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भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

प्रसन्न किया। बारह वर्षकी अवस्थावाले उन लोगोंको भक्तवत्सला शारदादेवीने अपनी कन्याएँ प्रदान कीं। वे क्रमशः उपाध्यायी, दीक्षिता, पाठकी, शुक्लिका, मिश्राणी, अग्निहोत्रिणी, द्विवेदिनी, त्रिवेदिनी, पाण्डुयायनी और चतुर्वेदिनी कहलाईं। फिर उन कन्याओंके भी अपने-अपने पतिसे सोलह-सोलह पुत्र हुए। वे सब गोत्रकार हुए। जिनका नाम इस प्रकार है—कश्यप, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि, वसिष्ठ, वत्स, गौतम, पराशर, गर्ग, अत्रि, भृगु, अंगिरा, शृंगी, कात्यायन और याज्ञवल्क्य। इन नामोंसे सोलह-सोलह पुत्र जाने जाते हैं।

सरस्वतीकी आज्ञासे महर्षि कण्व मिक्षदेश आ गये और वहाँ दस हजार म्लेच्छोंको संस्कृत पढ़ाकर अपने वशमें कर लिया तथा स्वयं श्रेष्ठ ब्रह्मवर्तमें आ गये। उन लोगोंने सरस्वतीदेवीको तपस्यासे संतुष्ट किया। पाँच वर्षके बाद सरस्वतीदेवी प्रकट हुई और सपत्नीक उन म्लेच्छोंको शूद्रवर्णका बना दिया। वे सब कारुवृत्ति करनेवाले (शिल्पी) अनेक पुत्रोंसे समन्वित हुए। उनके मध्यमें दो हजार वैश्य हुए। उनके मध्यमें आचार्य पृथु नामका कश्यपसेवक था। उसने बारह वर्षतक तपस्याद्वारा महामुनिको संतुष्ट किया। महर्षि कण्वने प्रसन्न हो देवताओंके वरसे उन्हें क्षत्रिय राजा बनाया और उन्हें राजपुत्रपुर प्रदान किया। राजन्या नामकी उनकी पत्नी मागध नामक पुत्रको जन्म दिया। उनको कण्वने पूर्व दिशामें मागध देश दिया। तदनन्तर कश्यपपुत्र काश्यप स्वर्गलोक चले गये। उनके स्वर्ग चले जानेपर शूद्रवर्णवाले उन म्लेच्छोंने यज्ञोद्वारा देवाधिदेव शचीपति इन्द्रकी अर्चना की। इससे दुःखी होकर इन्द्र अपने बन्धुके साथ अपने अंशसे पुनः ब्रह्मयोनिमें पृथ्वीमें उत्पन्न हुए।

जिन नामका कोई विप्र था और उसकी पत्नीका

नाम था जयनी। वे दोनों कश्यपद्वारा अदितिसे कीकटदेशमें उत्पन्न हुए थे। उनके द्वारा लोककल्याणके लिये आदित्य उत्पन्न हुए। कर्मनाशा* नदीके तटपर बोधगया नामक एक नगरी है। वहाँपर उन्होंने बौद्धशास्त्रसे समन्वित हो शास्त्रार्थ किया और शूद्रोंसे वेदको ग्रहणकर विशाला (बदरीक्षेत्र) नगरी चले गये और वहाँ समाधिस्थ मुनियोंको जगाकर उन्हें वेद प्रदान किया। तभीसे सभी देवगण भूतलको छोड़कर स्वर्ग चले गये। म्लेच्छगण बौद्ध हो गये और शेष सभी वेदपरायण हो गये।

सरस्वतीकी कृपासे उन आर्योंकी संख्या बहुत बढ़ गयी। उन लोगोंने देवताओं और पितरोंको हव्य तथा कव्य समर्पित किया। इस प्रकार सभी लोग देवोपासनाद्वारा देवताओंको तृप्त करने लगे। सताईस सौ वर्ष कलियुगके बीतनेपर बलिके द्वारा प्रेषित मय नामका महान् असुर भूमिपर आया। वह अनेक मायाओंका प्रवर्तक शाक्यसिंह गुरुके नामसे प्रसिद्ध हुआ तथा गौतमाचार्य नामसे दैत्यपक्षको बढ़ानेवाला हुआ। उसने सभी तीर्थोंपर मायामय यन्त्रोंको स्थापित किया। उसके नीचे जो जाता वह बौद्ध हो जाता। फलतः चारों ओर बौद्ध परिव्याप्त हो गये। प्रायः दस करोड़के लगभग आर्य बौद्धधर्मावलम्बी हो गये। शेष पाँच लाख पर्वतशिखरपर चले गये। अग्निवंशमें उत्पन्न राजाओंने चतुर्वेदके प्रभावसे बौद्धोंको पराजित किया और आर्योंको सुसंस्कृतकर विन्ध्यपर्वतके दक्षिणमें स्थापित किया तथा विन्ध्यके उत्तरकी पुण्यभूमि आर्यावर्तमें पाँच लाख लोग अवस्थित हुए।

सूतजीने पुनः कहा—शौनक! चैतन्यमहाप्रभु भगवान् जगन्नाथकी वाणीको सुनकर उनके शिष्य हो गये और वेदमार्गपरायण हो गये। वे शुक्लदत्तके पुत्र स्वामी नित्यानन्दको पाकर अत्यन्त प्रसन्न हुए। वे भी जगन्नाथपदको नमस्कार कर उनके शिष्य

  • बोधगया फल्गु नदीके तटपर स्थित है। कर्मनाशा आजकल रोहतास, गाजीपुर, भोजपुर और बनारस जिलेकी सीमा निर्धारित करती है।

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  • प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *

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हो गये। उषापति भगवान् अनिरुद्धने प्रसन्न हो उन दोनोंका अभिषेक कर महत्त्वमें प्रतिष्ठित किया। उस दिनसे उन लोगोंकी भूतलमें 'महत्त्व' पदवी हो गयी। दोनों गुरुभाइयों (महाप्रभु और नित्यानन्द) ने प्रसन्न होकर अपने शिष्योंसे कहा— 'जो यहाँ—जगन्नाथजीमें पद्मनाभि उषापति भगवान् जगन्नाथजीका दर्शन करेगा, वह स्वर्ग प्राप्त करेगा। जो यहाँके प्रसादको सादर ग्रहण करेगा, वह करोड़ जन्मतक वेदज्ञ एवं धनाढ्य द्विज होगा। मार्कण्डेयवटके पास कृष्णका दर्शन कर जो महान् इन्द्रद्युम्नसरमें स्नान करता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। श्रद्धा-भक्तिके साथ जो इस कथाको सुनेगा वह भी जगन्नाथपुरीमें जानेका फल प्राप्त कर लेगा।'

महाप्रभु चैतन्यने इस प्रकार भगवान् जगन्नाथकी महिमा बतलाई। भगवान् जगन्नाथने भी 'यज्ञांश-महाप्रभुकी बातें ठीक हैं' ऐसा कहा और वे वहाँ अन्तर्धान हो गये।

इसी बीचमें कलिन बलिसे प्रार्थना की। तब दुःखित हो बलिन मय दैत्यको बुलाकर कहा— 'दैत्येन्द्र! सुकन्दर नामक म्लेच्छपति हमलोगोंकी उन्नतिके लिये सदा तत्पर है। मेरी आज्ञाके अनुसार तुम उसकी सहायता करो।' बलिकी बात सुनकर ज्योतिर्विद्याविशारद वह दानव मय एक सौ दैत्योंके साथ कर्मभूमिमें आया और उसने दुष्ट म्लेच्छजातिको ज्योतिर्गणितसहित इक्कीस अध्यायवाले रेखागणितकी शिक्षा दी। तब ज्योतिर्विद्यामें पारङ्गत होकर उन म्लेच्छोंने सातों पुरियोंमें यन्त्रोंका निर्माण कराया। उन यन्त्रोंके प्रभावसे वहाँ जो लोग थे, वे सब म्लेच्छत्वको प्राप्त हो गये।

यह आदर्श देखकर सभी आर्य बहुत दुःखी

हुए, सर्वत्र महान् कोलाहल और हाहाकार मच गया। वह करुणक्रन्दन सुनकर कृष्णचैतन्यके सेवक सभी वैष्णव गुरुके दिव्य मन्त्रको ग्रहणकर म्लेच्छोंको निष्प्रभावी करनेके लिये अलग-अलग पुरियों आदि स्थानोंकी ओर चले गये। रामानन्द शिष्योंके साथ अयोध्या आ गये और उन्होंने म्लेच्छयन्त्रको उलटकर वहाँपर सभीको वैष्णव बना दिया। ललाटपर त्रिशूलके समान श्रीचिह्न बन गया, जो श्वेत-रक्तमय हुआ। कण्ठमें तुलसीकी माला और जिह्वा राममय हो गयी। इस प्रकार वे सभी म्लेच्छ रामानन्दके प्रभावसे वैष्णव हो गये*। वे संयोगी वैष्णव कहलाये। शेष आर्य मुख्य वैष्णवरूपमें अयोध्यामें स्थित हुए। बुद्धिमान् निम्बादित्य अपने शिष्योंके साथ काञ्चिकापुरी चले गये। वहाँ उन्होंने राजमार्गमें स्थित म्लेच्छयन्त्रको देखा। अपने गुरुके मन्त्रको विलोम करके वे वहाँ रहने लगे, जिससे म्लेच्छयन्त्र प्रभावशून्य हो गया। वे ललाटपर वंशपत्रके समान ऊर्ध्वरेखा, कण्ठमें माला और मुखमें गोपीवल्लभके मन्त्रसे सुशोभित हुए। उनके पास उपस्थित सभी म्लेच्छ वैष्णव हो गये और वे संयोगी वैष्णव कहलाये, शेष सभी आर्य वैष्णवमार्गके अनुयायी हो गये। अपने गणोंके साथ विष्णुस्वामी हरिद्वार गये। वहाँ स्थित म्लेच्छोंके महायन्त्रको उन्होंने विलोम कर दिया और जो लोग सेवामें आये वे सब-के-सब वैष्णव हो गये। ललाटमें दो रेखाओंसे समन्वित ऊर्ध्वपुण्ड्र और मध्यमें बिन्दु, कण्ठमें तुलसीगोलक और मुखमें कल्याणकारक माधवके मन्त्रसे सुशोभित होकर रहने लगे।

विष्णुभक्त मध्वाचार्य मथुरामें आये और उन्होंने राजमार्गमें स्थित म्लेच्छयन्त्रोंको देखकर विलोम

  • इसका आशय सिकन्दर लोदीके द्वारा बलात् धर्मपरिवर्तित भारतीयोंको आचार्य रामानन्द तथा चैतन्यमहाप्रभुद्वारा पुनः शुद्धिपूर्वक सनातन हिन्दू बनानेमें है। जैसा कि इन लोगोंके ग्रन्थोंमें सनातन गोस्वामी आदिकी जीवनियोंसे स्पष्ट है। पीछे स्वामी दयानन्दने भी इसीका अनुसरण किया।

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

कर दिया। उनके समीप जो लोग आये, वे उनके पक्षगामी वैष्णव हो गये। उनके ललाटमें नासाधैके आधे भागतकर करवीरपत्रके समान शुभ तिलक, कण्ठमें तुलसीकी माला और मुखमें राधाकृष्णका शुभ नाम विराजमान था। शैवमार्गपरायण शंकराचार्य* भी रामानुजकी आज्ञासे अपने गणोंके साथ काशीपुरी आ गये। म्लेच्छयन्त्रको विलोम करके उनके अन्तर्गत आये सभी शैव हुए। इनके भालपर त्रिपुण्ड्र और कण्ठमें रुद्राक्षकी माला तथा मुखमें गोविन्दमन्त्र विराजमान था। रामानुज तोतादरी—तोताद्विमें जाकर सुखी हो गये। उस समय उनके ललाटमें दो ऊर्ध्वरेखाओंके बीचमें पीतिकावर्णकी सूक्ष्म रेखा और कण्ठमें तुलसीमाला विराजमान थी। गुणवान् वराहमिहिर उज्जयिनी आये और उन्होंने वहाँपर म्लेच्छयन्त्रोंको निष्फलकर सभी लोगोंको शैव बना लिया। उनके ललाटमें चिताभस्म, कण्ठमें रुद्राक्षकी माला और 'शिव' यह मङ्गलनाम मुखमें विराजमान हुआ। वाणीभूषण कन्याकुब्ज—कान्यकुब्जमें आये। अर्धचन्द्राकार पुण्ड्र, रक्त चन्दनकी माला और देवीका निर्मल नाम उनके मुखमें विराजमान था। धन्वन्तरिने प्रयागमें आकर म्लेच्छयन्त्रको विलोम कर दिया। जो उनके संनिकट आये, वे उनके

अनुयायी होकर ललाटपर अर्धपुण्ड्र और रक्तबिन्दुको धारण करनेवाले हुए। उनके कण्ठमें रक्त चन्दनकी मालाएँ शोभायमान हुईं। धीमान् भट्टोजि श्रेष्ठ उत्पलारण्य गये। इन्होंने मस्तकपर लाल त्रिपुण्ड्र और कण्ठमें रुद्राक्षकी माला धारण की एवं विश्वनाथ नामका सदा जप करने लगे। रोपण भी इष्टिका (एटा) आये। वहाँ उन्होंने म्लेच्छयन्त्रको निष्फलकर जन-जनमें ब्रह्ममार्गका प्रदर्शन किया। इसी प्रकार विष्णुभक्त जयदेव द्वारकामें आये, इससे वहाँपर उन म्लेच्छोंका यन्त्र निष्फल हो गया। उनके जो अनुयायी हुए उनके मस्तकपर एक लाल रेखा, कण्ठमें पद्माक्ष—कमलगट्टेकी माला और जिह्वापर 'गोविन्द' नाम विराजमान हुआ।

इस प्रकार वैष्णव, शैव और शाक्त अनेक संख्यामें हो गये। शाक्त निर्गुण थे और वैष्णव सगुण। जो निर्गुण और सगुण थे, वे शैव कहलाये। नित्यानन्द शान्तिपुरमें, नदीहापत्तन—नदियामें हरि, मागध (मगहर देश)—में कबीर, कलिंजरमें रैदास और सधन (सदन) नैमिषारण्यमें समाधिस्थ हो गये। आज भी यहाँ वैष्णवोंका महान् समुदाय वर्तमान है। इस प्रकारसे मय आदि दैत्य भी निष्फल होकर बलिके पास चले गये। (अध्याय २१)

अकबर आदि अन्तिम मुगल शासकोंका चरित्र; तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई, तानसेन तथा बीरबल आदिके पूर्वजन्मोंका वृत्तान्त; गुरुण्ड, मौन और सर्वत्र म्लेच्छराज्यका विस्तार

सूतजी बोले—शौनक! इस प्रकार दैत्योंने बलिके पास जाकर अपनी पराजयका वृत्तान्त बतलाया। दैत्यराज बलिने देवताओंकी महान् विजय सुनकर रोषण नामक दैत्येन्द्रको बुलाकर कहा—'तुम तिमिरलिङ्ग (तैमूरलंग)—के पुत्र होकर

सरुष नामसे प्रसिद्ध होगे। अतः तुम वहाँ जाकर दैत्योंके श्रेष्ठ कार्यका सम्पादन करो। इसपर उसने क्रुद्ध हो देहली आकर वेदमार्गस्थ पुरुषोंका नाश करना शुरू कर दिया। उसने पाँच वर्षतक राज्य किया। उसीका पुत्र बाबर हुआ, बीस वर्षतक

  • यहाँ आदिशंकराचार्य आदि आचार्यगण अभिप्रेत न होकर कोई तत्कालीन शंकर आदि नामवाले महात्मा इष्ट प्रतीत होते हैं।

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  • प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *

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उसने राज्य किया। (कुछ वर्ष समरकन्दमें और कुछ दिन भारतमें।) उसका पुत्र होमायु (हुमार्यूँ) हुआ। मदान्ध होमायुने देवताओंका निरादर किया। तब देवताओंने नदीहाके उपवनमें स्थित कृष्णचैतन्यकी स्तुति की। स्तुति सुनकर हरि क्रुद्ध हुए और उन्होंने अपने तेजसे उसके राज्यमें विघ्न उत्पन्न किया। उनके सैन्योद्धार होमायुका पराजय हुआ। उस समय शेषशाक (शेरशाह) -ने रमणीय देहली नगरमें आकर पाँच वर्षतक अत्यन्त कुशलतापूर्वक राज्य किया। उन्हीं दिनोंकी बात है, शंकराचार्यके गोत्रमें उत्पन्न मुकुन्द नामक एक श्रेष्ठ ब्राह्मण अपने बीस शिष्योंके साथ प्रयागमें तप कर रहा था। 'म्लेच्छराज बाबरके द्वारा देवताओंकी प्रतिमाओं आदिको नष्ट-भ्रष्ट कर दिया गया है' यह जानकर ब्राह्मण मुकुन्दने दुःखी होकर अग्निये अपने प्राणोंकी आहुति दे दी। उसके बीस शिष्योंने भी गुरुके मार्गका ही अनुगमन किया। किसी समय ब्राह्मण मुकुन्दने गौके दूधके साथ गौके रोमका भी पान कर लिया था, इसी दोषके कारण वह दूसरे जन्ममें म्लेच्छयोनिमें उत्पन्न हुआ। जब हुमार्यू कश्मीर (अपने भाई मकरानके यहाँ काबुल-कश्मीरकी सीमा)-में निवास कर रहा था, तब उसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ और उसी समय यह आकाशवाणी हुई कि 'तुम्हारा पुत्र बड़ा प्रतापी और भाग्यशाली होगा। यह अकस्मात् (अक) प्राप्त वर (वरदान)-से उत्पन्न हुआ है, अतः इसका नाम 'अकबर' होगा और यह म्लेच्छ या पिशाचोंके मार्गका अनुसरण नहीं करेगा। यह श्रीधर, श्रीपति, शम्भु, वरेण्य, मधुव्रती, विमल, देववान्, सोम, वर्धन, वर्तक, रुचि, मान्धाता, मानकारी, केशव, माधव, मधु, देवापि, सोमपा, सूर तथा मदन—ये बीस जिसके शिष्य हैं, वही पूर्वजन्मका मुकुन्द ब्राह्मण भाग्यवश

तुम्हारे घरमें इस रूपमें आया है।'

ऐसी आकाशवाणी सुनकर प्रसन्नचित्त हुमार्यूने भूखसे पीड़ित व्यक्तियोंको दान दिया और प्रेमपूर्वक पुत्रका पालन किया। पुत्रकी दस वर्षकी अवस्था होनेपर वह देहलीमें आया और शेषशाकको पराजित कर वहाँका राजा हो गया। उसने एक वर्ष राज्य किया और बादमें उसका पुत्र अकबर राजा हुआ।

अकबर (मुकुन्द ब्राह्मण)-के राज्यप्राप्तिके बाद उसके पूर्वजन्मके सात प्रिय शिष्य (केशव, माधव, मधु, देवापि, सोमपा, सूर तथा मदन) इस जन्ममें भी पुनः उत्पन्न होकर अकबरके दरबारमें आये। मुकुन्द ब्राह्मणके शिष्य केशव अकबरके समयमें गानसेन (तानसेन) नामसे उत्पन्न हुए। पूर्वजन्मके माधव अकबरके समयमें वैजवाक् (बैजूबावरा) नामसे प्रसिद्ध हुए। पूर्वजन्मके मधु अकबरके समयमें सभी रागोंके ज्ञाता 'हरिदासगायक' नामसे विख्यात हुए। ये मध्वाचार्य-मतानुयायी प्रसिद्ध वैष्णव थे। पूर्वजन्मके देवापि अकबरके समयमें 'बीरबल' नामसे प्रसिद्ध हुए। वे पश्चिमी ब्राह्मण थे और उन्हें वाणीकी अधिष्ठात्री सरस्वतीदेवीका अभिमान था। पूर्वजन्मका गौतमवंशमें उत्पन्न सोमपा अकबरके समयमें 'मानसिंह' नामसे उत्पन्न हुआ और वह आर्यभूपशिरोमणि अकबरका सेनापति बना। पूर्वजन्मका शूर दक्षिण देशमें ब्राह्मण-कुलमें उत्पन्न हुआ, यह पण्डित था, इसका नाम हुआ 'बिल्वमंगल'। यह अकबरका मित्र बना। पूर्वजन्मका पूर्वदेशका ब्राह्मण मदन अकबरके समयमें 'चन्दल' नामसे प्रसिद्ध हुआ। यह नर्तक और रहःक्रीडाविशारद था।

ये सात राजा अकबरके दरबारमें स्थित हुए और पूर्वजन्मके श्रीधर आदि तेरह शिष्य दूसरे स्थानोंमें प्रतिष्ठित हुए। अकबरके समयमें अपनेके पुत्र श्रीधर ही पुराणोंमें निपुण तुलसीशर्मा (तुलसीदास)

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नामसे प्रसिद्ध हुए। वे नारीसे शिक्षा प्राप्तकर राघवानन्दके शिष्य श्रीरामानन्दकी परम्परामें काशीमें अत्यन्त विरक्त वैष्णव कवि हुए। पूर्वजन्मके श्रीपति अकबरके समयमें महान् अन्ध भक्त कवि 'सूरदास' के रूपमें उत्पन्न हुए, ये मध्वाचार्यके मतमें स्थित रहनेवाले थे। इन्होंने कृष्णलीलाका वर्णन किया। पूर्वजन्मके शम्भु अकबरके समयमें चन्द्रभट्टके कुलमें हरिप्रिय नामसे उत्पन्न हुए, ये विष्णुभक्त थे और रामानन्दके मतमें स्थित हुए। पूर्वजन्मके वरेण्य अकबरके समयमें अग्रभुक् (अग्रदास१) नामके प्रसिद्ध संत थे, जो रामानन्दके मतमें स्थित हुए। ज्ञान-ध्यानपरायण, भाषा-छन्दकी रचना करनेवाले पूर्वजन्मके कवि मधुव्रती अकबरके समयमें 'कीलक' नामसे विख्यात हुए। धीमान् कीलकने रामलीलाकी रचना की और रामानन्दमतके अनुयायी हुए। पूर्वजन्मके विमल अकबरके समयमें 'दिवाकर' नामसे प्रसिद्ध हुए और भगवती सीताके पावन चरित्रका गान किया तथा वे रामानन्दके मतमें स्थित हुए। इसी प्रकार पूर्वजन्मके देवान् अकबरके समयमें 'केशव' नामसे अवतीर्ण हुए, ये विष्णुस्वामीके अनुयायी बने। कविप्रिया आदिकी रचनाकर इन्होंने प्रेतत्व प्राप्त किया और राम-ज्योत्स्ना नामक ग्रन्थकी रचनाकर स्वर्ग प्राप्त किया। पूर्वजन्मके सोम 'व्यासदास' नामसे उत्पन्न हुए। ये निम्बादित्यके मतानुयायी हुए। इन्होंने रहःक्रीडा ग्रन्थकी रचनाकर स्वर्ग प्राप्त किया। पूर्वजन्मके वर्धन 'चरणदास' नामसे विख्यात हुए। इन्होंने ज्ञानमाला नामक

ग्रन्थका निर्माण किया और ये रैदास-मार्गके अनुयायी बने। पूर्वजन्मके वर्तक 'रत्नभानु' नामसे उत्पन्न हुए, ये जैमिनि भाषाके रचयिता थे और रोपण-मतके अनुयायी थे। पूर्वजन्मके रुचि 'रोचन' नामसे उत्पन्न हुए। ये मध्वाचार्यके मतानुयायी थे। इन्होंने अनेक गानमयी लीला करके स्वर्ग प्राप्त किया। पूर्वजन्मके मान्धाता 'भूपति' नामके कायस्थ हुए। मध्वाचार्यके मतानुसार इन्होंने हिन्दी-भाषामें भागवतका सुन्दर अनुवाद किया। पूर्वजन्मके मानकारने नारीभावसे स्त्रीशरीरको प्राप्त किया और 'मीरा' के नामसे विख्यात राजाकी पुत्री हुई। मध्वाचार्यके मतको माननेवाली वह मीरा अत्यन्त प्रसिद्ध हुई। उनका प्रबन्ध भयंकर कलिकालके लिये मङ्गलकर होगा।

अकबरने पचास वर्षतक निष्कण्टक राज्य किया और अन्तमें मरकर स्वर्ग चला गया। उसका पुत्र सलोमा—सलीम (जहाँगीर) था। उसने भी पिताके समान राज्य किया। उसका बेटा खुर्दक (खुसरो शाहजहाँ) था, उसने दस वर्षतक राज्य किया। उसके चार बेटे थे। उसका मध्यम बेटा नवरंग (औरंगजेब) था। उसने पिता और भाईको जीतकर राज्य किया। यह पूर्वजन्ममें अन्धक नामका प्रसिद्ध दैत्य था। इस कर्मभूमिमें अन्धकके अंशसे दैत्यराजकी आज्ञासे आया था। उसने चारों ओर अनेक मूर्तियोंको ध्वस्त किया। ऐसा देखकर देवताओंने आकर कृष्णचैतन्यसे कहा—'भगवन्! दैत्यराजका अंशभूत (औरंगजेब२)' राजा उत्पन्न हुआ है, वह देवताओं और वेदोंका

१-ये बहुत बड़े सिद्ध महात्मा थे, इनकी कुण्डलिया प्रसिद्ध हैं। ये जयपुरके गलता गद्दीके संस्थापक थे। इनके सम्प्रदायके अधिकांश लोग दुर्भाग्यपर जीवन-यापन करते थे। इससे इन्हें पयहारी कहा जाता था। भक्त नाभादास इनके ही शिष्य थे।

२-वास्तवमें औरंगजेब एवं महाप्रभुके समयमें प्रायः ३०० वर्षोंका अन्तर है। इसलिये यहाँ महाप्रभुसे किसी गौड़ीय सम्प्रदायके तत्कालीन प्रभावशाली संतका तात्पर्य ग्रहण करना चाहिये। औरंगजेबपर सर डॉ० यदुनाथ सरकारकी पाँच बड़े जिल्दोंकी अत्यन्त

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  • प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *

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विनाश कर दैत्य-पक्षकी अभिवृद्धि कर रहा है। नदीहाके वनमें स्थित यज्ञाशने यह सुनकर उस दुराचारीके वंशक्षयका शाप दिया। उनचास वर्षांतक उस दुष्टात्माने राज्य किया।

उस समय देवपक्षकी वृद्धि करनेवाले सेवाजय (छत्रपति शिवाजी) नामके एक राजा हुए, जो महाराष्ट्रमें उत्पन्न हुए थे तथा युद्धविद्यामें विशारद थे। उन्होंने उस दुराचारीको मारकर उसके पुत्रको वह स्थान दे दिया। फिर वे दक्षिण देशमें चले गये। आलोमा नामके उसके पुत्रने पाँच वर्षांतक राज्य किया और वह भी दिवंगत हो गया। तालनके कुलमें बलवान् म्लेच्छ 'फलरुष' हुआ। उसने मुकल (मुगल) कुलका नाश कर दस वर्षांतक राज्य किया और अन्तमें वह शत्रुओंसे मारा गया। उसका बेटा महामद हुआ, उसने बीस वर्षांतक राज्य किया।

उसी समय नादर (फारस-निवासी नादिरशाह दुर्गनी) नामका एक भारी लुटेरा देशमें आया और आर्योंको मारकर देवताओंको जीतकर वह खुरज (ईरान) देशमें चला गया। महामदका पुत्र था महामत्स्य। उसने अपने पिताके स्थानको ग्रहण कर पाँच वर्षांतक राज्य किया। तालनवंशमें उत्पन्न दुष्ट महामत्स्य महाराष्ट्रियोंद्वारा मारा गया। माधवने देहली नगरमें दस वर्षांतक राज्य किया। उसने म्लेच्छ आलोमाके राज्यको प्राप्त किया। उस राष्ट्रमें अपने देशमें उत्पन्न अनेक राजा हुए। देश-देशमें, ग्राममें रहनेवाले बहुत-से राजा हो गये। प्रायः कोई चक्रवर्ती सम्राट् नहीं रहा। सर्वत्र छोटे-छोटे मण्डलीकों (तालुकेदारों)-के अधिकारमें देश विभक्त हो गया। कुछ लोग तो गाँव-गाँवके ही मालिक

रहे। इस प्रकार तीस वर्ष बीत गये।

इसके बाद सभी देवगण कृष्णचैतन्यके* पास आये। उन्होंने महीतलपर उनके दुःखको जानकर एक मुहूर्तके लिये ध्यानस्थ होकर देवताओंसे कहा—'पूर्वकालमें बुद्धिमान् राघवने राक्षस रावणको जीतकर सुधावृष्टिके द्वारा वानरोंको जीवित कर लिया था। विकट, वृजिल, जाल, बरलीन, सिंहल, जव (जावा), सुमात्र (सुमात्रा) नामके छोटे-छोटे वानरोंने भगवान् रामचन्द्रसे कहा कि हमलोगोंको मनोवाञ्छित वर दीजिये। दाशरथि रामने उनके मनोरथोंको जानकर रावणके द्वारा देवाङ्गनाओंसे उत्पन्न कन्याओंको वानरोंको प्रदान किया और प्रसन्नचित्त हो वानरोंसे कहा कि 'जालंधरद्वारा निर्मित आपलोगोंके नामसे जो द्वीप होंगे, उन द्वीपोंके आपलोग राजा होंगे और ये आपलोगोंकी रानियाँ होंगी। नन्दिनी गौके रूण्ड (धड)-से जो म्लेच्छ उत्पन्न होंगे वे गुरुण्ड कहलायेंगे। उन्हें जीतकर आपलोग श्रेष्ठ राज्य प्राप्त करेंगे।'

यह सुनकर हरिको नमस्कारकर आनन्दपूर्वक वे सभी द्वीपोंमें चले गये। देवगणों! विकटके वंशमें उत्पन्न तथा उसके द्वारा प्रेरित वानरमुखी गुरुण्ड-लोग व्यापारकी दृष्टिसे यहाँ आये और उनका हृदय ईश-पुत्र (खिष्ट, ईशु या ईसामसीह)-का मतावलम्बी था। वे सत्यव्रती, कामजित, क्रोधरहित और सूर्यपरायण हैं। आपलोग वहाँ रहकर उनका कार्य करें। यह सुनकर देवता सूर्यकी आदरपूर्वक अर्चना कर कलिकातामें आ गये। पश्चिम द्वीपमें विकट नामका राजा हुआ, उसकी पत्नी विकटावती (विकटोरिया)-ने अष्ट कौशलमार्गसे (पार्लियामेंटके परामर्शसे) शासन किया।

प्रामाणिक ऐतिहासिक जीवनी प्रसिद्ध है। कैम्ब्रिज इतिहासके चौथे भागके उत्तरार्धमें औरंगजेबका वृत्तान्त इन्हींके द्वारा लिखित है। यहाँ चैतन्य शब्दसे भगवान् जगन्नाथ भी अभीष्ट हो सकते हैं।

  • यहाँ भी तत्कालीन गौड़ीय सम्प्रदायका कोई आचार्य समझ जाना चाहिये, क्योंकि महाप्रभु चैतन्य तो इससे प्रायः ४५० वर्ष पूर्व हुए थे।

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

उसके वंशके सात और गुरुण्ड राजा हुए, जो चौंसठ वर्षों तक राज्यकर नष्ट हो गये। गुरुण्डके आठवें राजातक न्यायपूर्वक शासन करनेपर कलिपक्षीय बलि दैत्यने मुर नामक महान् असुरको देवदेशमें भेजा। वह मुर वाडिल राजाको वशमें करके आर्य-धर्मके विनाशके लिये तत्पर हो गया। मूर्तिमें स्थित देवगणोंने महाप्रभुचैतन्य यज्ञाशके पास जाकर नमस्कार कर मुर नामक दैत्यके आनेकी बात कही। यह जानकर कृष्णांशने बौद्धपंथी गुरुण्डको शाप दिया कि 'जो मुरके मतमें हैं, वे नष्ट हो जायँगे।' इस तरहकी बात कहनेपर कालसे प्रेरित समस्त दुष्ट गुरुण्ड अपनी सेनाओंके साथ एक वर्षके अंदर ही नष्ट हो गये। वह राजा वाडिल भी विनाशको प्राप्त हो गया। तत्पश्चात् मेकल (लार्ड मेकाले) नामक नौवों वीर्यवान् (शिक्षाशास्त्री) गुरुण्ड आया। इसने न्यायपूर्वक बारह वर्षतक राज्य किया। दसवों लार्डल (लार्ड वेवल) नामक विख्यात गुरुण्डने बत्तीस वर्षतक धर्मपूर्वक राज्य किया। लार्डलके स्वर्ग जानेपर मकरन्दकुलमें उत्पन्न आर्योंने शासन किया। तदनन्तर हिमलुंग-निवासी मौनोंने राज्य प्राप्त किया। वे बध्रुवर्ण, सूक्ष्म तथा बर्तुल नासावाले एवं दीर्घ मस्तकवाले बौद्धमार्गगामी लाखोंकी संख्यामें देहली आये। उनका राजा हुआ आर्जिक। उसके पुत्र देवकर्णने गङ्गोत्रगिरिके शिखरपर राज्यकी वृद्धिके लिये बारह वर्षतक घोर तपस्या की। उस बुद्धिमान्की तपस्यासे भगवती गङ्गाने उसे दर्शन दिया और कुबेरने उसे आर्योंका मण्डलीक-पद प्रदान किया। तदनन्तर मण्डलीक देवकर्ण प्रजापालक राजा हुआ। साठ वर्षतक उसने महीतलपर राज्य किया। उसके वंशमें देवपूजक आठ राजा हुए। दो सौ वर्षतक राज्य करके वे स्वर्गलोक चले गये। ग्यारहवों मौन राजा पन्नगारि हुआ। वह चालीस वर्षतक राज्य करनेके बाद

पन्नगोद्धार मृत्युको प्राप्त हो गया। इस प्रकारसे महीतलपर मौन-जातियोंका राज्य हुआ।

इसके अनन्तर नागवंशीय, आन्ध्रवंशीय, कौसलदेशीय, नैषधदेशीय, सौराष्ट्रदेशीय तथा गुर्जरदेशीय राजाओंने अनेक वर्षों तक राज्य किया। गुर्जरदेशमें कलिन आभीरीके गर्भसे 'राहु' नामसे सिंहिकाके पुत्ररूपमें जन्म ग्रहण किया। जैसे चन्द्रको कष्ट देनेवाला नभोमण्डलमें सिंहिकापुत्र राहु स्थित है, वैसे ही कलिका अंशभूत देवताओंको कष्ट देनेवाला आभीरीका राहु नामका पुत्र उत्पन्न हुआ। इसके उत्पन्न होते ही पृथ्वीपर भयंकर भूकम्प होने लगा। सभी विपरीत ग्रह भयंकर दुःख उत्पन्न करने लगे। उसके भयसे देवगण अपनी-अपनी मूर्तियों-प्रतिमाओंमेंसे देवांशका परित्याग कर सुमेरु पर्वतके शिखरपर महेन्द्रकी शरणमें चले गये। उन लोगोंके कल्याणके लिये भगवान् शक्रने जगदम्बिकाकी स्तुति की। तब कन्यामूर्ति उस कल्याणकारी देवीने देवताओंसे कहा—'देवगणों! मेरे दर्शनसे आपलोग भूख-प्याससे रहित हो जायँगे।' यह सुनकर देवगण प्रसन्न हुए।

आभीरी-पुत्र राहु सौ वर्ष राज्य करके अपना प्राण त्यागकर कलिनमें लीन हो गया। उसके वंशमें डेढ़ सौ राजा हुए, जिन्होंने दस हजार वर्षतक राज्य किया। उन्होंने नष्ट हुए महामदके मतका पुनः प्रचार किया। वे सभी म्लेच्छ हुए। उस समय कलियुगमें न वेदाध्ययन था, न वर्ण-व्यवस्था थी और न देवता ही थे। कोई भी मर्यादा नहीं थी। जो शेष ब्राह्मण थे वे अर्बुद शिखरपर रहने लगे और बारह वर्षों तक प्रयत्नपूर्वक देवताओंकी आराधना करने लगे। फलतः अर्बुद शिखरसे खड्ग और चर्मधारी एक क्षत्रिय प्रादुर्भूत हुआ। उसका नाम हुआ अर्वबली। उसने भयंकर म्लेच्छोंको जीतकर पाँच योजन भूमिपर

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  • प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *

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अर्बपुरीका निर्माण किया। धीरे-धीरे वहाँ आर्य आकर बसने लगे और फिर आर्यकुलकी वृद्धि हो गयी। अर्बबलीने पचास वर्षोंतक राज्य किया। उसके वंशमें डेढ़ सौ राजा हुए। दस हजार वर्षके बाद म्लेच्छोंके मित्र वर्णसंकरणोंने म्लेच्छ-कन्याओंके साथ विवाह किया।

आर्यमार्गानुगामी नाममात्रके रह गये। उस समय मलयदेशस्थ एक लाख म्लेच्छोंका अर्बुदीय आर्यके साथ भयंकर युद्ध हुआ। उसमें महाबलशाली म्लेच्छोंने विजय प्राप्त की। सम्पूर्ण भूमि म्लेच्छमयी हो गयी और सर्वत्र अलक्ष्मीका निवास हो गया। (अध्याय २२-२३)

कलिके द्वितीय, तृतीय तथा चतुर्थ चरणोंका वृत्तान्त तथा कलिक भगवान्का अवतार

सूतजीने कहा—शौनक! म्लेच्छोंकी विजय होनेपर कलिने उन्हें सम्मानित किया। तदनन्तर सभी दैत्यगण अनेकों जलयानोंका निर्माणकर हरिखण्डमें आये। उस समय हरिखण्डमें भी मनुष्य देवताओंके समान महाबलशाली थे। उन लोगोंने दैत्योंके साथ भयंकर अस्त्र-शस्त्रोंसे युद्ध किया, किंतु दस वर्षके बाद वे सभी दैत्योंके मायायुद्धसे पराजित हो गये। तब वे हरिखण्डनिवासी महेन्द्रकी शरणमें गये। भगवान् शक्रने विश्वकर्मसे कहा—‘तात! सप्तसिन्धुओंमें तुम्हारे द्वारा विरचित भ्रमि नामक यन्त्र अवस्थित है। उस यन्त्रके प्रभावसे मानव एक खण्डसे दूसरे खण्डमें नहीं जा पाते; किंतु मायावी मयने उसे भ्रष्ट कर दिया है। फलतः सातों द्वीपोंमें मेरे शत्रु म्लेच्छगण सब जगह जाने लगे हैं। इसलिये आपके द्वारा सम्पादित जो मर्यादा है, उससे हमलोगोंकी आप रक्षा करें।’

यह सुनकर विश्वकर्मने एक दिव्य भ्रमि यन्त्रका निर्माण किया। उस यन्त्रके प्रभावसे वे सब भ्रमित हो गये। भ्रमि-यन्त्रसे म्लेच्छविनाशक एक महावायु उत्पन्न हुआ। उस महावायुसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ जो वात्य कहलाया। ज्ञानमय उस वात्यने दैत्यों, यक्षों और पिशाचोंको जीतकर त्रैवर्णिक द्विजोंका सत्कार किया। महाबली वात्यने म्लेच्छोंको उनके वर्णमें प्रतिष्ठित किया और पचास वर्षोंतक पृथ्वीपर ‘मण्डलीक’ पदको

सुशोभित किया। उसके वंशमें कलियुगमें हजारों राजा हुए। जिन्होंने सोलह हजार वर्षतक राज्य किया और वे सभी वायुके उपासक हुए।

दुःखित हो कलिने पुनः दैत्यराज बलिके पास जाकर वात्यवंशका सम्पूर्ण वृत्तान्त बतलाया, तब बलिने अपने मित्र कलिके साथ वामनभगवान्के पास आकर नमस्कार कर कहा—‘हे सुरोत्तम! मुझपर प्रसन्न होकर आपने मेरे लिये कलिको बनाया है, परंतु वह कलि वात्य-द्विजोंके द्वारा तिरस्कृत कर दिया गया है। प्रभो! कलियुगके एक चरण व्यतीत होनेमें थोड़ा ही समय शेष है। इतने समयमें मेरी अपेक्षा देवोंका अधिक राज्य रहा। मैंने तो देवेन्द्रकी मायाके कारण पृथ्वीका अधिकार छोड़ दिया है। अतः आप मेरे मित्र इस कलिकी रक्षा करें।’ तब भगवान् वामन हरि अपने पूर्वार्ध अंशसे यमुनातटनिवासी कामशर्मा नामक ब्राह्मणके घर उसकी पत्नी देवहूतिसे दो दिव्य पुत्रोंके रूपमें उत्पन्न हुए। एकका नाम था भोगसिंह और दूसरेका नाम था केलिसिंह। वे वात्यसे उत्पन्न राजाओंको जीतकर कल्पक्षेत्रमें आये। मयनिर्मित रहःक्रीडावती नामकी नगरीमें रहकर बलवान् उन दोनोंने कलिकी धुरीको धारण किया। कालान्तरमें कलियुगमें विपुल वर्णसंकरणकी सृष्टि हो गयी। वृक्षपरके पक्षीके समान इनकी प्रभूत वृद्धि हो गयी। दो हजार वर्षके बाद इन्होंने

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३८०

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

पूर्ववर्ती मानवोंको समाप्त कर दिया। उस समय पृथ्वीपर कलिका द्वितीय चरण आ गया। इस समय किन्नरोंकी वार्ता भूतलपर वर्तमान है। वे दैत्यमय मनुष्य ढाई हाथमात्र ऊँचे हो गये और उनकी अवस्था चालीस वर्ष हुई तथा वे पक्षियोंके समान कर्महीन हो गये। कलिके द्वितीय चरणके अन्तमें न विवाह होगा, न राजा रहेंगे, न कोई उद्यमशील रहेंगे और न कर्मकर्ता रहेंगे। भोगसिंह और केलिसिंहके वंशज सवा लाख वर्षतक पृथ्वीमें रहेंगे। इसलिये हे मुनिगणो! आप सबको मेरे साथ कृष्णचैतन्यके पास चलना चाहिये।

व्यासजी बोले— हे मनो! विशालापुननिवासी वे सभी मुनिगण प्रसन्नचित्त होकर यज्ञांशके पास जायँगे और उन्हें प्रणाम कर इन्द्रलोक जानेकी अनुमति माँगेंगे। तब यज्ञांश चैतन्य, आह्लाद, योगी गोरख, शंकर आदि रुद्रांशों और राजा भर्तृहरि आदि अपने सभी शिष्यों तथा अन्य योगिजनों और विशालापुननिवासी मुनियोंके साथ विमानपर आरूढ़ होकर देवलोक चले जायँगे। तब कलिके द्वितीय चरणमें वामनांशसे उद्भूत भोगसिंह और केलिसिंह योगमार्गका अवलम्बन कर कल्पक्षेत्रमें स्थित होंगे और दैत्यवर्गकी अभिवृद्धि करेंगे।

कलिके तृतीय चरणके आनेपर किन्नरगण धीरे-धीरे पृथ्वीपर विनष्ट हो जायँगे। कलियुगके तृतीय चरणके छब्बीस हजार वर्ष व्यतीत होनेपर रुद्रकी आज्ञासे भुङ्ग-ऋषि सौरभी नामकी पत्नीसे महाबलवान् कौलकल्प नामक मनुष्योंको उत्पन्न करेंगे जो सभी किन्नरोंका भक्षण करनेवाले होंगे। उस समय कलिमें उनकी उम्र छब्बीस वर्षकी होगी। भयभीत किन्नर वामनांशकी शरणमें जायँगे और तब भोगसिंह तथा केलिसिंहके साथ कौलकल्पोंका घोर युद्ध होगा। दस वर्ष युद्ध करनेके पश्चात् भोगसिंह आदि सब पराजित हो

जायँगे। दैत्योंके साथ वामनांश (भोगसिंह, केलिसिंह) भी पातालमें चले जायँगे।

घोर कलियुगमें भुङ्ग-ऋषिकी भयंकर सृष्टि होगी। माता-बहिन, पुत्री आदिसे वे मनुष्य पशुवत् व्यवहार करेंगे। कामान्ध होकर वे सब बहुत पुत्रोंको उत्पन्न करेंगे। कलिके तृतीय चरणमें वे सृष्टियाँ भी भयंकर तिर्यक्-योनिको प्राप्त कर नष्ट हो जायँगी।

कलिके चतुर्थ चरणमें मनुष्यकी आयु बीस वर्षकी होगी और वे मरकर नरक जायँगे। उस समय जलीय और वन्य जीवोंके समान वे कन्द-मूल-फल खानेवाले हो जायँगे। जो तामिस्स आदि भयंकर नरक प्रसिद्ध हैं, वे सब कर्मभूमिमें उत्पन्न मानवोंसे भरे जायँगे।

कलियुगके चतुर्थ चरणमें उत्पन्न मनुष्योंके द्वारा इक्कीसों नरकोंमें अजीर्णता आ जायगी—नरक मनुष्योंसे भर जायँगे। तब नरक धर्मराजके पास जाकर कहेंगे कि पापियोंसे हमारे स्थान भर गये हैं। हे सुरोत्तम! जिस तरह हम लोग प्राकृतरूपमें हो जायँ आप वैसा उपाय करें। यह सुनकर धर्मराज चित्रगुप्तके साथ कलियुगके संध्याकालमें ब्रह्माके पास जायँगे और परमेष्ठि पितामह उनके साथ क्षीरसागर जायँगे तथा वहाँ जगन्नाथ देवाधिदेव वृषाकपिकी पूजा कर सांख्यशास्त्रमय स्तोत्रोंसे स्तुति करेंगे एवं रक्षाकी प्रार्थना करेंगे। इसपर वे कहेंगे—देवगणो! लोककल्याणके लिये यह कश्यप सम्भल ग्राममें जन्म लेगा और वहाँ इसका नाम होगा विष्णुयशा। इसकी पत्नीका नाम होगा विष्णुकीर्ति। विष्णुयशा कृष्णलीलाके ग्रन्थ मनुष्योंको सुनायेगा किंतु वे महाधूर्त नारकीय प्राणी उसे भयंकर दृढ़ बन्धनमें बाँधकर कारागारमें डाल देंगे, तब विष्णुकीर्तिसे संसारका कल्याण करनेवाले पूर्ण भगवान् नारायण मार्गशीर्ष मासके कृष्ण पक्षकी अष्टमीके दिन

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  • प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *

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अन्धकारपूर्ण रात्रिमें कल्किरूपमें उत्पन्न होंगे तथा ब्रह्माण्डके कल्याणके लिये सभी देवताओंका भी प्रादुर्भाव होगा और वे सभी देवता तथा ग्रह परमेश्वरकी स्तुति करेंगे। तब भगवान् कल्कि उन्हें कल्पों, मन्वन्तरों, अवतार-कथाओं, सनातन राधा-कृष्णकी

महिमा तथा कर्मभूमि और सभी लोकों एवं ग्रहोंकी स्थितिको बतलायेंगे। इसी प्रसंगमें श्वेतवाराहकल्पकी कथा भी कहेंगे। तदनन्तर प्रसन्न होकर पुनः प्रणाम कर वे सभी देवगण अपने-अपने स्थानोंको चले जायेंगे। (अध्याय २४-२५)

भगवान् कल्किकी विजय, सत्ययुगकी उत्पत्ति-कथा, अक्षयनवमीमें आँवलेके पूजनका माहात्म्य, अयोध्यामें महाराज वैवस्वतका प्रतिष्ठित होना तथा प्रतिसर्गपर्वका उपसंहार

व्यासजीने कहा—अनन्तर पुराणपुरुषसे उत्पन्न भगवान् कल्कि खड्ग, कवच और ढाल धारण कर दिव्य अश्वपर आरूढ़ हो दैत्यस्वरूप म्लेच्छोंको मारकर योगमार्गका आश्रय लेंगे और सोलह हजार वर्षोंतक उनकी योगाग्निसे तपायी गयी कर्मभूमि भस्मीभूत होकर निर्जीव हो जायगी। अनन्तर प्रलयंकर मेघ उत्पन्न होकर प्रलयकारी वृष्टि करेंगे और भूमि उस जलमें निमग्न हो जायगी। उस समय घोर कलियुग बलिके पास चला जायगा। कलियुगके जानेके बाद भगवान् हरि पुनः कर्मभूमिको रमणीय स्थलमयी करके यज्ञोंसे देवीका यजन करेंगे। यज्ञभाग ग्रहण करके वे देवगण शक्तिसम्पन्न हो जायेंगे और वैवस्वतमनुके पास जाकर सम्पूर्ण वृत्तान्त कहेंगे। अनन्तर कल्किके मुखसे ब्राह्मण, बाहुसे क्षत्रिय, जानुसे वैश्य और पैरसे शूद्र वर्ण उत्पन्न होंगे। ये ब्राह्मणादि क्रमशः गौर, रक्त, पीत एवं श्यामवर्णके होंगे और देवीसे शक्ति प्राप्त करके अनेक पुत्र उत्पन्न करेंगे। उस समय मनुष्य जाति-धर्मका आश्रय लेकर देवताओंका यजन करेंगे। तब धीमान् वैवस्वत विष्णुरूप उस कल्कि हरिको नमस्कार कर उनकी आज्ञासे अयोध्यामें राजपद ग्रहण करेंगे। उनकी इच्छासे जो पुत्र उत्पन्न होगा उसका नाम होगा इक्ष्वाकु। राजा इक्ष्वाकु पिता वैवस्वतके राज्यको प्राप्त कर दिव्य सौ वर्षकी आयु प्राप्त कर अन्तमें

शरीरका परित्याग कर देंगे।

जब भगवान् कल्कि ब्रह्मसत्र करेंगे, तब अङ्गोंके साथ चारों वेद मूर्तिमान् हो जायेंगे। अष्टादश पुराणोंके साथ वे वहाँ आयेंगे और वे सभी पुराणपुरुषके अंशभूत कल्किकी स्तुति करेंगे।

कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी नवमी तिथिमें गुरुवारको एक श्रेष्ठ पुरुष यज्ञकुण्डसे उत्पन्न होगा। सत्यमार्गका प्रदर्शक वह सत्ययुग नामसे कहा जायगा। ब्रह्मादि देवगण नवमी तिथिमें इस रमणीय पुरुषके आविर्भावको देखकर उस तिथिका, समस्त कर्मोंका क्षय करनेवाली तिथिके रूपमें वर्णन करेंगे। इस तिथिको जो मनुष्य आँवला-वृक्षके नीचे जिन देवताओंकी पूजा करेगा वे देवता उसके वशमें हो जायेंगे। यह नवमी अक्षयनवमी और युगादि नवमीके नामसे प्रसिद्ध है। यह लोकमङ्गलदायिनी और सभी पापोंका नाश करनेवाली है। आँवलाके वृक्षके नीचे जो मालती और तुलसीको स्थापित कर विधिपूर्वक शालग्रामकी पूजा करता है, वह पितरोंका तुसिकारक एवं जीवनमुक्त होता है। आँवला-वृक्षके नीचे जो श्राद्ध करता है, वह हजारों गया-श्राद्ध करनेका फल प्राप्त करता है और जो व्यक्ति वहाँपर होम करता है, उसे हजारों यज्ञ करनेका फल प्राप्त होता है तथा वह मरनेके बाद अनेक कुटुम्बियोंके साथ स्वर्ग प्राप्त करता है। कल्किदेवता प्रसन्न होकर

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

देवताओंके प्रति 'ऐसा ही हो' यह कहेंगे, यह कहकर भगवान् कलिक देवताओंके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान होकर सुषुप्त हो जायेंगे।

भगवान् कलिकके जानेके बाद दुःखित भगवती कर्मभूमि विरहाग्रिसे संतप्त बीजोंका नाश कर देंगी। उस समय पातालनिवासी महान् दैत्यगण प्रह्लादके साथ अपने वाहनोंपर आरूढ़ हो अनेक अस्त्र-शस्त्रोंको लेकर देवताओंके पास गरजते हुए जायेंगे। तब इन्द्र आदि तैंतीस देवगण अपने आयुधोंको ग्रहण कर उनसे भयंकर युद्ध करेंगे। दिव्य एक वर्षतक उनका भयंकर युद्ध होगा। मरे हुए दैत्योंको शुक्राचार्य जिला देंगे, तब थके हुए देवगण युद्ध छोड़कर क्षीरसागर चले जायेंगे, जहाँ साक्षात् हरि विराजमान रहते हैं। देवगण उनकी स्तुति करेंगे। उनकी स्तुतिसे वे भगवान् देवताओंके कल्याणके लिये अपने पूर्वार्धसे हंसरूप बना लेंगे। वे हंसरूपी

साक्षात् हरि सैकड़ों सूर्यकी कान्तिके समान प्रभावशाली होंगे। प्रह्लादादि प्रमुख दैत्यगण एवं शुक्राचार्यको वे अपने तेजसे तप्त कर देंगे। तब पराजित दैत्यगण पृथ्वीको छोड़कर दुःखित हो वितललोकमें चले जायेंगे। महादेवसे रक्षित वे सभी देवगण निर्भय, निरुपद्रव हो जायेंगे और पृथ्वीपर वैवस्वतके पुत्रका अभिषेक करेंगे। वे इक्ष्वाकु दिव्य सौ वर्षकी आयुवाले होंगे, उस समय मनुष्यकी आयु चार सौ वर्षकी होगी। धर्मके चार पाद हैं—ज्ञान, ध्यान, शम तथा दम। आत्मज्ञान ज्ञान कहलाता है। अध्यात्मचिन्तन ध्यान कहलाता है। मनकी स्थिरता शम है और इन्द्रियोंका निग्रह करना दम है। चार लाख बत्तीस हजार वर्ष धर्मका एक पाद कहा जाता है। जब धर्मकी वृद्धि होती है, तब आयुकी भी वृद्धि होती है।

(अध्याय २६)

॥ प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड सम्पूर्ण ॥ ॥ भविष्यपुराणान्तर्गत प्रतिसर्गपर्व सम्पूर्ण ॥

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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

उत्तरपर्व

महाराज युधिष्ठिरके पास व्यासादि महर्षियोंका आगमन एवं उनसे उपदेश करनेके लिये युधिष्ठिरकी प्रार्थना

कल्याणानि ददातु वो गणपतिर्यस्मिन्नतुष्टे सति क्षोदीयस्यपि कर्मणि प्रभवितुं ब्रह्मापि जिह्वायते । भजे यच्चरणारविन्दमसकृतसौभाग्यभाग्योदयै- स्तैनैषा जगति प्रसिद्धिर्मगमददेवेन्द्रलक्ष्मीरपि ॥ शश्रुत्युण्यहरिणयगभरसनासिंहासनाध्यासिनी सेयं वागधिदेवता वितरतु श्रेयांसि भूयांसि वः । यत्पादामलकोमलाङ्गुलिनखज्योत्स्नाभिरुद्भेत्तिलतः शब्दब्रह्मसुधाम्बुधिर्युधमनस्युच्छृङ्गुलं खेलेति ॥

(उत्तरपर्व १।१-२)

‘जिनकी प्रसन्नताके बिना ब्रह्मा भी एक क्षुद्रकार्यका सम्पादन नहीं कर सकते और जिनके चरणोंके एक बार आश्रय लेनेसे देवेन्द्रका भाग्य चमक उठा तथा उन्हें अखण्ड राजलक्ष्मीकी प्राप्ति हो गयी, वे भगवान् गणपतिदेव आपलोगोंका कल्याण करें। जो ब्रह्माके जिह्वाग्र-भागपर निरन्तर सिंहासनासीन रहती हैं और जिनके चरणनखकी चन्द्रकासे प्रकाशित होकर शब्दब्रह्मका समुद्र विद्वानोंके हृदयपर नृत्य करता है, वे भगवती सरस्वती आप सबका अनन्त कल्याण करें।’

भगवान् शंकरका ध्यान कर, भगवान् (विष्णु) कृष्णकी स्तुति कर और ब्रह्माजीको नमस्कार कर तथा सूर्यदेव एवं अग्निदेवको प्रणाम कर इस ग्रन्थका वाचन करना चाहिये*।

एक बार धर्मके पुत्र धर्मवेता महाराज युधिष्ठिरको देखनेके लिये व्यास, मार्कण्डेय, माण्डव्य, शाण्डिल्य, गौतम, शातातप, पराशर, भरद्वाज, शौनक, पुलस्त्य, पुलह तथा देवर्षि नारद आदि श्रेष्ठ ऋषिगण पधारे।

उन महान् तपस्वी एवं वेदवेदाङ्गपरांगत ऋषियोंको देखकर भक्तिमान् राजा युधिष्ठिरने अपने भाइयोंके साथ प्रसन्नचित्त हो सिंहासनसे उठकर भगवान् श्रीकृष्ण तथा पुरोहित धौम्यको आगे कर उनका अभिवादन किया और आचमन एवं पाद्यादिसे उनकी पूजा कर आसन प्रदान किया। उन तपस्वियोंके बैठनेपर विनयसे अवगत हो महाराज युधिष्ठिरने श्रीवेदव्यासजीसे कहा—

‘भगवन्! आपके प्रसादसे मैंने यह महान् राज्य प्राप्त किया तथा दुर्घोषनादिको परास्त किया। किंतु जैसे रोगीको सुख प्राप्त होनेपर भी वह सुख उसके लिये सुखकर नहीं होता, वैसे ही अपने बन्धु-बान्धवोंको मारकर यह राज्य-सुख मुझे प्रिय नहीं लग रहा है। जो आनन्द वनमें निवास करते हुए कन्द-मूल तथा फलोंके भक्षणसे प्राप्त होता है, वह सुख शत्रुओंको जीतकर सम्पूर्ण पृथ्वीका राज्य प्राप्त करनेपर भी नहीं होता। जो भीष्मपितामह हमारे गुरु, बन्धु, रक्षक, कल्याण और कवचस्वरूप थे, उन्हें भी मुझ-जैसे पापीने राज्यके लोभसे मार डाला। मैंने बहुत विवेकशून्य कार्य किया है। मेरा मन पाप-पङ्कमें लिस हो गया है। भगवन्! आप कृपाकर अपने ज्ञानरूपी जलसे मेरे अज्ञान तथा पाप-पङ्कको धोकर सर्वथा निर्मल बना दीजिये और अपने प्रज्ञारूपी दीपकसे मेरा धर्मरूपी मार्ग प्रशस्त कीजिये। धर्मके संरक्षक ये मुनिगण कृपाकर यहाँ आये हुए हैं। गङ्गापुत्र महाराज भीष्मपितामहसे मैंने

  • शिवं ध्यात्वा हरिं स्तुत्वा प्रणम्य परमेश्विनम्। चित्रभानुं च भानुं च नत्वा ग्रन्थमुदीरयेत् ॥ (उत्तरपर्व १।७)

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र और मोक्षशास्त्रका विस्तारसे श्रवण किया है। उन शान्तनुपुत्र भीष्मके स्वर्गलोक चले जानेपर अब श्रीकृष्ण और आप ही मैत्री एवं बन्धुताके कारण मेरे मार्गदर्शक हैं।'

व्यासजी बोले—राजन्! आपको करने योग्य सभी बातें मैंने, पितामह भीष्मने, महर्षि मार्कण्डेय, धौम्य और महामुनि लोमशने बता दी हैं। आप धर्मज्ञ, गुणी, मेधावी तथा धीमान् पुरुषोंके समान

हैं, धर्म और अधर्मके निश्चयमें कोई भी बात आपको अज्ञात नहीं है। हृषीकेश भगवान् श्रीकृष्णके यहाँ उपस्थित रहते हुए धर्मका उपदेश करनेका साहस कौन कर सकता है? क्योंकि ये ही संसारकी सृष्टि, स्थिति तथा पालन करते हैं एवं प्रत्यक्षदर्शी हैं। अतः ये ही आपको उपदेश करेंगे। इतना कहकर तथा पाण्डवोंकी पूजा ग्रहण कर बादरायण व्यासजी तपोवन चले गये। (अध्याय १)

भुवनकोशका संक्षिप्त वर्णन

महाराज युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! यह जगत् किसमें प्रतिष्ठित है? कहाँसे उत्पन्न होता है? इसका किसमें लय होता है? इस विश्वका हेतु क्या है? पृथ्वीपर कितने द्वीप, समुद्र तथा कुलाचल हैं? पृथिवीका कितना प्रमाण है? कितने भुवन हैं? इन सबका आप वर्णन करें।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! आपने जो पूछा है, वह सब पुराणका विषय है, किंतु संसारमें घूमते हुए मैंने जैसा सुना और जो अनुभव किया है, उनका संक्षेपमें मैं वर्णन करता हूँ। सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित—इन पाँच लक्षणोंसे समन्वित पुराण कहा जाता है*।

अनघ! आपका प्रश्न इन पाँच लक्षणोंमेंसे सर्ग (सृष्टि)-के प्रति ही विशेषरूपसे सम्बद्ध है, इसलिये इसका मैं संक्षेपमें वर्णन करता हूँ।

अव्यक्त-प्रकृतिसे महत्त्व-बुद्धि उत्पन्न हुई। महत्त्वसे त्रिगुणात्मक अहंकार उत्पन्न हुआ, अहंकारसे पञ्चतन्मात्रा, पञ्चतन्मात्राओंसे पाँच महाभूत और इन भूतोंसे चराचर जगत् उत्पन्न हुआ है। स्थावर-जङ्गमात्मक अर्थात् चराचर जगत्के नष्ट होनेपर जलमूर्तिमय विष्णु रह जाते हैं अर्थात् सर्वत्र जल परिव्याप्त रहता है, उससे भूतात्मक

अण्ड उत्पन्न हुआ। कुछ समयके बाद उस अण्डके दो भाग हो गये। उसमें एक खण्ड पृथिवी और दूसरा भाग आकाश हुआ। उसमें जरायुसे मेरु आदि पर्वत हुए। नाडियोंसे नदी आदि हुई। मेरु पर्वत सोलह हजार योजन भूमिके अंदर प्रविष्ट हैं और चौरासी हजार योजन भूमिके ऊपर हैं, बत्तीस हजार योजन मेरुके शिखरका विस्तार है। कमलस्वरूप भूमिकी कर्णिका मेरु है। उस अण्डसे आदिदेवता आदित्य उत्पन्न हुए, जो प्रातःकालमें ब्रह्मा, मध्याह्नमें विष्णु और सायंकालमें रुद्ररूपसे अवस्थित रहते हैं। एक आदित्य ही तीन रूपोंको धारण करते हैं। ब्रह्मासे मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वसिष्ठ और नारद—ये नौ मानस-पुत्र उत्पन्न हुए। पुराणोंमें इन्हें ब्रह्मपुत्र कहा गया है। ब्रह्माके दक्षिण अँगूठेसे दक्ष उत्पन्न हुए और बायें अँगूठेसे प्रसूति उत्पन्न हुई। दोनों दम्पति अँगूठेसे ही उत्पन्न हुए। उन दोनोंसे उत्पन्न हर्यश्च आदि पुत्रोंको देवर्षि नारदने सृष्टिके लिये उद्यत होनेपर भी सृष्टिसे विरत कर दिया। प्रजापति दक्षने अपने पुत्र हर्यश्चोंको सृष्टिसे विमुख देखकर सत्या आदि नामवाली साठ कन्याओंको उत्पन्न किया और उनमेंसे उन्होंने दस धर्मको, तेरह कश्यपको,

  • सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च। वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ॥ (उत्तरपर्व २।११)

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  • उत्तरपर्व *

३८५

सताईस चन्द्रमाको, दो बाहुपुत्रको, दो कृशाश्वको, चार अरिष्टनेमिको, एक भृगुको और एक कन्या शंकरको प्रदान किया। फिर इनसे चराचर जगत् उत्पन्न हुआ। मेरु पर्वतके तीन शृङ्गोंपर ब्रह्मा, विष्णु और शिवकी क्रमशः वैराज, वैकुण्ठ तथा कैलास नामक तीन पुरियाँ हैं। पूर्व आदि दिशाओंमें इन्द्र आदि दिक्पालोंकी नगरी है। हिमवान्, हेमकूट, निषध, मेरु, नील, श्वेत और शृङ्गवान्—ये सात जम्बूद्वीपमें कुल-पर्वत हैं। जम्बूद्वीप लक्ष योजना प्रमाणवाला है। इसमें नौ वर्ष हैं। जम्बू, शाक, कुश, क्राँच, शाल्मलि, गोमेद* तथा पुष्कर—ये सात द्वीप हैं। ये सातों द्वीप सात समुद्रोंसे परिवेष्टित हैं। क्षार, दुग्ध, इक्षुरस, सुरा, दधि, घृत और स्वादिष्ट जलके सात समुद्र हैं। सातों समुद्र और सातों द्वीप एककी अपेक्षा एक द्विगुण हैं। भूलोक, भुवलोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक—ये देवताओंके निवास-स्थान हैं। सात पाताललोक हैं—अतल, महातल, भूमितल, सुतल, वितल, रसातल तथा तलातल। इनमें हिरण्याक्ष आदि दानव और वासुकि आदि नाग निवास करते हैं। हे युधिष्ठिर! सिद्ध और ऋषिगण भी इनमें निवास करते हैं। स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत और चाक्षुष—ये छः मनु व्यतीत हो गये हैं, इस समय वैवस्वत मनु वर्तमान है। उन्हींके पुत्र और पौत्रोंसे यह पृथिवी परिव्याप्त है। बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र और दो अश्विनीकुमार—ये तैंतीस देवता वैवस्वत-

मन्वन्तरमें कहे गये हैं। विप्रचित्तिसे दैत्यगण और हिरण्याक्षसे दानवगण उत्पन्न हुए हैं।

द्वीप और समुद्रोंसे समन्वित भूमिका प्रमाण पचास कोटि योजन है। नौकाकी तरह यह भूमि जलपर तैर रही है। इसके चारों ओर लोका लोक-पर्वत हैं। नैमित्तिक, प्राकृत, आत्यन्तिक और नित्य—ये चार प्रकारके प्रलय हैं। जिससे इस संसारकी उत्पत्ति होती है। प्रलयके समय उसीमें इसका लय हो जाता है। जिस प्रकार ऋतुके अनुकूल वृक्षोंके पुष्प, फल और फूल उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार संसार भी अपने समयसे उत्पन्न होता है और अपने समयसे लीन होता है। सम्पूर्ण विश्वके लीन होनेके बाद महेश्वर वेद-शब्दोंके द्वारा पुनः इसका निर्माण करते हैं। हिंस्र, अहिंस्र, मृदु, क्रूर, धर्म, अधर्म, सत्य, असत्य आदि कर्मोंसे जीव अनेक योनियोंको इस संसारमें प्राप्त करते हैं। भूमि जलसे, जल तेजसे, तेज वायुसे, वायु आकाशसे वेष्टित है। आकाश अहंकारसे, अहंकार महत्त्वसे, महत्त्व प्रकृतिसे और प्रकृति उस अविनाशी पुरुषसे परिव्याप्त है। इस प्रकारके हजारों अण्ड उत्पन्न होते हैं और नष्ट होते हैं। सुर, नर, किन्नर, नाग, यक्ष तथा सिद्ध आदिसे समन्वित चराचर जगत् नारायणकी कुक्षिमें अवस्थित है। निर्मल बुद्धि तथा शुद्ध अन्तःकरणवाले मुनिगण इसके बाह्य और आभ्यन्तरस्वरूपको देखते हैं अथवा परमात्माकी माया ही उन्हें जानती है।

(अध्याय २)

  • अन्य मत्स्य आदि सभी पुराणोंके अनुसार गोमेद आठवाँ है, यहाँ प्लक्ष नामक द्वीप छूट गया है।

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३८६

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

नारदजीको विष्णु-मायाका दर्शन

राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! यह विष्णुभगवान्की माया किस प्रकारकी है? जो इस चराचर जगत्को व्यामोहित करती है।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! किसी समय नारदमुनि श्वेतद्वीपमें नारायणका दर्शन करनेके लिये गये। वहाँ श्रीनारायणका दर्शन कर और उन्हें प्रसन्न-मुद्रामें देखकर उनसे जिज्ञासा की। भगवन्! आपकी माया कैसी है? कहाँ रहती है? कृपाकर उसका रूप मुझे दिखायें।

भगवान्ने हँसकर कहा—नारद! मायाको देखकर क्या करोगे? इसके अतिरिक्त जो कुछ चाहते हो वह माँगो।

नारदजीने कहा—भगवन्! आप अपनी मायाको ही दिखायें, अन्य किसी वरकी अभिलाषा नहीं है। नारदजीने बार-बार आग्रह किया।

नारायणने कहा—अच्छा, आप हमारी माया देखें। यह कहकर नारदकी अँगुली पकड़कर श्वेतद्वीपसे चले। मार्गमें आकर भगवान्ने एक वृद्ध ब्राह्मणका रूप धारण कर लिया। शिखा, यज्ञोपवीत, कमण्डलु, मृगचर्मको धारण कर कुशाकी पवित्री हाथोंमें पहनकर वेद-पाठ करने लगे और अपना नाम उन्हींने यज्ञशर्मा रख लिया। इस प्रकारका रूप धारणकर नारदके साथ जम्बूद्वीपमें आये। वे दोनों वैत्रवती नदीके तटपर स्थित विदिशा नामक नगरीमें गये। उस विदिशा नगरीमें धन-धान्यसे समृद्ध उद्यमी, गाय, भैंस, बकरी आदि पशु-पालनमें तत्पर, कृषिकार्यको भलीभाँति करनेवाला सीरभद्र नामका एक वैश्य निवास करता था। वे दोनों सर्वप्रथम उसीके घर गये। उसने इन विशुद्ध ब्राह्मणोंका आसन, अर्घ्य आदिसे आदर-सत्कार किया। फिर पूछा—'यदि आप उचित समझें तो अपनी रुचिके अनुसार मेरे यहाँ अन्नका भोजन करें।' यह सुनकर

वृद्ध ब्राह्मणरूपधारी भगवान्ने हँसकर कहा—'तुमको अनेक पुत्र-पौत्र हों और सभी व्यापार एवं खेतीमें तत्पर रहें। तुम्हारी खेती और पशु-धनकी नित्य वृद्धि हो'—यह मेरा आशीर्वाद है। इतना कहकर वे दोनों वहाँसे आगे गये। मार्गमें गङ्गाके तटपर वेणिका नामके गाँवमें गोस्वामी नामका एक दरिद्र ब्राह्मण रहता था, वे दोनों उसके पास पहुँचे। वह अपनी खेतीकी चिन्तामें लगा था। भगवान्ने उससे कहा—'हम बहुत दूरसे आये हैं, अब हम तुम्हारे अतिथि हैं, हम भूखे हैं, हमें भोजन कराओ।' उन दोनोंको साथमें लेकर वह ब्राह्मण अपने घरपर आया। उसने दोनोंको स्नान-भोजन आदि कराया, अनन्तर सुखपूर्वक उत्तम शय्यापर शयन आदिकी व्यवस्था की। प्रातः उठकर भगवान्ने ब्राह्मणसे कहा—'हम तुम्हारे घरमें सुखपूर्वक रहे, अब जा रहे हैं। परमेश्वर करे कि तुम्हारी खेती निष्फल हो, तुम्हारी संततिकी वृद्धि न हो'—इतना कहकर वे वहाँसे चले गये।

मार्गमें नारदजीने पूछा—भगवन्! वैश्यने आपकी कुछ भी सेवा नहीं की, किंतु उसको आपने उत्तम वर दिया। इस ब्राह्मणने श्रद्धासे आपकी बहुत सेवा की, किंतु उसको आपने आशीर्वादके रूपमें शाप ही दिया—ऐसा आपने क्यों किया?

भगवान्ने कहा—नारद! वर्षभर मछली पकड़नेसे जितना पाप होता है, उतना ही एक दिन हल जोतनेसे होता है। वह सीरभद्र वैश्य अपने पुत्र-पौत्रोंके साथ इसी कृषि-कार्यमें लगा हुआ है, वह नरकमें जायगा, अतः हमने न तो उसके घरमें विश्राम किया और न भोजन ही किया। इस ब्राह्मणके घरमें भोजन और विश्राम किया। इस ब्राह्मणको ऐसा आशीर्वाद दिया है कि जिससे यह जगज्जालमें न फँसकर मुक्तिको प्राप्त करे।

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  • उत्तरपर्व *

३८७

इस प्रकार मार्गमें बातचीत करते हुए वे दोनों कायकुब्ज देशके समीप पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक अतिशय रम्य सरोवर देखा। उस सरोवरकी शोभा देखकर वे बहुत प्रसन्न हुए।

भगवान्ने कहा— नारद! यह उत्तम तीर्थस्थान है। इसमें स्नान करना चाहिये, फिर कत्रौज नामके नगरमें चलेगे। इतना कहकर भगवान् उस सरोवरमें स्नानकर शीघ्र ही बाहर आ गये।

तदनन्तर नारदजी भी स्नान करनेके लिये सरोवरमें प्रविष्ट हुए। स्नान सम्पन्न कर जब वे बाहर निकले, तब उन्होंने अपनेको दिव्य कन्याके रूपमें देखा। उस कन्याके विशाल नेत्र थे। चन्द्रमाके समान मुख था, वह सर्वाङ्ग-सुन्दरी कन्या दिव्य शुभलक्षणोंसे सम्पन्न थी। अपनी सुन्दरतासे संसारको व्यामोहित कर रही थी। जिस प्रकार समुद्रसे सम्पूर्ण रूपकी निधान लक्ष्मी निकली थीं, उसी प्रकार सरोवरसे स्नानके बाद नारदजी स्त्रीके रूपमें निकले। भगवान् अन्तर्धान हो गये। वह स्त्री भी अपने झुंडसे भ्रष्ट अकेली हरिणीकी तरह भयभीत होकर इधर-उधर देखने लगी। इसी समय अपनी सेनाओंके साथ राजा तालध्वज वहाँ आया और उस सुन्दरीको देखकर सोचने लगा कि यह कोई देवस्त्री है या अप्सरा? फिर बोला—‘बाले! तुम कौन हो, कहाँसे आयी हो?’ उस कन्याने कहा—‘मैं माता-पितासे रहित और निराश्रय हूँ। मेरा विवाह भी नहीं हुआ है, अब आपकी ही शरणमें हूँ।’ इतना सुनते ही प्रसन्नचित्त हो राजा उसे घोड़ेपर बैठाकर राजधानी पहुँचा और विधिपूर्वक उससे विवाह कर लिया। तेरहवें वर्षमें वह गर्भवती हुई। समय पूर्ण होनेपर उससे एक तुम्बी (लौकी) उत्पन्न हुई, जिसमें पचास छोटे-छोटे दिव्य शरीरवाले

युद्धमें कुशल बलशाली बालक थे, उसने उनको घृतकुण्डमें छोड़ दिया, कुछ दिन बाद पुत्र और पौत्रोंकी खूब वृद्धि हो गयी। वे महान् अहंकारी, परस्पर-विरोधी और राज्यकी कामना करनेवाले थे। अनन्तर राज्यके लोभसे कौरव और पाण्डवोंकी तरह परस्पर युद्ध करके समुद्रकी लहरोंकी भाँति लड़ते हुए वे सभी नष्ट हो गये। वह स्त्री अपने वंशका इस प्रकार संहार देखकर छाती पीटकर करुणापूर्वक विलाप करती हुई मूर्च्छित हो पृथ्वीपर गिर पड़ी। राजा भी शोकसे पीड़ित हो रोने लगा।

इसी समय ब्राह्मणका रूप धारण कर भगवान् विष्णु द्विजोंके साथ वहाँ आये और राजा तथा रानीको उपदेश देने लगे—‘यह विष्णुकी माया है। तुमलोग व्यर्थ ही रो रहे हो। सम्पूर्ण प्राणियोंकी अन्तमें यही स्थिति होती है। विष्णुमाया ही ऐसी है कि उसके द्वारा सैकड़ों चक्रवर्ती और हजारों इन्द्र उसी तरह नष्ट कर दिये गये हैं जैसे दीपकको प्रचण्ड वायु विनष्ट कर देती है। समुद्रको सुखानेके लिये भूमिको पीसकर चूर्ण कर डालनेकी तथा पर्वतको पीठपर उठानेकी सामर्थ्य रखनेवाले पुरुष भी कालके काराल मुखमें चले गये हैं। त्रिकूट पर्वत जिसका दुर्ग था, समुद्र जिसकी खाई थी, ऐसी लंका जिसकी राजधानी थी, राक्षसगण जिसके योद्धा थे, सभी शास्त्रों और वेदोंको जाननेवाले शुक्राचार्य जिसके लिये मन्त्रणा करते थे, कुबेरके धनको भी जिसने जीत लिया था, ऐसा रावण भी दैववश नष्ट हो गया*। युद्धमें, घरमें, पर्वतपर, अग्निमें, गुफामें अथवा समुद्रमें कहीं भी कोई जाय, वह कालके कोपसे नहीं बच सकता। भावी होकर ही रहती है। पातालमें जाय, इन्द्रलोकमें जाय, मेरु पर्वतपर चढ़ जाय, मन्त्र, औषध, शस्त्र आदिसे

  • दुर्गस्त्रिकूटः परिखा समुद्रो रक्षांसि योधा धनदाच्च वित्तम्।

शास्त्रं च यस्यांशनासा प्रणीतं स रावणो दैववशाद् विपन्नः ॥ (उत्तरपर्व ४।१३)

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३८८

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

भी कितनी भी अपनी रक्षा करे, किंतु जो होना होता है, वह होता ही है—इसमें किसी प्रकारका संदेह नहीं है। मनुष्योंके भाग्यानुसार जो भी शुभ और अशुभ होना है, वह अवश्य ही होता है। हजारों उपाय करनेपर भी भावी किसी भी प्रकार नहीं टल सकती१। कोई शोक-विह्वल होकर आँसू टपकाता है, कोई रोता है, कोई बड़ी प्रसन्नतासे नाचता है, कोई मनोहर गीत गाता है, कोई धनके लिये अनेक उपाय करता है, इस तरह अनेक प्रकारके जालकी रचना करता रहता है, अतः यह संसार एक नाटक है और सभी प्राणिवर्ग उस नाटकके पात्र हैं।'

इतना उपदेश देकर भगवान्ने रानीका हाथ पकड़कर कहा—'नारदजी! तुमने विष्णुकी माया देख ली। उठो! अब स्नानकर अपने पुत्र-पौत्रोंको अर्घ्य देकर और्ध्वदैहिक कृत्य करो। यह माया विष्णुने स्वयं निर्मित की है।' इतना कहकर उसी

पुण्यतीर्थमें नारदको स्नान कराया। स्नान करते ही स्त्री-रूपको छोड़कर नारदमुनिने अपना रूप धारण कर लिया। राजाने भी अपने मन्त्री और पुरोहितोंके साथ देखा कि जटाधारी, यज्ञोपवीतधारी, दण्ड-कमण्डलु लिये, वीणा धारण किये हुए, खड़ाऊँके ऊपर स्थित एक तेजस्वी मुनि हैं, यह मेरी रानी नहीं है। उसी समय भगवान् नारदका हाथ पकड़कर आकाश-मार्गसे क्षणमात्रमें श्वेतद्वीप आ गये।

भगवान्ने नारदसे कहा —देवर्षि नारदजी! आपने मेरी माया देख ली। नारदके देखते-देखते ऐसा कहकर भगवान् विष्णु अन्तर्हित हो गये। देवर्षि नारदजीने भी हँसकर उन्हें प्रणाम किया और भगवान्की आज्ञा प्राप्त कर तीनों लोकोंमें घूमने लगे। महाराज! इस विष्णुमायाका हमने संक्षेपमें वर्णन किया। इस मायाके प्रभावसे संसारके जीव पुत्र, स्त्री, धन आदिमें आसक्त हो रोते-गाते हुए अनेक प्रकारकी चेष्टाएँ करते हैं। (अध्याय ३)

संसारके दोषोंका वर्णन

महाराज युधिष्ठिरने पूछा —भगवन! यह जीव किस कर्मसे देवता, मनुष्य और पशु आदि योनियोंमें उत्पन्न होता है? बालभावमें कैसे पुष्ट होता है और किस कर्मसे युवा होता है? किस कर्मके फलस्वरूप अतिशय भयंकर दारुण गर्भवासका कष्ट सहन करता है? गर्भमें क्या खाता है? किस कर्मसे रूपवान्, धनवान्, पण्डित, पुत्रवान्, त्यागी और कुलीन होता है? किस कर्मसे रोगरहित जीवन व्यतीत करता है? कैसे सुखपूर्वक मरता है? शुभ और अशुभ फलका भोग कैसे करता

है? हे विमलमते! ये सभी विषय मुझे बहुत ही गहन मालूम होते हैं?

भगवान् श्रीकृष्णने कहा —महाराज! उत्तम कर्मोंसे देवयोनि, मिश्रकर्मोंसे मनुष्ययोनि और पाप-कर्मोंसे पशु आदि योनियोंमें जन्म होता है। धर्म और अधर्मके निश्चयमें श्रुति ही प्रमाण है। पापसे पापयोनि और पुण्यसे पुण्ययोनि प्राप्त होती है२।

ऋतुकालके समय दोषरहित शुक्र वायुसे प्रेरित स्त्रीके रक्तके साथ मिलकर एक हो जाता है। शुक्रके साथ ही कर्मोंके अनुसार प्रेरित जीवयोनियोंमें

१-पातालमाविशतु यातु सुरेन्द्रलोकमारोहतु क्षितिधराधिपतिं सुमेरुम्।

मन्त्रीपधिप्रहरणैश्च करोतु रक्षां यद्वावि तद्भवति नाथ विभावितोऽस्मि ॥ (उत्तरपर्व ४।९५)

२-शुभैर्देवत्वमाप्नोति मिश्रैर्मानुषतां ब्रजेत् । अशुभैः कर्मभिर्जनस्तुत्तियोनियु जायते ॥

प्रमाणं श्रुतिरेवात्र धर्माधर्मविनिश्चये । पापं पापेन भवति पुण्यं पुण्येन कर्मणा ॥ (उत्तरपर्व ४।६-७)

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  • उत्तरपर्व *

३८९

प्रविष्ट होता है। एक दिनमें शुक्र और शोणित मिलकर कलल बनता है। पाँच रातमें वह कलल बुद्ध हो जाता है। सात रातमें बुद्ध मांसपेशी बन जाता है। चौदह दिनोंमें वह मांसपेशी मांस और रुधिरसे व्याप्त होकर दूद हो जाता है। पचीस दिनोंमें उसमें अङ्गुर निकलते हैं। एक महीनेमें उन अङ्गुरोंके पाँच-पाँच भाग—ग्रीवा, सिर, कन्धे, पृष्ठवंश तथा उदर हो जाते हैं। चार मासमें वही अङ्गुरोंका भाग अँगुली बन जाता है। पाँच महीनेमें मुख, नासिका और कान बनते हैं। छः महीनेमें दन्तपंक्तियाँ, नख और कानके छिद्र बनते हैं। सातवें महीनेमें गुदा, लिङ्ग अथवा योनि और नाभि बनते हैं, संधियाँ उत्पन्न होती हैं और अङ्गोंमें संकोच भी होता है। आठवें महीनेमें अङ्ग-प्रत्यङ्ग सब पूर्ण हो जाते हैं और सिरमें केश भी आ जाते हैं। माताके भोजनका रस नाभिके द्वारा बालकके शरीरमें पहुँचता रहता है, उसीसे उसका पोषण होता है। तब गर्भमें स्थित जीव सब सुख-दुःख समझता है और यह विचार करता है कि 'मैंने अनेक योनियोंमें जन्म लिया और बारम्बार मृत्युके अधीन हुआ तथा अब जन्म होते ही फिर संसारके बन्धनको प्राप्त करूँगा।' इस प्रकार गर्भमें विचारता और मोक्षका उपाय सोचता हुआ जीव अतिशय दुःखी रहता है। पर्वतके नीचे दब जानेसे जितना क्लेश जीवको होता है, उतना ही जरायुसे वेष्टित अर्थात् गर्भमें होता है। समुद्रमें डूबनेसे जो दुःख होता है, वही दुःख गर्भके जलमें भी होता है, तस लोहेके खम्भसे बाँधनेमें जीवको जो क्लेश होता है वही गर्भमें जठराग्निके तापसे होता है। तपायी हुई सूह्योंसे बेधनेपर जो व्यथा होती है, उससे आठ गुना अधिक गर्भमें जीवको कष्ट होता है। जीवोंके लिये गर्भवाससे अधिक कोई दुःख नहीं है। उससे भी कोटि गुना दुःख जन्म लेते

समय होता है, उस दुःखसे मूर्च्छा भी आ जाती है। प्रबल प्रसववायुकी प्रेरणासे जीव गर्भके बाहर निकलता है। जिस प्रकार कोल्हूमें पीडन करनेसे तिल निस्सार हो जाते हैं, उसी प्रकार शरीर भी योनियन्त्रके पीडनसे निस्तत्त्व हो जाता है। मुखरूप जिसका द्वार है, दोनों ओष्ठ कपाट हैं, सभी इन्द्रियाँ गवाक्ष अर्थात् झरोखे हैं, दाँत, जिह्वा, गला, वात, पित्त, कफ, जरा, शोक, काम, क्रोध, तृष्णा, राग, द्वेष आदि जिसमें उपकरण हैं, ऐसे इस देहरूप अनित्य गृहमें नित्य आत्माका निवास-स्थान है। शुक्र-शोणितके संयोगसे शरीर उत्पन्न होता है और नित्य ही मूत्र, विष्टा आदिसे भरा रहता है। इसलिये यह अत्यन्त अपवित्र है। जिस प्रकार विष्टासे भरा हुआ घट बाहर धोनेसे शुद्ध नहीं होता, इसी प्रकार यह देह भी स्नान आदिके द्वारा पवित्र नहीं हो सकता। पञ्चगव्य आदि पवित्र पदार्थ भी इसके संसर्गसे अपवित्र हो जाते हैं। इससे अधिक और कौन अपवित्र पदार्थ होगा। उत्तम भोजन, पान आदि देहके संसर्गसे मलरूप हो जाते हैं, फिर देहकी अपवित्रताका क्या वर्णन करें। देहको बाहरसे जितना भी शुद्ध करें, भीतर तो कफ, मूत्र, विष्टा आदि भरे ही रहेंगे। सुगन्धित तेल देहमें मलते रहें, परंतु कभी इस देहकी मलिनता कम नहीं होती। यह आश्चर्य है कि मनुष्य अपने देहका दुर्गन्ध सृष्टिकर, नित्य अपना मल-मूत्र देखकर और नासिकाका मल निकालकर भी इस देहसे विरक्त नहीं होता और उसे देहसे घृणा उत्पन्न नहीं होती। यह मोहका ही प्रभाव है कि शरीरके दोष और दुर्गन्ध देख-सृष्टिकर भी इससे ग्लानि नहीं होती। यह शरीर स्वभावतः अपवित्र है। यह केलेके वृक्षकी भाँति केवल त्वक आदिसे आवृत और निस्सार है। जन्म होते ही बाहरकी वायुके स्पर्शसे पूर्वजन्मोंका ज्ञान नष्ट

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३९०

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

हो जाता है और पुनः संसारके व्यवहारमें आसक्त हो अनेक दुष्कर्ममें रत हो जाता है और अपनेको तथा परमेश्वरको भूल जाता है। आँख रहते हुए भी नहीं देख पाता, बुद्धि रहते हुए भी भले-बुरेका निर्णय नहीं कर पाता। राग तथा लोभ आदिके वशीभूत होकर वह संसारमें दुःख प्राप्त करता रहता है। सूखे मार्गमें भी पैर फिसलते हैं, यह सब मोहकी ही महिमा है। दिव्यदर्शी महर्षियोंने इस गर्भका वृत्तान्त विस्तृत रूपसे वर्णन किया है। इसे सुनकर भी मनुष्यको वैराग्य उत्पन्न नहीं होता और अपने कल्याणका मार्ग नहीं सोचता—यह बड़ा ही आश्चर्य है।

बाल्यावस्थामें भी केवल दुःख ही है। बालक अपना अभिप्राय भी नहीं कह सकता और जो चाहता है, वह नहीं कर पाता, वह असमर्थ रहता है। इससे नित्य व्याकुल रहता है। दाँत आनेके समय बालक बहुत क्लेश भोगता है और भाँति-भाँतिके रोग तथा बालग्रह उसे सताते रहते हैं। वह क्षुधा-तृष्णासे पीड़ित होता रहता है, मोहसे विघ्ना आदिका भी भक्षण करने लगता है। कुमारारवस्थामें कर्ण-वेधके समय दुःख होता है। अक्षरारम्भके समय गुरुसे भी बड़ा ही भय होता है। माता-पिता ताडन करते हैं।

युवावस्थामें भी सुख नहीं है। अनेक प्रकारकी ईर्ष्या मनमें उपजती है। मनुष्य मोहमें लीन हो जाता है। राग आदिमें आसक्त होनेके कारण दुःख होता है, रात्रिको नींद नहीं आती और धनकी चिन्तासे दिनमें भी चैन नहीं पड़ता। स्त्री-संसर्गमें भी कोई सुख नहीं। कुष्ठी व्यक्तिके कोढ़में कीड़े पड़ जानेपर जो खुजलाहट होती है,

उसे खुजलानेमें जितना आनन्द होता है, उससे अधिक कामी व्यक्तिको स्त्रीसे सुख नहीं मिलता*। इस तरह विचार करनेपर मालूम होता है कि स्त्रीमें कोई सुख नहीं है।

व्यक्ति मान-अपमानके द्वारा, युवावस्था-वृद्धावस्थाके द्वारा और संयोग-वियोगके द्वारा ग्रस्त है तो फिर निर्विवाद सुख कहाँ? जो यौवनके कारण स्त्री-पुरुषोंके शरीर परस्पर प्रिय लगते हैं, वही वार्धक्यके कारण घृणित प्रतीत होते हैं। वृद्ध हो जाने, शरीरके काँपने और सभी अङ्गोंके जर्जर एवं शिथिल हो जानेपर वह सभीको अप्रिय लगता है। जो युवावस्थाके बाद वार्धक्यमें अपनेमें भारी परिवर्तन और अपनी शक्तिहीनताको देखकर विरक्त नहीं होता—धर्म और भगवान्की ओर प्रवृत्त नहीं होता, उससे बढ़कर मूर्ख कौन हो सकता है?

बुढ़ापेमें जब पुत्र-पौत्र, बान्धव, दुराचारी नौकर आदि अवज्ञा—उपेक्षा करते हैं, तब अत्यन्त दुःख होता है। बुढ़ापेमें वह धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष-सम्बन्धी कार्योंको सम्पन्न करनेमें असमर्थ रहता है। इसमें वात, पित्त आदिकी विषमतासे अर्थात् न्यूनता-अधिकता होनेसे अनेक प्रकारके रोग होते रहते हैं। इसलिये यह शरीर रोगोंका घर है। ये दुःख प्रायः सभीको समय-समयपर अनुभूत होते ही हैं, फिर उसमें विशेष कहनेकी आवश्यकता ही क्या?

वास्तवमें शरीरमें सैकड़ों मृत्युके स्थान हैं, जिनमें एक तो साक्षात् मृत्यु या काल है, दूसरे अन्य आने-जानेवाली भयंकर आधि-व्याधियाँ हैं, जो आधी मृत्युके समान हैं। आने-जानेवाली

  • अव्यक्तैन्द्रियवृत्तित्वाद् बाल्ये दुःखं महत्पुनः । इच्छत्रापि न शक्नोति कर्तुं वक्तुं च सत्क्रियाम् ॥ दन्तोत्थाने महद्दुःखं मौलेन व्याधिना तथा । बालरोगैश्च विविधैः पीडा बालग्रहैरपि ॥ क्रिमिभिस्तुष्टमानस्य कुष्ठिनः कामिनस्तथा । कण्ठूयनाग्रितापेन यद्धवेत् स्त्रीषु तद्वि तत् ॥

(उत्तरपर्व ४।६३-६४, ७९)

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  • उत्तरपर्व *

३१९

आधि-व्याधियाँ तो जप-तप एवं औषध आदिसे टल भी जाती हैं, परंतु काल-मृत्युका कोई उपाय नहीं है। रोग, सर्प, शस्त्र, विष तथा अन्य घात करनेवाले बाघ, सिंह, दस्यु आदि प्राणिवर्ग ये सब भी मृत्युके द्वार ही हैं। किंतु जब रोग आदिके रूपमें साक्षात् मृत्यु पहुँच जाती है तो देव-वैद्य धन्वन्तरि भी कुछ नहीं कर पाते। औषध, तन्त्र, मन्त्र, तप, दान, रसायन, योग आदि भी कालसे ग्रस्त व्यक्तिकी रक्षा नहीं कर सकते। सभी प्राणियोंके लिये मृत्युके समान न कोई रोग है, न भय, न दुःख है और न कोई शंकाका स्थान अर्थात् केवल एकमात्र मृत्युसे ही सारे भय आदि आशंकाएँ हैं। मृत्यु पुत्र, स्त्री, मित्र, राज्य, ऐश्वर्य, धन आदि सबसे वियुक्त करा देती है और बद्धमूल वैर भी मृत्युसे निवृत्त हो जाते हैं।

पुरुषकी आयु सौ वर्षोंकी कही गयी है, परंतु कोई अस्सी वर्ष जीता है कोई सत्तर वर्ष। अन्य लोग अधिक-से-अधिक साठ वर्षतक ही जीते हैं और बहुत-से तो इससे पहले ही मर जाते हैं। पूर्वकर्मानुसार मनुष्यकी जितनी आयु निश्चित है, उसका आधा समय तो रात्रि ही सोनेमें हर लेती है। बीस वर्ष बाल्य और बुढ़ापेमें व्यर्थ चले जाते हैं। युवा-अवस्थामें अनेक प्रकारकी चिन्ता और कामकी व्यथा रहती है। इसलिये वह समय भी निरर्थक ही चला जाता है। इस प्रकार यह आयु समाप्त हो जाती है और मृत्यु आ पहुँचती है। मरणके समय जो दुःख होता है, उसकी कोई उपमा नहीं। हे मातः ! हे पितः ! हे कान्त ! आदि चिल्लाते व्यक्तिको भी मृत्यु वैसे ही पकड़ ले जाती है, जैसे मेढकको सर्प पकड़ लेता है। व्याधिसे पीड़ित व्यक्ति खाटपर पड़ा इधर-उधर हाथ-पैर पटकता रहता है और साँस लेता रहता है। कभी खाटसे भूमिपर और कभी भूमिसे

खाटपर जाता है, परंतु कहीं चैन नहीं मिलता। कण्ठमें घर्ष-घर्ष शब्द होने लगता है। मुख सूख जाता है। शरीर मूत्र, विष्टा आदिसे लिस हो जाता है। प्यास लगनेपर जब वह पानी माँगता है तो दिया हुआ पानी भी कण्ठतक ही रह जाता है। वाणी बंद हो जाती है, पड़ा-पड़ा चिन्ता करता रहता है कि मेरे धनको कौन भोगेगा? मेरे कुटुम्बकी रक्षा कौन करेगा? इस तरह अनेक प्रकारकी यातना भोगता हुआ मनुष्य मरता है और जीव इस देहसे निकलते ही जाँककी तरह दूसरे शरीरमें प्रविष्ट हो जाता है।

मृत्युसे भी अधिक दुःख विवेकी पुरुषोंको याचना अर्थात् माँगनेमें होता है। मृत्युमें तो क्षणिक दुःख होता है, किंतु याचनासे तो निरन्तर ही दुःख होता है। देखिये, भगवान् विष्णु भी बलिये माँगते ही वामन (अत्यन्त छोटे) हो गये। फिर और दूसरा है ही कौन जिसकी प्रतिष्ठा याचनासे न घटे। आदि, मध्य और अन्तमें दुःखकी ही परम्परा है। अज्ञानवश मनुष्य दुःखोंको झेलता हुआ कभी आनन्द नहीं प्राप्त करता। बहुत खाये तो दुःख, थोड़ा खाये तो दुःख, किसी समय भी सुख नहीं है। शुधा सब रोगोंमें प्रबल है और वह अन्नरूपी औषधिके सेवनसे थोड़ी देरके लिये शान्त हो जाती है, परंतु अन्न भी परम सुखका साधन नहीं है। प्रातः उठते ही मूत्र, विष्टा आदिकी बाधा, मध्याह्नमें क्षुधा-तृष्णाकी पीड़ा और पेट भरनेपर कामकी व्यथा होती है। रात्रिको निद्रा दुःख देती है। धनके सम्पादनमें दुःख, सम्पादित धनकी रक्षा करनेमें दुःख, फिर उसके व्यय करनेमें अतिशय दुःख होता है। इससे धन भी सुखदायक नहीं है। चोर, जल, अग्नि, राजा और स्वजनोंसे भी धनवालोंको अधिक भय रहता है। मांसको आकाशमें फेंकनेपर पक्षी, भूमिपर कुत्ते आदि जीव और जलमें मछली आदि खा

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