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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 395, कुल 654 में से

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पृष्ठ 395

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र और मोक्षशास्त्रका विस्तारसे श्रवण किया है। उन शान्तनुपुत्र भीष्मके स्वर्गलोक चले जानेपर अब श्रीकृष्ण और आप ही मैत्री एवं बन्धुताके कारण मेरे मार्गदर्शक हैं।'

व्यासजी बोले—राजन्! आपको करने योग्य सभी बातें मैंने, पितामह भीष्मने, महर्षि मार्कण्डेय, धौम्य और महामुनि लोमशने बता दी हैं। आप धर्मज्ञ, गुणी, मेधावी तथा धीमान् पुरुषोंके समान

हैं, धर्म और अधर्मके निश्चयमें कोई भी बात आपको अज्ञात नहीं है। हृषीकेश भगवान् श्रीकृष्णके यहाँ उपस्थित रहते हुए धर्मका उपदेश करनेका साहस कौन कर सकता है? क्योंकि ये ही संसारकी सृष्टि, स्थिति तथा पालन करते हैं एवं प्रत्यक्षदर्शी हैं। अतः ये ही आपको उपदेश करेंगे। इतना कहकर तथा पाण्डवोंकी पूजा ग्रहण कर बादरायण व्यासजी तपोवन चले गये। (अध्याय १)

भुवनकोशका संक्षिप्त वर्णन

महाराज युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! यह जगत् किसमें प्रतिष्ठित है? कहाँसे उत्पन्न होता है? इसका किसमें लय होता है? इस विश्वका हेतु क्या है? पृथ्वीपर कितने द्वीप, समुद्र तथा कुलाचल हैं? पृथिवीका कितना प्रमाण है? कितने भुवन हैं? इन सबका आप वर्णन करें।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! आपने जो पूछा है, वह सब पुराणका विषय है, किंतु संसारमें घूमते हुए मैंने जैसा सुना और जो अनुभव किया है, उनका संक्षेपमें मैं वर्णन करता हूँ। सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित—इन पाँच लक्षणोंसे समन्वित पुराण कहा जाता है*।

अनघ! आपका प्रश्न इन पाँच लक्षणोंमेंसे सर्ग (सृष्टि)-के प्रति ही विशेषरूपसे सम्बद्ध है, इसलिये इसका मैं संक्षेपमें वर्णन करता हूँ।

अव्यक्त-प्रकृतिसे महत्त्व-बुद्धि उत्पन्न हुई। महत्त्वसे त्रिगुणात्मक अहंकार उत्पन्न हुआ, अहंकारसे पञ्चतन्मात्रा, पञ्चतन्मात्राओंसे पाँच महाभूत और इन भूतोंसे चराचर जगत् उत्पन्न हुआ है। स्थावर-जङ्गमात्मक अर्थात् चराचर जगत्के नष्ट होनेपर जलमूर्तिमय विष्णु रह जाते हैं अर्थात् सर्वत्र जल परिव्याप्त रहता है, उससे भूतात्मक

अण्ड उत्पन्न हुआ। कुछ समयके बाद उस अण्डके दो भाग हो गये। उसमें एक खण्ड पृथिवी और दूसरा भाग आकाश हुआ। उसमें जरायुसे मेरु आदि पर्वत हुए। नाडियोंसे नदी आदि हुई। मेरु पर्वत सोलह हजार योजन भूमिके अंदर प्रविष्ट हैं और चौरासी हजार योजन भूमिके ऊपर हैं, बत्तीस हजार योजन मेरुके शिखरका विस्तार है। कमलस्वरूप भूमिकी कर्णिका मेरु है। उस अण्डसे आदिदेवता आदित्य उत्पन्न हुए, जो प्रातःकालमें ब्रह्मा, मध्याह्नमें विष्णु और सायंकालमें रुद्ररूपसे अवस्थित रहते हैं। एक आदित्य ही तीन रूपोंको धारण करते हैं। ब्रह्मासे मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वसिष्ठ और नारद—ये नौ मानस-पुत्र उत्पन्न हुए। पुराणोंमें इन्हें ब्रह्मपुत्र कहा गया है। ब्रह्माके दक्षिण अँगूठेसे दक्ष उत्पन्न हुए और बायें अँगूठेसे प्रसूति उत्पन्न हुई। दोनों दम्पति अँगूठेसे ही उत्पन्न हुए। उन दोनोंसे उत्पन्न हर्यश्च आदि पुत्रोंको देवर्षि नारदने सृष्टिके लिये उद्यत होनेपर भी सृष्टिसे विरत कर दिया। प्रजापति दक्षने अपने पुत्र हर्यश्चोंको सृष्टिसे विमुख देखकर सत्या आदि नामवाली साठ कन्याओंको उत्पन्न किया और उनमेंसे उन्होंने दस धर्मको, तेरह कश्यपको,

  • सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च। वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ॥ (उत्तरपर्व २।११)

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