भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 394, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
उत्तरपर्व
महाराज युधिष्ठिरके पास व्यासादि महर्षियोंका आगमन एवं उनसे उपदेश करनेके लिये युधिष्ठिरकी प्रार्थना
कल्याणानि ददातु वो गणपतिर्यस्मिन्नतुष्टे सति क्षोदीयस्यपि कर्मणि प्रभवितुं ब्रह्मापि जिह्वायते । भजे यच्चरणारविन्दमसकृतसौभाग्यभाग्योदयै- स्तैनैषा जगति प्रसिद्धिर्मगमददेवेन्द्रलक्ष्मीरपि ॥ शश्रुत्युण्यहरिणयगभरसनासिंहासनाध्यासिनी सेयं वागधिदेवता वितरतु श्रेयांसि भूयांसि वः । यत्पादामलकोमलाङ्गुलिनखज्योत्स्नाभिरुद्भेत्तिलतः शब्दब्रह्मसुधाम्बुधिर्युधमनस्युच्छृङ्गुलं खेलेति ॥
(उत्तरपर्व १।१-२)
‘जिनकी प्रसन्नताके बिना ब्रह्मा भी एक क्षुद्रकार्यका सम्पादन नहीं कर सकते और जिनके चरणोंके एक बार आश्रय लेनेसे देवेन्द्रका भाग्य चमक उठा तथा उन्हें अखण्ड राजलक्ष्मीकी प्राप्ति हो गयी, वे भगवान् गणपतिदेव आपलोगोंका कल्याण करें। जो ब्रह्माके जिह्वाग्र-भागपर निरन्तर सिंहासनासीन रहती हैं और जिनके चरणनखकी चन्द्रकासे प्रकाशित होकर शब्दब्रह्मका समुद्र विद्वानोंके हृदयपर नृत्य करता है, वे भगवती सरस्वती आप सबका अनन्त कल्याण करें।’
भगवान् शंकरका ध्यान कर, भगवान् (विष्णु) कृष्णकी स्तुति कर और ब्रह्माजीको नमस्कार कर तथा सूर्यदेव एवं अग्निदेवको प्रणाम कर इस ग्रन्थका वाचन करना चाहिये*।
एक बार धर्मके पुत्र धर्मवेता महाराज युधिष्ठिरको देखनेके लिये व्यास, मार्कण्डेय, माण्डव्य, शाण्डिल्य, गौतम, शातातप, पराशर, भरद्वाज, शौनक, पुलस्त्य, पुलह तथा देवर्षि नारद आदि श्रेष्ठ ऋषिगण पधारे।
उन महान् तपस्वी एवं वेदवेदाङ्गपरांगत ऋषियोंको देखकर भक्तिमान् राजा युधिष्ठिरने अपने भाइयोंके साथ प्रसन्नचित्त हो सिंहासनसे उठकर भगवान् श्रीकृष्ण तथा पुरोहित धौम्यको आगे कर उनका अभिवादन किया और आचमन एवं पाद्यादिसे उनकी पूजा कर आसन प्रदान किया। उन तपस्वियोंके बैठनेपर विनयसे अवगत हो महाराज युधिष्ठिरने श्रीवेदव्यासजीसे कहा—
‘भगवन्! आपके प्रसादसे मैंने यह महान् राज्य प्राप्त किया तथा दुर्घोषनादिको परास्त किया। किंतु जैसे रोगीको सुख प्राप्त होनेपर भी वह सुख उसके लिये सुखकर नहीं होता, वैसे ही अपने बन्धु-बान्धवोंको मारकर यह राज्य-सुख मुझे प्रिय नहीं लग रहा है। जो आनन्द वनमें निवास करते हुए कन्द-मूल तथा फलोंके भक्षणसे प्राप्त होता है, वह सुख शत्रुओंको जीतकर सम्पूर्ण पृथ्वीका राज्य प्राप्त करनेपर भी नहीं होता। जो भीष्मपितामह हमारे गुरु, बन्धु, रक्षक, कल्याण और कवचस्वरूप थे, उन्हें भी मुझ-जैसे पापीने राज्यके लोभसे मार डाला। मैंने बहुत विवेकशून्य कार्य किया है। मेरा मन पाप-पङ्कमें लिस हो गया है। भगवन्! आप कृपाकर अपने ज्ञानरूपी जलसे मेरे अज्ञान तथा पाप-पङ्कको धोकर सर्वथा निर्मल बना दीजिये और अपने प्रज्ञारूपी दीपकसे मेरा धर्मरूपी मार्ग प्रशस्त कीजिये। धर्मके संरक्षक ये मुनिगण कृपाकर यहाँ आये हुए हैं। गङ्गापुत्र महाराज भीष्मपितामहसे मैंने
- शिवं ध्यात्वा हरिं स्तुत्वा प्रणम्य परमेश्विनम्। चित्रभानुं च भानुं च नत्वा ग्रन्थमुदीरयेत् ॥ (उत्तरपर्व १।७)
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