भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 399, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
भी कितनी भी अपनी रक्षा करे, किंतु जो होना होता है, वह होता ही है—इसमें किसी प्रकारका संदेह नहीं है। मनुष्योंके भाग्यानुसार जो भी शुभ और अशुभ होना है, वह अवश्य ही होता है। हजारों उपाय करनेपर भी भावी किसी भी प्रकार नहीं टल सकती१। कोई शोक-विह्वल होकर आँसू टपकाता है, कोई रोता है, कोई बड़ी प्रसन्नतासे नाचता है, कोई मनोहर गीत गाता है, कोई धनके लिये अनेक उपाय करता है, इस तरह अनेक प्रकारके जालकी रचना करता रहता है, अतः यह संसार एक नाटक है और सभी प्राणिवर्ग उस नाटकके पात्र हैं।'
इतना उपदेश देकर भगवान्ने रानीका हाथ पकड़कर कहा—'नारदजी! तुमने विष्णुकी माया देख ली। उठो! अब स्नानकर अपने पुत्र-पौत्रोंको अर्घ्य देकर और्ध्वदैहिक कृत्य करो। यह माया विष्णुने स्वयं निर्मित की है।' इतना कहकर उसी
पुण्यतीर्थमें नारदको स्नान कराया। स्नान करते ही स्त्री-रूपको छोड़कर नारदमुनिने अपना रूप धारण कर लिया। राजाने भी अपने मन्त्री और पुरोहितोंके साथ देखा कि जटाधारी, यज्ञोपवीतधारी, दण्ड-कमण्डलु लिये, वीणा धारण किये हुए, खड़ाऊँके ऊपर स्थित एक तेजस्वी मुनि हैं, यह मेरी रानी नहीं है। उसी समय भगवान् नारदका हाथ पकड़कर आकाश-मार्गसे क्षणमात्रमें श्वेतद्वीप आ गये।
भगवान्ने नारदसे कहा —देवर्षि नारदजी! आपने मेरी माया देख ली। नारदके देखते-देखते ऐसा कहकर भगवान् विष्णु अन्तर्हित हो गये। देवर्षि नारदजीने भी हँसकर उन्हें प्रणाम किया और भगवान्की आज्ञा प्राप्त कर तीनों लोकोंमें घूमने लगे। महाराज! इस विष्णुमायाका हमने संक्षेपमें वर्णन किया। इस मायाके प्रभावसे संसारके जीव पुत्र, स्त्री, धन आदिमें आसक्त हो रोते-गाते हुए अनेक प्रकारकी चेष्टाएँ करते हैं। (अध्याय ३)
संसारके दोषोंका वर्णन
महाराज युधिष्ठिरने पूछा —भगवन! यह जीव किस कर्मसे देवता, मनुष्य और पशु आदि योनियोंमें उत्पन्न होता है? बालभावमें कैसे पुष्ट होता है और किस कर्मसे युवा होता है? किस कर्मके फलस्वरूप अतिशय भयंकर दारुण गर्भवासका कष्ट सहन करता है? गर्भमें क्या खाता है? किस कर्मसे रूपवान्, धनवान्, पण्डित, पुत्रवान्, त्यागी और कुलीन होता है? किस कर्मसे रोगरहित जीवन व्यतीत करता है? कैसे सुखपूर्वक मरता है? शुभ और अशुभ फलका भोग कैसे करता
है? हे विमलमते! ये सभी विषय मुझे बहुत ही गहन मालूम होते हैं?
भगवान् श्रीकृष्णने कहा —महाराज! उत्तम कर्मोंसे देवयोनि, मिश्रकर्मोंसे मनुष्ययोनि और पाप-कर्मोंसे पशु आदि योनियोंमें जन्म होता है। धर्म और अधर्मके निश्चयमें श्रुति ही प्रमाण है। पापसे पापयोनि और पुण्यसे पुण्ययोनि प्राप्त होती है२।
ऋतुकालके समय दोषरहित शुक्र वायुसे प्रेरित स्त्रीके रक्तके साथ मिलकर एक हो जाता है। शुक्रके साथ ही कर्मोंके अनुसार प्रेरित जीवयोनियोंमें
१-पातालमाविशतु यातु सुरेन्द्रलोकमारोहतु क्षितिधराधिपतिं सुमेरुम्।
मन्त्रीपधिप्रहरणैश्च करोतु रक्षां यद्वावि तद्भवति नाथ विभावितोऽस्मि ॥ (उत्तरपर्व ४।९५)
२-शुभैर्देवत्वमाप्नोति मिश्रैर्मानुषतां ब्रजेत् । अशुभैः कर्मभिर्जनस्तुत्तियोनियु जायते ॥
प्रमाणं श्रुतिरेवात्र धर्माधर्मविनिश्चये । पापं पापेन भवति पुण्यं पुण्येन कर्मणा ॥ (उत्तरपर्व ४।६-७)
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