भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

व्रतका पूर्वकालमें भगवान् शंकरने मुझे उपदेश किया था और हमने आपको सुनाया। यह तिलकव्रत समस्त दुःखोंको हरनेवाला है। इस

व्रतको जो भक्तिपूर्वक करता है, वह चिरकालपर्यन्त संसारका सुख भोगकर अन्तमें ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है। (अध्याय ८)

अशोकव्रत तथा करवीरव्रतका माहात्म्य

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! आश्विन मासकी शुक्ल प्रतिपदाको गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, सप्तधान्यसे तथा फल, नारिकेल, अनार, लड्डू आदि अनेक प्रकारके नैवेद्यसे मनोरम पल्लवोंसे युक्त अशोक-वृक्षका पूजन करनेसे कभी शोक नहीं होता। अशोक-वृक्षकी निम्नलिखित मन्त्रसे प्रार्थना करे और उसे अर्घ्य प्रदान करे—

पितृभ्रातृपतिश्चश्रृंश्रुशुराणां तथैव च।

अशोक शोकशमनो भव सर्वत्र नः कुले॥

(उत्तरपर्व ९।४)

‘अशोक-वृक्ष! आप मेरे कुलमें पिता, भाई, पति, सास तथा ससुर आदि सभीका शोक शमन करें।’

वस्त्रसे अशोक-वृक्षको लपेट कर पताकाओंसे अलंकृत करे। इस व्रतको यदि स्त्री भक्तिपूर्वक करे तो वह दमयन्ती, स्वाहा, वेदवती और सतीकी भाँति अपने पतिकी अति प्रिय हो जाती है। वनगमनके समय सीताने भी मार्गमें अशोक-वृक्षका भक्तिपूर्वक गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, तिल, अक्षत आदिसे पूजन किया और प्रदक्षिणा कर वनको गयीं। जो स्त्री तिल, अक्षत, गेहूँ, सर्पप आदिसे अशोकका पूजन कर मन्त्रसे वन्दना और प्रदक्षिणा कर ब्राह्मणको दक्षिणा देती है, वह शोकमुक्त होकर चिरकालतक अपने पतिसहित संसारके सुखोंका उपभोग कर अन्तमें गौरी-लोकमें निवास करती है। यह अशोकव्रत सब प्रकारके

शोक और रोगको हरनेवाला है।

महाराज! इसी प्रकार ज्येष्ठ मासकी शुक्ल प्रतिपदाको सूर्योदयके समय अत्यन्त मनोहर देवताके उद्यानमें लगे हुए करवीर-वृक्षका पूजन करे। लाल सूत्रसे वृक्षको वेष्टित कर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, सप्तधान्य, नारिकेल, नारंगी और भाँति-भाँतिके फलोंसे पूजन कर इस मन्त्रसे उसकी प्रार्थना करे—

करवीर विषावास नमस्ते भानुवल्मभ।

मौलिमण्डनसद्वत् नमस्ते केशवेशयोः॥

(उत्तरपर्व १०।४)

‘भगवान् विष्णु और शंकरके मुकुटपर रत्नके रूपमें सुशोभित, भगवान् सूर्यके अत्यन्त प्रिय तथा विषके आवास करवीर (जहर करनेर) ! आपको बार-बार नमस्कार है।’

इसी तरह ‘आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयत्रभृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्॥’ (यजु० ३३।४३) इस मन्त्रसे प्रार्थना कर ब्राह्मणको दक्षिणा दे एवं वृक्षकी प्रदक्षिणा कर घरको जाय। सूर्यदेवकी प्रसन्नताके लिये इस व्रतको अरुन्धती, सावित्री, सरस्वती, गायत्री, गङ्गा, दमयन्ती, अनसूया और सत्यभामा आदि पतिव्रता स्त्रियोंने तथा अन्य स्त्रियोंने भी किया है। इस करवीरव्रतको जो भक्तिपूर्वक करता है, वह अनेक प्रकारके सुख भोग कर अन्तमें सूर्यलोकको जाता है। (अध्याय ९-१०)

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