका पुत्र बाबर हुआ, बीस वर्षतक

  • यहाँ आदिशंकराचार्य आदि आचार्यगण अभिप्रेत न होकर कोई तत्कालीन शंकर आदि नामवाले महात्मा इष्ट प्रतीत होते हैं।

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

  • प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *

३७५

उसने राज्य किया। (कुछ वर्ष समरकन्दमें और कुछ दिन भारतमें।) उसका पुत्र होमायु (हुमार्यूँ) हुआ। मदान्ध होमायुने देवताओंका निरादर किया। तब देवताओंने नदीहाके उपवनमें स्थित कृष्णचैतन्यकी स्तुति की। स्तुति सुनकर हरि क्रुद्ध हुए और उन्होंने अपने तेजसे उसके राज्यमें विघ्न उत्पन्न किया। उनके सैन्योद्धार होमायुका पराजय हुआ। उस समय शेषशाक (शेरशाह) -ने रमणीय देहली नगरमें आकर पाँच वर्षतक अत्यन्त कुशलतापूर्वक राज्य किया। उन्हीं दिनोंकी बात है, शंकराचार्यके गोत्रमें उत्पन्न मुकुन्द नामक एक श्रेष्ठ ब्राह्मण अपने बीस शिष्योंके साथ प्रयागमें तप कर रहा था। 'म्लेच्छराज बाबरके द्वारा देवताओंकी प्रतिमाओं आदिको नष्ट-भ्रष्ट कर दिया गया है' यह जानकर ब्राह्मण मुकुन्दने दुःखी होकर अग्निये अपने प्राणोंकी आहुति दे दी। उसके बीस शिष्योंने भी गुरुके मार्गका ही अनुगमन किया। किसी समय ब्राह्मण मुकुन्दने गौके दूधके साथ गौके रोमका भी पान कर लिया था, इसी दोषके कारण वह दूसरे जन्ममें म्लेच्छयोनिमें उत्पन्न हुआ। जब हुमार्यू कश्मीर (अपने भाई मकरानके यहाँ काबुल-कश्मीरकी सीमा)-में निवास कर रहा था, तब उसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ और उसी समय यह आकाशवाणी हुई कि 'तुम्हारा पुत्र बड़ा प्रतापी और भाग्यशाली होगा। यह अकस्मात् (अक) प्राप्त वर (वरदान)-से उत्पन्न हुआ है, अतः इसका नाम 'अकबर' होगा और यह म्लेच्छ या पिशाचोंके मार्गका अनुसरण नहीं करेगा। यह श्रीधर, श्रीपति, शम्भु, वरेण्य, मधुव्रती, विमल, देववान्, सोम, वर्धन, वर्तक, रुचि, मान्धाता, मानकारी, केशव, माधव, मधु, देवापि, सोमपा, सूर तथा मदन—ये बीस जिसके शिष्य हैं, वही पूर्वजन्मका मुकुन्द ब्राह्मण भाग्यवश

तुम्हारे घरमें इस रूपमें आया है।'

ऐसी आकाशवाणी सुनकर प्रसन्नचित्त हुमार्यूने भूखसे पीड़ित व्यक्तियोंको दान दिया और प्रेमपूर्वक पुत्रका पालन किया। पुत्रकी दस वर्षकी अवस्था होनेपर वह देहलीमें आया और शेषशाकको पराजित कर वहाँका राजा हो गया। उसने एक वर्ष राज्य किया और बादमें उसका पुत्र अकबर राजा हुआ।

अकबर (मुकुन्द ब्राह्मण)-के राज्यप्राप्तिके बाद उसके पूर्वजन्मके सात प्रिय शिष्य (केशव, माधव, मधु, देवापि, सोमपा, सूर तथा मदन) इस जन्ममें भी पुनः उत्पन्न होकर अकबरके दरबारमें आये। मुकुन्द ब्राह्मणके शिष्य केशव अकबरके समयमें गानसेन (तानसेन) नामसे उत्पन्न हुए। पूर्वजन्मके माधव अकबरके समयमें वैजवाक् (बैजूबावरा) नामसे प्रसिद्ध हुए। पूर्वजन्मके मधु अकबरके समयमें सभी रागोंके ज्ञाता 'हरिदासगायक' नामसे विख्यात हुए। ये मध्वाचार्य-मतानुयायी प्रसिद्ध वैष्णव थे। पूर्वजन्मके देवापि अकबरके समयमें 'बीरबल' नामसे प्रसिद्ध हुए। वे पश्चिमी ब्राह्मण थे और उन्हें वाणीकी अधिष्ठात्री सरस्वतीदेवीका अभिमान था। पूर्वजन्मका गौतमवंशमें उत्पन्न सोमपा अकबरके समयमें 'मानसिंह' नामसे उत्पन्न हुआ और वह आर्यभूपशिरोमणि अकबरका सेनापति बना। पूर्वजन्मका शूर दक्षिण देशमें ब्राह्मण-कुलमें उत्पन्न हुआ, यह पण्डित था, इसका नाम हुआ 'बिल्वमंगल'। यह अकबरका मित्र बना। पूर्वजन्मका पूर्वदेशका ब्राह्मण मदन अकबरके समयमें 'चन्दल' नामसे प्रसिद्ध हुआ। यह नर्तक और रहःक्रीडाविशारद था।

ये सात राजा अकबरके दरबारमें स्थित हुए और पूर्वजन्मके श्रीधर आदि तेरह शिष्य दूसरे स्थानोंमें प्रतिष्ठित हुए। अकबरके समयमें अपनेके पुत्र श्रीधर ही पुराणोंमें निपुण तुलसीशर्मा (तुलसीदास)

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

३७६

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

नामसे प्रसिद्ध हुए। वे नारीसे शिक्षा प्राप्तकर राघवानन्दके शिष्य श्रीरामानन्दकी परम्परामें काशीमें अत्यन्त विरक्त वैष्णव कवि हुए। पूर्वजन्मके श्रीपति अकबरके समयमें महान् अन्ध भक्त कवि 'सूरदास' के रूपमें उत्पन्न हुए, ये मध्वाचार्यके मतमें स्थित रहनेवाले थे। इन्होंने कृष्णलीलाका वर्णन किया। पूर्वजन्मके शम्भु अकबरके समयमें चन्द्रभट्टके कुलमें हरिप्रिय नामसे उत्पन्न हुए, ये विष्णुभक्त थे और रामानन्दके मतमें स्थित हुए। पूर्वजन्मके वरेण्य अकबरके समयमें अग्रभुक् (अग्रदास१) नामके प्रसिद्ध संत थे, जो रामानन्दके मतमें स्थित हुए। ज्ञान-ध्यानपरायण, भाषा-छन्दकी रचना करनेवाले पूर्वजन्मके कवि मधुव्रती अकबरके समयमें 'कीलक' नामसे विख्यात हुए। धीमान् कीलकने रामलीलाकी रचना की और रामानन्दमतके अनुयायी हुए। पूर्वजन्मके विमल अकबरके समयमें 'दिवाकर' नामसे प्रसिद्ध हुए और भगवती सीताके पावन चरित्रका गान किया तथा वे रामानन्दके मतमें स्थित हुए। इसी प्रकार पूर्वजन्मके देवान् अकबरके समयमें 'केशव' नामसे अवतीर्ण हुए, ये विष्णुस्वामीके अनुयायी बने। कविप्रिया आदिकी रचनाकर इन्होंने प्रेतत्व प्राप्त किया और राम-ज्योत्स्ना नामक ग्रन्थकी रचनाकर स्वर्ग प्राप्त किया। पूर्वजन्मके सोम 'व्यासदास' नामसे उत्पन्न हुए। ये निम्बादित्यके मतानुयायी हुए। इन्होंने रहःक्रीडा ग्रन्थकी रचनाकर स्वर्ग प्राप्त किया। पूर्वजन्मके वर्धन 'चरणदास' नामसे विख्यात हुए। इन्होंने ज्ञानमाला नामक

ग्रन्थका निर्माण किया और ये रैदास-मार्गके अनुयायी बने। पूर्वजन्मके वर्तक 'रत्नभानु' नामसे उत्पन्न हुए, ये जैमिनि भाषाके रचयिता थे और रोपण-मतके अनुयायी थे। पूर्वजन्मके रुचि 'रोचन' नामसे उत्पन्न हुए। ये मध्वाचार्यके मतानुयायी थे। इन्होंने अनेक गानमयी लीला करके स्वर्ग प्राप्त किया। पूर्वजन्मके मान्धाता 'भूपति' नामके कायस्थ हुए। मध्वाचार्यके मतानुसार इन्होंने हिन्दी-भाषामें भागवतका सुन्दर अनुवाद किया। पूर्वजन्मके मानकारने नारीभावसे स्त्रीशरीरको प्राप्त किया और 'मीरा' के नामसे विख्यात राजाकी पुत्री हुई। मध्वाचार्यके मतको माननेवाली वह मीरा अत्यन्त प्रसिद्ध हुई। उनका प्रबन्ध भयंकर कलिकालके लिये मङ्गलकर होगा।

अकबरने पचास वर्षतक निष्कण्टक राज्य किया और अन्तमें मरकर स्वर्ग चला गया। उसका पुत्र सलोमा—सलीम (जहाँगीर) था। उसने भी पिताके समान राज्य किया। उसका बेटा खुर्दक (खुसरो शाहजहाँ) था, उसने दस वर्षतक राज्य किया। उसके चार बेटे थे। उसका मध्यम बेटा नवरंग (औरंगजेब) था। उसने पिता और भाईको जीतकर राज्य किया। यह पूर्वजन्ममें अन्धक नामका प्रसिद्ध दैत्य था। इस कर्मभूमिमें अन्धकके अंशसे दैत्यराजकी आज्ञासे आया था। उसने चारों ओर अनेक मूर्तियोंको ध्वस्त किया। ऐसा देखकर देवताओंने आकर कृष्णचैतन्यसे कहा—'भगवन्! दैत्यराजका अंशभूत (औरंगजेब२)' राजा उत्पन्न हुआ है, वह देवताओं और वेदोंका

१-ये बहुत बड़े सिद्ध महात्मा थे, इनकी कुण्डलिया प्रसिद्ध हैं। ये जयपुरके गलता गद्दीके संस्थापक थे। इनके सम्प्रदायके अधिकांश लोग दुर्भाग्यपर जीवन-यापन करते थे। इससे इन्हें पयहारी कहा जाता था। भक्त नाभादास इनके ही शिष्य थे।

२-वास्तवमें औरंगजेब एवं महाप्रभुके समयमें प्रायः ३०० वर्षोंका अन्तर है। इसलिये यहाँ महाप्रभुसे किसी गौड़ीय सम्प्रदायके तत्कालीन प्रभावशाली संतका तात्पर्य ग्रहण करना चाहिये। औरंगजेबपर सर डॉ० यदुनाथ सरकारकी पाँच बड़े जिल्दोंकी अत्यन्त

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

  • प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *

३७७

विनाश कर दैत्य-पक्षकी अभिवृद्धि कर रहा है। नदीहाके वनमें स्थित यज्ञाशने यह सुनकर उस दुराचारीके वंशक्षयका शाप दिया। उनचास वर्षांतक उस दुष्टात्माने राज्य किया।

उस समय देवपक्षकी वृद्धि करनेवाले सेवाजय (छत्रपति शिवाजी) नामके एक राजा हुए, जो महाराष्ट्रमें उत्पन्न हुए थे तथा युद्धविद्यामें विशारद थे। उन्होंने उस दुराचारीको मारकर उसके पुत्रको वह स्थान दे दिया। फिर वे दक्षिण देशमें चले गये। आलोमा नामके उसके पुत्रने पाँच वर्षांतक राज्य किया और वह भी दिवंगत हो गया। तालनके कुलमें बलवान् म्लेच्छ 'फलरुष' हुआ। उसने मुकल (मुगल) कुलका नाश कर दस वर्षांतक राज्य किया और अन्तमें वह शत्रुओंसे मारा गया। उसका बेटा महामद हुआ, उसने बीस वर्षांतक राज्य किया।

उसी समय नादर (फारस-निवासी नादिरशाह दुर्गनी) नामका एक भारी लुटेरा देशमें आया और आर्योंको मारकर देवताओंको जीतकर वह खुरज (ईरान) देशमें चला गया। महामदका पुत्र था महामत्स्य। उसने अपने पिताके स्थानको ग्रहण कर पाँच वर्षांतक राज्य किया। तालनवंशमें उत्पन्न दुष्ट महामत्स्य महाराष्ट्रियोंद्वारा मारा गया। माधवने देहली नगरमें दस वर्षांतक राज्य किया। उसने म्लेच्छ आलोमाके राज्यको प्राप्त किया। उस राष्ट्रमें अपने देशमें उत्पन्न अनेक राजा हुए। देश-देशमें, ग्राममें रहनेवाले बहुत-से राजा हो गये। प्रायः कोई चक्रवर्ती सम्राट् नहीं रहा। सर्वत्र छोटे-छोटे मण्डलीकों (तालुकेदारों)-के अधिकारमें देश विभक्त हो गया। कुछ लोग तो गाँव-गाँवके ही मालिक

रहे। इस प्रकार तीस वर्ष बीत गये।

इसके बाद सभी देवगण कृष्णचैतन्यके* पास आये। उन्होंने महीतलपर उनके दुःखको जानकर एक मुहूर्तके लिये ध्यानस्थ होकर देवताओंसे कहा—'पूर्वकालमें बुद्धिमान् राघवने राक्षस रावणको जीतकर सुधावृष्टिके द्वारा वानरोंको जीवित कर लिया था। विकट, वृजिल, जाल, बरलीन, सिंहल, जव (जावा), सुमात्र (सुमात्रा) नामके छोटे-छोटे वानरोंने भगवान् रामचन्द्रसे कहा कि हमलोगोंको मनोवाञ्छित वर दीजिये। दाशरथि रामने उनके मनोरथोंको जानकर रावणके द्वारा देवाङ्गनाओंसे उत्पन्न कन्याओंको वानरोंको प्रदान किया और प्रसन्नचित्त हो वानरोंसे कहा कि 'जालंधरद्वारा निर्मित आपलोगोंके नामसे जो द्वीप होंगे, उन द्वीपोंके आपलोग राजा होंगे और ये आपलोगोंकी रानियाँ होंगी। नन्दिनी गौके रूण्ड (धड)-से जो म्लेच्छ उत्पन्न होंगे वे गुरुण्ड कहलायेंगे। उन्हें जीतकर आपलोग श्रेष्ठ राज्य प्राप्त करेंगे।'

यह सुनकर हरिको नमस्कारकर आनन्दपूर्वक वे सभी द्वीपोंमें चले गये। देवगणों! विकटके वंशमें उत्पन्न तथा उसके द्वारा प्रेरित वानरमुखी गुरुण्ड-लोग व्यापारकी दृष्टिसे यहाँ आये और उनका हृदय ईश-पुत्र (खिष्ट, ईशु या ईसामसीह)-का मतावलम्बी था। वे सत्यव्रती, कामजित, क्रोधरहित और सूर्यपरायण हैं। आपलोग वहाँ रहकर उनका कार्य करें। यह सुनकर देवता सूर्यकी आदरपूर्वक अर्चना कर कलिकातामें आ गये। पश्चिम द्वीपमें विकट नामका राजा हुआ, उसकी पत्नी विकटावती (विकटोरिया)-ने अष्ट कौशलमार्गसे (पार्लियामेंटके परामर्शसे) शासन किया।

प्रामाणिक ऐतिहासिक जीवनी प्रसिद्ध है। कैम्ब्रिज इतिहासके चौथे भागके उत्तरार्धमें औरंगजेबका वृत्तान्त इन्हींके द्वारा लिखित है। यहाँ चैतन्य शब्दसे भगवान् जगन्नाथ भी अभीष्ट हो सकते हैं।

  • यहाँ भी तत्कालीन गौड़ीय सम्प्रदायका कोई आचार्य समझ जाना चाहिये, क्योंकि महाप्रभु चैतन्य तो इससे प्रायः ४५० वर्ष पूर्व हुए थे।

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

३७८

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

उसके वंशके सात और गुरुण्ड राजा हुए, जो चौंसठ वर्षों तक राज्यकर नष्ट हो गये। गुरुण्डके आठवें राजातक न्यायपूर्वक शासन करनेपर कलिपक्षीय बलि दैत्यने मुर नामक महान् असुरको देवदेशमें भेजा। वह मुर वाडिल राजाको वशमें करके आर्य-धर्मके विनाशके लिये तत्पर हो गया। मूर्तिमें स्थित देवगणोंने महाप्रभुचैतन्य यज्ञाशके पास जाकर नमस्कार कर मुर नामक दैत्यके आनेकी बात कही। यह जानकर कृष्णांशने बौद्धपंथी गुरुण्डको शाप दिया कि 'जो मुरके मतमें हैं, वे नष्ट हो जायँगे।' इस तरहकी बात कहनेपर कालसे प्रेरित समस्त दुष्ट गुरुण्ड अपनी सेनाओंके साथ एक वर्षके अंदर ही नष्ट हो गये। वह राजा वाडिल भी विनाशको प्राप्त हो गया। तत्पश्चात् मेकल (लार्ड मेकाले) नामक नौवों वीर्यवान् (शिक्षाशास्त्री) गुरुण्ड आया। इसने न्यायपूर्वक बारह वर्षतक राज्य किया। दसवों लार्डल (लार्ड वेवल) नामक विख्यात गुरुण्डने बत्तीस वर्षतक धर्मपूर्वक राज्य किया। लार्डलके स्वर्ग जानेपर मकरन्दकुलमें उत्पन्न आर्योंने शासन किया। तदनन्तर हिमलुंग-निवासी मौनोंने राज्य प्राप्त किया। वे बध्रुवर्ण, सूक्ष्म तथा बर्तुल नासावाले एवं दीर्घ मस्तकवाले बौद्धमार्गगामी लाखोंकी संख्यामें देहली आये। उनका राजा हुआ आर्जिक। उसके पुत्र देवकर्णने गङ्गोत्रगिरिके शिखरपर राज्यकी वृद्धिके लिये बारह वर्षतक घोर तपस्या की। उस बुद्धिमान्की तपस्यासे भगवती गङ्गाने उसे दर्शन दिया और कुबेरने उसे आर्योंका मण्डलीक-पद प्रदान किया। तदनन्तर मण्डलीक देवकर्ण प्रजापालक राजा हुआ। साठ वर्षतक उसने महीतलपर राज्य किया। उसके वंशमें देवपूजक आठ राजा हुए। दो सौ वर्षतक राज्य करके वे स्वर्गलोक चले गये। ग्यारहवों मौन राजा पन्नगारि हुआ। वह चालीस वर्षतक राज्य करनेके बाद

पन्नगोद्धार मृत्युको प्राप्त हो गया। इस प्रकारसे महीतलपर मौन-जातियोंका राज्य हुआ।

इसके अनन्तर नागवंशीय, आन्ध्रवंशीय, कौसलदेशीय, नैषधदेशीय, सौराष्ट्रदेशीय तथा गुर्जरदेशीय राजाओंने अनेक वर्षों तक राज्य किया। गुर्जरदेशमें कलिन आभीरीके गर्भसे 'राहु' नामसे सिंहिकाके पुत्ररूपमें जन्म ग्रहण किया। जैसे चन्द्रको कष्ट देनेवाला नभोमण्डलमें सिंहिकापुत्र राहु स्थित है, वैसे ही कलिका अंशभूत देवताओंको कष्ट देनेवाला आभीरीका राहु नामका पुत्र उत्पन्न हुआ। इसके उत्पन्न होते ही पृथ्वीपर भयंकर भूकम्प होने लगा। सभी विपरीत ग्रह भयंकर दुःख उत्पन्न करने लगे। उसके भयसे देवगण अपनी-अपनी मूर्तियों-प्रतिमाओंमेंसे देवांशका परित्याग कर सुमेरु पर्वतके शिखरपर महेन्द्रकी शरणमें चले गये। उन लोगोंके कल्याणके लिये भगवान् शक्रने जगदम्बिकाकी स्तुति की। तब कन्यामूर्ति उस कल्याणकारी देवीने देवताओंसे कहा—'देवगणों! मेरे दर्शनसे आपलोग भूख-प्याससे रहित हो जायँगे।' यह सुनकर देवगण प्रसन्न हुए।

आभीरी-पुत्र राहु सौ वर्ष राज्य करके अपना प्राण त्यागकर कलिनमें लीन हो गया। उसके वंशमें डेढ़ सौ राजा हुए, जिन्होंने दस हजार वर्षतक राज्य किया। उन्होंने नष्ट हुए महामदके मतका पुनः प्रचार किया। वे सभी म्लेच्छ हुए। उस समय कलियुगमें न वेदाध्ययन था, न वर्ण-व्यवस्था थी और न देवता ही थे। कोई भी मर्यादा नहीं थी। जो शेष ब्राह्मण थे वे अर्बुद शिखरपर रहने लगे और बारह वर्षों तक प्रयत्नपूर्वक देवताओंकी आराधना करने लगे। फलतः अर्बुद शिखरसे खड्ग और चर्मधारी एक क्षत्रिय प्रादुर्भूत हुआ। उसका नाम हुआ अर्वबली। उसने भयंकर म्लेच्छोंको जीतकर पाँच योजन भूमिपर

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

  • प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *

३७९

अर्बपुरीका निर्माण किया। धीरे-धीरे वहाँ आर्य आकर बसने लगे और फिर आर्यकुलकी वृद्धि हो गयी। अर्बबलीने पचास वर्षोंतक राज्य किया। उसके वंशमें डेढ़ सौ राजा हुए। दस हजार वर्षके बाद म्लेच्छोंके मित्र वर्णसंकरणोंने म्लेच्छ-कन्याओंके साथ विवाह किया।

आर्यमार्गानुगामी नाममात्रके रह गये। उस समय मलयदेशस्थ एक लाख म्लेच्छोंका अर्बुदीय आर्यके साथ भयंकर युद्ध हुआ। उसमें महाबलशाली म्लेच्छोंने विजय प्राप्त की। सम्पूर्ण भूमि म्लेच्छमयी हो गयी और सर्वत्र अलक्ष्मीका निवास हो गया। (अध्याय २२-२३)

कलिके द्वितीय, तृतीय तथा चतुर्थ चरणोंका वृत्तान्त तथा कलिक भगवान्का अवतार

सूतजीने कहा—शौनक! म्लेच्छोंकी विजय होनेपर कलिने उन्हें सम्मानित किया। तदनन्तर सभी दैत्यगण अनेकों जलयानोंका निर्माणकर हरिखण्डमें आये। उस समय हरिखण्डमें भी मनुष्य देवताओंके समान महाबलशाली थे। उन लोगोंने दैत्योंके साथ भयंकर अस्त्र-शस्त्रोंसे युद्ध किया, किंतु दस वर्षके बाद वे सभी दैत्योंके मायायुद्धसे पराजित हो गये। तब वे हरिखण्डनिवासी महेन्द्रकी शरणमें गये। भगवान् शक्रने विश्वकर्मसे कहा—‘तात! सप्तसिन्धुओंमें तुम्हारे द्वारा विरचित भ्रमि नामक यन्त्र अवस्थित है। उस यन्त्रके प्रभावसे मानव एक खण्डसे दूसरे खण्डमें नहीं जा पाते; किंतु मायावी मयने उसे भ्रष्ट कर दिया है। फलतः सातों द्वीपोंमें मेरे शत्रु म्लेच्छगण सब जगह जाने लगे हैं। इसलिये आपके द्वारा सम्पादित जो मर्यादा है, उससे हमलोगोंकी आप रक्षा करें।’

यह सुनकर विश्वकर्मने एक दिव्य भ्रमि यन्त्रका निर्माण किया। उस यन्त्रके प्रभावसे वे सब भ्रमित हो गये। भ्रमि-यन्त्रसे म्लेच्छविनाशक एक महावायु उत्पन्न हुआ। उस महावायुसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ जो वात्य कहलाया। ज्ञानमय उस वात्यने दैत्यों, यक्षों और पिशाचोंको जीतकर त्रैवर्णिक द्विजोंका सत्कार किया। महाबली वात्यने म्लेच्छोंको उनके वर्णमें प्रतिष्ठित किया और पचास वर्षोंतक पृथ्वीपर ‘मण्डलीक’ पदको

सुशोभित किया। उसके वंशमें कलियुगमें हजारों राजा हुए। जिन्होंने सोलह हजार वर्षतक राज्य किया और वे सभी वायुके उपासक हुए।

दुःखित हो कलिने पुनः दैत्यराज बलिके पास जाकर वात्यवंशका सम्पूर्ण वृत्तान्त बतलाया, तब बलिने अपने मित्र कलिके साथ वामनभगवान्के पास आकर नमस्कार कर कहा—‘हे सुरोत्तम! मुझपर प्रसन्न होकर आपने मेरे लिये कलिको बनाया है, परंतु वह कलि वात्य-द्विजोंके द्वारा तिरस्कृत कर दिया गया है। प्रभो! कलियुगके एक चरण व्यतीत होनेमें थोड़ा ही समय शेष है। इतने समयमें मेरी अपेक्षा देवोंका अधिक राज्य रहा। मैंने तो देवेन्द्रकी मायाके कारण पृथ्वीका अधिकार छोड़ दिया है। अतः आप मेरे मित्र इस कलिकी रक्षा करें।’ तब भगवान् वामन हरि अपने पूर्वार्ध अंशसे यमुनातटनिवासी कामशर्मा नामक ब्राह्मणके घर उसकी पत्नी देवहूतिसे दो दिव्य पुत्रोंके रूपमें उत्पन्न हुए। एकका नाम था भोगसिंह और दूसरेका नाम था केलिसिंह। वे वात्यसे उत्पन्न राजाओंको जीतकर कल्पक्षेत्रमें आये। मयनिर्मित रहःक्रीडावती नामकी नगरीमें रहकर बलवान् उन दोनोंने कलिकी धुरीको धारण किया। कालान्तरमें कलियुगमें विपुल वर्णसंकरणकी सृष्टि हो गयी। वृक्षपरके पक्षीके समान इनकी प्रभूत वृद्धि हो गयी। दो हजार वर्षके बाद इन्होंने

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

३८०

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

पूर्ववर्ती मानवोंको समाप्त कर दिया। उस समय पृथ्वीपर कलिका द्वितीय चरण आ गया। इस समय किन्नरोंकी वार्ता भूतलपर वर्तमान है। वे दैत्यमय मनुष्य ढाई हाथमात्र ऊँचे हो गये और उनकी अवस्था चालीस वर्ष हुई तथा वे पक्षियोंके समान कर्महीन हो गये। कलिके द्वितीय चरणके अन्तमें न विवाह होगा, न राजा रहेंगे, न कोई उद्यमशील रहेंगे और न कर्मकर्ता रहेंगे। भोगसिंह और केलिसिंहके वंशज सवा लाख वर्षतक पृथ्वीमें रहेंगे। इसलिये हे मुनिगणो! आप सबको मेरे साथ कृष्णचैतन्यके पास चलना चाहिये।

व्यासजी बोले— हे मनो! विशालापुननिवासी वे सभी मुनिगण प्रसन्नचित्त होकर यज्ञांशके पास जायँगे और उन्हें प्रणाम कर इन्द्रलोक जानेकी अनुमति माँगेंगे। तब यज्ञांश चैतन्य, आह्लाद, योगी गोरख, शंकर आदि रुद्रांशों और राजा भर्तृहरि आदि अपने सभी शिष्यों तथा अन्य योगिजनों और विशालापुननिवासी मुनियोंके साथ विमानपर आरूढ़ होकर देवलोक चले जायँगे। तब कलिके द्वितीय चरणमें वामनांशसे उद्भूत भोगसिंह और केलिसिंह योगमार्गका अवलम्बन कर कल्पक्षेत्रमें स्थित होंगे और दैत्यवर्गकी अभिवृद्धि करेंगे।

कलिके तृतीय चरणके आनेपर किन्नरगण धीरे-धीरे पृथ्वीपर विनष्ट हो जायँगे। कलियुगके तृतीय चरणके छब्बीस हजार वर्ष व्यतीत होनेपर रुद्रकी आज्ञासे भुङ्ग-ऋषि सौरभी नामकी पत्नीसे महाबलवान् कौलकल्प नामक मनुष्योंको उत्पन्न करेंगे जो सभी किन्नरोंका भक्षण करनेवाले होंगे। उस समय कलिमें उनकी उम्र छब्बीस वर्षकी होगी। भयभीत किन्नर वामनांशकी शरणमें जायँगे और तब भोगसिंह तथा केलिसिंहके साथ कौलकल्पोंका घोर युद्ध होगा। दस वर्ष युद्ध करनेके पश्चात् भोगसिंह आदि सब पराजित हो

जायँगे। दैत्योंके साथ वामनांश (भोगसिंह, केलिसिंह) भी पातालमें चले जायँगे।

घोर कलियुगमें भुङ्ग-ऋषिकी भयंकर सृष्टि होगी। माता-बहिन, पुत्री आदिसे वे मनुष्य पशुवत् व्यवहार करेंगे। कामान्ध होकर वे सब बहुत पुत्रोंको उत्पन्न करेंगे। कलिके तृतीय चरणमें वे सृष्टियाँ भी भयंकर तिर्यक्-योनिको प्राप्त कर नष्ट हो जायँगी।

कलिके चतुर्थ चरणमें मनुष्यकी आयु बीस वर्षकी होगी और वे मरकर नरक जायँगे। उस समय जलीय और वन्य जीवोंके समान वे कन्द-मूल-फल खानेवाले हो जायँगे। जो तामिस्स आदि भयंकर नरक प्रसिद्ध हैं, वे सब कर्मभूमिमें उत्पन्न मानवोंसे भरे जायँगे।

कलियुगके चतुर्थ चरणमें उत्पन्न मनुष्योंके द्वारा इक्कीसों नरकोंमें अजीर्णता आ जायगी—नरक मनुष्योंसे भर जायँगे। तब नरक धर्मराजके पास जाकर कहेंगे कि पापियोंसे हमारे स्थान भर गये हैं। हे सुरोत्तम! जिस तरह हम लोग प्राकृतरूपमें हो जायँ आप वैसा उपाय करें। यह सुनकर धर्मराज चित्रगुप्तके साथ कलियुगके संध्याकालमें ब्रह्माके पास जायँगे और परमेष्ठि पितामह उनके साथ क्षीरसागर जायँगे तथा वहाँ जगन्नाथ देवाधिदेव वृषाकपिकी पूजा कर सांख्यशास्त्रमय स्तोत्रोंसे स्तुति करेंगे एवं रक्षाकी प्रार्थना करेंगे। इसपर वे कहेंगे—देवगणो! लोककल्याणके लिये यह कश्यप सम्भल ग्राममें जन्म लेगा और वहाँ इसका नाम होगा विष्णुयशा। इसकी पत्नीका नाम होगा विष्णुकीर्ति। विष्णुयशा कृष्णलीलाके ग्रन्थ मनुष्योंको सुनायेगा किंतु वे महाधूर्त नारकीय प्राणी उसे भयंकर दृढ़ बन्धनमें बाँधकर कारागारमें डाल देंगे, तब विष्णुकीर्तिसे संसारका कल्याण करनेवाले पूर्ण भगवान् नारायण मार्गशीर्ष मासके कृष्ण पक्षकी अष्टमीके दिन

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

  • प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *

३८१

अन्धकारपूर्ण रात्रिमें कल्किरूपमें उत्पन्न होंगे तथा ब्रह्माण्डके कल्याणके लिये सभी देवताओंका भी प्रादुर्भाव होगा और वे सभी देवता तथा ग्रह परमेश्वरकी स्तुति करेंगे। तब भगवान् कल्कि उन्हें कल्पों, मन्वन्तरों, अवतार-कथाओं, सनातन राधा-कृष्णकी

महिमा तथा कर्मभूमि और सभी लोकों एवं ग्रहोंकी स्थितिको बतलायेंगे। इसी प्रसंगमें श्वेतवाराहकल्पकी कथा भी कहेंगे। तदनन्तर प्रसन्न होकर पुनः प्रणाम कर वे सभी देवगण अपने-अपने स्थानोंको चले जायेंगे। (अध्याय २४-२५)

भगवान् कल्किकी विजय, सत्ययुगकी उत्पत्ति-कथा, अक्षयनवमीमें आँवलेके पूजनका माहात्म्य, अयोध्यामें महाराज वैवस्वतका प्रतिष्ठित होना तथा प्रतिसर्गपर्वका उपसंहार

व्यासजीने कहा—अनन्तर पुराणपुरुषसे उत्पन्न भगवान् कल्कि खड्ग, कवच और ढाल धारण कर दिव्य अश्वपर आरूढ़ हो दैत्यस्वरूप म्लेच्छोंको मारकर योगमार्गका आश्रय लेंगे और सोलह हजार वर्षोंतक उनकी योगाग्निसे तपायी गयी कर्मभूमि भस्मीभूत होकर निर्जीव हो जायगी। अनन्तर प्रलयंकर मेघ उत्पन्न होकर प्रलयकारी वृष्टि करेंगे और भूमि उस जलमें निमग्न हो जायगी। उस समय घोर कलियुग बलिके पास चला जायगा। कलियुगके जानेके बाद भगवान् हरि पुनः कर्मभूमिको रमणीय स्थलमयी करके यज्ञोंसे देवीका यजन करेंगे। यज्ञभाग ग्रहण करके वे देवगण शक्तिसम्पन्न हो जायेंगे और वैवस्वतमनुके पास जाकर सम्पूर्ण वृत्तान्त कहेंगे। अनन्तर कल्किके मुखसे ब्राह्मण, बाहुसे क्षत्रिय, जानुसे वैश्य और पैरसे शूद्र वर्ण उत्पन्न होंगे। ये ब्राह्मणादि क्रमशः गौर, रक्त, पीत एवं श्यामवर्णके होंगे और देवीसे शक्ति प्राप्त करके अनेक पुत्र उत्पन्न करेंगे। उस समय मनुष्य जाति-धर्मका आश्रय लेकर देवताओंका यजन करेंगे। तब धीमान् वैवस्वत विष्णुरूप उस कल्कि हरिको नमस्कार कर उनकी आज्ञासे अयोध्यामें राजपद ग्रहण करेंगे। उनकी इच्छासे जो पुत्र उत्पन्न होगा उसका नाम होगा इक्ष्वाकु। राजा इक्ष्वाकु पिता वैवस्वतके राज्यको प्राप्त कर दिव्य सौ वर्षकी आयु प्राप्त कर अन्तमें

शरीरका परित्याग कर देंगे।

जब भगवान् कल्कि ब्रह्मसत्र करेंगे, तब अङ्गोंके साथ चारों वेद मूर्तिमान् हो जायेंगे। अष्टादश पुराणोंके साथ वे वहाँ आयेंगे और वे सभी पुराणपुरुषके अंशभूत कल्किकी स्तुति करेंगे।

कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी नवमी तिथिमें गुरुवारको एक श्रेष्ठ पुरुष यज्ञकुण्डसे उत्पन्न होगा। सत्यमार्गका प्रदर्शक वह सत्ययुग नामसे कहा जायगा। ब्रह्मादि देवगण नवमी तिथिमें इस रमणीय पुरुषके आविर्भावको देखकर उस तिथिका, समस्त कर्मोंका क्षय करनेवाली तिथिके रूपमें वर्णन करेंगे। इस तिथिको जो मनुष्य आँवला-वृक्षके नीचे जिन देवताओंकी पूजा करेगा वे देवता उसके वशमें हो जायेंगे। यह नवमी अक्षयनवमी और युगादि नवमीके नामसे प्रसिद्ध है। यह लोकमङ्गलदायिनी और सभी पापोंका नाश करनेवाली है। आँवलाके वृक्षके नीचे जो मालती और तुलसीको स्थापित कर विधिपूर्वक शालग्रामकी पूजा करता है, वह पितरोंका तुसिकारक एवं जीवनमुक्त होता है। आँवला-वृक्षके नीचे जो श्राद्ध करता है, वह हजारों गया-श्राद्ध करनेका फल प्राप्त करता है और जो व्यक्ति वहाँपर होम करता है, उसे हजारों यज्ञ करनेका फल प्राप्त होता है तथा वह मरनेके बाद अनेक कुटुम्बियोंके साथ स्वर्ग प्राप्त करता है। कल्किदेवता प्रसन्न होकर

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

३८२

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

देवताओंके प्रति 'ऐसा ही हो' यह कहेंगे, यह कहकर भगवान् कलिक देवताओंके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान होकर सुषुप्त हो जायेंगे।

भगवान् कलिकके जानेके बाद दुःखित भगवती कर्मभूमि विरहाग्रिसे संतप्त बीजोंका नाश कर देंगी। उस समय पातालनिवासी महान् दैत्यगण प्रह्लादके साथ अपने वाहनोंपर आरूढ़ हो अनेक अस्त्र-शस्त्रोंको लेकर देवताओंके पास गरजते हुए जायेंगे। तब इन्द्र आदि तैंतीस देवगण अपने आयुधोंको ग्रहण कर उनसे भयंकर युद्ध करेंगे। दिव्य एक वर्षतक उनका भयंकर युद्ध होगा। मरे हुए दैत्योंको शुक्राचार्य जिला देंगे, तब थके हुए देवगण युद्ध छोड़कर क्षीरसागर चले जायेंगे, जहाँ साक्षात् हरि विराजमान रहते हैं। देवगण उनकी स्तुति करेंगे। उनकी स्तुतिसे वे भगवान् देवताओंके कल्याणके लिये अपने पूर्वार्धसे हंसरूप बना लेंगे। वे हंसरूपी

साक्षात् हरि सैकड़ों सूर्यकी कान्तिके समान प्रभावशाली होंगे। प्रह्लादादि प्रमुख दैत्यगण एवं शुक्राचार्यको वे अपने तेजसे तप्त कर देंगे। तब पराजित दैत्यगण पृथ्वीको छोड़कर दुःखित हो वितललोकमें चले जायेंगे। महादेवसे रक्षित वे सभी देवगण निर्भय, निरुपद्रव हो जायेंगे और पृथ्वीपर वैवस्वतके पुत्रका अभिषेक करेंगे। वे इक्ष्वाकु दिव्य सौ वर्षकी आयुवाले होंगे, उस समय मनुष्यकी आयु चार सौ वर्षकी होगी। धर्मके चार पाद हैं—ज्ञान, ध्यान, शम तथा दम। आत्मज्ञान ज्ञान कहलाता है। अध्यात्मचिन्तन ध्यान कहलाता है। मनकी स्थिरता शम है और इन्द्रियोंका निग्रह करना दम है। चार लाख बत्तीस हजार वर्ष धर्मका एक पाद कहा जाता है। जब धर्मकी वृद्धि होती है, तब आयुकी भी वृद्धि होती है।

(अध्याय २६)

॥ प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड सम्पूर्ण ॥ ॥ भविष्यपुराणान्तर्गत प्रतिसर्गपर्व सम्पूर्ण ॥

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

उत्तरपर्व

महाराज युधिष्ठिरके पास व्यासादि महर्षियोंका आगमन एवं उनसे उपदेश करनेके लिये युधिष्ठिरकी प्रार्थना

कल्याणानि ददातु वो गणपतिर्यस्मिन्नतुष्टे सति क्षोदीयस्यपि कर्मणि प्रभवितुं ब्रह्मापि जिह्वायते । भजे यच्चरणारविन्दमसकृतसौभाग्यभाग्योदयै- स्तैनैषा जगति प्रसिद्धिर्मगमददेवेन्द्रलक्ष्मीरपि ॥ शश्रुत्युण्यहरिणयगभरसनासिंहासनाध्यासिनी सेयं वागधिदेवता वितरतु श्रेयांसि भूयांसि वः । यत्पादामलकोमलाङ्गुलिनखज्योत्स्नाभिरुद्भेत्तिलतः शब्दब्रह्मसुधाम्बुधिर्युधमनस्युच्छृङ्गुलं खेलेति ॥

(उत्तरपर्व १।१-२)

‘जिनकी प्रसन्नताके बिना ब्रह्मा भी एक क्षुद्रकार्यका सम्पादन नहीं कर सकते और जिनके चरणोंके एक बार आश्रय लेनेसे देवेन्द्रका भाग्य चमक उठा तथा उन्हें अखण्ड राजलक्ष्मीकी प्राप्ति हो गयी, वे भगवान् गणपतिदेव आपलोगोंका कल्याण करें। जो ब्रह्माके जिह्वाग्र-भागपर निरन्तर सिंहासनासीन रहती हैं और जिनके चरणनखकी चन्द्रकासे प्रकाशित होकर शब्दब्रह्मका समुद्र विद्वानोंके हृदयपर नृत्य करता है, वे भगवती सरस्वती आप सबका अनन्त कल्याण करें।’

भगवान् शंकरका ध्यान कर, भगवान् (विष्णु) कृष्णकी स्तुति कर और ब्रह्माजीको नमस्कार कर तथा सूर्यदेव एवं अग्निदेवको प्रणाम कर इस ग्रन्थका वाचन करना चाहिये*।

एक बार धर्मके पुत्र धर्मवेता महाराज युधिष्ठिरको देखनेके लिये व्यास, मार्कण्डेय, माण्डव्य, शाण्डिल्य, गौतम, शातातप, पराशर, भरद्वाज, शौनक, पुलस्त्य, पुलह तथा देवर्षि नारद आदि श्रेष्ठ ऋषिगण पधारे।

उन महान् तपस्वी एवं वेदवेदाङ्गपरांगत ऋषियोंको देखकर भक्तिमान् राजा युधिष्ठिरने अपने भाइयोंके साथ प्रसन्नचित्त हो सिंहासनसे उठकर भगवान् श्रीकृष्ण तथा पुरोहित धौम्यको आगे कर उनका अभिवादन किया और आचमन एवं पाद्यादिसे उनकी पूजा कर आसन प्रदान किया। उन तपस्वियोंके बैठनेपर विनयसे अवगत हो महाराज युधिष्ठिरने श्रीवेदव्यासजीसे कहा—

‘भगवन्! आपके प्रसादसे मैंने यह महान् राज्य प्राप्त किया तथा दुर्घोषनादिको परास्त किया। किंतु जैसे रोगीको सुख प्राप्त होनेपर भी वह सुख उसके लिये सुखकर नहीं होता, वैसे ही अपने बन्धु-बान्धवोंको मारकर यह राज्य-सुख मुझे प्रिय नहीं लग रहा है। जो आनन्द वनमें निवास करते हुए कन्द-मूल तथा फलोंके भक्षणसे प्राप्त होता है, वह सुख शत्रुओंको जीतकर सम्पूर्ण पृथ्वीका राज्य प्राप्त करनेपर भी नहीं होता। जो भीष्मपितामह हमारे गुरु, बन्धु, रक्षक, कल्याण और कवचस्वरूप थे, उन्हें भी मुझ-जैसे पापीने राज्यके लोभसे मार डाला। मैंने बहुत विवेकशून्य कार्य किया है। मेरा मन पाप-पङ्कमें लिस हो गया है। भगवन्! आप कृपाकर अपने ज्ञानरूपी जलसे मेरे अज्ञान तथा पाप-पङ्कको धोकर सर्वथा निर्मल बना दीजिये और अपने प्रज्ञारूपी दीपकसे मेरा धर्मरूपी मार्ग प्रशस्त कीजिये। धर्मके संरक्षक ये मुनिगण कृपाकर यहाँ आये हुए हैं। गङ्गापुत्र महाराज भीष्मपितामहसे मैंने

  • शिवं ध्यात्वा हरिं स्तुत्वा प्रणम्य परमेश्विनम्। चित्रभानुं च भानुं च नत्वा ग्रन्थमुदीरयेत् ॥ (उत्तरपर्व १।७)

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth