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भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ
  • प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *

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अर्बपुरीका निर्माण किया। धीरे-धीरे वहाँ आर्य आकर बसने लगे और फिर आर्यकुलकी वृद्धि हो गयी। अर्बबलीने पचास वर्षोंतक राज्य किया। उसके वंशमें डेढ़ सौ राजा हुए। दस हजार वर्षके बाद म्लेच्छोंके मित्र वर्णसंकरणोंने म्लेच्छ-कन्याओंके साथ विवाह किया।

आर्यमार्गानुगामी नाममात्रके रह गये। उस समय मलयदेशस्थ एक लाख म्लेच्छोंका अर्बुदीय आर्यके साथ भयंकर युद्ध हुआ। उसमें महाबलशाली म्लेच्छोंने विजय प्राप्त की। सम्पूर्ण भूमि म्लेच्छमयी हो गयी और सर्वत्र अलक्ष्मीका निवास हो गया। (अध्याय २२-२३)

कलिके द्वितीय, तृतीय तथा चतुर्थ चरणोंका वृत्तान्त तथा कलिक भगवान्का अवतार

सूतजीने कहा—शौनक! म्लेच्छोंकी विजय होनेपर कलिने उन्हें सम्मानित किया। तदनन्तर सभी दैत्यगण अनेकों जलयानोंका निर्माणकर हरिखण्डमें आये। उस समय हरिखण्डमें भी मनुष्य देवताओंके समान महाबलशाली थे। उन लोगोंने दैत्योंके साथ भयंकर अस्त्र-शस्त्रोंसे युद्ध किया, किंतु दस वर्षके बाद वे सभी दैत्योंके मायायुद्धसे पराजित हो गये। तब वे हरिखण्डनिवासी महेन्द्रकी शरणमें गये। भगवान् शक्रने विश्वकर्मसे कहा—‘तात! सप्तसिन्धुओंमें तुम्हारे द्वारा विरचित भ्रमि नामक यन्त्र अवस्थित है। उस यन्त्रके प्रभावसे मानव एक खण्डसे दूसरे खण्डमें नहीं जा पाते; किंतु मायावी मयने उसे भ्रष्ट कर दिया है। फलतः सातों द्वीपोंमें मेरे शत्रु म्लेच्छगण सब जगह जाने लगे हैं। इसलिये आपके द्वारा सम्पादित जो मर्यादा है, उससे हमलोगोंकी आप रक्षा करें।’

यह सुनकर विश्वकर्मने एक दिव्य भ्रमि यन्त्रका निर्माण किया। उस यन्त्रके प्रभावसे वे सब भ्रमित हो गये। भ्रमि-यन्त्रसे म्लेच्छविनाशक एक महावायु उत्पन्न हुआ। उस महावायुसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ जो वात्य कहलाया। ज्ञानमय उस वात्यने दैत्यों, यक्षों और पिशाचोंको जीतकर त्रैवर्णिक द्विजोंका सत्कार किया। महाबली वात्यने म्लेच्छोंको उनके वर्णमें प्रतिष्ठित किया और पचास वर्षोंतक पृथ्वीपर ‘मण्डलीक’ पदको

सुशोभित किया। उसके वंशमें कलियुगमें हजारों राजा हुए। जिन्होंने सोलह हजार वर्षतक राज्य किया और वे सभी वायुके उपासक हुए।

दुःखित हो कलिने पुनः दैत्यराज बलिके पास जाकर वात्यवंशका सम्पूर्ण वृत्तान्त बतलाया, तब बलिने अपने मित्र कलिके साथ वामनभगवान्के पास आकर नमस्कार कर कहा—‘हे सुरोत्तम! मुझपर प्रसन्न होकर आपने मेरे लिये कलिको बनाया है, परंतु वह कलि वात्य-द्विजोंके द्वारा तिरस्कृत कर दिया गया है। प्रभो! कलियुगके एक चरण व्यतीत होनेमें थोड़ा ही समय शेष है। इतने समयमें मेरी अपेक्षा देवोंका अधिक राज्य रहा। मैंने तो देवेन्द्रकी मायाके कारण पृथ्वीका अधिकार छोड़ दिया है। अतः आप मेरे मित्र इस कलिकी रक्षा करें।’ तब भगवान् वामन हरि अपने पूर्वार्ध अंशसे यमुनातटनिवासी कामशर्मा नामक ब्राह्मणके घर उसकी पत्नी देवहूतिसे दो दिव्य पुत्रोंके रूपमें उत्पन्न हुए। एकका नाम था भोगसिंह और दूसरेका नाम था केलिसिंह। वे वात्यसे उत्पन्न राजाओंको जीतकर कल्पक्षेत्रमें आये। मयनिर्मित रहःक्रीडावती नामकी नगरीमें रहकर बलवान् उन दोनोंने कलिकी धुरीको धारण किया। कालान्तरमें कलियुगमें विपुल वर्णसंकरणकी सृष्टि हो गयी। वृक्षपरके पक्षीके समान इनकी प्रभूत वृद्धि हो गयी। दो हजार वर्षके बाद इन्होंने

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

पूर्ववर्ती मानवोंको समाप्त कर दिया। उस समय पृथ्वीपर कलिका द्वितीय चरण आ गया। इस समय किन्नरोंकी वार्ता भूतलपर वर्तमान है। वे दैत्यमय मनुष्य ढाई हाथमात्र ऊँचे हो गये और उनकी अवस्था चालीस वर्ष हुई तथा वे पक्षियोंके समान कर्महीन हो गये। कलिके द्वितीय चरणके अन्तमें न विवाह होगा, न राजा रहेंगे, न कोई उद्यमशील रहेंगे और न कर्मकर्ता रहेंगे। भोगसिंह और केलिसिंहके वंशज सवा लाख वर्षतक पृथ्वीमें रहेंगे। इसलिये हे मुनिगणो! आप सबको मेरे साथ कृष्णचैतन्यके पास चलना चाहिये।

व्यासजी बोले— हे मनो! विशालापुननिवासी वे सभी मुनिगण प्रसन्नचित्त होकर यज्ञांशके पास जायँगे और उन्हें प्रणाम कर इन्द्रलोक जानेकी अनुमति माँगेंगे। तब यज्ञांश चैतन्य, आह्लाद, योगी गोरख, शंकर आदि रुद्रांशों और राजा भर्तृहरि आदि अपने सभी शिष्यों तथा अन्य योगिजनों और विशालापुननिवासी मुनियोंके साथ विमानपर आरूढ़ होकर देवलोक चले जायँगे। तब कलिके द्वितीय चरणमें वामनांशसे उद्भूत भोगसिंह और केलिसिंह योगमार्गका अवलम्बन कर कल्पक्षेत्रमें स्थित होंगे और दैत्यवर्गकी अभिवृद्धि करेंगे।

कलिके तृतीय चरणके आनेपर किन्नरगण धीरे-धीरे पृथ्वीपर विनष्ट हो जायँगे। कलियुगके तृतीय चरणके छब्बीस हजार वर्ष व्यतीत होनेपर रुद्रकी आज्ञासे भुङ्ग-ऋषि सौरभी नामकी पत्नीसे महाबलवान् कौलकल्प नामक मनुष्योंको उत्पन्न करेंगे जो सभी किन्नरोंका भक्षण करनेवाले होंगे। उस समय कलिमें उनकी उम्र छब्बीस वर्षकी होगी। भयभीत किन्नर वामनांशकी शरणमें जायँगे और तब भोगसिंह तथा केलिसिंहके साथ कौलकल्पोंका घोर युद्ध होगा। दस वर्ष युद्ध करनेके पश्चात् भोगसिंह आदि सब पराजित हो

जायँगे। दैत्योंके साथ वामनांश (भोगसिंह, केलिसिंह) भी पातालमें चले जायँगे।

घोर कलियुगमें भुङ्ग-ऋषिकी भयंकर सृष्टि होगी। माता-बहिन, पुत्री आदिसे वे मनुष्य पशुवत् व्यवहार करेंगे। कामान्ध होकर वे सब बहुत पुत्रोंको उत्पन्न करेंगे। कलिके तृतीय चरणमें वे सृष्टियाँ भी भयंकर तिर्यक्-योनिको प्राप्त कर नष्ट हो जायँगी।

कलिके चतुर्थ चरणमें मनुष्यकी आयु बीस वर्षकी होगी और वे मरकर नरक जायँगे। उस समय जलीय और वन्य जीवोंके समान वे कन्द-मूल-फल खानेवाले हो जायँगे। जो तामिस्स आदि भयंकर नरक प्रसिद्ध हैं, वे सब कर्मभूमिमें उत्पन्न मानवोंसे भरे जायँगे।

कलियुगके चतुर्थ चरणमें उत्पन्न मनुष्योंके द्वारा इक्कीसों नरकोंमें अजीर्णता आ जायगी—नरक मनुष्योंसे भर जायँगे। तब नरक धर्मराजके पास जाकर कहेंगे कि पापियोंसे हमारे स्थान भर गये हैं। हे सुरोत्तम! जिस तरह हम लोग प्राकृतरूपमें हो जायँ आप वैसा उपाय करें। यह सुनकर धर्मराज चित्रगुप्तके साथ कलियुगके संध्याकालमें ब्रह्माके पास जायँगे और परमेष्ठि पितामह उनके साथ क्षीरसागर जायँगे तथा वहाँ जगन्नाथ देवाधिदेव वृषाकपिकी पूजा कर सांख्यशास्त्रमय स्तोत्रोंसे स्तुति करेंगे एवं रक्षाकी प्रार्थना करेंगे। इसपर वे कहेंगे—देवगणो! लोककल्याणके लिये यह कश्यप सम्भल ग्राममें जन्म लेगा और वहाँ इसका नाम होगा विष्णुयशा। इसकी पत्नीका नाम होगा विष्णुकीर्ति। विष्णुयशा कृष्णलीलाके ग्रन्थ मनुष्योंको सुनायेगा किंतु वे महाधूर्त नारकीय प्राणी उसे भयंकर दृढ़ बन्धनमें बाँधकर कारागारमें डाल देंगे, तब विष्णुकीर्तिसे संसारका कल्याण करनेवाले पूर्ण भगवान् नारायण मार्गशीर्ष मासके कृष्ण पक्षकी अष्टमीके दिन

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  • प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *

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अन्धकारपूर्ण रात्रिमें कल्किरूपमें उत्पन्न होंगे तथा ब्रह्माण्डके कल्याणके लिये सभी देवताओंका भी प्रादुर्भाव होगा और वे सभी देवता तथा ग्रह परमेश्वरकी स्तुति करेंगे। तब भगवान् कल्कि उन्हें कल्पों, मन्वन्तरों, अवतार-कथाओं, सनातन राधा-कृष्णकी

महिमा तथा कर्मभूमि और सभी लोकों एवं ग्रहोंकी स्थितिको बतलायेंगे। इसी प्रसंगमें श्वेतवाराहकल्पकी कथा भी कहेंगे। तदनन्तर प्रसन्न होकर पुनः प्रणाम कर वे सभी देवगण अपने-अपने स्थानोंको चले जायेंगे। (अध्याय २४-२५)

भगवान् कल्किकी विजय, सत्ययुगकी उत्पत्ति-कथा, अक्षयनवमीमें आँवलेके पूजनका माहात्म्य, अयोध्यामें महाराज वैवस्वतका प्रतिष्ठित होना तथा प्रतिसर्गपर्वका उपसंहार

व्यासजीने कहा—अनन्तर पुराणपुरुषसे उत्पन्न भगवान् कल्कि खड्ग, कवच और ढाल धारण कर दिव्य अश्वपर आरूढ़ हो दैत्यस्वरूप म्लेच्छोंको मारकर योगमार्गका आश्रय लेंगे और सोलह हजार वर्षोंतक उनकी योगाग्निसे तपायी गयी कर्मभूमि भस्मीभूत होकर निर्जीव हो जायगी। अनन्तर प्रलयंकर मेघ उत्पन्न होकर प्रलयकारी वृष्टि करेंगे और भूमि उस जलमें निमग्न हो जायगी। उस समय घोर कलियुग बलिके पास चला जायगा। कलियुगके जानेके बाद भगवान् हरि पुनः कर्मभूमिको रमणीय स्थलमयी करके यज्ञोंसे देवीका यजन करेंगे। यज्ञभाग ग्रहण करके वे देवगण शक्तिसम्पन्न हो जायेंगे और वैवस्वतमनुके पास जाकर सम्पूर्ण वृत्तान्त कहेंगे। अनन्तर कल्किके मुखसे ब्राह्मण, बाहुसे क्षत्रिय, जानुसे वैश्य और पैरसे शूद्र वर्ण उत्पन्न होंगे। ये ब्राह्मणादि क्रमशः गौर, रक्त, पीत एवं श्यामवर्णके होंगे और देवीसे शक्ति प्राप्त करके अनेक पुत्र उत्पन्न करेंगे। उस समय मनुष्य जाति-धर्मका आश्रय लेकर देवताओंका यजन करेंगे। तब धीमान् वैवस्वत विष्णुरूप उस कल्कि हरिको नमस्कार कर उनकी आज्ञासे अयोध्यामें राजपद ग्रहण करेंगे। उनकी इच्छासे जो पुत्र उत्पन्न होगा उसका नाम होगा इक्ष्वाकु। राजा इक्ष्वाकु पिता वैवस्वतके राज्यको प्राप्त कर दिव्य सौ वर्षकी आयु प्राप्त कर अन्तमें

शरीरका परित्याग कर देंगे।

जब भगवान् कल्कि ब्रह्मसत्र करेंगे, तब अङ्गोंके साथ चारों वेद मूर्तिमान् हो जायेंगे। अष्टादश पुराणोंके साथ वे वहाँ आयेंगे और वे सभी पुराणपुरुषके अंशभूत कल्किकी स्तुति करेंगे।

कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी नवमी तिथिमें गुरुवारको एक श्रेष्ठ पुरुष यज्ञकुण्डसे उत्पन्न होगा। सत्यमार्गका प्रदर्शक वह सत्ययुग नामसे कहा जायगा। ब्रह्मादि देवगण नवमी तिथिमें इस रमणीय पुरुषके आविर्भावको देखकर उस तिथिका, समस्त कर्मोंका क्षय करनेवाली तिथिके रूपमें वर्णन करेंगे। इस तिथिको जो मनुष्य आँवला-वृक्षके नीचे जिन देवताओंकी पूजा करेगा वे देवता उसके वशमें हो जायेंगे। यह नवमी अक्षयनवमी और युगादि नवमीके नामसे प्रसिद्ध है। यह लोकमङ्गलदायिनी और सभी पापोंका नाश करनेवाली है। आँवलाके वृक्षके नीचे जो मालती और तुलसीको स्थापित कर विधिपूर्वक शालग्रामकी पूजा करता है, वह पितरोंका तुसिकारक एवं जीवनमुक्त होता है। आँवला-वृक्षके नीचे जो श्राद्ध करता है, वह हजारों गया-श्राद्ध करनेका फल प्राप्त करता है और जो व्यक्ति वहाँपर होम करता है, उसे हजारों यज्ञ करनेका फल प्राप्त होता है तथा वह मरनेके बाद अनेक कुटुम्बियोंके साथ स्वर्ग प्राप्त करता है। कल्किदेवता प्रसन्न होकर

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

देवताओंके प्रति 'ऐसा ही हो' यह कहेंगे, यह कहकर भगवान् कलिक देवताओंके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान होकर सुषुप्त हो जायेंगे।

भगवान् कलिकके जानेके बाद दुःखित भगवती कर्मभूमि विरहाग्रिसे संतप्त बीजोंका नाश कर देंगी। उस समय पातालनिवासी महान् दैत्यगण प्रह्लादके साथ अपने वाहनोंपर आरूढ़ हो अनेक अस्त्र-शस्त्रोंको लेकर देवताओंके पास गरजते हुए जायेंगे। तब इन्द्र आदि तैंतीस देवगण अपने आयुधोंको ग्रहण कर उनसे भयंकर युद्ध करेंगे। दिव्य एक वर्षतक उनका भयंकर युद्ध होगा। मरे हुए दैत्योंको शुक्राचार्य जिला देंगे, तब थके हुए देवगण युद्ध छोड़कर क्षीरसागर चले जायेंगे, जहाँ साक्षात् हरि विराजमान रहते हैं। देवगण उनकी स्तुति करेंगे। उनकी स्तुतिसे वे भगवान् देवताओंके कल्याणके लिये अपने पूर्वार्धसे हंसरूप बना लेंगे। वे हंसरूपी

साक्षात् हरि सैकड़ों सूर्यकी कान्तिके समान प्रभावशाली होंगे। प्रह्लादादि प्रमुख दैत्यगण एवं शुक्राचार्यको वे अपने तेजसे तप्त कर देंगे। तब पराजित दैत्यगण पृथ्वीको छोड़कर दुःखित हो वितललोकमें चले जायेंगे। महादेवसे रक्षित वे सभी देवगण निर्भय, निरुपद्रव हो जायेंगे और पृथ्वीपर वैवस्वतके पुत्रका अभिषेक करेंगे। वे इक्ष्वाकु दिव्य सौ वर्षकी आयुवाले होंगे, उस समय मनुष्यकी आयु चार सौ वर्षकी होगी। धर्मके चार पाद हैं—ज्ञान, ध्यान, शम तथा दम। आत्मज्ञान ज्ञान कहलाता है। अध्यात्मचिन्तन ध्यान कहलाता है। मनकी स्थिरता शम है और इन्द्रियोंका निग्रह करना दम है। चार लाख बत्तीस हजार वर्ष धर्मका एक पाद कहा जाता है। जब धर्मकी वृद्धि होती है, तब आयुकी भी वृद्धि होती है।

(अध्याय २६)

॥ प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड सम्पूर्ण ॥ ॥ भविष्यपुराणान्तर्गत प्रतिसर्गपर्व सम्पूर्ण ॥

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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

उत्तरपर्व

महाराज युधिष्ठिरके पास व्यासादि महर्षियोंका आगमन एवं उनसे उपदेश करनेके लिये युधिष्ठिरकी प्रार्थना

कल्याणानि ददातु वो गणपतिर्यस्मिन्नतुष्टे सति क्षोदीयस्यपि कर्मणि प्रभवितुं ब्रह्मापि जिह्वायते । भजे यच्चरणारविन्दमसकृतसौभाग्यभाग्योदयै- स्तैनैषा जगति प्रसिद्धिर्मगमददेवेन्द्रलक्ष्मीरपि ॥ शश्रुत्युण्यहरिणयगभरसनासिंहासनाध्यासिनी सेयं वागधिदेवता वितरतु श्रेयांसि भूयांसि वः । यत्पादामलकोमलाङ्गुलिनखज्योत्स्नाभिरुद्भेत्तिलतः शब्दब्रह्मसुधाम्बुधिर्युधमनस्युच्छृङ्गुलं खेलेति ॥

(उत्तरपर्व १।१-२)

‘जिनकी प्रसन्नताके बिना ब्रह्मा भी एक क्षुद्रकार्यका सम्पादन नहीं कर सकते और जिनके चरणोंके एक बार आश्रय लेनेसे देवेन्द्रका भाग्य चमक उठा तथा उन्हें अखण्ड राजलक्ष्मीकी प्राप्ति हो गयी, वे भगवान् गणपतिदेव आपलोगोंका कल्याण करें। जो ब्रह्माके जिह्वाग्र-भागपर निरन्तर सिंहासनासीन रहती हैं और जिनके चरणनखकी चन्द्रकासे प्रकाशित होकर शब्दब्रह्मका समुद्र विद्वानोंके हृदयपर नृत्य करता है, वे भगवती सरस्वती आप सबका अनन्त कल्याण करें।’

भगवान् शंकरका ध्यान कर, भगवान् (विष्णु) कृष्णकी स्तुति कर और ब्रह्माजीको नमस्कार कर तथा सूर्यदेव एवं अग्निदेवको प्रणाम कर इस ग्रन्थका वाचन करना चाहिये*।

एक बार धर्मके पुत्र धर्मवेता महाराज युधिष्ठिरको देखनेके लिये व्यास, मार्कण्डेय, माण्डव्य, शाण्डिल्य, गौतम, शातातप, पराशर, भरद्वाज, शौनक, पुलस्त्य, पुलह तथा देवर्षि नारद आदि श्रेष्ठ ऋषिगण पधारे।

उन महान् तपस्वी एवं वेदवेदाङ्गपरांगत ऋषियोंको देखकर भक्तिमान् राजा युधिष्ठिरने अपने भाइयोंके साथ प्रसन्नचित्त हो सिंहासनसे उठकर भगवान् श्रीकृष्ण तथा पुरोहित धौम्यको आगे कर उनका अभिवादन किया और आचमन एवं पाद्यादिसे उनकी पूजा कर आसन प्रदान किया। उन तपस्वियोंके बैठनेपर विनयसे अवगत हो महाराज युधिष्ठिरने श्रीवेदव्यासजीसे कहा—

‘भगवन्! आपके प्रसादसे मैंने यह महान् राज्य प्राप्त किया तथा दुर्घोषनादिको परास्त किया। किंतु जैसे रोगीको सुख प्राप्त होनेपर भी वह सुख उसके लिये सुखकर नहीं होता, वैसे ही अपने बन्धु-बान्धवोंको मारकर यह राज्य-सुख मुझे प्रिय नहीं लग रहा है। जो आनन्द वनमें निवास करते हुए कन्द-मूल तथा फलोंके भक्षणसे प्राप्त होता है, वह सुख शत्रुओंको जीतकर सम्पूर्ण पृथ्वीका राज्य प्राप्त करनेपर भी नहीं होता। जो भीष्मपितामह हमारे गुरु, बन्धु, रक्षक, कल्याण और कवचस्वरूप थे, उन्हें भी मुझ-जैसे पापीने राज्यके लोभसे मार डाला। मैंने बहुत विवेकशून्य कार्य किया है। मेरा मन पाप-पङ्कमें लिस हो गया है। भगवन्! आप कृपाकर अपने ज्ञानरूपी जलसे मेरे अज्ञान तथा पाप-पङ्कको धोकर सर्वथा निर्मल बना दीजिये और अपने प्रज्ञारूपी दीपकसे मेरा धर्मरूपी मार्ग प्रशस्त कीजिये। धर्मके संरक्षक ये मुनिगण कृपाकर यहाँ आये हुए हैं। गङ्गापुत्र महाराज भीष्मपितामहसे मैंने

  • शिवं ध्यात्वा हरिं स्तुत्वा प्रणम्य परमेश्विनम्। चित्रभानुं च भानुं च नत्वा ग्रन्थमुदीरयेत् ॥ (उत्तरपर्व १।७)

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र और मोक्षशास्त्रका विस्तारसे श्रवण किया है। उन शान्तनुपुत्र भीष्मके स्वर्गलोक चले जानेपर अब श्रीकृष्ण और आप ही मैत्री एवं बन्धुताके कारण मेरे मार्गदर्शक हैं।'

व्यासजी बोले—राजन्! आपको करने योग्य सभी बातें मैंने, पितामह भीष्मने, महर्षि मार्कण्डेय, धौम्य और महामुनि लोमशने बता दी हैं। आप धर्मज्ञ, गुणी, मेधावी तथा धीमान् पुरुषोंके समान

हैं, धर्म और अधर्मके निश्चयमें कोई भी बात आपको अज्ञात नहीं है। हृषीकेश भगवान् श्रीकृष्णके यहाँ उपस्थित रहते हुए धर्मका उपदेश करनेका साहस कौन कर सकता है? क्योंकि ये ही संसारकी सृष्टि, स्थिति तथा पालन करते हैं एवं प्रत्यक्षदर्शी हैं। अतः ये ही आपको उपदेश करेंगे। इतना कहकर तथा पाण्डवोंकी पूजा ग्रहण कर बादरायण व्यासजी तपोवन चले गये। (अध्याय १)

भुवनकोशका संक्षिप्त वर्णन

महाराज युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! यह जगत् किसमें प्रतिष्ठित है? कहाँसे उत्पन्न होता है? इसका किसमें लय होता है? इस विश्वका हेतु क्या है? पृथ्वीपर कितने द्वीप, समुद्र तथा कुलाचल हैं? पृथिवीका कितना प्रमाण है? कितने भुवन हैं? इन सबका आप वर्णन करें।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! आपने जो पूछा है, वह सब पुराणका विषय है, किंतु संसारमें घूमते हुए मैंने जैसा सुना और जो अनुभव किया है, उनका संक्षेपमें मैं वर्णन करता हूँ। सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित—इन पाँच लक्षणोंसे समन्वित पुराण कहा जाता है*।

अनघ! आपका प्रश्न इन पाँच लक्षणोंमेंसे सर्ग (सृष्टि)-के प्रति ही विशेषरूपसे सम्बद्ध है, इसलिये इसका मैं संक्षेपमें वर्णन करता हूँ।

अव्यक्त-प्रकृतिसे महत्त्व-बुद्धि उत्पन्न हुई। महत्त्वसे त्रिगुणात्मक अहंकार उत्पन्न हुआ, अहंकारसे पञ्चतन्मात्रा, पञ्चतन्मात्राओंसे पाँच महाभूत और इन भूतोंसे चराचर जगत् उत्पन्न हुआ है। स्थावर-जङ्गमात्मक अर्थात् चराचर जगत्के नष्ट होनेपर जलमूर्तिमय विष्णु रह जाते हैं अर्थात् सर्वत्र जल परिव्याप्त रहता है, उससे भूतात्मक

अण्ड उत्पन्न हुआ। कुछ समयके बाद उस अण्डके दो भाग हो गये। उसमें एक खण्ड पृथिवी और दूसरा भाग आकाश हुआ। उसमें जरायुसे मेरु आदि पर्वत हुए। नाडियोंसे नदी आदि हुई। मेरु पर्वत सोलह हजार योजन भूमिके अंदर प्रविष्ट हैं और चौरासी हजार योजन भूमिके ऊपर हैं, बत्तीस हजार योजन मेरुके शिखरका विस्तार है। कमलस्वरूप भूमिकी कर्णिका मेरु है। उस अण्डसे आदिदेवता आदित्य उत्पन्न हुए, जो प्रातःकालमें ब्रह्मा, मध्याह्नमें विष्णु और सायंकालमें रुद्ररूपसे अवस्थित रहते हैं। एक आदित्य ही तीन रूपोंको धारण करते हैं। ब्रह्मासे मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वसिष्ठ और नारद—ये नौ मानस-पुत्र उत्पन्न हुए। पुराणोंमें इन्हें ब्रह्मपुत्र कहा गया है। ब्रह्माके दक्षिण अँगूठेसे दक्ष उत्पन्न हुए और बायें अँगूठेसे प्रसूति उत्पन्न हुई। दोनों दम्पति अँगूठेसे ही उत्पन्न हुए। उन दोनोंसे उत्पन्न हर्यश्च आदि पुत्रोंको देवर्षि नारदने सृष्टिके लिये उद्यत होनेपर भी सृष्टिसे विरत कर दिया। प्रजापति दक्षने अपने पुत्र हर्यश्चोंको सृष्टिसे विमुख देखकर सत्या आदि नामवाली साठ कन्याओंको उत्पन्न किया और उनमेंसे उन्होंने दस धर्मको, तेरह कश्यपको,

  • सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च। वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ॥ (उत्तरपर्व २।११)

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  • उत्तरपर्व *

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सताईस चन्द्रमाको, दो बाहुपुत्रको, दो कृशाश्वको, चार अरिष्टनेमिको, एक भृगुको और एक कन्या शंकरको प्रदान किया। फिर इनसे चराचर जगत् उत्पन्न हुआ। मेरु पर्वतके तीन शृङ्गोंपर ब्रह्मा, विष्णु और शिवकी क्रमशः वैराज, वैकुण्ठ तथा कैलास नामक तीन पुरियाँ हैं। पूर्व आदि दिशाओंमें इन्द्र आदि दिक्पालोंकी नगरी है। हिमवान्, हेमकूट, निषध, मेरु, नील, श्वेत और शृङ्गवान्—ये सात जम्बूद्वीपमें कुल-पर्वत हैं। जम्बूद्वीप लक्ष योजना प्रमाणवाला है। इसमें नौ वर्ष हैं। जम्बू, शाक, कुश, क्राँच, शाल्मलि, गोमेद* तथा पुष्कर—ये सात द्वीप हैं। ये सातों द्वीप सात समुद्रोंसे परिवेष्टित हैं। क्षार, दुग्ध, इक्षुरस, सुरा, दधि, घृत और स्वादिष्ट जलके सात समुद्र हैं। सातों समुद्र और सातों द्वीप एककी अपेक्षा एक द्विगुण हैं। भूलोक, भुवलोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक—ये देवताओंके निवास-स्थान हैं। सात पाताललोक हैं—अतल, महातल, भूमितल, सुतल, वितल, रसातल तथा तलातल। इनमें हिरण्याक्ष आदि दानव और वासुकि आदि नाग निवास करते हैं। हे युधिष्ठिर! सिद्ध और ऋषिगण भी इनमें निवास करते हैं। स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत और चाक्षुष—ये छः मनु व्यतीत हो गये हैं, इस समय वैवस्वत मनु वर्तमान है। उन्हींके पुत्र और पौत्रोंसे यह पृथिवी परिव्याप्त है। बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र और दो अश्विनीकुमार—ये तैंतीस देवता वैवस्वत-

मन्वन्तरमें कहे गये हैं। विप्रचित्तिसे दैत्यगण और हिरण्याक्षसे दानवगण उत्पन्न हुए हैं।

द्वीप और समुद्रोंसे समन्वित भूमिका प्रमाण पचास कोटि योजन है। नौकाकी तरह यह भूमि जलपर तैर रही है। इसके चारों ओर लोका लोक-पर्वत हैं। नैमित्तिक, प्राकृत, आत्यन्तिक और नित्य—ये चार प्रकारके प्रलय हैं। जिससे इस संसारकी उत्पत्ति होती है। प्रलयके समय उसीमें इसका लय हो जाता है। जिस प्रकार ऋतुके अनुकूल वृक्षोंके पुष्प, फल और फूल उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार संसार भी अपने समयसे उत्पन्न होता है और अपने समयसे लीन होता है। सम्पूर्ण विश्वके लीन होनेके बाद महेश्वर वेद-शब्दोंके द्वारा पुनः इसका निर्माण करते हैं। हिंस्र, अहिंस्र, मृदु, क्रूर, धर्म, अधर्म, सत्य, असत्य आदि कर्मोंसे जीव अनेक योनियोंको इस संसारमें प्राप्त करते हैं। भूमि जलसे, जल तेजसे, तेज वायुसे, वायु आकाशसे वेष्टित है। आकाश अहंकारसे, अहंकार महत्त्वसे, महत्त्व प्रकृतिसे और प्रकृति उस अविनाशी पुरुषसे परिव्याप्त है। इस प्रकारके हजारों अण्ड उत्पन्न होते हैं और नष्ट होते हैं। सुर, नर, किन्नर, नाग, यक्ष तथा सिद्ध आदिसे समन्वित चराचर जगत् नारायणकी कुक्षिमें अवस्थित है। निर्मल बुद्धि तथा शुद्ध अन्तःकरणवाले मुनिगण इसके बाह्य और आभ्यन्तरस्वरूपको देखते हैं अथवा परमात्माकी माया ही उन्हें जानती है।

(अध्याय २)

  • अन्य मत्स्य आदि सभी पुराणोंके अनुसार गोमेद आठवाँ है, यहाँ प्लक्ष नामक द्वीप छूट गया है।

584 Sankshipta Bhavishya Puran Section 14.1 Front In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

नारदजीको विष्णु-मायाका दर्शन

राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! यह विष्णुभगवान्की माया किस प्रकारकी है? जो इस चराचर जगत्को व्यामोहित करती है।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! किसी समय नारदमुनि श्वेतद्वीपमें नारायणका दर्शन करनेके लिये गये। वहाँ श्रीनारायणका दर्शन कर और उन्हें प्रसन्न-मुद्रामें देखकर उनसे जिज्ञासा की। भगवन्! आपकी माया कैसी है? कहाँ रहती है? कृपाकर उसका रूप मुझे दिखायें।

भगवान्ने हँसकर कहा—नारद! मायाको देखकर क्या करोगे? इसके अतिरिक्त जो कुछ चाहते हो वह माँगो।

नारदजीने कहा—भगवन्! आप अपनी मायाको ही दिखायें, अन्य किसी वरकी अभिलाषा नहीं है। नारदजीने बार-बार आग्रह किया।

नारायणने कहा—अच्छा, आप हमारी माया देखें। यह कहकर नारदकी अँगुली पकड़कर श्वेतद्वीपसे चले। मार्गमें आकर भगवान्ने एक वृद्ध ब्राह्मणका रूप धारण कर लिया। शिखा, यज्ञोपवीत, कमण्डलु, मृगचर्मको धारण कर कुशाकी पवित्री हाथोंमें पहनकर वेद-पाठ करने लगे और अपना नाम उन्हींने यज्ञशर्मा रख लिया। इस प्रकारका रूप धारणकर नारदके साथ जम्बूद्वीपमें आये। वे दोनों वैत्रवती नदीके तटपर स्थित विदिशा नामक नगरीमें गये। उस विदिशा नगरीमें धन-धान्यसे समृद्ध उद्यमी, गाय, भैंस, बकरी आदि पशु-पालनमें तत्पर, कृषिकार्यको भलीभाँति करनेवाला सीरभद्र नामका एक वैश्य निवास करता था। वे दोनों सर्वप्रथम उसीके घर गये। उसने इन विशुद्ध ब्राह्मणोंका आसन, अर्घ्य आदिसे आदर-सत्कार किया। फिर पूछा—'यदि आप उचित समझें तो अपनी रुचिके अनुसार मेरे यहाँ अन्नका भोजन करें।' यह सुनकर

वृद्ध ब्राह्मणरूपधारी भगवान्ने हँसकर कहा—'तुमको अनेक पुत्र-पौत्र हों और सभी व्यापार एवं खेतीमें तत्पर रहें। तुम्हारी खेती और पशु-धनकी नित्य वृद्धि हो'—यह मेरा आशीर्वाद है। इतना कहकर वे दोनों वहाँसे आगे गये। मार्गमें गङ्गाके तटपर वेणिका नामके गाँवमें गोस्वामी नामका एक दरिद्र ब्राह्मण रहता था, वे दोनों उसके पास पहुँचे। वह अपनी खेतीकी चिन्तामें लगा था। भगवान्ने उससे कहा—'हम बहुत दूरसे आये हैं, अब हम तुम्हारे अतिथि हैं, हम भूखे हैं, हमें भोजन कराओ।' उन दोनोंको साथमें लेकर वह ब्राह्मण अपने घरपर आया। उसने दोनोंको स्नान-भोजन आदि कराया, अनन्तर सुखपूर्वक उत्तम शय्यापर शयन आदिकी व्यवस्था की। प्रातः उठकर भगवान्ने ब्राह्मणसे कहा—'हम तुम्हारे घरमें सुखपूर्वक रहे, अब जा रहे हैं। परमेश्वर करे कि तुम्हारी खेती निष्फल हो, तुम्हारी संततिकी वृद्धि न हो'—इतना कहकर वे वहाँसे चले गये।

मार्गमें नारदजीने पूछा—भगवन्! वैश्यने आपकी कुछ भी सेवा नहीं की, किंतु उसको आपने उत्तम वर दिया। इस ब्राह्मणने श्रद्धासे आपकी बहुत सेवा की, किंतु उसको आपने आशीर्वादके रूपमें शाप ही दिया—ऐसा आपने क्यों किया?

भगवान्ने कहा—नारद! वर्षभर मछली पकड़नेसे जितना पाप होता है, उतना ही एक दिन हल जोतनेसे होता है। वह सीरभद्र वैश्य अपने पुत्र-पौत्रोंके साथ इसी कृषि-कार्यमें लगा हुआ है, वह नरकमें जायगा, अतः हमने न तो उसके घरमें विश्राम किया और न भोजन ही किया। इस ब्राह्मणके घरमें भोजन और विश्राम किया। इस ब्राह्मणको ऐसा आशीर्वाद दिया है कि जिससे यह जगज्जालमें न फँसकर मुक्तिको प्राप्त करे।

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  • उत्तरपर्व *

३८७

इस प्रकार मार्गमें बातचीत करते हुए वे दोनों कायकुब्ज देशके समीप पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक अतिशय रम्य सरोवर देखा। उस सरोवरकी शोभा देखकर वे बहुत प्रसन्न हुए।

भगवान्ने कहा— नारद! यह उत्तम तीर्थस्थान है। इसमें स्नान करना चाहिये, फिर कत्रौज नामके नगरमें चलेगे। इतना कहकर भगवान् उस सरोवरमें स्नानकर शीघ्र ही बाहर आ गये।

तदनन्तर नारदजी भी स्नान करनेके लिये सरोवरमें प्रविष्ट हुए। स्नान सम्पन्न कर जब वे बाहर निकले, तब उन्होंने अपनेको दिव्य कन्याके रूपमें देखा। उस कन्याके विशाल नेत्र थे। चन्द्रमाके समान मुख था, वह सर्वाङ्ग-सुन्दरी कन्या दिव्य शुभलक्षणोंसे सम्पन्न थी। अपनी सुन्दरतासे संसारको व्यामोहित कर रही थी। जिस प्रकार समुद्रसे सम्पूर्ण रूपकी निधान लक्ष्मी निकली थीं, उसी प्रकार सरोवरसे स्नानके बाद नारदजी स्त्रीके रूपमें निकले। भगवान् अन्तर्धान हो गये। वह स्त्री भी अपने झुंडसे भ्रष्ट अकेली हरिणीकी तरह भयभीत होकर इधर-उधर देखने लगी। इसी समय अपनी सेनाओंके साथ राजा तालध्वज वहाँ आया और उस सुन्दरीको देखकर सोचने लगा कि यह कोई देवस्त्री है या अप्सरा? फिर बोला—‘बाले! तुम कौन हो, कहाँसे आयी हो?’ उस कन्याने कहा—‘मैं माता-पितासे रहित और निराश्रय हूँ। मेरा विवाह भी नहीं हुआ है, अब आपकी ही शरणमें हूँ।’ इतना सुनते ही प्रसन्नचित्त हो राजा उसे घोड़ेपर बैठाकर राजधानी पहुँचा और विधिपूर्वक उससे विवाह कर लिया। तेरहवें वर्षमें वह गर्भवती हुई। समय पूर्ण होनेपर उससे एक तुम्बी (लौकी) उत्पन्न हुई, जिसमें पचास छोटे-छोटे दिव्य शरीरवाले

युद्धमें कुशल बलशाली बालक थे, उसने उनको घृतकुण्डमें छोड़ दिया, कुछ दिन बाद पुत्र और पौत्रोंकी खूब वृद्धि हो गयी। वे महान् अहंकारी, परस्पर-विरोधी और राज्यकी कामना करनेवाले थे। अनन्तर राज्यके लोभसे कौरव और पाण्डवोंकी तरह परस्पर युद्ध करके समुद्रकी लहरोंकी भाँति लड़ते हुए वे सभी नष्ट हो गये। वह स्त्री अपने वंशका इस प्रकार संहार देखकर छाती पीटकर करुणापूर्वक विलाप करती हुई मूर्च्छित हो पृथ्वीपर गिर पड़ी। राजा भी शोकसे पीड़ित हो रोने लगा।

इसी समय ब्राह्मणका रूप धारण कर भगवान् विष्णु द्विजोंके साथ वहाँ आये और राजा तथा रानीको उपदेश देने लगे—‘यह विष्णुकी माया है। तुमलोग व्यर्थ ही रो रहे हो। सम्पूर्ण प्राणियोंकी अन्तमें यही स्थिति होती है। विष्णुमाया ही ऐसी है कि उसके द्वारा सैकड़ों चक्रवर्ती और हजारों इन्द्र उसी तरह नष्ट कर दिये गये हैं जैसे दीपकको प्रचण्ड वायु विनष्ट कर देती है। समुद्रको सुखानेके लिये भूमिको पीसकर चूर्ण कर डालनेकी तथा पर्वतको पीठपर उठानेकी सामर्थ्य रखनेवाले पुरुष भी कालके काराल मुखमें चले गये हैं। त्रिकूट पर्वत जिसका दुर्ग था, समुद्र जिसकी खाई थी, ऐसी लंका जिसकी राजधानी थी, राक्षसगण जिसके योद्धा थे, सभी शास्त्रों और वेदोंको जाननेवाले शुक्राचार्य जिसके लिये मन्त्रणा करते थे, कुबेरके धनको भी जिसने जीत लिया था, ऐसा रावण भी दैववश नष्ट हो गया*। युद्धमें, घरमें, पर्वतपर, अग्निमें, गुफामें अथवा समुद्रमें कहीं भी कोई जाय, वह कालके कोपसे नहीं बच सकता। भावी होकर ही रहती है। पातालमें जाय, इन्द्रलोकमें जाय, मेरु पर्वतपर चढ़ जाय, मन्त्र, औषध, शस्त्र आदिसे

  • दुर्गस्त्रिकूटः परिखा समुद्रो रक्षांसि योधा धनदाच्च वित्तम्।

शास्त्रं च यस्यांशनासा प्रणीतं स रावणो दैववशाद् विपन्नः ॥ (उत्तरपर्व ४।१३)

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३८८

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

भी कितनी भी अपनी रक्षा करे, किंतु जो होना होता है, वह होता ही है—इसमें किसी प्रकारका संदेह नहीं है। मनुष्योंके भाग्यानुसार जो भी शुभ और अशुभ होना है, वह अवश्य ही होता है। हजारों उपाय करनेपर भी भावी किसी भी प्रकार नहीं टल सकती१। कोई शोक-विह्वल होकर आँसू टपकाता है, कोई रोता है, कोई बड़ी प्रसन्नतासे नाचता है, कोई मनोहर गीत गाता है, कोई धनके लिये अनेक उपाय करता है, इस तरह अनेक प्रकारके जालकी रचना करता रहता है, अतः यह संसार एक नाटक है और सभी प्राणिवर्ग उस नाटकके पात्र हैं।'

इतना उपदेश देकर भगवान्ने रानीका हाथ पकड़कर कहा—'नारदजी! तुमने विष्णुकी माया देख ली। उठो! अब स्नानकर अपने पुत्र-पौत्रोंको अर्घ्य देकर और्ध्वदैहिक कृत्य करो। यह माया विष्णुने स्वयं निर्मित की है।' इतना कहकर उसी

पुण्यतीर्थमें नारदको स्नान कराया। स्नान करते ही स्त्री-रूपको छोड़कर नारदमुनिने अपना रूप धारण कर लिया। राजाने भी अपने मन्त्री और पुरोहितोंके साथ देखा कि जटाधारी, यज्ञोपवीतधारी, दण्ड-कमण्डलु लिये, वीणा धारण किये हुए, खड़ाऊँके ऊपर स्थित एक तेजस्वी मुनि हैं, यह मेरी रानी नहीं है। उसी समय भगवान् नारदका हाथ पकड़कर आकाश-मार्गसे क्षणमात्रमें श्वेतद्वीप आ गये।

भगवान्ने नारदसे कहा —देवर्षि नारदजी! आपने मेरी माया देख ली। नारदके देखते-देखते ऐसा कहकर भगवान् विष्णु अन्तर्हित हो गये। देवर्षि नारदजीने भी हँसकर उन्हें प्रणाम किया और भगवान्की आज्ञा प्राप्त कर तीनों लोकोंमें घूमने लगे। महाराज! इस विष्णुमायाका हमने संक्षेपमें वर्णन किया। इस मायाके प्रभावसे संसारके जीव पुत्र, स्त्री, धन आदिमें आसक्त हो रोते-गाते हुए अनेक प्रकारकी चेष्टाएँ करते हैं। (अध्याय ३)

संसारके दोषोंका वर्णन

महाराज युधिष्ठिरने पूछा —भगवन! यह जीव किस कर्मसे देवता, मनुष्य और पशु आदि योनियोंमें उत्पन्न होता है? बालभावमें कैसे पुष्ट होता है और किस कर्मसे युवा होता है? किस कर्मके फलस्वरूप अतिशय भयंकर दारुण गर्भवासका कष्ट सहन करता है? गर्भमें क्या खाता है? किस कर्मसे रूपवान्, धनवान्, पण्डित, पुत्रवान्, त्यागी और कुलीन होता है? किस कर्मसे रोगरहित जीवन व्यतीत करता है? कैसे सुखपूर्वक मरता है? शुभ और अशुभ फलका भोग कैसे करता

है? हे विमलमते! ये सभी विषय मुझे बहुत ही गहन मालूम होते हैं?

भगवान् श्रीकृष्णने कहा —महाराज! उत्तम कर्मोंसे देवयोनि, मिश्रकर्मोंसे मनुष्ययोनि और पाप-कर्मोंसे पशु आदि योनियोंमें जन्म होता है। धर्म और अधर्मके निश्चयमें श्रुति ही प्रमाण है। पापसे पापयोनि और पुण्यसे पुण्ययोनि प्राप्त होती है२।

ऋतुकालके समय दोषरहित शुक्र वायुसे प्रेरित स्त्रीके रक्तके साथ मिलकर एक हो जाता है। शुक्रके साथ ही कर्मोंके अनुसार प्रेरित जीवयोनियोंमें

१-पातालमाविशतु यातु सुरेन्द्रलोकमारोहतु क्षितिधराधिपतिं सुमेरुम्।

मन्त्रीपधिप्रहरणैश्च करोतु रक्षां यद्वावि तद्भवति नाथ विभावितोऽस्मि ॥ (उत्तरपर्व ४।९५)

२-शुभैर्देवत्वमाप्नोति मिश्रैर्मानुषतां ब्रजेत् । अशुभैः कर्मभिर्जनस्तुत्तियोनियु जायते ॥

प्रमाणं श्रुतिरेवात्र धर्माधर्मविनिश्चये । पापं पापेन भवति पुण्यं पुण्येन कर्मणा ॥ (उत्तरपर्व ४।६-७)

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  • उत्तरपर्व *

३८९

प्रविष्ट होता है। एक दिनमें शुक्र और शोणित मिलकर कलल बनता है। पाँच रातमें वह कलल बुद्ध हो जाता है। सात रातमें बुद्ध मांसपेशी बन जाता है। चौदह दिनोंमें वह मांसपेशी मांस और रुधिरसे व्याप्त होकर दूद हो जाता है। पचीस दिनोंमें उसमें अङ्गुर निकलते हैं। एक महीनेमें उन अङ्गुरोंके पाँच-पाँच भाग—ग्रीवा, सिर, कन्धे, पृष्ठवंश तथा उदर हो जाते हैं। चार मासमें वही अङ्गुरोंका भाग अँगुली बन जाता है। पाँच महीनेमें मुख, नासिका और कान बनते हैं। छः महीनेमें दन्तपंक्तियाँ, नख और कानके छिद्र बनते हैं। सातवें महीनेमें गुदा, लिङ्ग अथवा योनि और नाभि बनते हैं, संधियाँ उत्पन्न होती हैं और अङ्गोंमें संकोच भी होता है। आठवें महीनेमें अङ्ग-प्रत्यङ्ग सब पूर्ण हो जाते हैं और सिरमें केश भी आ जाते हैं। माताके भोजनका रस नाभिके द्वारा बालकके शरीरमें पहुँचता रहता है, उसीसे उसका पोषण होता है। तब गर्भमें स्थित जीव सब सुख-दुःख समझता है और यह विचार करता है कि 'मैंने अनेक योनियोंमें जन्म लिया और बारम्बार मृत्युके अधीन हुआ तथा अब जन्म होते ही फिर संसारके बन्धनको प्राप्त करूँगा।' इस प्रकार गर्भमें विचारता और मोक्षका उपाय सोचता हुआ जीव अतिशय दुःखी रहता है। पर्वतके नीचे दब जानेसे जितना क्लेश जीवको होता है, उतना ही जरायुसे वेष्टित अर्थात् गर्भमें होता है। समुद्रमें डूबनेसे जो दुःख होता है, वही दुःख गर्भके जलमें भी होता है, तस लोहेके खम्भसे बाँधनेमें जीवको जो क्लेश होता है वही गर्भमें जठराग्निके तापसे होता है। तपायी हुई सूह्योंसे बेधनेपर जो व्यथा होती है, उससे आठ गुना अधिक गर्भमें जीवको कष्ट होता है। जीवोंके लिये गर्भवाससे अधिक कोई दुःख नहीं है। उससे भी कोटि गुना दुःख जन्म लेते

समय होता है, उस दुःखसे मूर्च्छा भी आ जाती है। प्रबल प्रसववायुकी प्रेरणासे जीव गर्भके बाहर निकलता है। जिस प्रकार कोल्हूमें पीडन करनेसे तिल निस्सार हो जाते हैं, उसी प्रकार शरीर भी योनियन्त्रके पीडनसे निस्तत्त्व हो जाता है। मुखरूप जिसका द्वार है, दोनों ओष्ठ कपाट हैं, सभी इन्द्रियाँ गवाक्ष अर्थात् झरोखे हैं, दाँत, जिह्वा, गला, वात, पित्त, कफ, जरा, शोक, काम, क्रोध, तृष्णा, राग, द्वेष आदि जिसमें उपकरण हैं, ऐसे इस देहरूप अनित्य गृहमें नित्य आत्माका निवास-स्थान है। शुक्र-शोणितके संयोगसे शरीर उत्पन्न होता है और नित्य ही मूत्र, विष्टा आदिसे भरा रहता है। इसलिये यह अत्यन्त अपवित्र है। जिस प्रकार विष्टासे भरा हुआ घट बाहर धोनेसे शुद्ध नहीं होता, इसी प्रकार यह देह भी स्नान आदिके द्वारा पवित्र नहीं हो सकता। पञ्चगव्य आदि पवित्र पदार्थ भी इसके संसर्गसे अपवित्र हो जाते हैं। इससे अधिक और कौन अपवित्र पदार्थ होगा। उत्तम भोजन, पान आदि देहके संसर्गसे मलरूप हो जाते हैं, फिर देहकी अपवित्रताका क्या वर्णन करें। देहको बाहरसे जितना भी शुद्ध करें, भीतर तो कफ, मूत्र, विष्टा आदि भरे ही रहेंगे। सुगन्धित तेल देहमें मलते रहें, परंतु कभी इस देहकी मलिनता कम नहीं होती। यह आश्चर्य है कि मनुष्य अपने देहका दुर्गन्ध सृष्टिकर, नित्य अपना मल-मूत्र देखकर और नासिकाका मल निकालकर भी इस देहसे विरक्त नहीं होता और उसे देहसे घृणा उत्पन्न नहीं होती। यह मोहका ही प्रभाव है कि शरीरके दोष और दुर्गन्ध देख-सृष्टिकर भी इससे ग्लानि नहीं होती। यह शरीर स्वभावतः अपवित्र है। यह केलेके वृक्षकी भाँति केवल त्वक आदिसे आवृत और निस्सार है। जन्म होते ही बाहरकी वायुके स्पर्शसे पूर्वजन्मोंका ज्ञान नष्ट

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३९०

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

हो जाता है और पुनः संसारके व्यवहारमें आसक्त हो अनेक दुष्कर्ममें रत हो जाता है और अपनेको तथा परमेश्वरको भूल जाता है। आँख रहते हुए भी नहीं देख पाता, बुद्धि रहते हुए भी भले-बुरेका निर्णय नहीं कर पाता। राग तथा लोभ आदिके वशीभूत होकर वह संसारमें दुःख प्राप्त करता रहता है। सूखे मार्गमें भी पैर फिसलते हैं, यह सब मोहकी ही महिमा है। दिव्यदर्शी महर्षियोंने इस गर्भका वृत्तान्त विस्तृत रूपसे वर्णन किया है। इसे सुनकर भी मनुष्यको वैराग्य उत्पन्न नहीं होता और अपने कल्याणका मार्ग नहीं सोचता—यह बड़ा ही आश्चर्य है।

बाल्यावस्थामें भी केवल दुःख ही है। बालक अपना अभिप्राय भी नहीं कह सकता और जो चाहता है, वह नहीं कर पाता, वह असमर्थ रहता है। इससे नित्य व्याकुल रहता है। दाँत आनेके समय बालक बहुत क्लेश भोगता है और भाँति-भाँतिके रोग तथा बालग्रह उसे सताते रहते हैं। वह क्षुधा-तृष्णासे पीड़ित होता रहता है, मोहसे विघ्ना आदिका भी भक्षण करने लगता है। कुमारारवस्थामें कर्ण-वेधके समय दुःख होता है। अक्षरारम्भके समय गुरुसे भी बड़ा ही भय होता है। माता-पिता ताडन करते हैं।

युवावस्थामें भी सुख नहीं है। अनेक प्रकारकी ईर्ष्या मनमें उपजती है। मनुष्य मोहमें लीन हो जाता है। राग आदिमें आसक्त होनेके कारण दुःख होता है, रात्रिको नींद नहीं आती और धनकी चिन्तासे दिनमें भी चैन नहीं पड़ता। स्त्री-संसर्गमें भी कोई सुख नहीं। कुष्ठी व्यक्तिके कोढ़में कीड़े पड़ जानेपर जो खुजलाहट होती है,

उसे खुजलानेमें जितना आनन्द होता है, उससे अधिक कामी व्यक्तिको स्त्रीसे सुख नहीं मिलता*। इस तरह विचार करनेपर मालूम होता है कि स्त्रीमें कोई सुख नहीं है।

व्यक्ति मान-अपमानके द्वारा, युवावस्था-वृद्धावस्थाके द्वारा और संयोग-वियोगके द्वारा ग्रस्त है तो फिर निर्विवाद सुख कहाँ? जो यौवनके कारण स्त्री-पुरुषोंके शरीर परस्पर प्रिय लगते हैं, वही वार्धक्यके कारण घृणित प्रतीत होते हैं। वृद्ध हो जाने, शरीरके काँपने और सभी अङ्गोंके जर्जर एवं शिथिल हो जानेपर वह सभीको अप्रिय लगता है। जो युवावस्थाके बाद वार्धक्यमें अपनेमें भारी परिवर्तन और अपनी शक्तिहीनताको देखकर विरक्त नहीं होता—धर्म और भगवान्की ओर प्रवृत्त नहीं होता, उससे बढ़कर मूर्ख कौन हो सकता है?

बुढ़ापेमें जब पुत्र-पौत्र, बान्धव, दुराचारी नौकर आदि अवज्ञा—उपेक्षा करते हैं, तब अत्यन्त दुःख होता है। बुढ़ापेमें वह धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष-सम्बन्धी कार्योंको सम्पन्न करनेमें असमर्थ रहता है। इसमें वात, पित्त आदिकी विषमतासे अर्थात् न्यूनता-अधिकता होनेसे अनेक प्रकारके रोग होते रहते हैं। इसलिये यह शरीर रोगोंका घर है। ये दुःख प्रायः सभीको समय-समयपर अनुभूत होते ही हैं, फिर उसमें विशेष कहनेकी आवश्यकता ही क्या?

वास्तवमें शरीरमें सैकड़ों मृत्युके स्थान हैं, जिनमें एक तो साक्षात् मृत्यु या काल है, दूसरे अन्य आने-जानेवाली भयंकर आधि-व्याधियाँ हैं, जो आधी मृत्युके समान हैं। आने-जानेवाली

  • अव्यक्तैन्द्रियवृत्तित्वाद् बाल्ये दुःखं महत्पुनः । इच्छत्रापि न शक्नोति कर्तुं वक्तुं च सत्क्रियाम् ॥ दन्तोत्थाने महद्दुःखं मौलेन व्याधिना तथा । बालरोगैश्च विविधैः पीडा बालग्रहैरपि ॥ क्रिमिभिस्तुष्टमानस्य कुष्ठिनः कामिनस्तथा । कण्ठूयनाग्रितापेन यद्धवेत् स्त्रीषु तद्वि तत् ॥

(उत्तरपर्व ४।६३-६४, ७९)

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  • उत्तरपर्व *

३१९

आधि-व्याधियाँ तो जप-तप एवं औषध आदिसे टल भी जाती हैं, परंतु काल-मृत्युका कोई उपाय नहीं है। रोग, सर्प, शस्त्र, विष तथा अन्य घात करनेवाले बाघ, सिंह, दस्यु आदि प्राणिवर्ग ये सब भी मृत्युके द्वार ही हैं। किंतु जब रोग आदिके रूपमें साक्षात् मृत्यु पहुँच जाती है तो देव-वैद्य धन्वन्तरि भी कुछ नहीं कर पाते। औषध, तन्त्र, मन्त्र, तप, दान, रसायन, योग आदि भी कालसे ग्रस्त व्यक्तिकी रक्षा नहीं कर सकते। सभी प्राणियोंके लिये मृत्युके समान न कोई रोग है, न भय, न दुःख है और न कोई शंकाका स्थान अर्थात् केवल एकमात्र मृत्युसे ही सारे भय आदि आशंकाएँ हैं। मृत्यु पुत्र, स्त्री, मित्र, राज्य, ऐश्वर्य, धन आदि सबसे वियुक्त करा देती है और बद्धमूल वैर भी मृत्युसे निवृत्त हो जाते हैं।

पुरुषकी आयु सौ वर्षोंकी कही गयी है, परंतु कोई अस्सी वर्ष जीता है कोई सत्तर वर्ष। अन्य लोग अधिक-से-अधिक साठ वर्षतक ही जीते हैं और बहुत-से तो इससे पहले ही मर जाते हैं। पूर्वकर्मानुसार मनुष्यकी जितनी आयु निश्चित है, उसका आधा समय तो रात्रि ही सोनेमें हर लेती है। बीस वर्ष बाल्य और बुढ़ापेमें व्यर्थ चले जाते हैं। युवा-अवस्थामें अनेक प्रकारकी चिन्ता और कामकी व्यथा रहती है। इसलिये वह समय भी निरर्थक ही चला जाता है। इस प्रकार यह आयु समाप्त हो जाती है और मृत्यु आ पहुँचती है। मरणके समय जो दुःख होता है, उसकी कोई उपमा नहीं। हे मातः ! हे पितः ! हे कान्त ! आदि चिल्लाते व्यक्तिको भी मृत्यु वैसे ही पकड़ ले जाती है, जैसे मेढकको सर्प पकड़ लेता है। व्याधिसे पीड़ित व्यक्ति खाटपर पड़ा इधर-उधर हाथ-पैर पटकता रहता है और साँस लेता रहता है। कभी खाटसे भूमिपर और कभी भूमिसे

खाटपर जाता है, परंतु कहीं चैन नहीं मिलता। कण्ठमें घर्ष-घर्ष शब्द होने लगता है। मुख सूख जाता है। शरीर मूत्र, विष्टा आदिसे लिस हो जाता है। प्यास लगनेपर जब वह पानी माँगता है तो दिया हुआ पानी भी कण्ठतक ही रह जाता है। वाणी बंद हो जाती है, पड़ा-पड़ा चिन्ता करता रहता है कि मेरे धनको कौन भोगेगा? मेरे कुटुम्बकी रक्षा कौन करेगा? इस तरह अनेक प्रकारकी यातना भोगता हुआ मनुष्य मरता है और जीव इस देहसे निकलते ही जाँककी तरह दूसरे शरीरमें प्रविष्ट हो जाता है।

मृत्युसे भी अधिक दुःख विवेकी पुरुषोंको याचना अर्थात् माँगनेमें होता है। मृत्युमें तो क्षणिक दुःख होता है, किंतु याचनासे तो निरन्तर ही दुःख होता है। देखिये, भगवान् विष्णु भी बलिये माँगते ही वामन (अत्यन्त छोटे) हो गये। फिर और दूसरा है ही कौन जिसकी प्रतिष्ठा याचनासे न घटे। आदि, मध्य और अन्तमें दुःखकी ही परम्परा है। अज्ञानवश मनुष्य दुःखोंको झेलता हुआ कभी आनन्द नहीं प्राप्त करता। बहुत खाये तो दुःख, थोड़ा खाये तो दुःख, किसी समय भी सुख नहीं है। शुधा सब रोगोंमें प्रबल है और वह अन्नरूपी औषधिके सेवनसे थोड़ी देरके लिये शान्त हो जाती है, परंतु अन्न भी परम सुखका साधन नहीं है। प्रातः उठते ही मूत्र, विष्टा आदिकी बाधा, मध्याह्नमें क्षुधा-तृष्णाकी पीड़ा और पेट भरनेपर कामकी व्यथा होती है। रात्रिको निद्रा दुःख देती है। धनके सम्पादनमें दुःख, सम्पादित धनकी रक्षा करनेमें दुःख, फिर उसके व्यय करनेमें अतिशय दुःख होता है। इससे धन भी सुखदायक नहीं है। चोर, जल, अग्नि, राजा और स्वजनोंसे भी धनवालोंको अधिक भय रहता है। मांसको आकाशमें फेंकनेपर पक्षी, भूमिपर कुत्ते आदि जीव और जलमें मछली आदि खा

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३१२

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

जाते हैं, इसी प्रकार धनवान्की भी सर्वत्र यही स्थिति होती है। सम्पत्तिके अर्जन करनेमें दुःख, सम्पत्तिकी प्राप्तिके बाद मोहरूपी दुःख और नाश हो जानेपर तो अत्यन्त दुःख होता ही है, इसलिये किसी भी कालमें धन सुखका साधन नहीं है। धन आदिकी कामनाएँ ही दुःखका परम कारण हैं, इसके विपरीत कामनाओंसे निःस्पृह रहना परम सुखका मूल है*।

हेमन्त-ऋतुमें शीतका दुःख, ग्रीष्ममें दारुण तापका दुःख और वर्षा-ऋतुमें झंझावात तथा वर्षाका दुःख होता है। इसलिये काल भी सुखदायक नहीं है। विवाहमें दुःख और पतिके विदेश-गमनमें दुःख, स्त्री गर्भवती हो तब दुःख, प्रसवके समय दुःख, संतानके दन्त, नेत्र आदिकी पीड़ासे दुःख। इस प्रकार स्त्री भी सदा व्याकुल रहती है। कुटुम्बियोंको यह चिन्ता रहती है कि गौ नष्ट हो गयी, खेती सूख गयी, नौकर चला गया, घरमें मेहमान आया है, स्त्रीके अभी संतान हुई है, इसके लिये रसोई कौन बनायेगा, कन्याके विवाह

आदिकी चिन्ता—इस प्रकार हजारों चिन्ताएँ कुटुम्बियोंके कारण लगी रहती हैं, जिनसे उनके शील, शुद्ध बुद्धि और सम्पूर्ण गुण नष्ट हो जाते हैं। जिस तरह कच्चे घड़ेमें जल डालते ही घटके साथ जल नष्ट हो जाता है, उसी तरह गुणोंसहित कुटुम्बी मनुष्यका देह नष्ट हो जाता है।

राज्य भी सुखका साधन नहीं है। जहाँ नित्य सन्धि-विग्रहकी चिन्ता लगी रहती है और पुत्रसे भी राज्यके ग्रहणका भय बना रहता है, वहाँ सुखका लेश भी नहीं है। अपनी जातिसे भी सबको भय होता है। जिस प्रकार एक मांसखण्डके अभिलाषी कुत्तोंको परस्पर भय रहता है, वैसे ही संसारमें कोई सुखी नहीं है। ऐसा कोई राजा नहीं जो सबको जीतकर सुखपूर्वक राज्य करे, प्रत्येकको दूसरेसे भय रहता है। इतना कहकर श्रीकृष्णभगवान्ने पुनः कहा कि 'महाराज! यह कर्मभय शरीर जन्मसे लेकर अन्ततक दुःखी ही है। जो पुरुष जितेन्द्रिय हैं और व्रत, दान तथा उपवास आदिमें तत्पर रहते हैं, वे सदा सुखी रहते हैं।' (अध्याय ४)

विविध प्रकारके पापों एवं पुण्य-कर्मोंका फल

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! अधम कर्म करनेसे जीव घोर नरकमें गिरते हैं और अनेक प्रकारकी यातनाएँ भोगते हैं। उस अधम कर्मको ही पाप और अधर्म कहते हैं। चित्तवृत्तिके भेदसे अधर्मका भेद जानना चाहिये। स्थूल, सूक्ष्म, अतिसूक्ष्म आदि भेदोंके द्वारा करोड़ों प्रकारके पाप हैं। परंतु यहाँ मैं केवल बड़े-बड़े पापोंका संक्षेपमें वर्णन

करता हूँ—परस्त्रीका चिन्तन, दूसरेका अनिष्ट-चिन्तन और अकार्य (कुकर्म)—में अभिनिवेश—ये तीन प्रकारके मानस पाप हैं। अनियन्त्रित प्रलाप, अप्रिय, असत्य, परनिन्दा और पिशुनता अर्थात् चुगली—ये पाँच वाचिक पाप हैं। अभक्ष्य-भक्षण, हिंसा, मिथ्या कामसेवन (असंयमित जीवन व्यतीत करना) और परधन-हरण—ये चार कायिक पाप हैं।

  • अर्थस्योपार्जने दुःखमर्जितस्यापि रक्षणै । आये दुःखं व्यये दुःखमर्थभ्यश्च कुतः सुखम् ॥

चौरभ्यः सलिलादग्नेः स्वजनात् पार्थिवादपि । भयमर्थवतां नित्यं मृत्योः प्राणभूतामिव ॥

खे यातं पक्षिभिर्मांसं भक्ष्यते क्षापदैर्भुवि । जले च भक्ष्यते मत्स्येस्तथा सर्वत्र वितवान् ॥

विमोहयन्ति सम्पत्सु तापयन्ति विपत्तिषु । खेदयन्त्यर्जनाकाले कदा ह्यार्थाः सुखावहाः ॥

यथार्थपतिरुद्दिग्नो यश्च सर्वार्थनिःस्पृहः । यतश्चार्थपतिर्दुःखी सुखी सर्वार्थनिःस्पृहः ॥

(उत्तरपर्व ४।१२१—१२५)

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  • उत्तरपर्व *

३९३

इन बारह कर्मोंके करनेसे नरककी प्राप्ति होती है। इन कर्मोंके भी अनेक भेद होते हैं। जो पुरुष संसाररूपी सागरसे उद्धार करनेवाले महादेव अथवा भगवान् विष्णुसे द्वेष रखते हैं, वे घोर नरकमें पड़ते हैं। ब्रह्महत्या, सुरापान, सुवर्णकी चोरी और गुरु-पत्नीगमन—ये चार महापातक हैं। इन पातकोंको करनेवालोंके सम्पर्कमें रहनेवाला मनुष्य पाँचवाँ महापातकी गिना जाता है। ये सभी नरकमें जाते हैं।

अब मैं उपपातकोंका वर्णन करता हूँ। ब्राह्मणको कोई पदार्थ देनेकी प्रतिज्ञा करके फिर नहीं देना, ब्राह्मणका धन हरण करना, अत्यन्त अहंकार, अतिक्रोध, दाम्भिकत्व, कृतघ्नता, कृपणता, विषयोंमें अतिशय आसक्ति, अच्छे पुरुषोंसे द्वेष, परस्त्रीहरण, कुमारीगमन, स्त्री, पुत्र आदिको बेचना, स्त्री-धनसे निर्वाह करना, स्त्रीकी रक्षा न करना, ऋण लेकर न चुकाना; देवता, अग्नि, साधु, गौ, ब्राह्मण, राजा और पतिव्रताकी निन्दा करना आदि उपपातक हैं। इन पापोंको करनेवाले पुरुषोंका जो संसर्ग करते हैं, वे भी पातकी होते हैं। इस प्रकार पाप करनेवाले मनुष्योंको मृत्युके बाद यमराज नरकमें ले जाते हैं। जो भूलसे पाप करते हैं, उनको गुरुजनोंकी आज्ञाके अनुसार प्रायश्चित्त करना चाहिये। जो मन, वचन, कर्मसे पाप करते हैं एवं दूसरोंसे कराते हैं अथवा पाप करते हुए पुरुषोंका अनुमोदन करते हैं, वे सभी नरकमें जाते हैं और जो उत्तम कर्म करते हैं, वे स्वर्गमें सुखसे आनन्द भोगते हैं। अशुभ कर्मोंका अशुभ फल और शुभ कर्मोंका शुभ फल होता है।

महाराज! यमराजकी सभामें सबके शुभ-अशुभ कर्मोंका विचार चित्रगुप्त आदि करते हैं। जीवको अपने कर्मानुसार फल भोगना पड़ता है। इसलिये

शुभ कर्म ही करना चाहिये। किये गये कर्मका फल बिना भोगे किसी प्रकार नष्ट नहीं होता। धर्म करनेवाले सुखपूर्वक परलोक जाते हैं और पापी अनेक प्रकारके दुःखका भोग करते हुए यमलोक जाते हैं। इसलिये सदा धर्म ही करना चाहिये। जीव छियासी हजार योजन चलकर वैवस्वतपुरमें पहुँचता है। पुण्यात्माओंको इतना बड़ा मार्ग निकट ही जान पड़ता है और पापियोंके लिये बहुत लम्बा हो जाता है। पापी जिस मार्गसे चलते हैं, उसमें तीखे काँटे, कंकड़, पत्थर, कीचड़, गड्ढे और तलवारकी धारके समान तीक्ष्ण पत्थर पड़े रहते हैं तथा लोहेकी सुइयाँ बिखरी रहती हैं। उस मार्गमें कहीं अग्नि, कहीं सिंह, कहीं व्याघ्र और कहीं-कहीं मक्षिका, सर्प, वृक्षक आदि दुष्ट जन्तु घूमते रहते हैं। कहींपर डाकिनी, शाकिनी, रोग और बड़े क्रूर राक्षस दुःख देते रहते हैं। उस मार्गमें न कहीं छाया है और न जल। इस प्रकारके भयंकर मार्गसे यमदूत पापियोंको लोहेकी शृङ्खलासे बाँधकर घसीटते हुए ले जाते हैं। उस समय अपने बन्धु आदिसे रहित वे प्राणी अपने कर्मोंको सोचते हुए रोते रहते हैं। भूख और प्यासके मारे उनके कण्ठ, तालु और ओष्ठ सूख जाते हैं। भयंकर यमदूत उन्हें बार-बार ताड़ित करते हैं और पैरोंमें अथवा चोटीमें साँकलसे बाँधकर खींचते हुए ले जाते हैं। इस प्रकार दुःख भोगते-भोगते वे यमलोकमें पहुँचते हैं और वहाँ अनेक यातनाएँ भोगते हैं।

पुण्य करनेवाले उत्तम मार्गसे सुखपूर्वक पहुँचकर सौम्यस्वरूप धर्मराजका दर्शन करते हैं और वे उनका बहुत आदर करते हैं, वे कहते हैं कि महात्माओ! आपलोग धन्य हैं, दूसरोंका उपकार करनेवाले हैं। आपने दिव्य सुखकी प्राप्तिके लिये

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३९४

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

बहुत पुण्य किया है। इसलिये इस उत्तम विमानपर चढ़कर स्वर्गको जायँ। पुण्यात्मा यमराजको प्रसन्नचित्त अपने पिताकी भाँति देखते हैं, परंतु पापी लोग उन्हें भयानक रूपमें देखते हैं। यमराजके समीप ही कालाग्रिके समान क्रूर कृष्णवर्ण मृत्युदेव विराजमान रहते हैं और कालकी भयंकर शक्तियाँ तथा अनेक प्रकारके रूप धारण किये सम्पूर्ण रोग वहाँ बैठे दिखायी देते हैं। कृष्णवर्णके असंख्य यमदूत अपने हाथोंमें शक्ति, शूल, अङ्गुश, पाश, चक्र, खड्ग, वज्र, दण्ड आदि शस्त्र धारण किये वहाँ स्थित रहते हैं। पापी जीव यमराजको इस रूपमें स्थित देखते हैं और यमराजके समीप बैठे हुए चित्रगुप्त उनकी भत्खी करके कहते हैं कि पापियो! तुमने ऐसे बुरे कर्म क्यों किये? तुमने पराया धन अपहरण किया है, रूपके गर्वसे पर-स्त्रियोंका सम्पर्क किया है और भी अनेक प्रकारके पातक-उपपातक तुमने किये हैं। अब उन कर्मोंका फल भोगो। अब कोई तुम्हारी रक्षा नहीं कर सकता। इस प्रकार पापी राजाओंका तर्जन कर चित्रगुप्त यमदूतको आज्ञा देते हैं कि इनको ले जाकर नरकोंकी अग्निये डाल दो।

सातवें पातालमें घोर अन्धकारके बीच अति दारुण अट्टाईस करोड़ नरक हैं, जिनमें पापी जीव यातना भोगते हैं। यमदूत वहाँ उनको ऊँचे वृक्षोंकी शाखाओंमें टाँग देते हैं और सैकड़ों मन लोहा उनके पैरोंमें बाँध देते हैं। उस बोझसे उनका शरीर टूटने लगता है और वे अपने अशुभ कर्मोंको यादकर रोते तथा चिल्लाते हैं। तपाये हुए काँटोंसे युक्त लौह-दण्डसे और चानुकोंसे यमदूत उन्हें बार-बार ताड़ित करते हैं और साँपोंसे कटवाते हैं। जब उनके देहोंमें घाव हो जाता है तब उनमें नमक लगता है। कभी उनको उतारकर खोलते हुए तेलमें

डालते हैं, वहाँसे निकालकर विष्टाके कूपमें उनको डुबोते हैं, जिनमें कीड़े काट-काटकर खाते हैं, फिर मेद, रुधिर, पूय आदिके कुण्डोंमें उनको ढकेल देते हैं। जहाँ लोहेकी चौंचवाले काक और श्वान आदि जीव उनका मांस नोच-नोच कर खाते हैं। कभी उनको तीक्ष्ण शूलोंमें पिरोंते हैं।

अभक्ष्य-भक्षण और मिथ्या भाषण करनेवाली जिह्वाको बहुत दण्ड मिलता है। जो पुरुष माता, पिता और गुरुको कठोर वचन बोलते हैं, उनके मुखमें जलते हुए अंगारे भर दिये जाते हैं और घावोंमें नमक भरकर खोलता हुआ तेल डाल दिया जाता है। जो अतिथिको अन्न-जल दिये बिना उसके सम्मुख ही स्वयं भोजन करते हैं, वे इक्षुकी तरह कोल्हूमें पेर जाते हैं तथा वे असितालवन नामक नरकमें जाते हैं। इस प्रकार अनेक क्लेश भोगते रहनेपर भी उनके प्राण नहीं निकलते। जिसने परनारीके साथ संग किया हो, यमदूत उसे तस लोहेकी नारीसे आलिङ्गन कराते हैं और पर-पुरुषगामिनी स्त्रीको तस लौह पुरुषसे लिपटाते हैं और कहते हैं कि 'दुष्टे! जिस प्रकार तुमने अपने पतिको परित्याग कर पर-पुरुषका आलिङ्गन किया, उसी प्रकारसे इस लौह-पुरुषका भी आलिङ्गन करो।' जो पुरुष देवालय, बाग, वापी, कूप, मठ आदिको नष्ट करते हैं और वहाँ रहकर मैथुन आदि अनेक प्रकारके पाप करते हैं, यमदूत उनको अनेक प्रकारके यन्त्रोंसे पीड़ित करते हैं और वे जबतक चन्द्र-सूर्य हैं, तबतक नरककी अग्निये पड़े जलते रहते हैं। जो गुरुकी निन्दा श्रवण करते हैं, उनके कानोंको दण्ड मिलता है। इस प्रकार जिन-जिन इन्द्रियोंसे मनुष्य पाप करते हैं, वे इन्द्रियाँ कष्ट पाती हैं। इस प्रकारकी अनेक घोर यातना पापी पुरुष सभी नरकोंमें भोगते हैं,

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  • उत्तरपर्व *

३१५

इनका सौ वर्षोंमें भी वर्णन नहीं हो सकता। जीव नरकोंमें अनेक प्रकारकी दारुण व्यथा भोगते रहते हैं, परंतु उनके प्राण नहीं निकलते।

इससे भी अधिक दारुण यातनाएँ हैं, मृदुचित्त पुरुष उनको सुनकर ही दहलने लगते हैं। पुत्र, मित्र, स्त्री आदिके लिये प्राणी अनेक प्रकारका पाप करता है, परंतु उस समय कोई सहायता नहीं करता। केवल एकाकी ही वह दुःख भोगता है और प्रलयपर्यन्त नरकमें पड़ा रहता है। यह ध्रुव सिद्धान्त है कि अपना किया पाप स्वयं भोगना पड़ता है। इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य शरीरको नश्वर जानकर लेशमात्र भी पाप न करे, पापसे अवश्य ही नरक भोगना पड़ता है। पापका फल दुःख है और नरकसे बढ़कर अधिक दुःख कहीं नहीं है। पापी मनुष्य नरकवासके अनन्तर फिर पृथ्वीपर जन्म लेते हैं। वृक्ष आदि अनेक प्रकारकी स्थावर योनियोंमें वे जन्म ग्रहण करते हैं और अनेक कष्ट भोगते हैं। अनन्तर कीट, पतंग, पक्षी, पशु आदि अनेक योनियोंमें जन्म लेते हुए अति दुर्लभ मनुष्य-जन्म पाते हैं। स्वर्ग एवं मोक्ष देनेवाले मनुष्य-जन्मको पाकर ऐसा कर्म करना चाहिये, जिससे नरक न देखना पड़े। यह मनुष्य-योनि देवताओं तथा असुरोंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ है। धर्मसे ही मनुष्यका जन्म मिलता है। मनुष्य-जन्म पाकर उसे धर्मकी वृद्धि करनी चाहिये। जो अपने कल्याणके लिये धर्मका पालन नहीं करता है, उसके समान मूर्ख कौन होगा?

यह देश सब देशोंमें उत्तम है। बहुत पुण्यसे प्राणीका जन्म भारतवर्षमें होता है। इस देशमें जन्म पाकर जो अपने कल्याणके लिये पुण्य करता है, वही बुद्धिमान् है। जिसने ऐसा नहीं किया, उसने अपने आत्माके साथ वञ्चना की। जबतक यह शरीर स्वस्थ है, तबतक जो कुछ पुण्य बन सके वह कर लेना चाहिये। बादमें कुछ भी नहीं हो सकता। दिन-रातके बहाने नित्य आयुके ही अंश खण्डित हो रहे हैं। फिर भी मनुष्योंको बोध नहीं होता कि एक दिन मृत्यु आ पहुँचेगी*। यह तो किसीको भी निश्चय नहीं है कि किसकी मृत्यु किस समयमें होगी, फिर मनुष्यको क्योंकर धैर्य और सुख मिलता है? यह जानते हुए कि एक दिन इन सभी सामग्रियोंको छोड़कर अकेले चले जायेंगे, फिर अपने हाथसे ही अपनी सम्पत्ति सत्प्रात्रोंको क्यों नहीं बाँट देते? मनुष्यके लिये दान ही पाथेय अर्थात् रास्तेके लिये भोजन है। जो दान करते हैं, वे सुखपूर्वक जाते हैं। दानहीन मार्गमें अनेक दुःख पाते हैं, भूखे मरते जाते हैं। इन सब बातोंको विचारकर पुण्य ही करना चाहिये, पापसे सदा बचना चाहिये। पुण्य-कर्मोंसे देवत्व प्राप्त होता है और पाप करनेसे नरककी प्राप्ति होती है। जो सत्यरुष सर्वात्मभावसे श्रीसदाशिवकी शरणमें जाते हैं, वे पद्मपत्रपर स्थित जलकी तरह पापोंसे लिस नहीं होते। इसलिये दृन्द्रसे छूटकर भक्तिपूर्वक ईश्वरकी आराधना करनी चाहिये तथा सभी प्रकारके पापोंसे निरन्तर बचना चाहिये। (अध्याय ५-६)

  • आयुषः खण्डखण्डानि निपतन्ति तवाग्रतः। अहोरात्रापदेशेन किमर्थं नावबुध्यसे ॥ (उत्तरपर्व ६।११९)

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३९६

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

व्रतोपवासकी महिमामें शकटव्रतकी कथा

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! मैंने जो भीषण नरकोंका विस्तारसे वर्णन किया है, उन्हें व्रत-उपवासरूपी नौकासे मनुष्य पार कर सकता है। प्राणीको अति दुर्लभ मनुष्य-जन्म पाकर ऐसा कर्म करना चाहिये, जिससे पश्चात्ताप न करना पड़े और यह जन्म भी व्यर्थ न जाय एवं फिर जन्म भी न लेना पड़े। जिस मनुष्यकी कीर्ति, दान, व्रत, उपवास आदिकी परम्परा बनी है, वह परलोकमें उन्हीं कर्मोंके द्वारा सुख भोगता है। व्रत तथा स्वाध्याय न करनेवालेकी कहीं भी गति नहीं है। इसके विपरीत व्रत-स्वाध्याय करनेवाले पुरुष सदा सुखी होते हैं। इसलिये व्रत-स्वाध्याय अवश्य करने चाहिये।

राजन्! यहाँ एक प्राचीन इतिहासका वर्णन करता हूँ—योगको सिद्ध किया हुआ एक सिद्ध अति भयंकर विकृत रूप धारणकर पृथ्वीपर विचरण करता था। उसके लम्बे ओंठ, टूटे दाँत, पिङ्गल नेत्र, चपटे कान, फटा मुख, लम्बा पेट, टेढ़े पैर और सम्पूर्ण अङ्ग कुरूप थे। उसे मूलजालिक नामके एक ब्राह्मणने देखा और उससे पूछा कि आप स्वर्गसे कब आये और किस प्रयोजनसे यहाँ आपका आगमन हुआ? क्या आपने देवताओंके चित्तको मोहित करनेवाली और स्वर्गकी अलंकार-स्वरूपिणी रम्भाको देखा है? अब आप स्वर्गमें जायँ तो रम्भासे कहें कि अवन्तिपुरीका निवासी ब्राह्मण तुम्हारा कुशल पूछता था। ब्राह्मणका वचन सुनकर सिद्धने चकित हो पूछा कि 'ब्राह्मण! तुमने मुझे कैसे पहचाना?' तब ब्राह्मणने कहा कि 'महाराज! कुरूप पुरुषोंके एक-दो अङ्ग विकृत होते हैं, पर आपके सभी अङ्ग टेढ़े और विकृत हैं।' इसीसे

मैंने अनुमान किया कि इतना रूप गुप्त किये कोई स्वर्गके निवासी सिद्ध ही हैं। ब्राह्मणका वचन सुनते ही वह सिद्ध वहाँसे अन्तर्धान हो गया और कई दिनोंके बाद पुनः ब्राह्मणके समीप आया और कहने लगा—'ब्राह्मण! हम स्वर्गमें गये और इन्द्रकी सभामें जब नृत्य हो चुका, उसके बाद मैंने एकान्तमें रम्भासे तुम्हारा संदेश कहा, परंतु रम्भाने यह कहा कि मैं उस ब्राह्मणको नहीं जानती। यहाँ तो उसीका नाम जानते हैं जो निर्मल विद्या, पौरुष, दान, तप, यज्ञ अथवा व्रत आदिसे युक्त होता है। उसका नाम स्वर्गभरमें चिरकालतक स्थिर रहता है।' रम्भाका सिद्धके मुखसे यह वचन सुनकर ब्राह्मणने कहा कि हम शकटव्रतको नियमसे करते हैं, आप रम्भासे कह दीजिये। यह सुनते ही सिद्ध फिर अन्तर्धान हो गया और स्वर्गमें जाकर उसने रम्भासे ब्राह्मणका संदेश कहा और जब उसने उसके गुण वर्णन किये तब रम्भा प्रसन्न होकर कहने लगी—'सिद्ध महाकाल! मैं वनके निवासी उस शकट ब्रह्मचारीको जानती हूँ। दर्शनसे, सम्भाषणसे, एकत्र निवाससे और उपकार करनेसे मनुष्योंका परस्पर स्नेह होता है, परंतु मुझे उस ब्राह्मणका दर्शन-सम्भाषण आदि कुछ भी नहीं हुआ। केवल नाम-श्रवणसे इतना स्नेह हो गया है।' सिद्धसे इतना कहकर रम्भा इन्द्रके समीप गयी और ब्राह्मणके व्रत आदि करने तथा अपने ऊपर अनुरक्त होनेका वर्णन किया। इन्द्रने भी प्रसन्न हो रम्भासे पूछकर उस उत्तम ब्राह्मणको वस्त्राभूषण आदिसे अलंकृत कर दिव्य विमानमें बैठाकर स्वर्गमें बुलाया और वहाँ सत्कारपूर्वक स्वर्गके दिव्य भोगोंको उसे प्रदान किया। ब्राह्मण चिरकालतक वहाँ दिव्य

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  • उत्तरपर्व *

३९७

भोग भोगता रहा। यह शकट-व्रतका माहात्म्य हमने संक्षेपमें वर्णन किया है। दूदव्रती पुरुषके लिये राजलक्ष्मी, वैकुण्ठलोक, मनोवाञ्छित फल

आदि दुर्लभ पदार्थ भी जगत्में सुलभ हैं। इसलिये सदा सत्परायण पुरुषको व्रतमें संलग्न रहना चाहिये। (अध्याय ७)

तिलकव्रतके माहात्म्यमें चित्रलेखाका चरित्र

[ संवत्सर-प्रतिपदाका कृत्य ]

राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! ब्रह्मा, विष्णु, शिव, गौरी, गणपति, दुर्गा, सोम, अग्नि तथा सूर्य आदि देवताओंके व्रत शास्त्रोंमें निर्दिष्ट हैं, उन व्रतोंका वर्णन आप प्रतिपदादि क्रमसे करें। जिस देवताकी जो तिथि है तथा जिस तिथिमें जो कर्तव्य है, उसे आप पूरी तरह बतलायें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी जो प्रतिपदा होती है, उस दिन स्त्री अथवा पुरुष नदी, तालाब या घरपर स्नान कर देवता और पितरोंका तर्पण करे। फिर घर आकर आटेकी पुरुषाकार संवत्सरकी मूर्ति बनाकर चन्दन, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि उपचारोंसे उसकी पूजा करे। ऋतु तथा मासोंका उच्चारण करते हुए पूजन तथा प्रणाम कर संवत्सरकी प्रार्थना करे और—संवत्सरोऽसि परिवत्सरोऽसीदावत्सरोऽसीद्वत्सरोऽसि वत्सरोऽसि। उषसस्ते कल्पन्तामहोरात्रास्ते कल्पन्तामर्धमासास्ते कल्पन्तां मासास्ते कल्पन्तामृतवस्ते कल्पन्ताथ संवत्सरस्ते कल्पताम्। प्रेत्या एत्यै सं चाञ्च प्र च सारय। सुपर्णचिदसि तथा देवतयाऽङ्गिरस्स्वद् ध्रुवः सीद ॥’ (यजु० २७।४५) यह मन्त्र पढ़कर वस्त्रसे प्रतिमाको वेष्टित करे। तदनन्तर फल, पुष्प, मोदक आदि नैवेद्य चढ़ाकर हाथ जोड़कर प्रार्थना करे—‘भगवन्! आपके अनुग्रहसे मेरा वर्ष सुखपूर्वक व्यतीत हो*।’ यह कहकर यथाशक्ति ब्राह्मणको दक्षिणा दे और उसी दिनसे

आरम्भ कर ललाटको नित्य चन्दनसे अलंकृत करे। इस प्रकार स्त्री या पुरुष इस व्रतके प्रभावसे उत्तम फल प्राप्त करते हैं। भूत, प्रेत, पिशाच, ग्रह, डाकिनी और शत्रु उसके मस्तकमें तिलक देखते ही भाग खड़े होते हैं।

इस सम्बन्धमें मैं एक इतिहास कहता हूँ—पूर्व कालमें शत्रुञ्जय नामके एक राजा थे और चित्रलेखा नामकी अत्यन्त सदाचारिणी उनकी पत्नी थी। उसीने सर्वप्रथम ब्राह्मणोंसे संकल्पपूर्वक इस व्रतको ग्रहण किया था। इसके प्रभावसे बहुत अवस्था बीतनेपर उनको एक पुत्र हुआ। उसके जन्मसे उनको बहुत आनन्द प्राप्त हुआ। वह रानी सदा संवत्सरव्रत किया करती और नित्य ही मस्तकमें तिलक लगाती। जो उसको तिरस्कृत करनेकी इच्छासे उसके पास आता, वह उसके तिलकको देखकर पराभूत-सा हो जाता। कुछ समयके बाद राजाको उन्मत्त हाथीने मार डाला और उनका बालक भी सिरकी पीड़ासे मर गया। तब रानी अति शोकाकुल हुई। धर्मराजके किंकर (यमदूत) उन्हें लेनेके लिये आये। उन्होंने देखा कि तिलक लगाये चित्रलेखा रानी समीपमें बैठी है। उसको देखते ही वे उलटे लौट गये। यमदूतोंके चले जानेपर राजा अपने पुत्रके साथ स्वस्थ हो गया और पूर्वकर्मानुसार शुभ भोगोंका उपभोग करने लगा। महाराज! इस परम उत्तम

  • भगवंस्त्वत्स्रादेन वर्ष शुभदमस्तु मे। (उत्तरपर्व ८।१०)

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

व्रतका पूर्वकालमें भगवान् शंकरने मुझे उपदेश किया था और हमने आपको सुनाया। यह तिलकव्रत समस्त दुःखोंको हरनेवाला है। इस

व्रतको जो भक्तिपूर्वक करता है, वह चिरकालपर्यन्त संसारका सुख भोगकर अन्तमें ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है। (अध्याय ८)

अशोकव्रत तथा करवीरव्रतका माहात्म्य

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! आश्विन मासकी शुक्ल प्रतिपदाको गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, सप्तधान्यसे तथा फल, नारिकेल, अनार, लड्डू आदि अनेक प्रकारके नैवेद्यसे मनोरम पल्लवोंसे युक्त अशोक-वृक्षका पूजन करनेसे कभी शोक नहीं होता। अशोक-वृक्षकी निम्नलिखित मन्त्रसे प्रार्थना करे और उसे अर्घ्य प्रदान करे—

पितृभ्रातृपतिश्चश्रृंश्रुशुराणां तथैव च।

अशोक शोकशमनो भव सर्वत्र नः कुले॥

(उत्तरपर्व ९।४)

‘अशोक-वृक्ष! आप मेरे कुलमें पिता, भाई, पति, सास तथा ससुर आदि सभीका शोक शमन करें।’

वस्त्रसे अशोक-वृक्षको लपेट कर पताकाओंसे अलंकृत करे। इस व्रतको यदि स्त्री भक्तिपूर्वक करे तो वह दमयन्ती, स्वाहा, वेदवती और सतीकी भाँति अपने पतिकी अति प्रिय हो जाती है। वनगमनके समय सीताने भी मार्गमें अशोक-वृक्षका भक्तिपूर्वक गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, तिल, अक्षत आदिसे पूजन किया और प्रदक्षिणा कर वनको गयीं। जो स्त्री तिल, अक्षत, गेहूँ, सर्पप आदिसे अशोकका पूजन कर मन्त्रसे वन्दना और प्रदक्षिणा कर ब्राह्मणको दक्षिणा देती है, वह शोकमुक्त होकर चिरकालतक अपने पतिसहित संसारके सुखोंका उपभोग कर अन्तमें गौरी-लोकमें निवास करती है। यह अशोकव्रत सब प्रकारके

शोक और रोगको हरनेवाला है।

महाराज! इसी प्रकार ज्येष्ठ मासकी शुक्ल प्रतिपदाको सूर्योदयके समय अत्यन्त मनोहर देवताके उद्यानमें लगे हुए करवीर-वृक्षका पूजन करे। लाल सूत्रसे वृक्षको वेष्टित कर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, सप्तधान्य, नारिकेल, नारंगी और भाँति-भाँतिके फलोंसे पूजन कर इस मन्त्रसे उसकी प्रार्थना करे—

करवीर विषावास नमस्ते भानुवल्मभ।

मौलिमण्डनसद्वत् नमस्ते केशवेशयोः॥

(उत्तरपर्व १०।४)

‘भगवान् विष्णु और शंकरके मुकुटपर रत्नके रूपमें सुशोभित, भगवान् सूर्यके अत्यन्त प्रिय तथा विषके आवास करवीर (जहर करनेर) ! आपको बार-बार नमस्कार है।’

इसी तरह ‘आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयत्रभृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्॥’ (यजु० ३३।४३) इस मन्त्रसे प्रार्थना कर ब्राह्मणको दक्षिणा दे एवं वृक्षकी प्रदक्षिणा कर घरको जाय। सूर्यदेवकी प्रसन्नताके लिये इस व्रतको अरुन्धती, सावित्री, सरस्वती, गायत्री, गङ्गा, दमयन्ती, अनसूया और सत्यभामा आदि पतिव्रता स्त्रियोंने तथा अन्य स्त्रियोंने भी किया है। इस करवीरव्रतको जो भक्तिपूर्वक करता है, वह अनेक प्रकारके सुख भोग कर अन्तमें सूर्यलोकको जाता है। (अध्याय ९-१०)

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