भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 389, कुल 654 में से

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

उसके वंशके सात और गुरुण्ड राजा हुए, जो चौंसठ वर्षों तक राज्यकर नष्ट हो गये। गुरुण्डके आठवें राजातक न्यायपूर्वक शासन करनेपर कलिपक्षीय बलि दैत्यने मुर नामक महान् असुरको देवदेशमें भेजा। वह मुर वाडिल राजाको वशमें करके आर्य-धर्मके विनाशके लिये तत्पर हो गया। मूर्तिमें स्थित देवगणोंने महाप्रभुचैतन्य यज्ञाशके पास जाकर नमस्कार कर मुर नामक दैत्यके आनेकी बात कही। यह जानकर कृष्णांशने बौद्धपंथी गुरुण्डको शाप दिया कि 'जो मुरके मतमें हैं, वे नष्ट हो जायँगे।' इस तरहकी बात कहनेपर कालसे प्रेरित समस्त दुष्ट गुरुण्ड अपनी सेनाओंके साथ एक वर्षके अंदर ही नष्ट हो गये। वह राजा वाडिल भी विनाशको प्राप्त हो गया। तत्पश्चात् मेकल (लार्ड मेकाले) नामक नौवों वीर्यवान् (शिक्षाशास्त्री) गुरुण्ड आया। इसने न्यायपूर्वक बारह वर्षतक राज्य किया। दसवों लार्डल (लार्ड वेवल) नामक विख्यात गुरुण्डने बत्तीस वर्षतक धर्मपूर्वक राज्य किया। लार्डलके स्वर्ग जानेपर मकरन्दकुलमें उत्पन्न आर्योंने शासन किया। तदनन्तर हिमलुंग-निवासी मौनोंने राज्य प्राप्त किया। वे बध्रुवर्ण, सूक्ष्म तथा बर्तुल नासावाले एवं दीर्घ मस्तकवाले बौद्धमार्गगामी लाखोंकी संख्यामें देहली आये। उनका राजा हुआ आर्जिक। उसके पुत्र देवकर्णने गङ्गोत्रगिरिके शिखरपर राज्यकी वृद्धिके लिये बारह वर्षतक घोर तपस्या की। उस बुद्धिमान्की तपस्यासे भगवती गङ्गाने उसे दर्शन दिया और कुबेरने उसे आर्योंका मण्डलीक-पद प्रदान किया। तदनन्तर मण्डलीक देवकर्ण प्रजापालक राजा हुआ। साठ वर्षतक उसने महीतलपर राज्य किया। उसके वंशमें देवपूजक आठ राजा हुए। दो सौ वर्षतक राज्य करके वे स्वर्गलोक चले गये। ग्यारहवों मौन राजा पन्नगारि हुआ। वह चालीस वर्षतक राज्य करनेके बाद

पन्नगोद्धार मृत्युको प्राप्त हो गया। इस प्रकारसे महीतलपर मौन-जातियोंका राज्य हुआ।

इसके अनन्तर नागवंशीय, आन्ध्रवंशीय, कौसलदेशीय, नैषधदेशीय, सौराष्ट्रदेशीय तथा गुर्जरदेशीय राजाओंने अनेक वर्षों तक राज्य किया। गुर्जरदेशमें कलिन आभीरीके गर्भसे 'राहु' नामसे सिंहिकाके पुत्ररूपमें जन्म ग्रहण किया। जैसे चन्द्रको कष्ट देनेवाला नभोमण्डलमें सिंहिकापुत्र राहु स्थित है, वैसे ही कलिका अंशभूत देवताओंको कष्ट देनेवाला आभीरीका राहु नामका पुत्र उत्पन्न हुआ। इसके उत्पन्न होते ही पृथ्वीपर भयंकर भूकम्प होने लगा। सभी विपरीत ग्रह भयंकर दुःख उत्पन्न करने लगे। उसके भयसे देवगण अपनी-अपनी मूर्तियों-प्रतिमाओंमेंसे देवांशका परित्याग कर सुमेरु पर्वतके शिखरपर महेन्द्रकी शरणमें चले गये। उन लोगोंके कल्याणके लिये भगवान् शक्रने जगदम्बिकाकी स्तुति की। तब कन्यामूर्ति उस कल्याणकारी देवीने देवताओंसे कहा—'देवगणों! मेरे दर्शनसे आपलोग भूख-प्याससे रहित हो जायँगे।' यह सुनकर देवगण प्रसन्न हुए।

आभीरी-पुत्र राहु सौ वर्ष राज्य करके अपना प्राण त्यागकर कलिनमें लीन हो गया। उसके वंशमें डेढ़ सौ राजा हुए, जिन्होंने दस हजार वर्षतक राज्य किया। उन्होंने नष्ट हुए महामदके मतका पुनः प्रचार किया। वे सभी म्लेच्छ हुए। उस समय कलियुगमें न वेदाध्ययन था, न वर्ण-व्यवस्था थी और न देवता ही थे। कोई भी मर्यादा नहीं थी। जो शेष ब्राह्मण थे वे अर्बुद शिखरपर रहने लगे और बारह वर्षों तक प्रयत्नपूर्वक देवताओंकी आराधना करने लगे। फलतः अर्बुद शिखरसे खड्ग और चर्मधारी एक क्षत्रिय प्रादुर्भूत हुआ। उसका नाम हुआ अर्वबली। उसने भयंकर म्लेच्छोंको जीतकर पाँच योजन भूमिपर

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