भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 401, कुल 654 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 401

३९०

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

हो जाता है और पुनः संसारके व्यवहारमें आसक्त हो अनेक दुष्कर्ममें रत हो जाता है और अपनेको तथा परमेश्वरको भूल जाता है। आँख रहते हुए भी नहीं देख पाता, बुद्धि रहते हुए भी भले-बुरेका निर्णय नहीं कर पाता। राग तथा लोभ आदिके वशीभूत होकर वह संसारमें दुःख प्राप्त करता रहता है। सूखे मार्गमें भी पैर फिसलते हैं, यह सब मोहकी ही महिमा है। दिव्यदर्शी महर्षियोंने इस गर्भका वृत्तान्त विस्तृत रूपसे वर्णन किया है। इसे सुनकर भी मनुष्यको वैराग्य उत्पन्न नहीं होता और अपने कल्याणका मार्ग नहीं सोचता—यह बड़ा ही आश्चर्य है।

बाल्यावस्थामें भी केवल दुःख ही है। बालक अपना अभिप्राय भी नहीं कह सकता और जो चाहता है, वह नहीं कर पाता, वह असमर्थ रहता है। इससे नित्य व्याकुल रहता है। दाँत आनेके समय बालक बहुत क्लेश भोगता है और भाँति-भाँतिके रोग तथा बालग्रह उसे सताते रहते हैं। वह क्षुधा-तृष्णासे पीड़ित होता रहता है, मोहसे विघ्ना आदिका भी भक्षण करने लगता है। कुमारारवस्थामें कर्ण-वेधके समय दुःख होता है। अक्षरारम्भके समय गुरुसे भी बड़ा ही भय होता है। माता-पिता ताडन करते हैं।

युवावस्थामें भी सुख नहीं है। अनेक प्रकारकी ईर्ष्या मनमें उपजती है। मनुष्य मोहमें लीन हो जाता है। राग आदिमें आसक्त होनेके कारण दुःख होता है, रात्रिको नींद नहीं आती और धनकी चिन्तासे दिनमें भी चैन नहीं पड़ता। स्त्री-संसर्गमें भी कोई सुख नहीं। कुष्ठी व्यक्तिके कोढ़में कीड़े पड़ जानेपर जो खुजलाहट होती है,

उसे खुजलानेमें जितना आनन्द होता है, उससे अधिक कामी व्यक्तिको स्त्रीसे सुख नहीं मिलता*। इस तरह विचार करनेपर मालूम होता है कि स्त्रीमें कोई सुख नहीं है।

व्यक्ति मान-अपमानके द्वारा, युवावस्था-वृद्धावस्थाके द्वारा और संयोग-वियोगके द्वारा ग्रस्त है तो फिर निर्विवाद सुख कहाँ? जो यौवनके कारण स्त्री-पुरुषोंके शरीर परस्पर प्रिय लगते हैं, वही वार्धक्यके कारण घृणित प्रतीत होते हैं। वृद्ध हो जाने, शरीरके काँपने और सभी अङ्गोंके जर्जर एवं शिथिल हो जानेपर वह सभीको अप्रिय लगता है। जो युवावस्थाके बाद वार्धक्यमें अपनेमें भारी परिवर्तन और अपनी शक्तिहीनताको देखकर विरक्त नहीं होता—धर्म और भगवान्की ओर प्रवृत्त नहीं होता, उससे बढ़कर मूर्ख कौन हो सकता है?

बुढ़ापेमें जब पुत्र-पौत्र, बान्धव, दुराचारी नौकर आदि अवज्ञा—उपेक्षा करते हैं, तब अत्यन्त दुःख होता है। बुढ़ापेमें वह धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष-सम्बन्धी कार्योंको सम्पन्न करनेमें असमर्थ रहता है। इसमें वात, पित्त आदिकी विषमतासे अर्थात् न्यूनता-अधिकता होनेसे अनेक प्रकारके रोग होते रहते हैं। इसलिये यह शरीर रोगोंका घर है। ये दुःख प्रायः सभीको समय-समयपर अनुभूत होते ही हैं, फिर उसमें विशेष कहनेकी आवश्यकता ही क्या?

वास्तवमें शरीरमें सैकड़ों मृत्युके स्थान हैं, जिनमें एक तो साक्षात् मृत्यु या काल है, दूसरे अन्य आने-जानेवाली भयंकर आधि-व्याधियाँ हैं, जो आधी मृत्युके समान हैं। आने-जानेवाली

  • अव्यक्तैन्द्रियवृत्तित्वाद् बाल्ये दुःखं महत्पुनः । इच्छत्रापि न शक्नोति कर्तुं वक्तुं च सत्क्रियाम् ॥ दन्तोत्थाने महद्दुःखं मौलेन व्याधिना तथा । बालरोगैश्च विविधैः पीडा बालग्रहैरपि ॥ क्रिमिभिस्तुष्टमानस्य कुष्ठिनः कामिनस्तथा । कण्ठूयनाग्रितापेन यद्धवेत् स्त्रीषु तद्वि तत् ॥

(उत्तरपर्व ४।६३-६४, ७९)

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth