भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 384, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
३७३
हो गये। उषापति भगवान् अनिरुद्धने प्रसन्न हो उन दोनोंका अभिषेक कर महत्त्वमें प्रतिष्ठित किया। उस दिनसे उन लोगोंकी भूतलमें 'महत्त्व' पदवी हो गयी। दोनों गुरुभाइयों (महाप्रभु और नित्यानन्द) ने प्रसन्न होकर अपने शिष्योंसे कहा— 'जो यहाँ—जगन्नाथजीमें पद्मनाभि उषापति भगवान् जगन्नाथजीका दर्शन करेगा, वह स्वर्ग प्राप्त करेगा। जो यहाँके प्रसादको सादर ग्रहण करेगा, वह करोड़ जन्मतक वेदज्ञ एवं धनाढ्य द्विज होगा। मार्कण्डेयवटके पास कृष्णका दर्शन कर जो महान् इन्द्रद्युम्नसरमें स्नान करता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। श्रद्धा-भक्तिके साथ जो इस कथाको सुनेगा वह भी जगन्नाथपुरीमें जानेका फल प्राप्त कर लेगा।'
महाप्रभु चैतन्यने इस प्रकार भगवान् जगन्नाथकी महिमा बतलाई। भगवान् जगन्नाथने भी 'यज्ञांश-महाप्रभुकी बातें ठीक हैं' ऐसा कहा और वे वहाँ अन्तर्धान हो गये।
इसी बीचमें कलिन बलिसे प्रार्थना की। तब दुःखित हो बलिन मय दैत्यको बुलाकर कहा— 'दैत्येन्द्र! सुकन्दर नामक म्लेच्छपति हमलोगोंकी उन्नतिके लिये सदा तत्पर है। मेरी आज्ञाके अनुसार तुम उसकी सहायता करो।' बलिकी बात सुनकर ज्योतिर्विद्याविशारद वह दानव मय एक सौ दैत्योंके साथ कर्मभूमिमें आया और उसने दुष्ट म्लेच्छजातिको ज्योतिर्गणितसहित इक्कीस अध्यायवाले रेखागणितकी शिक्षा दी। तब ज्योतिर्विद्यामें पारङ्गत होकर उन म्लेच्छोंने सातों पुरियोंमें यन्त्रोंका निर्माण कराया। उन यन्त्रोंके प्रभावसे वहाँ जो लोग थे, वे सब म्लेच्छत्वको प्राप्त हो गये।
यह आदर्श देखकर सभी आर्य बहुत दुःखी
हुए, सर्वत्र महान् कोलाहल और हाहाकार मच गया। वह करुणक्रन्दन सुनकर कृष्णचैतन्यके सेवक सभी वैष्णव गुरुके दिव्य मन्त्रको ग्रहणकर म्लेच्छोंको निष्प्रभावी करनेके लिये अलग-अलग पुरियों आदि स्थानोंकी ओर चले गये। रामानन्द शिष्योंके साथ अयोध्या आ गये और उन्होंने म्लेच्छयन्त्रको उलटकर वहाँपर सभीको वैष्णव बना दिया। ललाटपर त्रिशूलके समान श्रीचिह्न बन गया, जो श्वेत-रक्तमय हुआ। कण्ठमें तुलसीकी माला और जिह्वा राममय हो गयी। इस प्रकार वे सभी म्लेच्छ रामानन्दके प्रभावसे वैष्णव हो गये*। वे संयोगी वैष्णव कहलाये। शेष आर्य मुख्य वैष्णवरूपमें अयोध्यामें स्थित हुए। बुद्धिमान् निम्बादित्य अपने शिष्योंके साथ काञ्चिकापुरी चले गये। वहाँ उन्होंने राजमार्गमें स्थित म्लेच्छयन्त्रको देखा। अपने गुरुके मन्त्रको विलोम करके वे वहाँ रहने लगे, जिससे म्लेच्छयन्त्र प्रभावशून्य हो गया। वे ललाटपर वंशपत्रके समान ऊर्ध्वरेखा, कण्ठमें माला और मुखमें गोपीवल्लभके मन्त्रसे सुशोभित हुए। उनके पास उपस्थित सभी म्लेच्छ वैष्णव हो गये और वे संयोगी वैष्णव कहलाये, शेष सभी आर्य वैष्णवमार्गके अनुयायी हो गये। अपने गणोंके साथ विष्णुस्वामी हरिद्वार गये। वहाँ स्थित म्लेच्छोंके महायन्त्रको उन्होंने विलोम कर दिया और जो लोग सेवामें आये वे सब-के-सब वैष्णव हो गये। ललाटमें दो रेखाओंसे समन्वित ऊर्ध्वपुण्ड्र और मध्यमें बिन्दु, कण्ठमें तुलसीगोलक और मुखमें कल्याणकारक माधवके मन्त्रसे सुशोभित होकर रहने लगे।
विष्णुभक्त मध्वाचार्य मथुरामें आये और उन्होंने राजमार्गमें स्थित म्लेच्छयन्त्रोंको देखकर विलोम
- इसका आशय सिकन्दर लोदीके द्वारा बलात् धर्मपरिवर्तित भारतीयोंको आचार्य रामानन्द तथा चैतन्यमहाप्रभुद्वारा पुनः शुद्धिपूर्वक सनातन हिन्दू बनानेमें है। जैसा कि इन लोगोंके ग्रन्थोंमें सनातन गोस्वामी आदिकी जीवनियोंसे स्पष्ट है। पीछे स्वामी दयानन्दने भी इसीका अनुसरण किया।
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth