भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

कर दिया। उनके समीप जो लोग आये, वे उनके पक्षगामी वैष्णव हो गये। उनके ललाटमें नासाधैके आधे भागतकर करवीरपत्रके समान शुभ तिलक, कण्ठमें तुलसीकी माला और मुखमें राधाकृष्णका शुभ नाम विराजमान था। शैवमार्गपरायण शंकराचार्य* भी रामानुजकी आज्ञासे अपने गणोंके साथ काशीपुरी आ गये। म्लेच्छयन्त्रको विलोम करके उनके अन्तर्गत आये सभी शैव हुए। इनके भालपर त्रिपुण्ड्र और कण्ठमें रुद्राक्षकी माला तथा मुखमें गोविन्दमन्त्र विराजमान था। रामानुज तोतादरी—तोताद्विमें जाकर सुखी हो गये। उस समय उनके ललाटमें दो ऊर्ध्वरेखाओंके बीचमें पीतिकावर्णकी सूक्ष्म रेखा और कण्ठमें तुलसीमाला विराजमान थी। गुणवान् वराहमिहिर उज्जयिनी आये और उन्होंने वहाँपर म्लेच्छयन्त्रोंको निष्फलकर सभी लोगोंको शैव बना लिया। उनके ललाटमें चिताभस्म, कण्ठमें रुद्राक्षकी माला और 'शिव' यह मङ्गलनाम मुखमें विराजमान हुआ। वाणीभूषण कन्याकुब्ज—कान्यकुब्जमें आये। अर्धचन्द्राकार पुण्ड्र, रक्त चन्दनकी माला और देवीका निर्मल नाम उनके मुखमें विराजमान था। धन्वन्तरिने प्रयागमें आकर म्लेच्छयन्त्रको विलोम कर दिया। जो उनके संनिकट आये, वे उनके

अनुयायी होकर ललाटपर अर्धपुण्ड्र और रक्तबिन्दुको धारण करनेवाले हुए। उनके कण्ठमें रक्त चन्दनकी मालाएँ शोभायमान हुईं। धीमान् भट्टोजि श्रेष्ठ उत्पलारण्य गये। इन्होंने मस्तकपर लाल त्रिपुण्ड्र और कण्ठमें रुद्राक्षकी माला धारण की एवं विश्वनाथ नामका सदा जप करने लगे। रोपण भी इष्टिका (एटा) आये। वहाँ उन्होंने म्लेच्छयन्त्रको निष्फलकर जन-जनमें ब्रह्ममार्गका प्रदर्शन किया। इसी प्रकार विष्णुभक्त जयदेव द्वारकामें आये, इससे वहाँपर उन म्लेच्छोंका यन्त्र निष्फल हो गया। उनके जो अनुयायी हुए उनके मस्तकपर एक लाल रेखा, कण्ठमें पद्माक्ष—कमलगट्टेकी माला और जिह्वापर 'गोविन्द' नाम विराजमान हुआ।

इस प्रकार वैष्णव, शैव और शाक्त अनेक संख्यामें हो गये। शाक्त निर्गुण थे और वैष्णव सगुण। जो निर्गुण और सगुण थे, वे शैव कहलाये। नित्यानन्द शान्तिपुरमें, नदीहापत्तन—नदियामें हरि, मागध (मगहर देश)—में कबीर, कलिंजरमें रैदास और सधन (सदन) नैमिषारण्यमें समाधिस्थ हो गये। आज भी यहाँ वैष्णवोंका महान् समुदाय वर्तमान है। इस प्रकारसे मय आदि दैत्य भी निष्फल होकर बलिके पास चले गये। (अध्याय २१)

अकबर आदि अन्तिम मुगल शासकोंका चरित्र; तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई, तानसेन तथा बीरबल आदिके पूर्वजन्मोंका वृत्तान्त; गुरुण्ड, मौन और सर्वत्र म्लेच्छराज्यका विस्तार

सूतजी बोले—शौनक! इस प्रकार दैत्योंने बलिके पास जाकर अपनी पराजयका वृत्तान्त बतलाया। दैत्यराज बलिने देवताओंकी महान् विजय सुनकर रोषण नामक दैत्येन्द्रको बुलाकर कहा—'तुम तिमिरलिङ्ग (तैमूरलंग)—के पुत्र होकर

सरुष नामसे प्रसिद्ध होगे। अतः तुम वहाँ जाकर दैत्योंके श्रेष्ठ कार्यका सम्पादन करो। इसपर उसने क्रुद्ध हो देहली आकर वेदमार्गस्थ पुरुषोंका नाश करना शुरू कर दिया। उसने पाँच वर्षतक राज्य किया। उसीका पुत्र बाबर हुआ, बीस वर्षतक

  • यहाँ आदिशंकराचार्य आदि आचार्यगण अभिप्रेत न होकर कोई तत्कालीन शंकर आदि नामवाले महात्मा इष्ट प्रतीत होते हैं।

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