भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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पृष्ठ 388
  • प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *

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विनाश कर दैत्य-पक्षकी अभिवृद्धि कर रहा है। नदीहाके वनमें स्थित यज्ञाशने यह सुनकर उस दुराचारीके वंशक्षयका शाप दिया। उनचास वर्षांतक उस दुष्टात्माने राज्य किया।

उस समय देवपक्षकी वृद्धि करनेवाले सेवाजय (छत्रपति शिवाजी) नामके एक राजा हुए, जो महाराष्ट्रमें उत्पन्न हुए थे तथा युद्धविद्यामें विशारद थे। उन्होंने उस दुराचारीको मारकर उसके पुत्रको वह स्थान दे दिया। फिर वे दक्षिण देशमें चले गये। आलोमा नामके उसके पुत्रने पाँच वर्षांतक राज्य किया और वह भी दिवंगत हो गया। तालनके कुलमें बलवान् म्लेच्छ 'फलरुष' हुआ। उसने मुकल (मुगल) कुलका नाश कर दस वर्षांतक राज्य किया और अन्तमें वह शत्रुओंसे मारा गया। उसका बेटा महामद हुआ, उसने बीस वर्षांतक राज्य किया।

उसी समय नादर (फारस-निवासी नादिरशाह दुर्गनी) नामका एक भारी लुटेरा देशमें आया और आर्योंको मारकर देवताओंको जीतकर वह खुरज (ईरान) देशमें चला गया। महामदका पुत्र था महामत्स्य। उसने अपने पिताके स्थानको ग्रहण कर पाँच वर्षांतक राज्य किया। तालनवंशमें उत्पन्न दुष्ट महामत्स्य महाराष्ट्रियोंद्वारा मारा गया। माधवने देहली नगरमें दस वर्षांतक राज्य किया। उसने म्लेच्छ आलोमाके राज्यको प्राप्त किया। उस राष्ट्रमें अपने देशमें उत्पन्न अनेक राजा हुए। देश-देशमें, ग्राममें रहनेवाले बहुत-से राजा हो गये। प्रायः कोई चक्रवर्ती सम्राट् नहीं रहा। सर्वत्र छोटे-छोटे मण्डलीकों (तालुकेदारों)-के अधिकारमें देश विभक्त हो गया। कुछ लोग तो गाँव-गाँवके ही मालिक

रहे। इस प्रकार तीस वर्ष बीत गये।

इसके बाद सभी देवगण कृष्णचैतन्यके* पास आये। उन्होंने महीतलपर उनके दुःखको जानकर एक मुहूर्तके लिये ध्यानस्थ होकर देवताओंसे कहा—'पूर्वकालमें बुद्धिमान् राघवने राक्षस रावणको जीतकर सुधावृष्टिके द्वारा वानरोंको जीवित कर लिया था। विकट, वृजिल, जाल, बरलीन, सिंहल, जव (जावा), सुमात्र (सुमात्रा) नामके छोटे-छोटे वानरोंने भगवान् रामचन्द्रसे कहा कि हमलोगोंको मनोवाञ्छित वर दीजिये। दाशरथि रामने उनके मनोरथोंको जानकर रावणके द्वारा देवाङ्गनाओंसे उत्पन्न कन्याओंको वानरोंको प्रदान किया और प्रसन्नचित्त हो वानरोंसे कहा कि 'जालंधरद्वारा निर्मित आपलोगोंके नामसे जो द्वीप होंगे, उन द्वीपोंके आपलोग राजा होंगे और ये आपलोगोंकी रानियाँ होंगी। नन्दिनी गौके रूण्ड (धड)-से जो म्लेच्छ उत्पन्न होंगे वे गुरुण्ड कहलायेंगे। उन्हें जीतकर आपलोग श्रेष्ठ राज्य प्राप्त करेंगे।'

यह सुनकर हरिको नमस्कारकर आनन्दपूर्वक वे सभी द्वीपोंमें चले गये। देवगणों! विकटके वंशमें उत्पन्न तथा उसके द्वारा प्रेरित वानरमुखी गुरुण्ड-लोग व्यापारकी दृष्टिसे यहाँ आये और उनका हृदय ईश-पुत्र (खिष्ट, ईशु या ईसामसीह)-का मतावलम्बी था। वे सत्यव्रती, कामजित, क्रोधरहित और सूर्यपरायण हैं। आपलोग वहाँ रहकर उनका कार्य करें। यह सुनकर देवता सूर्यकी आदरपूर्वक अर्चना कर कलिकातामें आ गये। पश्चिम द्वीपमें विकट नामका राजा हुआ, उसकी पत्नी विकटावती (विकटोरिया)-ने अष्ट कौशलमार्गसे (पार्लियामेंटके परामर्शसे) शासन किया।

प्रामाणिक ऐतिहासिक जीवनी प्रसिद्ध है। कैम्ब्रिज इतिहासके चौथे भागके उत्तरार्धमें औरंगजेबका वृत्तान्त इन्हींके द्वारा लिखित है। यहाँ चैतन्य शब्दसे भगवान् जगन्नाथ भी अभीष्ट हो सकते हैं।

  • यहाँ भी तत्कालीन गौड़ीय सम्प्रदायका कोई आचार्य समझ जाना चाहिये, क्योंकि महाप्रभु चैतन्य तो इससे प्रायः ४५० वर्ष पूर्व हुए थे।

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