भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 390, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
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अर्बपुरीका निर्माण किया। धीरे-धीरे वहाँ आर्य आकर बसने लगे और फिर आर्यकुलकी वृद्धि हो गयी। अर्बबलीने पचास वर्षोंतक राज्य किया। उसके वंशमें डेढ़ सौ राजा हुए। दस हजार वर्षके बाद म्लेच्छोंके मित्र वर्णसंकरणोंने म्लेच्छ-कन्याओंके साथ विवाह किया।
आर्यमार्गानुगामी नाममात्रके रह गये। उस समय मलयदेशस्थ एक लाख म्लेच्छोंका अर्बुदीय आर्यके साथ भयंकर युद्ध हुआ। उसमें महाबलशाली म्लेच्छोंने विजय प्राप्त की। सम्पूर्ण भूमि म्लेच्छमयी हो गयी और सर्वत्र अलक्ष्मीका निवास हो गया। (अध्याय २२-२३)
कलिके द्वितीय, तृतीय तथा चतुर्थ चरणोंका वृत्तान्त तथा कलिक भगवान्का अवतार
सूतजीने कहा—शौनक! म्लेच्छोंकी विजय होनेपर कलिने उन्हें सम्मानित किया। तदनन्तर सभी दैत्यगण अनेकों जलयानोंका निर्माणकर हरिखण्डमें आये। उस समय हरिखण्डमें भी मनुष्य देवताओंके समान महाबलशाली थे। उन लोगोंने दैत्योंके साथ भयंकर अस्त्र-शस्त्रोंसे युद्ध किया, किंतु दस वर्षके बाद वे सभी दैत्योंके मायायुद्धसे पराजित हो गये। तब वे हरिखण्डनिवासी महेन्द्रकी शरणमें गये। भगवान् शक्रने विश्वकर्मसे कहा—‘तात! सप्तसिन्धुओंमें तुम्हारे द्वारा विरचित भ्रमि नामक यन्त्र अवस्थित है। उस यन्त्रके प्रभावसे मानव एक खण्डसे दूसरे खण्डमें नहीं जा पाते; किंतु मायावी मयने उसे भ्रष्ट कर दिया है। फलतः सातों द्वीपोंमें मेरे शत्रु म्लेच्छगण सब जगह जाने लगे हैं। इसलिये आपके द्वारा सम्पादित जो मर्यादा है, उससे हमलोगोंकी आप रक्षा करें।’
यह सुनकर विश्वकर्मने एक दिव्य भ्रमि यन्त्रका निर्माण किया। उस यन्त्रके प्रभावसे वे सब भ्रमित हो गये। भ्रमि-यन्त्रसे म्लेच्छविनाशक एक महावायु उत्पन्न हुआ। उस महावायुसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ जो वात्य कहलाया। ज्ञानमय उस वात्यने दैत्यों, यक्षों और पिशाचोंको जीतकर त्रैवर्णिक द्विजोंका सत्कार किया। महाबली वात्यने म्लेच्छोंको उनके वर्णमें प्रतिष्ठित किया और पचास वर्षोंतक पृथ्वीपर ‘मण्डलीक’ पदको
सुशोभित किया। उसके वंशमें कलियुगमें हजारों राजा हुए। जिन्होंने सोलह हजार वर्षतक राज्य किया और वे सभी वायुके उपासक हुए।
दुःखित हो कलिने पुनः दैत्यराज बलिके पास जाकर वात्यवंशका सम्पूर्ण वृत्तान्त बतलाया, तब बलिने अपने मित्र कलिके साथ वामनभगवान्के पास आकर नमस्कार कर कहा—‘हे सुरोत्तम! मुझपर प्रसन्न होकर आपने मेरे लिये कलिको बनाया है, परंतु वह कलि वात्य-द्विजोंके द्वारा तिरस्कृत कर दिया गया है। प्रभो! कलियुगके एक चरण व्यतीत होनेमें थोड़ा ही समय शेष है। इतने समयमें मेरी अपेक्षा देवोंका अधिक राज्य रहा। मैंने तो देवेन्द्रकी मायाके कारण पृथ्वीका अधिकार छोड़ दिया है। अतः आप मेरे मित्र इस कलिकी रक्षा करें।’ तब भगवान् वामन हरि अपने पूर्वार्ध अंशसे यमुनातटनिवासी कामशर्मा नामक ब्राह्मणके घर उसकी पत्नी देवहूतिसे दो दिव्य पुत्रोंके रूपमें उत्पन्न हुए। एकका नाम था भोगसिंह और दूसरेका नाम था केलिसिंह। वे वात्यसे उत्पन्न राजाओंको जीतकर कल्पक्षेत्रमें आये। मयनिर्मित रहःक्रीडावती नामकी नगरीमें रहकर बलवान् उन दोनोंने कलिकी धुरीको धारण किया। कालान्तरमें कलियुगमें विपुल वर्णसंकरणकी सृष्टि हो गयी। वृक्षपरके पक्षीके समान इनकी प्रभूत वृद्धि हो गयी। दो हजार वर्षके बाद इन्होंने
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