भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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प्रविष्ट होता है। एक दिनमें शुक्र और शोणित मिलकर कलल बनता है। पाँच रातमें वह कलल बुद्ध हो जाता है। सात रातमें बुद्ध मांसपेशी बन जाता है। चौदह दिनोंमें वह मांसपेशी मांस और रुधिरसे व्याप्त होकर दूद हो जाता है। पचीस दिनोंमें उसमें अङ्गुर निकलते हैं। एक महीनेमें उन अङ्गुरोंके पाँच-पाँच भाग—ग्रीवा, सिर, कन्धे, पृष्ठवंश तथा उदर हो जाते हैं। चार मासमें वही अङ्गुरोंका भाग अँगुली बन जाता है। पाँच महीनेमें मुख, नासिका और कान बनते हैं। छः महीनेमें दन्तपंक्तियाँ, नख और कानके छिद्र बनते हैं। सातवें महीनेमें गुदा, लिङ्ग अथवा योनि और नाभि बनते हैं, संधियाँ उत्पन्न होती हैं और अङ्गोंमें संकोच भी होता है। आठवें महीनेमें अङ्ग-प्रत्यङ्ग सब पूर्ण हो जाते हैं और सिरमें केश भी आ जाते हैं। माताके भोजनका रस नाभिके द्वारा बालकके शरीरमें पहुँचता रहता है, उसीसे उसका पोषण होता है। तब गर्भमें स्थित जीव सब सुख-दुःख समझता है और यह विचार करता है कि 'मैंने अनेक योनियोंमें जन्म लिया और बारम्बार मृत्युके अधीन हुआ तथा अब जन्म होते ही फिर संसारके बन्धनको प्राप्त करूँगा।' इस प्रकार गर्भमें विचारता और मोक्षका उपाय सोचता हुआ जीव अतिशय दुःखी रहता है। पर्वतके नीचे दब जानेसे जितना क्लेश जीवको होता है, उतना ही जरायुसे वेष्टित अर्थात् गर्भमें होता है। समुद्रमें डूबनेसे जो दुःख होता है, वही दुःख गर्भके जलमें भी होता है, तस लोहेके खम्भसे बाँधनेमें जीवको जो क्लेश होता है वही गर्भमें जठराग्निके तापसे होता है। तपायी हुई सूह्योंसे बेधनेपर जो व्यथा होती है, उससे आठ गुना अधिक गर्भमें जीवको कष्ट होता है। जीवोंके लिये गर्भवाससे अधिक कोई दुःख नहीं है। उससे भी कोटि गुना दुःख जन्म लेते

समय होता है, उस दुःखसे मूर्च्छा भी आ जाती है। प्रबल प्रसववायुकी प्रेरणासे जीव गर्भके बाहर निकलता है। जिस प्रकार कोल्हूमें पीडन करनेसे तिल निस्सार हो जाते हैं, उसी प्रकार शरीर भी योनियन्त्रके पीडनसे निस्तत्त्व हो जाता है। मुखरूप जिसका द्वार है, दोनों ओष्ठ कपाट हैं, सभी इन्द्रियाँ गवाक्ष अर्थात् झरोखे हैं, दाँत, जिह्वा, गला, वात, पित्त, कफ, जरा, शोक, काम, क्रोध, तृष्णा, राग, द्वेष आदि जिसमें उपकरण हैं, ऐसे इस देहरूप अनित्य गृहमें नित्य आत्माका निवास-स्थान है। शुक्र-शोणितके संयोगसे शरीर उत्पन्न होता है और नित्य ही मूत्र, विष्टा आदिसे भरा रहता है। इसलिये यह अत्यन्त अपवित्र है। जिस प्रकार विष्टासे भरा हुआ घट बाहर धोनेसे शुद्ध नहीं होता, इसी प्रकार यह देह भी स्नान आदिके द्वारा पवित्र नहीं हो सकता। पञ्चगव्य आदि पवित्र पदार्थ भी इसके संसर्गसे अपवित्र हो जाते हैं। इससे अधिक और कौन अपवित्र पदार्थ होगा। उत्तम भोजन, पान आदि देहके संसर्गसे मलरूप हो जाते हैं, फिर देहकी अपवित्रताका क्या वर्णन करें। देहको बाहरसे जितना भी शुद्ध करें, भीतर तो कफ, मूत्र, विष्टा आदि भरे ही रहेंगे। सुगन्धित तेल देहमें मलते रहें, परंतु कभी इस देहकी मलिनता कम नहीं होती। यह आश्चर्य है कि मनुष्य अपने देहका दुर्गन्ध सृष्टिकर, नित्य अपना मल-मूत्र देखकर और नासिकाका मल निकालकर भी इस देहसे विरक्त नहीं होता और उसे देहसे घृणा उत्पन्न नहीं होती। यह मोहका ही प्रभाव है कि शरीरके दोष और दुर्गन्ध देख-सृष्टिकर भी इससे ग्लानि नहीं होती। यह शरीर स्वभावतः अपवित्र है। यह केलेके वृक्षकी भाँति केवल त्वक आदिसे आवृत और निस्सार है। जन्म होते ही बाहरकी वायुके स्पर्शसे पूर्वजन्मोंका ज्ञान नष्ट

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