भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
प्रसन्न किया। बारह वर्षकी अवस्थावाले उन लोगोंको भक्तवत्सला शारदादेवीने अपनी कन्याएँ प्रदान कीं। वे क्रमशः उपाध्यायी, दीक्षिता, पाठकी, शुक्लिका, मिश्राणी, अग्निहोत्रिणी, द्विवेदिनी, त्रिवेदिनी, पाण्डुयायनी और चतुर्वेदिनी कहलाईं। फिर उन कन्याओंके भी अपने-अपने पतिसे सोलह-सोलह पुत्र हुए। वे सब गोत्रकार हुए। जिनका नाम इस प्रकार है—कश्यप, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि, वसिष्ठ, वत्स, गौतम, पराशर, गर्ग, अत्रि, भृगु, अंगिरा, शृंगी, कात्यायन और याज्ञवल्क्य। इन नामोंसे सोलह-सोलह पुत्र जाने जाते हैं।
सरस्वतीकी आज्ञासे महर्षि कण्व मिक्षदेश आ गये और वहाँ दस हजार म्लेच्छोंको संस्कृत पढ़ाकर अपने वशमें कर लिया तथा स्वयं श्रेष्ठ ब्रह्मवर्तमें आ गये। उन लोगोंने सरस्वतीदेवीको तपस्यासे संतुष्ट किया। पाँच वर्षके बाद सरस्वतीदेवी प्रकट हुई और सपत्नीक उन म्लेच्छोंको शूद्रवर्णका बना दिया। वे सब कारुवृत्ति करनेवाले (शिल्पी) अनेक पुत्रोंसे समन्वित हुए। उनके मध्यमें दो हजार वैश्य हुए। उनके मध्यमें आचार्य पृथु नामका कश्यपसेवक था। उसने बारह वर्षतक तपस्याद्वारा महामुनिको संतुष्ट किया। महर्षि कण्वने प्रसन्न हो देवताओंके वरसे उन्हें क्षत्रिय राजा बनाया और उन्हें राजपुत्रपुर प्रदान किया। राजन्या नामकी उनकी पत्नी मागध नामक पुत्रको जन्म दिया। उनको कण्वने पूर्व दिशामें मागध देश दिया। तदनन्तर कश्यपपुत्र काश्यप स्वर्गलोक चले गये। उनके स्वर्ग चले जानेपर शूद्रवर्णवाले उन म्लेच्छोंने यज्ञोद्वारा देवाधिदेव शचीपति इन्द्रकी अर्चना की। इससे दुःखी होकर इन्द्र अपने बन्धुके साथ अपने अंशसे पुनः ब्रह्मयोनिमें पृथ्वीमें उत्पन्न हुए।
जिन नामका कोई विप्र था और उसकी पत्नीका
नाम था जयनी। वे दोनों कश्यपद्वारा अदितिसे कीकटदेशमें उत्पन्न हुए थे। उनके द्वारा लोककल्याणके लिये आदित्य उत्पन्न हुए। कर्मनाशा* नदीके तटपर बोधगया नामक एक नगरी है। वहाँपर उन्होंने बौद्धशास्त्रसे समन्वित हो शास्त्रार्थ किया और शूद्रोंसे वेदको ग्रहणकर विशाला (बदरीक्षेत्र) नगरी चले गये और वहाँ समाधिस्थ मुनियोंको जगाकर उन्हें वेद प्रदान किया। तभीसे सभी देवगण भूतलको छोड़कर स्वर्ग चले गये। म्लेच्छगण बौद्ध हो गये और शेष सभी वेदपरायण हो गये।
सरस्वतीकी कृपासे उन आर्योंकी संख्या बहुत बढ़ गयी। उन लोगोंने देवताओं और पितरोंको हव्य तथा कव्य समर्पित किया। इस प्रकार सभी लोग देवोपासनाद्वारा देवताओंको तृप्त करने लगे। सताईस सौ वर्ष कलियुगके बीतनेपर बलिके द्वारा प्रेषित मय नामका महान् असुर भूमिपर आया। वह अनेक मायाओंका प्रवर्तक शाक्यसिंह गुरुके नामसे प्रसिद्ध हुआ तथा गौतमाचार्य नामसे दैत्यपक्षको बढ़ानेवाला हुआ। उसने सभी तीर्थोंपर मायामय यन्त्रोंको स्थापित किया। उसके नीचे जो जाता वह बौद्ध हो जाता। फलतः चारों ओर बौद्ध परिव्याप्त हो गये। प्रायः दस करोड़के लगभग आर्य बौद्धधर्मावलम्बी हो गये। शेष पाँच लाख पर्वतशिखरपर चले गये। अग्निवंशमें उत्पन्न राजाओंने चतुर्वेदके प्रभावसे बौद्धोंको पराजित किया और आर्योंको सुसंस्कृतकर विन्ध्यपर्वतके दक्षिणमें स्थापित किया तथा विन्ध्यके उत्तरकी पुण्यभूमि आर्यावर्तमें पाँच लाख लोग अवस्थित हुए।
सूतजीने पुनः कहा—शौनक! चैतन्यमहाप्रभु भगवान् जगन्नाथकी वाणीको सुनकर उनके शिष्य हो गये और वेदमार्गपरायण हो गये। वे शुक्लदत्तके पुत्र स्वामी नित्यानन्दको पाकर अत्यन्त प्रसन्न हुए। वे भी जगन्नाथपदको नमस्कार कर उनके शिष्य
- बोधगया फल्गु नदीके तटपर स्थित है। कर्मनाशा आजकल रोहतास, गाजीपुर, भोजपुर और बनारस जिलेकी सीमा निर्धारित करती है।
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