भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • उत्तरपर्व *

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इस प्रकार मार्गमें बातचीत करते हुए वे दोनों कायकुब्ज देशके समीप पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक अतिशय रम्य सरोवर देखा। उस सरोवरकी शोभा देखकर वे बहुत प्रसन्न हुए।

भगवान्ने कहा— नारद! यह उत्तम तीर्थस्थान है। इसमें स्नान करना चाहिये, फिर कत्रौज नामके नगरमें चलेगे। इतना कहकर भगवान् उस सरोवरमें स्नानकर शीघ्र ही बाहर आ गये।

तदनन्तर नारदजी भी स्नान करनेके लिये सरोवरमें प्रविष्ट हुए। स्नान सम्पन्न कर जब वे बाहर निकले, तब उन्होंने अपनेको दिव्य कन्याके रूपमें देखा। उस कन्याके विशाल नेत्र थे। चन्द्रमाके समान मुख था, वह सर्वाङ्ग-सुन्दरी कन्या दिव्य शुभलक्षणोंसे सम्पन्न थी। अपनी सुन्दरतासे संसारको व्यामोहित कर रही थी। जिस प्रकार समुद्रसे सम्पूर्ण रूपकी निधान लक्ष्मी निकली थीं, उसी प्रकार सरोवरसे स्नानके बाद नारदजी स्त्रीके रूपमें निकले। भगवान् अन्तर्धान हो गये। वह स्त्री भी अपने झुंडसे भ्रष्ट अकेली हरिणीकी तरह भयभीत होकर इधर-उधर देखने लगी। इसी समय अपनी सेनाओंके साथ राजा तालध्वज वहाँ आया और उस सुन्दरीको देखकर सोचने लगा कि यह कोई देवस्त्री है या अप्सरा? फिर बोला—‘बाले! तुम कौन हो, कहाँसे आयी हो?’ उस कन्याने कहा—‘मैं माता-पितासे रहित और निराश्रय हूँ। मेरा विवाह भी नहीं हुआ है, अब आपकी ही शरणमें हूँ।’ इतना सुनते ही प्रसन्नचित्त हो राजा उसे घोड़ेपर बैठाकर राजधानी पहुँचा और विधिपूर्वक उससे विवाह कर लिया। तेरहवें वर्षमें वह गर्भवती हुई। समय पूर्ण होनेपर उससे एक तुम्बी (लौकी) उत्पन्न हुई, जिसमें पचास छोटे-छोटे दिव्य शरीरवाले

युद्धमें कुशल बलशाली बालक थे, उसने उनको घृतकुण्डमें छोड़ दिया, कुछ दिन बाद पुत्र और पौत्रोंकी खूब वृद्धि हो गयी। वे महान् अहंकारी, परस्पर-विरोधी और राज्यकी कामना करनेवाले थे। अनन्तर राज्यके लोभसे कौरव और पाण्डवोंकी तरह परस्पर युद्ध करके समुद्रकी लहरोंकी भाँति लड़ते हुए वे सभी नष्ट हो गये। वह स्त्री अपने वंशका इस प्रकार संहार देखकर छाती पीटकर करुणापूर्वक विलाप करती हुई मूर्च्छित हो पृथ्वीपर गिर पड़ी। राजा भी शोकसे पीड़ित हो रोने लगा।

इसी समय ब्राह्मणका रूप धारण कर भगवान् विष्णु द्विजोंके साथ वहाँ आये और राजा तथा रानीको उपदेश देने लगे—‘यह विष्णुकी माया है। तुमलोग व्यर्थ ही रो रहे हो। सम्पूर्ण प्राणियोंकी अन्तमें यही स्थिति होती है। विष्णुमाया ही ऐसी है कि उसके द्वारा सैकड़ों चक्रवर्ती और हजारों इन्द्र उसी तरह नष्ट कर दिये गये हैं जैसे दीपकको प्रचण्ड वायु विनष्ट कर देती है। समुद्रको सुखानेके लिये भूमिको पीसकर चूर्ण कर डालनेकी तथा पर्वतको पीठपर उठानेकी सामर्थ्य रखनेवाले पुरुष भी कालके काराल मुखमें चले गये हैं। त्रिकूट पर्वत जिसका दुर्ग था, समुद्र जिसकी खाई थी, ऐसी लंका जिसकी राजधानी थी, राक्षसगण जिसके योद्धा थे, सभी शास्त्रों और वेदोंको जाननेवाले शुक्राचार्य जिसके लिये मन्त्रणा करते थे, कुबेरके धनको भी जिसने जीत लिया था, ऐसा रावण भी दैववश नष्ट हो गया*। युद्धमें, घरमें, पर्वतपर, अग्निमें, गुफामें अथवा समुद्रमें कहीं भी कोई जाय, वह कालके कोपसे नहीं बच सकता। भावी होकर ही रहती है। पातालमें जाय, इन्द्रलोकमें जाय, मेरु पर्वतपर चढ़ जाय, मन्त्र, औषध, शस्त्र आदिसे

  • दुर्गस्त्रिकूटः परिखा समुद्रो रक्षांसि योधा धनदाच्च वित्तम्।

शास्त्रं च यस्यांशनासा प्रणीतं स रावणो दैववशाद् विपन्नः ॥ (उत्तरपर्व ४।१३)

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