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भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

३९८

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

व्रतका पूर्वकालमें भगवान् शंकरने मुझे उपदेश किया था और हमने आपको सुनाया। यह तिलकव्रत समस्त दुःखोंको हरनेवाला है। इस

व्रतको जो भक्तिपूर्वक करता है, वह चिरकालपर्यन्त संसारका सुख भोगकर अन्तमें ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है। (अध्याय ८)

अशोकव्रत तथा करवीरव्रतका माहात्म्य

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! आश्विन मासकी शुक्ल प्रतिपदाको गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, सप्तधान्यसे तथा फल, नारिकेल, अनार, लड्डू आदि अनेक प्रकारके नैवेद्यसे मनोरम पल्लवोंसे युक्त अशोक-वृक्षका पूजन करनेसे कभी शोक नहीं होता। अशोक-वृक्षकी निम्नलिखित मन्त्रसे प्रार्थना करे और उसे अर्घ्य प्रदान करे—

पितृभ्रातृपतिश्चश्रृंश्रुशुराणां तथैव च।

अशोक शोकशमनो भव सर्वत्र नः कुले॥

(उत्तरपर्व ९।४)

‘अशोक-वृक्ष! आप मेरे कुलमें पिता, भाई, पति, सास तथा ससुर आदि सभीका शोक शमन करें।’

वस्त्रसे अशोक-वृक्षको लपेट कर पताकाओंसे अलंकृत करे। इस व्रतको यदि स्त्री भक्तिपूर्वक करे तो वह दमयन्ती, स्वाहा, वेदवती और सतीकी भाँति अपने पतिकी अति प्रिय हो जाती है। वनगमनके समय सीताने भी मार्गमें अशोक-वृक्षका भक्तिपूर्वक गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, तिल, अक्षत आदिसे पूजन किया और प्रदक्षिणा कर वनको गयीं। जो स्त्री तिल, अक्षत, गेहूँ, सर्पप आदिसे अशोकका पूजन कर मन्त्रसे वन्दना और प्रदक्षिणा कर ब्राह्मणको दक्षिणा देती है, वह शोकमुक्त होकर चिरकालतक अपने पतिसहित संसारके सुखोंका उपभोग कर अन्तमें गौरी-लोकमें निवास करती है। यह अशोकव्रत सब प्रकारके

शोक और रोगको हरनेवाला है।

महाराज! इसी प्रकार ज्येष्ठ मासकी शुक्ल प्रतिपदाको सूर्योदयके समय अत्यन्त मनोहर देवताके उद्यानमें लगे हुए करवीर-वृक्षका पूजन करे। लाल सूत्रसे वृक्षको वेष्टित कर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, सप्तधान्य, नारिकेल, नारंगी और भाँति-भाँतिके फलोंसे पूजन कर इस मन्त्रसे उसकी प्रार्थना करे—

करवीर विषावास नमस्ते भानुवल्मभ।

मौलिमण्डनसद्वत् नमस्ते केशवेशयोः॥

(उत्तरपर्व १०।४)

‘भगवान् विष्णु और शंकरके मुकुटपर रत्नके रूपमें सुशोभित, भगवान् सूर्यके अत्यन्त प्रिय तथा विषके आवास करवीर (जहर करनेर) ! आपको बार-बार नमस्कार है।’

इसी तरह ‘आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयत्रभृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्॥’ (यजु० ३३।४३) इस मन्त्रसे प्रार्थना कर ब्राह्मणको दक्षिणा दे एवं वृक्षकी प्रदक्षिणा कर घरको जाय। सूर्यदेवकी प्रसन्नताके लिये इस व्रतको अरुन्धती, सावित्री, सरस्वती, गायत्री, गङ्गा, दमयन्ती, अनसूया और सत्यभामा आदि पतिव्रता स्त्रियोंने तथा अन्य स्त्रियोंने भी किया है। इस करवीरव्रतको जो भक्तिपूर्वक करता है, वह अनेक प्रकारके सुख भोग कर अन्तमें सूर्यलोकको जाता है। (अध्याय ९-१०)

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  • उत्तरपर्व *

३९९

कोकिलाव्रतका विधान और माहात्म्य

राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! जिस व्रतके करनेसे कुलीन स्त्रियोंका अपने पतिके साथ परस्पर विशुद्ध प्रेम बना रहे, उसे आप बतलाइये।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! यमुनाके तटपर मथुरा नामक एक सुन्दर नगरी है। वहाँ श्रीरामचन्द्रजीने अपने भाई शत्रुघ्नको राजाके पदपर प्रतिष्ठित किया था। उनकी रानीका नाम कीर्तिमाला* था। वह बड़ी पतिव्रता थी। एक दिन कीर्तिमालाने अपने कुलगुरु, वसिष्ठमुनिसे प्रणामकर पूछा—‘मुनिश्रेष्ठ! आप मुझे कोई ऐसा व्रत बतायें, जिससे मेरे अखण्ड सौभाग्यकी वृद्धि हो।’

वसिष्ठजीने कहा—कीर्तिमाले! कल्याणकामिनी स्त्री आषाढ़ मासकी पूर्णिमाको सायंकाल यह संकल्प करे कि ‘श्रावण मासभर नित्य-स्नान, रात्रि-भोजन और भूमि-शयन करूँगी तथा ब्रह्मचर्यसे रहूँगी और प्राणियोंपर दया करूँगी।’ प्रातः उठकर सब सामग्री लेकर नदी, तालाब आदिपर जाय। वहाँ दन्तधवन कर सुगन्धित द्रव्य, तिल और आँवलेका उबटन लगाये और विधिसे स्नान करे। इस प्रकार आठ दिनतक स्नान करे। अनन्तर सर्वौषधियोंका उबटन लगाकर आठ दिनतक स्नान करे। शेष दिनोंमें वचका उबटन मलकर स्नान करे। तदनन्तर सूर्यभगवान्का ध्यान करे। इसके बाद तिल पीस करके उससे कोकिला पक्षीकी मूर्ति बनाये। रक्त चन्दन, चम्पाके पुष्प, पत्र, धूप,

दीप, नैवेद्य, तिल, चावल, दूर्वा आदिसे उसका पूजन कर इस मन्त्रसे प्रार्थना करे—

तिलसहे तिलसौख्ये तिलवर्णं तिलप्रिये।

सौभाग्यद्रव्यपुत्रांश्च देहि मे कोकिले नमः ॥

(उत्तरपर्व ११।१४)

‘तिलसहे कोकिला देवि! आप तिलके समान कृष्णवर्णवाली हैं। आपको तिलसे सुख प्राप्त होता है तथा आपको तिल अत्यन्त प्रिय है। आप मुझे सौभाग्य, सम्पत्ति तथा पुत्र प्रदान करें। आपको नमस्कार है।’

—इस प्रकार पूजन कर घरमें आकर भोजन ग्रहण करे। इस विधिसे एक मास व्रतकर अन्तमें तिलपिष्टकी कोकिला बनाकर उसमें रत्नके नेत्र और सुवर्णके पंख लगाकर ताम्रपात्रमें स्थापित करे। दक्षिणासहित वस्त्र, धान्य और गुड़ ससुर, दैवज्ञ, पुरोहित अथवा किसी ब्राह्मणको दान करे।

इस विधिसे जो नारी कोकिलाव्रत करती है, वह सात जन्मतक सौभाग्यवती रहती है और अन्तमें उत्तम विमानमें बैठकर गौरीलोकको जाती है। वसिष्ठजीसे व्रतका विधान सुनकर कीर्तिमालाने उसी प्रकार कोकिलाव्रतका अनुष्ठान किया। उससे उन्हें अखण्ड सौभाग्य, पुत्र, सुख-समृद्धि और शत्रुघ्नजीकी कृपा एवं प्रीति प्राप्त हुई। अन्य भी जो स्त्रियाँ इस व्रतको भक्तिपूर्वक करती हैं उन्हें भी सुख, सौभाग्य आदिकी प्राप्ति होती है। (अध्याय ११)

बृहत्तपोव्रतका विधान और फल

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! अब मैं सभी पापोंका नाशक तथा सुर, असुर और मुनियोंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ बृहत्तपोव्रतका विधान

बतलाता हूँ, आप सुनें—आश्विन मासकी पूर्णिमाके दिन आत्मशुद्धिपूर्वक उपवासकर रातमें घृतमिश्रित पायसका भोजन करना चाहिये। दूसरे दिन प्रातः

  • सभी रामायणोंमें शत्रुघ्न-पत्नीका नाम श्रुतिकीर्ति प्राप्त होता है। इसे उसका पर्याय मानना चाहिये। भाव प्रायः समान है।

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४००

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

उठकर पवित्र हो आचमनकर बिल्बके काष्ठसे दन्तधावन करे। अनन्तर इस मन्त्रसे महादेवजीकी प्रार्थना करनी चाहिये—

अहं देवव्रतमिदं कर्तुमिच्छामि शाश्वतम्। तवाज्ञया महादेव यथा निर्वहते कुरु ॥

(उत्तरपर्व १२।४)

‘महादेव! मैं आपकी आज्ञासे निरन्तर बृहत्तपोव्रत करना चाहता हूँ। जिस प्रकार मेरा यह व्रत निर्विघ्न पूर्ण हो जाय, आप वैसी कृपा करें।’

नियमपूर्वक सोलह वर्षपर्यन्त प्रतिपदका व्रत करना चाहिये। फिर मार्गशीर्ष मासकी प्रतिपदाको उपवास कर गुरुजनोंसे आदेश प्राप्त करके महादेवका स्मरण करते हुए भक्तिपूर्वक शिवका पूजन करना चाहिये और रातमें दीपक जलाकर शिवको निवेदित करना चाहिये। शिवभक्त सप्लीक सोलह ब्राह्मणोंको निमन्त्रित कर वस्त्र, आभूषण आदिसे पूजन कर भोजन कराये या आठ दम्पतिको भोजन कराये। यदि शक्ति न हो तो एक ही दम्पतिका पूजन करे। निराहार व्रत करके रातमें भूमिपर शयन करना चाहिये। सूर्योदय होनेपर स्नान करके सभी सामग्रियोंको लेकर शिवजीका उद्घर्तन एवं पञ्चगव्यसे स्नान कराना चाहिये। अनन्तर पञ्चामृत, तिलमिश्रित जल और गर्म जलसे स्नान कराना चाहिये। स्नानके अनन्तर कर्पूर, चन्दन आदिका लेपकर कमल आदि उत्तम पुष्प चढ़ाने चाहिये। वस्त्र, पताका, वितान, धूप, दीप, घण्टा एवं भाँति-भाँतिके नैवेद्य महादेवजीको समर्पित कर अग्नि प्रज्वलित कर एवं उसकी पूजाकर विधिपूर्वक हवन करना चाहिये। घर आकर पञ्चगव्य-प्राशन कर आचार्य आदिको भोजन कराकर अपने सभी बन्धुओंके साथ मौन

होकर भोजन करना चाहिये। फिर स्वर्ण, वस्त्र आदि देकर ब्राह्मणोंसे क्षमा माँगे। धनवान् व्यक्ति श्रद्धापूर्वक साङ्गोपाङ्ग निर्दिष्ट विधिसे पूजन करे एवं यदि कोई व्यक्ति निर्धन हो तो वह श्रद्धापूर्वक जल, पुष्प आदिसे पूजा करे। इससे व्रतके सम्यक् फलकी प्राप्ति होती है। श्रद्धाके साथ कार्तिककी प्रतिपदासे लेकर प्रतिमास इस विधिसे व्रत करना चाहिये। अनन्तर पारणा करनी चाहिये। सोलहवें वर्षमें पारणाके दिन शिवजीकी पूजा कर सोनेकी सींग, चाँदीके खुर और घण्टा, काँसेके दोहन-पात्रके साथ उत्तम गाय महादेवजीके निमित्त शिवभक्त ब्राह्मणोंको देनी चाहिये। अनन्तर सोलह ब्राह्मणोंका विधि-विधानसे पूजनकर यथाशक्ति वस्त्र, आभूषण आदिसे पूजनकर उत्तम पदार्थोंका भोजन कराना चाहिये। यथाशक्ति ब्राह्मण-भोजन कराकर दक्षिणा दे। दीनों, अन्धों, अनाथों आदिको भी भोजन कराकर कुछ दान देना चाहिये। यह बृहत्तपोव्रत ब्रह्महत्या-जैसे पापोंका हरण और तीनों लोकोंमें अनेक प्रकारके उत्तम भोगोंको प्रदान करनेवाला है। चारों वर्णोंके लिये यह स्वर्गकी सीढ़ी है। धन पाकर भी जो इस व्रतको नहीं करता, वह मूढ़-बुद्धि है। सधवा स्त्री यदि इसे करती है तो उसका पतिसे वियोग नहीं होता और विधवा स्त्रीको भी भविष्यमें वैधव्य न प्राप्त हो, इसलिये उसे यह व्रत करना चाहिये। इस व्रतके अनुष्ठानसे धन, आयु, रूप, सौभाग्य आदिकी प्राप्ति होती है। सभी स्त्री-पुरुष इस व्रतको कर सकते हैं। सोलह वर्षोंतक इस बृहत्तपोव्रतका भक्तिपूर्वक अनुष्ठान कर व्रती सूर्यमण्डलका भेदन कर शिवजीके चरणोंको प्राप्त करता है। (अध्याय १२)

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  • उत्तरपर्व *

४०९

जातिस्मर*-भद्रव्रतका फल और विधान तथा स्वर्णछीवीकी कथा

महाराज युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! अपने पूर्व-जन्मोंका ज्ञान होना बहुत कठिन है। आप यह बतायें कि ऋषियोंके वरदान, देवताओंकी आराधना या तीर्थ, स्नान, होम, जप, तप, व्रत आदिके करनेसे पूर्वजन्मका ज्ञान प्राप्त हो सकता है या नहीं? यदि ऐसा कोई व्रत हो, जिसके करनेसे पूर्वजन्मका स्मरण हो सकता है तो आप उसका वर्णन करें।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—राजन्! एक ही वर्षमें 'मार्गशीर्ष, फाल्गुन, ज्येष्ठ एवं भाद्रपद' क्रमशः इन चार मासोंमें भद्रव्रतका श्रद्धापूर्वक उपवास करनेसे मनुष्यको अपने पूर्वजन्मका स्मरण हो जाता है। इस विषयमें एक आख्यान है, उसे आप सुनें—

प्राचीन कालमें यमुनाके किनारे शुभोदय नामका एक वैश्य रहता था। वह इस व्रतको करता था। कालक्रमसे वह मृत्युको प्राप्त हुआ और व्रतके प्रभावसे वह दूसरे जन्ममें राजा संजयके पुत्र-रूपमें उत्पन्न हुआ, उसका नाम था स्वर्णछीवी। उसे पूर्वजन्मका स्मरण था। कुछ दिनों बाद चोरोंने उसे मार डाला और नारदजीके प्रभावसे वह जीवित हो गया। इस व्रतके प्रभावसे अपने इस विगत वृत्तान्तोंको वह भलीभाँति जानता था।

राजाने पूछा—उसका स्वर्णछीवी नाम कैसे पड़ा? और चोरोंने उसे क्यों मार डाला? तथा किस उपायसे वह जीवित हुआ, इसका विस्तारपूर्वक वर्णन करें?

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! कुशावती नामकी नगरीमें संजय नामका एक राजा रहता था। एक दिन नारद और पर्वत नामके दो मुनि

राजाके पास आये। वे दोनों राजाके मित्र थे। राजाने अर्घ्य-पाद्य, आसनादि उपचारोंसे उनका पूजन तथा सत्कार किया। उसी समय राजाकी अत्यन्त सुन्दरी राजकन्या वहाँ आयी। पर्वतमुनिने उसे देखकर मोहित हो राजासे पूछा—राजन्! यह युवती कौन है? राजाने कहा—'मुने! यह मेरी कन्या है।' नारदजीने कहा—'राजन्! आप अपनी इस कन्याको मुझे दे दें और आप जो दुर्लभ वर माँगना चाहते हों, वह मुझसे माँग लें।' राजाने प्रसन्न होकर कहा—'देवर्षि! आप मुझे एक ऐसा पुत्र दें जो जिस स्थानमें मूत्र-पुरीष और निष्ठीवन (थूक, खखार)-का त्याग करे, वह सब उत्तम सुवर्ण बन जाय।' नारदजी बोले—'ऐसा ही होगा।'

राजाने अभीष्ट वर प्राप्त कर अपनी कन्याको वस्त्राभूषणसे अलंकृतकर नारदजीसे उसका विवाह कर दिया। नारदकी इस लीलाको देखकर पर्वतमुनिने ओठ क्रोधसे फड़कने लगे, आँखें लाल हो गयीं। वे नारदजीसे बोले—'नारद! तुमने इसके साथ विवाह कर लिया, अतः तुम मेरे साथ स्वर्ग आदि लोकोंमें नहीं जा सकोगे और जो तुमने इस राजाको पुत्र-प्राप्तिका वरदान दिया है, वह पुत्र भी चोरोंद्वारा मारा जायगा।' यह सुनकर नारदजीने कहा—'पर्वत! तुम धर्मको जाने बिना मुझे शाप दे रहे हो। यह कन्या है, इसपर किसीका भी अधिकार नहीं। धर्मपूर्वक माता-पिता जिसे दे दें, वही उसका स्वामी होता है। तुमने मूढ़तावश मुझे शाप दिया है, इसलिये तुम भी स्वर्गमें नहीं जा सकोगे। राजा संजयके पुत्रको चोरोंद्वारा मार डाले जानेपर भी मैं उसे यमलोकसे ले आऊँगा।'

  • जातिस्मर शब्दका अर्थ है पूर्वजन्मोंको स्मरण करनेवाला व्यक्ति। यह योगदर्शनके अनुसार त्याग, अपरिग्रह और मन-बुद्धि एवं प्रकृतिके अनुशीलनसे प्राप्त होता है—'संस्कारसाक्षात्करणात् पूर्वजातिज्ञानम्।' (योगदर्शन ३।१८) जिस प्रकार अद्वैत, सद्भाव, सरलता आदिको जातिस्मरता (आध्यात्मिकता, कुण्डलिनी-जागरणदि)-में सहायक माना है, उसी प्रकार अहंकार, कौटिल्य-द्वेष-द्वेहादिको आध्यात्मिकतामें बाधक भी मानना चाहिये और कल्याणकामीको उनसे सदा बचते रहनेकी भी चेष्टा करनी चाहिये।

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४०२

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

इस प्रकार परस्पर शाप देकर और राजा संजयके द्वारा सत्कृत होकर दोनों मुनि अपने-अपने आश्रमकी ओर चले गये। तदनन्तर सातवें महीनेमें राजाको पुत्र उत्पन्न हुआ। वह कामदेवके समान अतिशय रूपवान् और पूर्वजन्मोंका ज्ञाता था। नारदजीके वरदानसे जिस स्थानपर वह मूत्र-पुरीष आदिका परित्याग करता, वहीं वह सुवर्ण हो जाता, इसलिये राजाने उसका नाम स्वर्णछीवी रखा। वह राजपुत्र सभी प्राणियोंकी बातोंको समझता था। राजा संजयने पुत्रके प्रभावसे बहुत धन प्राप्तकर राजसूय आदि यज्ञोंका विधिपूर्वक सम्पादन किया। उसने अनेक कूप, सरोवर, देवालयों आदिका निर्माण कराया। पुत्रकी रक्षाके लिये विशाल सेना भी नियुक्त कर दी।

स्वर्णछीवीके प्रभावसे राजा संजयके यहाँ स्वर्णकी ढेर सारी राशियाँ एकत्र हो गयीं। कुछ समयके बाद राजपुत्रकी अत्यन्त ख्याति सुनकर लोभवश मदोद्भूत चोरोंने स्वर्णछीवीका हरण कर लिया, परंतु जब उसके शरीरमें कहीं भी सोना नहीं देखा, तब चोरोंने उसे मारकर जंगलमें फेंक दिया। चोरोंद्वारा पुत्रके मारे जानेपर राजा बहुत दुःखी हो विलाप करने लगा। उस समय नारदजी वहाँ पुनः पधारे। नारदजीने अनेक प्राचीन राजाओंकी गाथाएँ सुनाकर राजाके शोकको दूर किया और यमलोकमें जाकर वे राजपुत्रको ले आये। पुत्रको प्राप्तकर राजा बहुत प्रसन्न हुआ और उसने नारदजीसे पूछा—‘महाराज! किस कर्मके प्रभावसे यह मेरा पुत्र स्वर्णछीवी हुआ और किस कर्मके प्रभावसे इसको पूर्वजन्मका स्मरण है?’ नारदजीने कहा—‘राजन्! इसने ‘भद्र’ नामक व्रतको विधिपूर्वक चार बार किया है। यह उसीका प्रताप है।’ इतना कहकर नारदजी अपने आश्रमको चले गये।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले— महाराज! इस व्रतके

करनेसे व्रतीका उत्तम कुलमें जन्म होता है और वह रूपवान् तथा पूर्वजन्मका ज्ञाता एवं दीर्घायु होता है। अब आप इस व्रतका विधान सुनें—इस व्रतके चार भद्र चार पादके रूपमें हैं। मार्गशीर्षमें पहला, फाल्गुनमें दूसरा, ज्येष्ठमें तीसरा और भाद्रपदमें चौथा पाद होता है। मार्गशीर्ष शुक्ल आदि तीन मास ‘विष्णुपद’ नामक भद्र सभी धर्मोंका साधक है। फाल्गुन शुक्ल आदि तीन मास ‘त्रिपुष्कर’ नामक भद्ररूप है और यह तप आदिका साधक एवं लक्ष्मीप्रद है। ज्येष्ठ शुक्ल आदि तीन मास ‘त्रिराम’ नामक भद्र है। यह सत्य और शौर्य प्रदान करता है। भाद्रपद शुक्ल आदि तीन मास ‘त्रिरंग’ नामक भद्र है, यह बहुत विद्या देनेवाला है। सभी स्त्री-पुरुषोंको इस भद्रव्रतको करना चाहिये।

राजा युधिष्ठिरने पूछा— जगत्पते! इन भद्रोंका विधान आप विस्तारपूर्वक कहें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले— महाराज! इस अतिशय गुप्त विधानको मैंने किसीसे नहीं कहा है, आपको मैं सुनाता हूँ, आप सावधान होकर सुनें—

मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी प्रारम्भिक चार तिथियाँ अत्यन्त श्रेष्ठ मानी गयी हैं। ये तिथियाँ हैं—द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी और पञ्चमी। व्रतीको प्रतिपदाके दिन जितेन्द्रिय होकर एकभुक्त रहना चाहिये। प्रातःकालमें द्वितीया तिथिको नित्यक्रियाओंको सम्पन्न कर मध्याह्नमें मन्त्रपूर्वक गोमय तथा मिट्टी आदि लगाकर स्नान करना चाहिये। इन मन्त्रोंके अधिकारी चारों वर्ण हैं, किंतु वर्णसंकरोंको इनका अधिकार नहीं है। विधवा स्त्री यदि सदाचारसम्पन्न हो तो वह भी इस व्रतकी अधिकारिणी है। सधवा स्त्री अपने पतिकी आज्ञासे यह व्रत ग्रहण करे। शरीरमें मिट्टी-लेपन करनेका मन्त्र इस प्रकार है—

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  • उत्तरपर्व *

४०३

त्वं मृत्युं वन्दित्वा देवैः समलैर्दैत्यघातिभिः ॥ मयापि वन्दित्वा भक्त्या मामतो विमलं कुरु ॥

(उत्तरपर्व १३।६५-६६)

‘मृतिके! दुष्ट दैत्योंका विनाश करनेवाले देवताओंके द्वारा आप वन्दित हैं, मैं भी भक्तिपूर्वक आपकी वन्दना करता हूँ, मुझे भी आप पवित्र बना दें।’

अनन्तर जलके सम्मुख जाकर सफेद सरसों, कृष्ण तिल, वच और सर्वौषधिका उबटन लगाकर जलमें मण्डल अङ्कित कर ये मन्त्र पढ़ने चाहिये—

त्वमादिः सर्वदेवानां जगतां च जगन्मये। भूतानां वीरुधां चैव रसानां पतये नमः ॥ गङ्गासागरजं तोयं पौष्करं नार्मदं तथा। यामुनं सान्निहत्तं च संनिधानमिहास्तु मे ॥

(उत्तरपर्व १३।६८-६९)

ये मन्त्र पढ़कर स्नानकर शुद्ध वस्त्र पहन, संध्या और तर्पण करे। फिर घर आकर नियमपूर्वक रहे और चन्द्रोदयपर्यन्त किसीसे सम्भाषण न करे।

इसी प्रकार द्वितीया आदि तिथियोंमें कृष्ण, अच्युत, अनन्त और हषीकेश—इन नामोंसे भक्तिपूर्वक भगवान्का पूजन करे। पहले दिन भगवान्के चरणारविन्दोंका, दूसरे दिन नाभिका, तीसरे दिन वक्षःस्थलका और चौथे दिन नारायणके मस्तकका विधिपूर्वक उत्तम पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे पूजन करे और रात्रिमें जब चन्द्रोदय हो, तब शशि, चन्द्र, शशाङ्क तथा इन्दु—इन नामोंसे क्रमशः चन्दन, अगुरु, कर्पूर, दधि, दूर्वा, अक्षत तथा अनेक रत्नों, पुष्पों एवं फलों आदिसे चन्द्रमाको अर्घ्य दे। प्रत्येक दिन जैसे-जैसे चन्द्रमाकी वृद्धि हो वैसे-वैसे अर्घ्यमें भी वृद्धि करनी चाहिये। अर्घ्य इस मन्त्रसे देना चाहिये—

नवो नवोऽसि मासान्ने जायमानः पुनः पुनः। त्रिरग्रिसमवेत्तान् वै देवानाप्यायसे हविः ॥ गगनाङ्गणसद्दीप दुग्धाब्धिधमथनोद्भव।

भाभासितदिगाभोग रमानुज नमोऽस्तु ते ॥

(उत्तरपर्व १३।८६-८७)

‘हे रमानुज! आप प्रत्येक मासके अन्तमें नवीन-नवीन रूपमें आविर्भूत होते रहते हैं। तीन अग्रियोंसे समन्वित देवताओंको आप ही हविष्यके द्वारा आप्पायित करते हैं। आपकी उत्पत्ति क्षीरसागरके मन्थनसे हुई है। आपकी आभासे ही दिशा-विदिशाएँ आभासित होती हैं। गगरूपी आँगनके आप सत्स्वरूपी देदीप्यमान दीपक हैं। आपको नमस्कार है।’

चन्द्रमाको अर्घ्य निवेदित कर वह अर्घ्य ब्राह्मणको दे दे। अनन्तर मौन होकर भूमिपर पद्मपत्र बिछाकर भोजन करे। पलाश या अशोकके पत्रोंद्वारा पवित्र भूमि या शिलातलका शोधन कर इस मन्त्रसे भूमिकी प्रार्थना करनी चाहिये—

त्वत्तले भोक्तुकामोऽहं देवि सर्वरसोद्भव ॥ मदनुग्रहाय सुस्वादं कुर्वन्त्रमभूतोपमम्।

(उत्तरपर्व १३।९०-९१)

‘सम्पूर्ण रसोंको उत्पन्न करनेवाली हे पृथ्वी देवि! आपके आश्रयमें मैं भोजन करना चाहता हूँ। मुझपर अनुग्रह करनेके लिये आप इस अन्नको अमृतके समान उत्तम स्वादयुक्त बना दें।’

अनन्तर शाक तथा पक्वानका भोजन करे। भोजनके बाद आचमन करे और अङ्गोंका स्पर्श कर चन्द्रमाका ध्यान करते हुए भूमिपर ही शयन करे। द्वितीयाके दिन क्षार एवं लवणरहित हविष्यका भोजन करना चाहिये। तृतीयाको नीवार (तिन्नी) तथा चतुर्थीको गायके दूधसे बने उत्तम पदार्थोंको ग्रहण करना चाहिये। पञ्चमीको घृतयुक्त कुशरात्र (खिचड़ी) ग्रहण करना चाहिये। इस भद्रव्रतमें सावों, चावल, गायका घृत तथा अन्य गव्य पदार्थ एवं अयाचित प्रास वन्य फल प्रशस्त माने गये हैं। अनन्तर प्रातःकाल स्नानकर पितरोंका तर्पण कर ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें दान-दक्षिणा आदि

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४०४

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

देकर बिदा करना चाहिये। बादमें भृत्य एवं बन्धुजनोंके साथ स्वयं भी भोजन करे।

इस प्रकार तीन-तीन महीनोंतक चार भद्र-व्रतोंका जो वर्षपर्यन्त भक्तिपूर्वक प्रमादरहित होकर आचरण करता है, उसे चन्द्रदेव प्रसन्न होकर श्री, विजय आदि प्रदान करते हैं। जो कन्या इस भद्रव्रतका अनुष्ठान करती है, वह शुभ पतिको प्राप्त करती है। दुर्भगा स्त्री सुभगा

एवं साध्वी हो जाती है तथा नित्य सौभाग्यको प्राप्त करती है। राज्यार्थी राज्य, धनार्थी धन और पुत्रार्थी पुत्र प्राप्त करता है। इस भद्रव्रतके करनेसे स्त्रीका उत्तम कुलमें विवाह होता है तथा वह उत्तम शय्या, अन्न, यान, आसन आदि शुभ पदार्थोंको प्राप्त करती है और पुरुष धन, पुत्र, स्त्रीके साथ ही पूर्वजन्मके ज्ञानको भी प्राप्त कर लेता है। (अध्याय १३)

यमद्वितीया तथा अशून्यशयन-व्रतकी विधि

भगवान् श्रीकृष्ण बोले —राजन्! कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी द्वितीया तिथिको यमुनाने अपने घर अपने भाई यमको भोजन कराया और यमलोकमें बड़ा उत्सव हुआ, इसलिये इस तिथिका नाम यमद्वितीया है। अतः इस दिन भाईको अपने घर भोजन न कर बहिनके घर जाकर प्रेमपूर्वक उसके हाथका बना हुआ भोजन करना चाहिये। उससे बल और पुष्टिकी वृद्धि होती है। इसके बदले बहिनको स्वर्णलंकार, वस्त्र तथा द्रव्य आदिसे संतुष्ट करना चाहिये। यदि अपनी सगी बहिन न हो तो पिताके भाईकी कन्या, मामाकी पुत्री, मौसी अथवा बुआकी बेटी—ये भी बहिनके समान हैं, इनके हाथका बना भोजन करे। जो पुरुष यमद्वितीयाको बहिनके हाथका भोजन करता है, उसे धन, यश, आयुष्य, धर्म, अर्थ और अपरिमित सुखकी प्राप्ति होती है।

राजा युधिष्ठिरने पूछा —भगवन्! आपने बताया कि सब धर्मोंका साधन गृहस्थाश्रम है, वह गृहस्थाश्रम स्त्री और पुरुषसे ही प्रतिष्ठित होता है। पत्नीहीन पुरुष और पुरुषहीन नारी धर्म आदि साधन सम्पन्न करनेमें समर्थ नहीं होते, इसलिये आप कोई ऐसा व्रत बतायें जिसके अनुष्ठानसे

दाम्पत्यका वियोग न हो।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले —महाराज! श्रावण मासके कृष्ण पक्षकी द्वितीयाको अशून्यशयन नामक व्रत होता है। इसके करनेसे स्त्री विधवा नहीं होती और पुरुष पत्नीसे हीन नहीं होता। इस तिथिको लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णुका शय्यापर अनेक उपचारोंद्वारा पूजन करना चाहिये। इस दिन उपवास, नक्तव्रत अथवा अयाचित-व्रत करना चाहिये। व्रतके दिन दही, अक्षत, कन्द-मूल, फल, पुष्प, जल आदि सुवर्णके पात्रमें रखकर निम्नमन्त्रको पढ़ते हुए चन्द्रमाको अर्घ्य देना चाहिये—

गगनाङ्गणसम्भूत दुग्धाब्धिधमथनोद्भव।

भाभासितदिगाभोग रमानुज नमोऽस्तु ते॥

(उत्तरपर्व १५।१८)

इस विधानके साथ जो व्यक्ति चार मासतक व्रत करता है, उसको कभी भी स्त्री-वियोग प्राप्त नहीं होता एवं उसे सभी प्रकारके ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं। जो स्त्री भक्तिपूर्वक इस व्रतको करती है, वह तीन जन्मतक विधवा और दुर्भगा नहीं होती। यह अशून्य-द्वितीयाका व्रत सभी कामनाओं और उत्तम भोगोंको देनेवाला है, अतः इसे अवश्य करना चाहिये। (अध्याय १४-१५)

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  • उत्तरपर्व *

४०५

मधूकतृतीया एवं मेघपालीतृतीया-व्रत

युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! मधूक-वृक्षका आश्रय ग्रहण करनेवाली भगवान् शंकरकी भार्या भगवती गौरीकी लक्ष्मी, सरस्वती आदि देवियोंने किस कारणसे अर्चना की, इसे आप बतायें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले— प्राचीन कालमें समुद्र-मन्थनसे मधूक-वृक्ष विनिर्गत हुआ। स्त्रियोंको अखण्ड सौभाग्य प्राप्त करानेवाले तथा सभी आधि-व्याधियोंको दूर करनेवाले उस वृक्षको भूलोकवासियोंने पृथिवीपर स्थापित किया। जया-विजया आदि सखियोंसहित भगवती गौरीको उस प्रफुल्लित सुन्दर वृक्षका आश्रय ग्रहण किये देखकर देवताओंने अपनी अभीष्ट इच्छाओंकी पूर्तिहेतु उसकी अनेक उपचारोंसे पूजा की। स्वयं लक्ष्मी, सरस्वती, सावित्री, गङ्गा, रोहिणी, रम्भा तथा अरुन्धती आदिने भी विनयपूर्वक पूजा की। भगवती गौरीने प्रसन्न होकर उन्हें अभिमत फल प्रदान किया। फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षकी तृतीया तिथिको इनकी उपासना हुई थी। इसलिये फाल्गुनके शुक्ल पक्षकी तृतीया तिथिको उपवासकर मधुवनमें जाकर मधूक-वृक्षके नीचे ब्रह्मचर्यमें स्थित, जटामुकुटसे सुशोभित, तपस्यारत तथा गोधाके रथपर आरूढ़, रुद्र-ध्यानपरायणा भगवती पार्वतीकी प्रतिमाका ध्यान करते हुए गन्ध, पुष्प, दीप, लाल चन्दन, केसर, मधुर द्रव्य, स्वर्ण, माणिक्य आदिसे पूजाकर देवीसे इस प्रकार अखण्ड सौभाग्यके लिये प्रार्थना करे—

ॐ भूषिता देवभूषा च भूषिका ललिता उमा।

तपोवनरता गौरी सौभाग्यं मे प्रयच्छतु॥

दौर्भाग्यं मे शमयतु सुप्रसन्नमनाः सदा।

अवैधव्यं कुले जन्म ददात्वपरजन्मनि॥

(उत्तरपर्व १६। ३-४)

‘तपोवनरता हे गौरी देवि! आपका नाम ललिता तथा उमा है। आप देवताओंकी

आभूषणस्वरूपा एवं सभीको आभूषित करनेवाली हैं और स्वयं आभूषित हैं। आप मुझे सौभाग्य प्रदान करें। आप मेरे दौर्भाग्यका शमन करें। दूसरे जन्ममें भी मेरा सौभाग्य अखण्डित रहे। आप सर्वदा मुझपर प्रसन्न रहें।’

अनन्तर फूल, जीरक, लवण, गुड़, घी, पुष्पमालाओं, कुंकूम, गन्ध, अगर, चन्दन एवं सिंदूर आदि तथा वस्त्रोंसे और अनेक देशोत्पन्न अंजनोंसे, पुआ, तिल और तण्डुल, घृतपूरित मोदक इत्यादि नैवेद्योंसे मधूक-वृक्षकी पूजा करे। उसकी प्रदक्षिणा कर ब्राह्मणोंको दक्षिणा दे। जो कन्या इस उत्तम तृतीया-व्रतको करती है, वह तीनों लोकोंमें दुष्प्राप्य भगवान् विष्णुके समान पति प्राप्त करती है। राजन्! मेरे द्वारा कथित यह व्रत चिरकालतक प्रसिद्ध रहेगा। इस व्रतको रुक्मिणीके सम्मुख प्रथम महर्षि कश्यपने कहा था। जो स्त्री इस व्रतका आचरण करेगी, वह नीरोग, सुन्दर दृष्टिसम्पन्न तथा अङ्ग-प्रत्यङ्गोंसे शोभायुक्त होकर सौ वर्षोंतक जीवित रहेगी। अनन्तर किंकिणीके शब्दोंसे समन्वित हंसयानसे रुद्रलोकको प्राप्त करेगी। वहाँ अनेक वर्षोंतक अपने पतिके साथ दिव्य भोगोंको प्राप्त कर आठों सिद्धियोंसे समन्वित होगी।

युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! मेघपाली-व्रत कब और कैसे अनुष्ठित होता है, इसका क्या फल है तथा मेघपाली लता कैसी होती है ? इसे बतलानेकी कृपा करें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले— आश्विन मासके कृष्ण पक्षकी तृतीया तिथिको भक्तिपूर्वक स्त्रियों अथवा पुरुषोंको सद्भर्मकी प्राप्तिके लिये मेघपालीको ससधान्य (यव, गोधूम, धान, तिल, कंगु, श्यामाक (सावौं) तथा चना) और अङ्कुरित गोधूमके साथ अथवा तिल-तण्डुलके पिण्डोंद्वारा अर्घ्य प्रदान करना चाहिये।

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४०६

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

मेघपाली ताम्बूलके समान पत्तोंवाली, मञ्जरीयुक्त एक लाल लता है, वह वाटिकाओंमें, ग्राम-मार्गमें होती है तथा पर्वतोंपर प्रायः होती है। व्यापारसे जीवन बितानेवाले वैश्यगण धान्य, तेल, गुड़, कुंकुम, स्वर्ण तथा पद (जूता, छाता, कपड़ा, अँगूठी, कमण्डलु, आसन, बर्तन और भोज्य वस्तु) आदिसे इसकी पूजा करते हैं। मेघपालीके अर्घ्यदानसे जाने-अनजाने जो भी पाप होते हैं वे नष्ट हो जाते हैं। श्रेष्ठ स्त्रियोंको शुभ देश या स्थानमें उत्पन्न मेघपालीकी फल, गन्ध, पुष्प, अक्षत, नारिकेल, खजूर, अनार, कनेर, धूप, दीप, दही और नये अङ्कुरवाले धान्य-समूहसे पूजा करनी चाहिये तथा लाल वस्त्रोंसे

उसे आच्छादित कर और अबीरसे विभूषित कर अर्घ्य देना चाहिये। वह अर्घ्य विद्वान् ब्राह्मणको समर्पण कर देना चाहिये। इस प्रकार मेघपालीकी पूजा करनेवाली नारी या पुरुष परम ऐश्वर्यको प्राप्त करते हैं तथा सुख-सौभाग्यसे समन्वित हो सौ वर्षोंतक मर्त्यलोकमें जीवित रहते हैं। अन्तमें विमानपर आरूढ़ हो विष्णुलोकको प्राप्त करते हैं और अपने सात कुलोंको निःसंदेह नरकसे स्वर्ग पहुँचा देते हैं। जो नरकके भयसे फलादिसे समन्वित अर्घ्य मेघपालीको प्रदान करता है, उसके सभी पाप वैसे ही नष्ट हो जाते हैं* जैसे सूर्यके द्वारा अन्धकार नष्ट हो जाता है। (अध्याय १६-१७)

पञ्चाग्रिसाधन नामक रम्भा-तृतीया तथा गोष्यद-तृतीयाव्रत

युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! इस मृत्युलोकमें जिस व्रतके द्वारा स्त्रियोंका गृहस्थाश्रम सुचारुरूपसे चले और उन्हें पतिकी भी प्रीति प्राप्त हो, उसे बताइये।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—एक समय अनेक लताओंसे आच्छन्न, विविध पुष्पोंसे सुशोभित, मुनि और किन्नरोंसे सेवित तथा गान और नृत्यसे परिपूर्ण रमणीय कैलास-शिखरपर मुनियों और देवताओंसे आवृत माँ पार्वती और भगवान् शिव बैठे हुए थे। उस समय भगवान् शंकरने पार्वतीसे पूछा—'सुन्दरि! तुमने कौन-सा ऐसा उत्तम व्रत किया था, जिससे आज तुम मेरी वामाङ्गिकी रूपमें अत्यन्त प्रिय बन गयी हो ?'

पार्वतीजी बोलीं—नाथ! मैंने बाल्य-कालमें रम्भाव्रत किया था, उसीके फलस्वरूप आप मुझे पतिरूपमें प्राप्त हुए हैं एवं मैं सभी स्त्रियोंकी स्वामिनी तथा आपकी अधीक्षिनी भी बन गयी हूँ।

भगवान् शंकरने पूछा—भद्रे! सभीको सौख्य प्रदान करनेवाला वह रम्भाव्रत कैसे किया जाता है ? पिताके यहाँ इसे तुमने किस प्रकार अनुष्ठित किया था ? उसे बताओ।

पार्वतीजी बोलीं—देव! एक समय मैं बाल्यकालमें अपने पिताके घर सखियोंके साथ बैठी थी, उस समय मेरे पिता हिमवान् तथा माता मेनाने मुझसे कहा—'पुत्रि! तुम सुन्दर तथा सौभाग्यवर्धक रम्भाव्रतका अनुष्ठान करो, उसके आरम्भ करते ही तुम्हें सौभाग्य, ऐश्वर्य तथा महादेवी-पदकी प्राप्ति हो जायगी। पुत्रि! ज्येष्ठ मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको स्नान कर इस व्रतका नियम ग्रहण करो और अपने चारों ओर पञ्चाग्रि प्रज्वलित करो अर्थात् गार्हपत्याग्रि, दक्षिणाग्रि, आहवनीय तथा सभ्याग्रि और पाँचवें तेजःस्वरूप सूर्याग्रिका सेवन करो। इसके बीचमें पूर्वकी दिशाकी ओर मुखकर बैठ जाओ और मृगचर्म, जट,

  • इसमें वनस्पतिको देवता मानकर उसकी पूजाको विशेष महत्त्व प्रदान किया गया है। विशेषकर अथर्ववेद तथा उसके सूत्रोंमें ऐसे कई प्रकरण आये हैं। ओषधियाँ देवता ही हैं, जिनसे रोग, दुःख, पाप-शमनके साथ-साथ धर्मार्थकी सिद्धि भी होती है।

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  • उत्तरपर्व *

४०७

बल्कल आदि धारण कर चार भुजाओंवाली एवं सभी अलंकारोंसे सुशोभित तथा कमलके ऊपर विराजमान भगवती महासतीका ध्यान करो। पुत्रि! महालक्ष्मी, महाकाली, महामाया, महामति, गङ्गा, यमुना, सिन्धु, शतद्रु, नर्मदा, मही, सरस्वती तथा वैतरणीके रूपमें वे ही महासती सर्वत्र व्याप्त हैं। अतः तुम उन्हींकी आराधना करो।'

प्रभो! मैंने माताके द्वारा बतलायी गयी विधिसे श्रद्धा-भक्तिपूर्वक रम्भा (गौरी)-व्रतका अनुष्ठान किया और उसी व्रतके प्रभावसे मैंने आपको प्राप्त कर लिया।

भगवान् श्रीकृष्ण पुनः बोले—कौन्तेय! लोपामुद्राने भी इस रम्भाव्रतके आचरणसे महामुनि अगस्त्यको प्राप्त किया और वे संसारमें पूजित हुई। जो कोई स्त्री-पुरुष इस रम्भाव्रतको करेगा, उसके कुलकी वृद्धि होगी। उसे उत्तम संतति तथा सम्पत्ति प्राप्त होगी। स्त्रियोंको अखण्ड सौभाग्यकी तथा सम्पूर्ण कामनाओंको सिद्ध करनेवाले श्रेष्ठ गार्हस्थ्य-सुखकी प्राप्ति होगी और जीवनके अन्तमें उन्हें इच्छानुसार विष्णु एवं शिवलोककी प्राप्ति होगी।

इस व्रतका संक्षिप्त विधान इस प्रकार है—व्रतीको एक सुन्दर मण्डप बनाकर उसे गन्ध-पुष्पादिसे सुवासित तथा अलंकृत करना चाहिये। तदनन्तर मण्डपमें महादेवी रुद्राणीकी यथाशक्ति स्वर्णादिसे निर्मित प्रतिमा स्थापित करनी चाहिये और गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा अनेक प्रकारके नैवेद्योंसे उनकी पूजा करनी चाहिये। देवीके सम्मुख सौभाग्याष्टक—जीरा, कडुहुंड, अपूप, फूल, पवित्र निष्पाव (सेम), नमक, चीनी तथा गुड़ निवेदित करना चाहिये। पद्मासन लगाकर सूर्यास्ततक देवीके सम्मुख बैठा रहे। अनन्तर रुद्राणीको प्रणाम कर यह मन्त्र कहें—

वेदेषु सर्वशास्त्रेषु दिवि भूमौ धरातले।

दृष्टः श्रुतश्च बहुशो न शक्या रहितः शिवः ॥ त्वं शक्तिस्त्वं स्वधा स्वाहात्वं सावित्री सरस्वती। पतिं देहि गृहं देहि वसु देहि नमोऽस्तु ते ॥

(उत्तरपर्व १८।२३-२४)

'सम्पूर्ण वेदादि शास्त्रोंमें, स्वर्गमें तथा पृथ्वी आदिमें कहीं भी यह कभी नहीं सुना गया है और न ऐसा देखा ही गया है कि शिव शक्तिसे रहित हैं। हे पार्वती! आप ही शक्ति हैं, आप ही स्वधा, स्वाहा, सावित्री और सरस्वती हैं। आप मुझे पति, श्रेष्ठ गृह तथा धन प्रदान करें, आपको नमस्कार है।'

इस प्रकार पुनः-पुनः उन्हें प्रणाम करके देवीसे क्षमा-प्रार्थना करे। अनन्तर सपत्नीक यशस्वी ब्राह्मणकी सभी उपकरणोंसे पूजा करके दान देना चाहिये। सुवासिनी स्त्रियोंको नैवेद्य आदि प्रदान करना चाहिये। इस विधानसे सभी कार्य सम्पन्न कर पाप-नाशके लिये क्षमा-प्रार्थना करे। अगले दिन चतुर्थीको ब्राह्मण-दम्पतियोंको मधुर रसोंसे समन्वित भोजन कराकर व्रत पूर्ण करना चाहिये।

पार्थ! भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी तृतीया तथा चतुर्थी तिथिको प्रतिवर्ष गोष्पद नामक व्रत करना चाहिये। स्त्री अथवा पुरुष प्रथम स्नानसे निवृत्त होकर अक्षत और पुष्पमाला, धूप, चन्दन, पिष्टक (पीठी) आदिसे गौकी पूजा करे। उनके शृंग आदि सभी अङ्गोंको अलंकृत करे। उन्हें भोजन कराकर तृप्त कर दे। स्वयं तेल और लवण आदि क्षार वस्तुओंसे रहित जो अग्निके द्वारा सिद्ध न किया गया हो उसका भोजन करे। वनकी ओर जाती तथा लौटती गौओंको उनकी तुष्टिके लिये ग्रास दे और उन्हें निम्न मन्त्रसे अर्घ्य प्रदान करे— माता रुद्राणां दुहिता वसूनां स्वसादित्यानाममृतस्य नाभिः। प्र नु बोचं चिकितुषे जनाय मा गामनागामदितिं वधिष्ट ॥

(ऋ० ८।१०१।१५)

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४०८

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

तदनन्तर निम्न मन्त्रसे गौकी प्रार्थना करे— गावो मे अग्रतः सन्तु गावो मे सन्तु पृष्ठतः । गावो मे हृदये सन्तु गवां मध्ये वसाम्यहम् ॥

(उत्तरपर्व १९।७)

पञ्चमीको क्रोधरहित होकर गायके दूध, दही, चावलका पीठा, फल तथा शाकका भोजन करे। रात्रिमें संयत होकर विश्राम करे। प्रातःकाल यथाशक्ति स्वर्णादिसे निर्मित गोष्यद (गायका खुर) तथा गुड्डसे निर्मित गोवर्धन पर्वतकी पूजा कर ब्राह्मणको 'गोविन्दः प्रीयताम्' ऐसा कहकर दान करे। अनन्तर अच्युतको प्रणाम करे।

इस व्रतको भक्तिपूर्वक करनेवाला व्रती सौभाग्य, लावण्य, धन, धान्य, यश, उत्तम संतान आदि सभी पदार्थोंको प्राप्त करता है। उसका घर, गौ और बछड़ोंसे परिपूर्ण रहता है। मृत्युके बाद वह दिव्य स्वरूप धारणकर दिव्यालंकारोंसे विभूषित हो विमानमें बैठकर स्वर्गलोक जाता है एवं स्वर्गमें दिव्य सौ वर्षोंतक निवासकर फिर विष्णुलोकमें जाता है। इस गोष्यद त्रिरात्रव्रतका कर्ता गौ तथा गोविन्दकी पूजा करनेवाला और गोरस आदिका भोजन करते हुए जीवन-यापन करनेवाला उत्तम गोलोकको प्राप्त करता है। (अध्याय १८-१९)

हरकालीव्रत-कथा

राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! भगवती हरकालीदेवी कौन है? इनका पूजन करनेसे स्त्रियोंको क्या फल प्राप्त होता है? इसका आप वर्णन करें?

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! दक्ष प्रजापतिकी एक कन्याका नाम था काली। उनका वर्ण भी नीलकमलके समान काला था। उनका विवाह भगवान् शंकरके साथ हुआ। विवाहके बाद भगवान् शंकर भगवती कालीके साथ आनन्द-पूर्वक रहने लगे। एक समय भगवान् शंकर भगवान् विष्णुके साथ अपने सुरम्य मण्डपमें विराजमान थे। उस समय हँसकर शिवजीने भगवती कालीको बुलाया और कहा—'प्रिये! गौरि! यहाँ आओ।' शिवजीका यह वक्रवाक्य सुनकर भगवतीको बहुत क्रोध आया और वे यह कहकर रुदन करने लगीं कि 'शिवजीने मेरा कृष्णवर्ण देखकर परिहास किया है और मुझे गौरी कहा है, अतः अब मैं अपनी इस देहको अग्निमें प्रज्वलित कर दूँगी।' भगवान् शंकरने उन्हें अग्निमें प्रवेश करनेसे रोकनेका प्रयत्न किया, परंतु देवीने अपनी देहकी हरितवर्णकी कान्ति हरी दूर्वा आदि घासमें त्यागकर अपनी

देहको अग्निमें हवन कर दिया और उन्होंने पुनः हिमालयकी पुत्री-रूपमें गौरी नामसे प्रादुर्भूत होकर शिवजीके वामाङ्गमें निवास किया। इसी दिनसे जगत्पूज्या श्रीभगवतीका नाम 'हरकाली' हुआ।

महाराज! भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी तृतीया तिथिको सब प्रकारके नये धान्य एकत्रकर उनपर अङ्कुरित हरी घाससे निर्मित भगवती हरकालीकी मूर्ति स्थापित करे और गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, मोदक आदि नैवेद्य तथा भाँति-भाँतिके उपचारोंसे देवीका पूजन करे। रात्रिमें गीत-नृत्य आदि उत्सवकर जागरण करे और देवी हरकालीको इस मन्त्रसे प्रणाम करे—

हरकर्मसमुत्पन्ने हरकाये हरप्रिये। मां त्राहीशस्य मूर्तिस्थे प्रणतोऽस्मि नमो नमः ॥

(उत्तरपर्व २०।२०)

'भगवान् शंकरके कृत्यसे उत्पन्न हे शंकरप्रिये! आप भगवान् शंकरके शरीरमें निवास करनेवाली हैं, भगवान् शंकरकी मूर्तिमें स्थित रहनेवाली हैं, मैं आपकी शरण हूँ, आप मेरी रक्षा करें। आपको बार-बार प्रणाम है।'

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  • उत्तरपर्व *

४०९

इस प्रकार देवीका पूजन कर प्रातःकाल सुवासिनी स्त्रियाँ बड़े उत्सवसे गीत-नृत्यादि करते हुए प्रतिमाको पवित्र जलाशयके समीप ले जायँ और इस मन्त्रको पढ़ते हुए विसर्जित करें —

अर्चितासि मया भक्त्या गच्छ देवि सुरालयम्।

हरकाले शिवे गौरि पुनरागमनाय च॥

(उत्तरपर्व २०।२२)

‘हे हरकाली देवि! मैंने भक्तिपूर्वक आपकी पूजा की है, हे गौरि! आप पुनः आगमनके लिये इस समय देवलोकको प्रस्थान करें।’

इस विधिसे प्रतिवर्ष, जो स्त्री अथवा पुरुष

व्रत करता है, वह आरोग्य, दीर्घायुष्य, सौभाग्य, पुत्र, पौत्र, धन, बल, ऐश्वर्य आदि प्राप्त करता है और सौ वर्षतक संसारका सुख भोगकर शिवलोक प्राप्त करता है। महादेवके अनुग्रहसे वहाँ वीरभद्र, महाकाल, नन्दीश्वर, विनायक आदि शिवजीके गण उसकी आज्ञामें रहते हैं। जो भी स्त्री भक्तिपूर्वक यह हरकाली-व्रत करती है और रात्रिके समय गीत-वाद्य-नृत्यसे जागरण कर उत्सव मनाती है, वह अपने पतिकी अति प्रिय होती है।

(अध्याय २०)

ललितातृतीया-व्रतकी विधि

राजा युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! अब आप द्वादश मासोंमें किये जानेवाले व्रतोंका वर्णन करें, जिनके करनेसे सभी उत्तम फल प्राप्त होते हैं, साथ ही प्रत्येक मास-व्रतका विधान भी बतानेकी कृपा करें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! इस विषयमें मैं एक प्राचीन वृत्तान्त सुनाता हूँ, आप सुनें—

एक समय देवता, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर, सिद्ध, तपस्वी, नाग आदिसे पूजित भगवान् श्रीसदाशिव कैलासपर्वतपर विराजमान थे। उस समय भगवती उमाने विनयपूर्वक भगवान् सदाशिवसे प्रार्थना की कि महाराज! आप मुझे उत्तम तृतीया-व्रतके विषयमें बतानेकी कृपा करें, जिसके करनेसे नारीको सौभाग्य, धन, सुख, पुत्र, रूप, लक्ष्मी, दीर्घायु तथा आरोग्य प्राप्त होता है और स्वर्गकी भी प्राप्ति होती है। उमाकी यह बात सुनकर भगवान् शिवने हँसते हुए कहा—‘प्रिये! तीनों लोकोंमें ऐसा कौनसा पदार्थ है जो तुम्हें दुर्लभ है तथा जिसकी प्राप्तिके लिये व्रतकी जिज्ञासा कर रही हो।’

पार्वतीजी बोलीं—महाराज! आपका कथन

सत्य ही है। आपकी कृपासे तीनों लोकोंके सभी उत्तम पदार्थ मुझे सुलभ हैं, किंतु संसारमें अनेक स्त्रियाँ विविध कामनाओंकी प्राप्तिके लिये तथा अमङ्गलोंकी निवृत्तिके लिये भक्तिपूर्वक मेरी आराधना करती हैं तथा मेरी शरण आती हैं। अतः ऐसा कोई व्रत बताइये, जिससे वे अनायास अपना अभीष्ट प्राप्त कर सकें।

भगवान् शिवने कहा—उमे! व्रतकी इच्छावाली स्त्री संयमपूर्वक माघशुक्ला तृतीयाको प्रातः उठकर नित्यकर्म सम्पन्नकर व्रतके नियमको ग्रहण करे। मध्याह्नके समय बिल्च और आमलकमिश्रित पवित्र जलसे स्नानकर शुद्ध वस्त्र धारण करे तथा गन्ध, पुष्प, दीप, कपूर, कुंकुम एवं विविध नैवेद्योंसे भक्तिपूर्वक भक्तोंपर वात्सल्यभाव रखनेवाली तुम्हारी (पार्वतीकी) भक्तिभावसे पूजा करे। अनन्तर ईशानी नामसे तुम्हारा ध्यान करते हुए ताँबेके घड़ेमें जल, अक्षत तथा सुवर्ण रखकर सौभाग्यादिकी कामनासे संकल्पपूर्वक वह घट ब्राह्मणको दान दे दे। ब्राह्मण उस घटस्थ जलसे व्रतकर्त्रीका अभिषेक करे। अनन्तर वह कुशोदकका आचमन कर रात्रिके समय भगवती

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४१०

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

उमादेवीका ध्यान करते हुए भूमिपर कुशकी शय्या बिछाकर सोये। दूसरे दिन प्रातः उठकर स्नानसे निवृत्त हो, विधिपूर्वक भगवतीका पूजन करे और यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन कराये तथा स्वयं भी मौन होकर भोजन करे। इस प्रकार भगवतीका प्रथम मासमें ईशानी नामसे, द्वितीय मासमें पार्वती नामसे, तृतीय मासमें शंकरप्रिया नामसे, चतुर्थ मासमें भवानी नामसे, पाँचवें मासमें स्कन्दमाता नामसे, छठे मासमें दक्षदुहिता नामसे, सातवें मासमें मैनाकी नामसे, आठवें मासमें कात्यायनी नामसे, नवें मासमें हिमाद्रिजा नामसे, दसवें मासमें सौभाग्यदायिनी नामसे, ग्यारहवें मासमें उमा नामसे तथा अन्तिम बारहवें मासमें गौरी नामसे पूजन करे। बारहों मासोंमें क्रमशः कुशोदक, दुग्ध, घृत, गोमूत्र, गोमय, फल, निम्ब-पत्र, कंटकारी, गोशृंगोदक, दही, पञ्चगव्य और शाकका प्राशन करे।

इस प्रकार बारह मासतक व्रतकर श्रद्धापूर्वक

भगवतीकी पूजा करे और प्रत्येक मासमें ब्राह्मणोंको दान दे। व्रतकी समाप्तिपर वेदपाठी ब्राह्मणको पत्नीके साथ बुलाकर दोनोंमें शिव-पार्वतीकी बुद्धि रखकर गन्ध-पुष्पादिसे उनकी पूजा करे और उन्हें भक्तिपूर्वक भोजन कराये तथा आभूषण, अन्न, दक्षिणा आदि देकर उन्हें संतुष्ट करे। ब्राह्मणको दो शुक्ल वस्त्र तथा ब्राह्मणीको दो रक्त वस्त्र प्रदान करे। जो स्त्री इस व्रतको भक्तिपूर्वक करती है, वह अपने पतिके साथ दिव्यलोकमें जाकर दस हजार वर्षांतक उत्तम भोगोंका भोग करती है। पुनः मनुष्य-लोकमें आनेके बाद वे दोनों दम्पति ही होते हैं और आरोग्य, धन, संतान आदि सभी उत्तम पदार्थ उन्हें प्राप्त होते हैं। इस व्रतका पालन करनेवाली स्त्रीका पति सदा उसके अधीन रहता है और उसे अपने प्राणोंसे भी अधिक मानता है। जन्मान्तरमें व्रतकर्त्री स्त्री राजपत्नी होकर राज्य-सुखका उपभोग करती है। (अध्याय २१)

अवियोगतृतीया-व्रत

राजा युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! जिस व्रतके करनेसे पत्नी पतिसे वियुक्त न हो और अन्तमें शिवलोकमें निवास करे तथा जन्मान्तरमें भी विधवा न हो ऐसे व्रतका आप वर्णन करें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! इसी विषयको भगवती पार्वतीजीने भगवान् शिवसे और अरुन्धतीने महर्षि वसिष्ठजीसे पूछा था। उन लोगोंने जो कहा, वही आपको सुनाता हूँ।

मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी द्वितीयाको पवित्र चरित्रवाली स्त्री रात्रिमें पायस भक्षण कर शिव और पार्वतीको दण्डवत् प्रणाम करे। तृतीया तिथिमें प्रातः गूलरकी दातौनसे दन्तधवन कर स्नान करे। शालि चावलके चूर्णसे शिव और पार्वतीकी प्रतिमा बनाये। उन्हें एक उत्तम पात्रमें

स्थापित कर विधिपूर्वक उनका पूजन करे। रात्रिमें जागरण कर शिव-पार्वतीका कीर्तन करती हुई भूमिपर शयन करे। चतुर्थीको प्रातः उठकर दक्षिणाके साथ उस प्रतिमाको आचार्यको समर्पित कर शिवभक्त ब्राह्मणोंको उत्तम भोजन कराकर संतुष्ट करे। ब्राह्मण दम्पतिकी भी यथाशक्ति पूजा करे।

इस प्रकार प्रतिमास व्रत एवं पूजन करना चाहिये। बारह महीनोंमें क्रमशः शिव-पार्वतीकी इन नामोंसे पूजा करनी चाहिये—मार्गशीर्षमें शिव-पार्वतीके नामसे, पौषमें गिरीश और पार्वती नामसे, माघमें भव और भवानी नामसे, फाल्गुनमें महादेव और उमा नामसे, चैत्रमें शंकर और ललिता नामसे, वैशाखमें स्थाणु और लोलनेत्रा नामसे, ज्येष्ठमें वीरेश्वर और एकवीरा नामसे, आषाढ़में त्रिलोचन

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  • उत्तरपर्व *

४११

पशुपति और शक्ति नामसे, श्रावणमें श्रीकण्ठ और सुता नामसे, भाद्रपदमें भीम और कालरात्रि नामसे, आश्विनमें शिव और दुर्गा नामसे तथा कार्तिकमें ईशान और शिवा नामसे पूजा करनी चाहिये।

बारह महीनोंमें भगवान् शिव एवं पार्वतीकी प्रसन्नताके लिये क्रमशः—नील कमल, कनेर, बिल्वपत्र, पलास, कुब्ज, मल्लिका, पाढर, श्वेत कमल, कदम्ब, तगर, द्रोण तथा मालती—इन पुष्पोंसे पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार मार्गशीर्षसे व्रत प्रारम्भकर कार्तिकमें व्रतका उद्यापन करना चाहिये। उद्यापनमें सुवर्ण, कमल, दो वस्त्र, ध्वजा, दीपक और विविध नैवेद्य शिवको अर्पित कर आरती करनी चाहिये और बारह ब्राह्मणयुगलका यथाशक्ति पूजन कर सुवर्णमय शिव-पार्वतीकी मूर्ति बनवाकर

उन्हें ताम्रपात्रमें स्थापित कर उसी पात्रमें चॉसठ मोती, चॉसठ मूँगा, चॉसठ पुखराज रखकर उस पात्रको वस्त्रसे ढककर आचार्यको समर्पित करना चाहिये। अङ्गतालीस जलपूर्ण कलश, छाता, जूता और सुवर्ण ब्राह्मणोंको दानमें देना चाहिये। दीन, अन्ध और कृपणको अन्न बाँटना चाहिये। किसीको भी उस दिन निराश नहीं जाने देना चाहिये। यदि इतनी शक्ति न हो तो कुछ कम करे, किंतु वित्तशाठ्य न करे। इस व्रतके करनेसे रूप, सौभाग्य, धन, आयु, पुत्र और शिवलोककी प्राप्ति होती है तथा इष्टजनोंसे कभी वियोग नहीं होता। इस व्रतके करनेपर पतिव्रता स्त्री कभी भी पति-पुत्र, सौभाग्य और धनसे वियुक्त नहीं होती और शिवलोकमें निवास करती है। (अध्याय २२)

उमामहेश्वर-व्रतकी विधि

महाराज युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! जिस व्रतके करनेसे स्त्रियोंको अनेक गुणवान् पुत्र-पौत्र, सुवर्ण, वस्त्र और सौभाग्यकी प्राप्ति होती है तथा पति-पत्नीका परस्पर वियोग नहीं होता, उस व्रतका आप वर्णन करें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! सभी व्रतोंमें श्रेष्ठ एक व्रत है, जो उमामहेश्वर-व्रत कहलाता है, इस व्रतको करनेसे स्त्रियोंको अनेक संतान, दास, दासी, आभूषण, वस्त्र और सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। इस व्रतको अप्सरा, विद्याधरी, किन्नरी, ऋषिकन्या, सीता, अहल्या, रोहिणी, दमयन्ती, तारा तथा अनसूया आदि सभीने किया था और अन्य सभी उत्तम स्त्रियाँ भी इस व्रतको करती हैं। भगवती पार्वतीने सौभाग्य तथा आरोग्य प्रदान करनेवाले और दखिन्ना तथा व्याधिका नाश करनेवाले इस व्रतका दुर्भाग और कुरूप तथा निर्धन स्त्रियोंके हितकी दृष्टिसे मनुष्यलोकमें प्रचार किया।

धर्मपरायणा स्त्री इस व्रतमें मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी तृतीया तिथिको नियमपूर्वक उपवास करे। प्रातः उठकर पवित्र गङ्गा आदि नदियोंमें स्नान कर शिव-पार्वतीका ध्यान करती हुई यह मन्त्र पढ़े और भगवान् शंकरकी अधीन्द्रिनी भगवती श्रीललिताकी पूजा करे—

नमो नमस्ते देवेश उमादेहार्धधारक।

महादेवि नमस्तेऽस्तु हरकायार्धवासिनि ॥

(उत्तरपर्व २३।१२)

‘भगवती उमाको अपने आधे भागमें धारण करनेवाले हे देवदेवेश्वर भगवान् शंकर! आपको बार-बार नमस्कार है। महादेवि! भगवती पार्वती! आप भगवान् शंकरके आधे शरीरमें निवास करनेवाली हैं, आपको नमस्कार है।’

पुनः घर आकर शरीरकी शुद्धिके लिये पञ्चगव्य-पान करे और प्रतिमाके दक्षिण भागमें भगवान् शंकर और वाम भागमें भगवती पार्वतीकी भावना

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

कर गन्ध, पुष्प, गुग्गुल, धूप, दीप और घीमें पकाये गये नैवेद्योंसे भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करे। इसी प्रकार बारह महीनेतक पूजनकर प्रसन्नचित्त हो व्रतका उद्घापन करे। भगवान् शंकरकी चाँदीकी तथा भगवती पार्वतीकी सुवर्णकी मूर्ति बनवाकर दोनोंको चाँदीके वृषभपर स्थापित कर वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत करे। अनन्तर चन्दन, श्वेत पुष्प, श्वेत वस्त्र आदिसे भगवान् शंकरकी और कुंकुम, रक्त वस्त्र, रक्त पुष्प आदिसे भगवती पार्वतीकी पूजा करनी चाहिये। फिर शिवभक्त वेदपाठी, शान्तचित्त ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। सभीको दक्षिणा देकर उनकी प्रदक्षिणा करके यह मन्त्र पढ़ना चाहिये—

उमामहेश्वरी देवी सर्वलोकपितामहौ।

व्रतेनानेन सुप्रीतौ भवेतां मम सर्वदा॥

(उत्तरपर्व २३।२१)

‘सभी लोकोंके पितामह भगवान् शिव एवं पार्वती मेरे इस व्रतके अनुष्ठानसे मुझपर सदा प्रसन्न रहें।’

इस प्रकार प्रार्थना करके क्रोधरहित ब्राह्मणको सभी सामग्रियाँ देकर व्रतको समाप्त करे। इस व्रतको जो स्त्री भक्तिपूर्वक करती है, वह शिवजीके समीप एक कल्पतक निवास करती है। तदनन्तर मनुष्य-लोकमें उत्तम कुलमें जन्म ग्रहणकर रूप, यौवन, पुत्र आदि सभी पदार्थोंको प्राप्त कर बहुत दिनोंतक अपने पतिके साथ सांसारिक सुखोंको भोगती है, उसका अपने पतिसे कभी वियोग नहीं होता और अन्तमें वह शिव-सायुज्य प्राप्त करती है। (अध्याय २३)

रम्भातृतीया-व्रतका माहात्म्य

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! अब मैं सभी पापोंके नाशक, पुत्र एवं सौभाग्यप्रद सभी व्याधियोंके उपशामक पुण्य तथा सौख्य प्रदान करनेवाले रम्भातृतीया-व्रतका वर्णन करता हूँ। यह व्रत सपत्नियोंसे उत्पन्न क्लेशका शामक तथा ऐश्वर्यको प्रदान करनेवाला है। भगवान् शंकरने देवी पार्वतीकी प्रसन्नताके लिये इस व्रतकी जो विधि बतलायी थी, उसे ही मैं कहता हूँ।

श्रद्धालु स्त्री मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी तृतीया तिथिको प्रातः उठकर दन्तधवन आदिसे निवृत्त हो भक्तिपूर्वक उपवासका नियम ग्रहण करे। वह सर्वप्रथम व्रत-ग्रहण करनेके लिये देवीसे इस प्रकार प्रार्थना करे—

देवि संवत्सरं यावत्तृतीयायामुपोषिता।

प्रतिमासं करिष्यामि पारणं चापरेऽहनि।

तदविघ्नं मे यातु प्रसादात् तव पार्वति॥

(उत्तरपर्व २४।५)

‘देवि! मैं पूरे एक वर्षतक इस तृतीया-व्रतका

आचरण और दूसरे दिन पारणा करूँगी। आप ऐसी कृपा करें, जिससे इसमें कोई विघ्न न उत्पन्न हो।’

इस प्रकार स्त्री या पुरुष व्रतका संकल्प करे और मनमें व्रतका निश्चय कर सावधानी बतेंते हुए नदी, तालाब अथवा घरमें स्नान करे। तदनन्तर देवी पार्वतीका पूजन कर रात्रिमें कुशोदकका प्राशन करे। दूसरे दिन प्रातःकाल विद्वान् शिवभक्त ब्राह्मणोंको भोजन कराये और दक्षिणाके रूपमें सुवर्ण एवं लवण प्रदान करे। यथाशक्ति गौरीश्वर भगवान् शिवको प्रयत्नपूर्वक भोग निवेदित करे।

राजन्! पौष मासकी तृतीयामें इसी विधिसे उपवास एवं पूजनकर रात्रिमें गोमूत्रका प्राशन कर प्रभातकालमें ब्राह्मणोंको भोजन कराये और दक्षिणाके रूपमें उन्हें अपनी शक्तिके अनुसार सोना तथा जीरक दे। इससे वाजपेय तथा अतिरात्र यज्ञोंका फल प्राप्त होता है और वह कल्पपर्यन्त इन्द्रलोकमें निवासकर अन्तमें शिवलोकको प्राप्त करता है।

माघ मासके शुक्लपक्षकी तृतीयाको ‘सुदेवी’

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  • उत्तरपर्व *

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नामसे भगवती पार्वतीका पूजन कर रात्रिमें गोमयका प्राशन कर अकेले ही सोये। प्रातः अपनी शक्तिके अनुसार केसर तथा सोना ब्राह्मणोंको दानमें दे। इससे व्रतीको चिरकालतक विष्णुलोकमें निवास करनेके पश्चात् भगवान् शंकरके सायुज्य (मोक्ष)-की प्राप्ति होती है।

फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको 'गौरी' नामसे देवी पार्वतीका पूजन कर रात्रिमें गायका दूध पीये। प्रातः विद्वान् शिवभक्तों तथा सुवासिनी स्त्रियोंको भोजन कराकर सोनेके साथ कडुहुंड देकर बिदा करे। इससे वाजपेय तथा अतिरात्र यज्ञोंका फल प्राप्त होता है।

चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयामें भक्तिपूर्वक भगवती पार्वतीका विशालाक्षी नामसे पूजन कर रात्रिमें दहीका प्राशन करे और प्रातः कुंकुमके साथ ब्राह्मणोंको सोना प्रदान करे। विशालाक्षीके प्रसादसे व्रतकर्त्रीको महान् सौभाग्य प्राप्त होता है।

वैशाख मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको भगवती पार्वतीका 'श्रीमुखी' नामसे पूजन करे। रात्रिमें घृतका प्राशन करे और एकाकी ही शयन करे। प्रातः शिवभक्त ब्राह्मणोंको यथारुचि भोजन कराकर ताम्बूल तथा लवण प्रदान कर प्रणामपूर्वक बिदा करे। इस विधिसे पूजन करनेपर सुन्दर पुत्रोंकी प्राप्ति होती है।

आषाढ़ मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको गौरी-पार्वतीकी 'माधवी' नामसे पूजा करे। तिलोदकका प्राशन करे। प्रातःकाल विप्रोंको भोजन कराये और दक्षिणामें गुड तथा सोना दे। इससे उसे शुभ लोककी प्राप्ति होती है।*

श्रावण मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको देवी पार्वतीका 'श्रीदेवी' नामसे पूजन कर गायके

सींगका स्पर्श करे और जल पीये। शिवभक्तोंको भोजन कराकर सोना और फल दक्षिणाके रूपमें दे। इससे व्रती सर्वलोकेश्वर होकर सभी कामनाओंको प्राप्त करता है।

भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको भगवती पार्वतीका 'हरताली' नामसे पूजन करे। महिषीका दूध पीये। इससे अतुल सौभाग्य प्राप्त होता है और इस लोकमें वह सुख भोगकर अन्तमें शिवलोकको प्राप्त करता है।

आश्विन मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको देवी पार्वतीका 'गिरिपुत्री' नामसे पूजन कर तण्डुल-मिश्रित जलका प्राशन करे और दूसरे दिन प्रातः ब्राह्मणोंका पूजन कर चन्दनयुक्त सुवर्ण दक्षिणामें दे। इससे सभी यज्ञोंका फल प्राप्त होता है और वह गौरीलोकमें प्रशंसित होता है।

कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको देवी पार्वतीका 'पद्मोद्भवा' नामसे पूजन करके पञ्चगव्यका प्राशन करे तथा रात्रिमें जागरण करे। प्रभातकालमें सप्लीक सदाचारी ब्राह्मणोंको भोजन कराये और माल्य, वस्त्र तथा अलंकारोंसे उन शिवभक्त ब्राह्मणोंका पूजन करे। कुमारियोंको भी भोजन कराये।

इस प्रकार वर्षभर व्रत करनेके पश्चात् उद्यापन करना चाहिये। यथाशक्ति सोनेकी उमा-महेश्वरकी प्रतिमा बनवाकर उन्हें एक सुन्दर, अलंकृत वितानयुक्त मण्डपमें स्थापित कर सुगन्धित द्रव्य, पत्र, पुष्प, फल, घृत-पक्क-नैवेद्य, दीपमाला, शर्करा, नारियल, दाडिम, बीजपूरक, जीरक, लवण, कुसुंभ, कुंकुम तथा मोदकयुक्त ताम्रपात्रसे देवदेवेशकी विधिवत् पूजा कर अन्तमें क्षमा-प्रार्थना एवं शंख आदि वाद्योंकी ध्वनि करनी चाहिये।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! इस विधिसे

  • ज्येष्ठ मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको भगवती पार्वतीका 'नारायणी' नामसे श्वेत पुष्पोंसे पूजन करे। रात्रिमें लवणका प्राशन करे। एकाकी शयन करे। प्रातःकाल शिवभक्त ब्राह्मण और सौभाग्यवती स्त्रियोंको यथाशक्ति भोजन कराये, ब्राह्मणको ताम्बूल दे और सुवर्णकी दक्षिणा देकर प्रणाम-क्षमा-प्रार्थना करे। इससे व्रतकर्ताको शिवलोक प्राप्त होता है।

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

देवी पार्वतीका पूजन करनेपर जो फल प्राप्त होता है, उसका फल वर्णन करनेमें मैं भी समर्थ नहीं हूँ। वह पूर्वोक्त सभी फलोंको प्राप्त करता है, सभी देवताओंके द्वारा पूजित होता है तथा सौ करोड़ कल्पोंतक सभी

कामनाओंका उपभोग करता हुआ अन्तमें शिव-सायुज्य प्राप्त करता है, इसमें कोई संदेह नहीं। यह व्रत पहले रम्भाके द्वारा किया गया था, इसलिये यह रम्भाव्रत कहलाता है। (अध्याय २४)

सौभाग्यशयन-व्रतकी विधि

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! अब मैं सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले सौभाग्यशयन-व्रतका वर्णन करता हूँ। जब प्रलयके पूर्वकालमें— ‘भूभुवः स्वः’ आदि सभी लोक दग्ध हो गये, तब सभी प्राणियोंका सौभाग्य एकत्र होकर वैकुण्ठमें भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलमें स्थित हो गया। पुनः जब सृष्टि हुई, तब आधा सौभाग्य ब्रह्माजीके पुत्र दक्ष प्रजापतिने पान कर लिया, जिससे उनका रूप-लावण्य, बल और तेज सबसे अधिक हो गया। शेष आधे सौभाग्यसे इक्षु, स्तवराज, निष्पाव (सेम), राजिधान्य (शालि या अगहनी), गोक्षीर तथा उसका विकार, कुसुंभ-पुष्प (केसर), कुंकुम तथा लवण—ये आठ पदार्थ उत्पन्न हुए। इनका नाम सौभाग्याष्टक है*।

दक्ष प्रजापतिने पूर्वकालमें जिस सौभाग्यका पान किया, उससे सती नामकी एक कन्या उत्पन्न हुई। सभी लोकोंमें उस कन्याका सौन्दर्य अधिक था, इसीसे उसका नाम सती एवं रूपमें अतिशय लालित्य होनेके कारण ललिता पड़ा। त्रैलोक्य-सुन्दरी इस कन्याका विवाह भगवान् शंकरके साथ हुआ। जगन्माता ललितादेवीकी आराधनासे भुक्ति, मुक्ति और स्वर्गका राज्य आदि सब प्राप्त होते हैं।

राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! जगद्धात्री उन भगवतीकी आराधनाका क्या विधान है? उसे

आप बतलायें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको ललितादेवीका भगवान् शंकरके साथ विवाह हुआ। इस दिन पूर्वाह्नमें तिलमिश्रित जलसे स्नान करे। पञ्चगव्य तथा चन्दनमिश्रित जलके द्वारा गौरी और भगवान् चन्द्रशेखरकी प्रतिमाको स्नान कराकर धूप, दीप, नैवेद्य तथा नाना प्रकारके फलोंद्वारा उन दोनोंकी पूजा करे। इसके बाद इस प्रकार अङ्ग-पूजा करे—

‘ॐ पाटलायै नमः, ॐ शम्भवे नमः’ ऐसा कहकर पार्वती और शम्भुके चरणोंकी, ‘ॐ त्रियुगयै नमः, ॐ शिवाय नमः’ से दोनोंके गुल्फोंकी, ‘ॐ विजयायै नमः, ॐ भद्रेश्चराय नमः’ से दोनोंके जानुओंकी, ‘ॐ ईशान्यै नमः, ॐ हरिकेशाय नमः’ से कटि-प्रदेशकी, ‘ॐ कोटव्यै नमः, ॐ शूलिने नमः’ से कुक्षियोंकी, ‘ॐ मङ्गलायै नमः, ॐ शर्वाय नमः’ से उदरकी, ‘ॐ उमायै नमः, ॐ रुद्राय नमः’ से कुचद्द्वयकी, ‘ॐ अनन्तायै नमः, ॐ त्रिपुरघ्राय नमः’ से दोनोंके हाथोंकी पूजा करे। ‘ॐ भवान्यै नमः, ॐ भवाय नमः’ से दोनोंके कण्ठकी, ‘ॐ गौयै नमः, ॐ हराय नमः’ से दोनोंके मुखकी तथा ‘ॐ ललितायै नमः, ॐ सर्वात्मने नमः’ से दोनोंके मस्तककी पूजा करे।

इस प्रकार विधिवत् पूजनकर शिव-पार्वतीके सम्मुख सौभाग्याष्टक स्थापित कर ‘उमामहेश्वरी

  • इक्षवः स्तवराजं च निष्पावा राजिधान्यकम्।

विकारवच्च गोक्षीरं कुसुम्भं कुंकुमं तथा। लवणं चाष्टमं तत्र सौभाग्याष्टकमुच्यते ॥ (उत्तरपर्व २५।१)

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  • उत्तरपर्व *

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प्रीयेताम्' कहकर उनकी प्रीतिके लिये निवेदन करे। उस रात्रिमें गोशृंगोदकका प्राशन कर भूमिपर ही शयन करना चाहिये। प्रातः द्विज-दम्पतिकी वस्त्र-माला तथा अलंकारोंसे पूजाकर सुवर्णनिर्मित गौरी तथा भगवान् शंकरकी प्रतिमाके साथ वह सौभाग्याष्टक 'ललिता प्रीयताम्' ऐसा कहकर ब्राह्मणोंको दे दे।

इस प्रकार एक वर्षतक प्रत्येक मासकी तृतीयाको पूजा करनी चाहिये। चैत्र आदि बारहों मासोंमें क्रमशः गौके सींगका जल, गोमय, मन्दार-पुष्प, बिल्वपत्र, दही, कुशोदक, दूध, घृत, गोमूत्र, मक्खन, कृष्ण तिल और पञ्चगव्यका प्राशन करना चाहिये। ललिता, विजया, भद्रा, भवानी, कुमुदा, शिवा, वासुदेवी, गौरी, मङ्गला, कमला, सती तथा उमा—इन बारह नामोंका क्रमशः बारह महीनोंमें दानके समय 'प्रीयताम्' कहकर उच्चारण करे। मल्लिका, अशोक, कमल, कदम्ब, उत्पल, मालती, कुड्मल, करवीर, बाण (कचनार या काश), खिला हुआ

पुष्प, कुंकुम और सिंदुवार—ये बारह महीनोंकी पूजाके लिये क्रमशः पुष्प कहे गये हैं। जपाकुसुम, कुसुभ, मालती तथा कुन्दके पुष्प प्रशस्त माने गये हैं। करवीरका पुष्प भगवतीको सदा ही प्रिय है।

इस प्रकार एक वर्षतक व्रत करके सभी सामग्रियोंसे युक्त उत्तम शय्यापर सुवर्णकी उमा-महेश्वरकी तथा सुवर्णनिर्मित गौ और वृषभकी प्रतिमा स्थापित कर उनकी पूजा कर ब्राह्मणको दे।

इस व्रतके करनेसे सभी कामनाएँ सिद्ध होती हैं और निष्कामभावसे करनेपर नित्यपद प्राप्त होता है। स्त्री, पुरुष अथवा कुमारी जो कोई भी इस सौभाग्यशयन नामक व्रतको भक्तिपूर्वक करते हैं, वे देवीके अनुग्रहसे अपनी कामनाओंको प्राप्त कर लेते हैं। जो इस व्रतका माहात्म्य श्रवण करते हैं, वे दिव्य शरीर प्राप्त कर स्वर्गमें जाते हैं। इस व्रतको कामदेव, चन्द्रमा, कुबेर तथा और भी अन्य देवताओंने किया है। अतः सबको यह व्रत करना चाहिये। (अध्याय २५)

अनन्त-तृतीया तथा रसकल्याणिनी-तृतीया-व्रत

राजा युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! अब आप सौभाग्य एवं आरोग्य-प्रदायक, शत्रुविनाशक तथा भुक्ति-मुक्ति-प्रदायक कोई व्रत बतलाइये।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महारज! बहुत पहलेकी बात है, असुरसंहारक भगवान् शंकरने अनेक कथाओंके प्रसंगमें पार्वतीजीसे भगवती ललिताकी आराधनाकी जो विधि बतलायी थी, उसी व्रतका मैं वर्णन कर रहा हूँ, यह व्रत सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाला तथा नारियोंके लिये अत्यन्त उत्तम है, इसे आप सावधान होकर सुनें—

वैशाख, भाद्रपद अथवा मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको श्वेत सरसोंका उबटन

लगाकर स्नान करे। गोरोचन, मोथा, गोमूत्र, दही, गोमय और चन्दन—इन सबको मिलाकर मस्तकमें तिलक करे, क्योंकि यह तिलक सौभाग्य तथा आरोग्यको देनेवाला है एवं भगवती ललिताको बहुत प्रिय है। प्रत्येक मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको सौभाग्यवती स्त्री रक्तवस्त्र, विधवा गेरू आदिसे रँगा वस्त्र और कुमारी शुक्ल वस्त्र धारणकर पूजा करे। भगवती ललिताको पञ्चगव्य अथवा केवल दुग्धसे स्नान कराकर मधु और चन्दन-पुष्पमिश्रित जलसे स्नान कराना चाहिये। स्नानके अनन्तर श्वेत पुष्प, अनेक प्रकारके फल, धनिया, श्वेत जीरा, नमक, गुड़, दूध तथा घीका

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

नैवेद्य अर्पण कर श्वेत अक्षत तथा तिलसे ललितादेवीकी अर्चना करे। प्रत्येक शुक्ल पक्षमें तृतीया तिथिको देवीकी अर्चना करे।

प्रत्येक शुक्ल पक्षमें तृतीया तिथिको देवीकी मूर्तिके चरणसे लेकर मस्तकपर्यन्त पूजन करनेका विधान इस प्रकार है—‘वरदायै नमः’ कहकर दोनों चरणोंकी, ‘श्रियै नमः’ कहकर दोनों टखनोंकी, ‘अशोकायै नमः’ कहकर दोनों पिण्डलियोंकी, ‘भवान्यै नमः’ कहकर घुटनोंकी, ‘मङ्गलकारिण्यै नमः’ कहकर ऊरुओंकी, ‘कामदेव्यै नमः’ कहकर कटिकी, ‘पद्मोद्भवान्यै नमः’ कहकर पेटकी, ‘कामश्रियै नमः’ कहकर वक्षःस्थलकी, ‘सौभाग्यवासिन्यै नमः’ कहकर हाथोंकी, ‘शशिमुखश्रियै नमः’ कहकर बाहुओंकी, ‘कन्दर्पवासिन्यै नमः’ कहकर मुखकी, ‘पार्वत्यै नमः’ कहकर मुसकानकी, ‘गौयै नमः’ कहकर नासिकाकी, ‘सुनेत्रायै नमः’ कहकर नेत्रोंकी, ‘तुष्ट्यै नमः’ कहकर ललाटकी, ‘काल्यायन्यै नमः’ कहकर उनके मस्तककी पूजा करे। तदनन्तर ‘गौयै नमः’, ‘सुष्ट्यै नमः’, ‘कान्त्यै नमः’, ‘श्रियै नमः’, ‘रम्भायै नमः’, ‘ललितायै नमः’ तथा ‘वासुदेव्यै नमः’ कहकर देवीके चरणोंमें बार-बार नमस्कार करे। इसी प्रकार विधिपूर्वक पूजाकर मूर्तिके आगे कुंकुमसे कर्णिकासहित द्वादश-दलयुक्त कमल बनाये। उसके पूर्वभागमें गौरी, अग्रिकोणमें अपर्णा, दक्षिणमें भवानी, नैऋत्यमें रुद्राणी, पश्चिममें सौम्या, वायव्यमें मदनवासिनी, उत्तरमें पाटला तथा ईशानकोणमें उमाकी स्थापना करे। मध्यमें लक्ष्मी, स्वाहा, स्वधा, तुष्टि, मङ्गला, कुमुदा, सती तथा रुद्राणीकी स्थापना कर कर्णिकाके ऊपर भगवती ललिताकी स्थापना करे। तत्पश्चात् गीत और माङ्गलिक वाद्योंका आयोजन कर श्वेत पुष्प एवं अक्षतसे अर्चना कर उन्हें नमस्कार करे। फिर लाल वस्त्र,

रक्त पुष्पोंकी माला और लाल अङ्गरागसे सुवासिनी स्त्रियोंका पूजन करे तथा उनके सिर (माँग)-में सिंदूर और केसर लगाये, क्योंकि सिंदूर और केसर सतीदेवीको सदा अभीष्ट हैं।

भाद्रपद मासमें उत्पल (नील कमल)-से, आश्विनमें बन्धुजीव (गुलदुपहरिया)-से, कार्तिकमें कमलसे, मार्गशीर्षमें कुन्द-पुष्पसे, पौषमें कुंकुमसे, माघमें सिंदुवार (निर्गुडी)-से, फाल्गुनमें मालतीसे, चैत्रमें मल्लिका तथा अशोकसे, वैशाखमें गन्धपाटल (गुलाब)-से, ज्येष्ठमें कमल और मन्दारसे, आषाढ़में चम्पक और कमलसे तथा श्रावणमें कदम्ब और मालतीके पुष्पोंसे उमादेवीकी पूजा करनी चाहिये। भाद्रपदसे लेकर श्रावण आदि बारह महीनोंमें क्रमशः गोमूत्र, गोमय, दूध, दही, घी, कुशोदक, बिल्वपत्र, मदार-पुष्प, गोशुङ्गोदक, पञ्चगव्य और बेलका नैवेद्य अर्पण करे।

प्रत्येक पक्षकी तृतीयामें ब्राह्मण-दम्पतिको निमन्त्रितकर उनमें शिव-पार्वतीकी भावना कर भोजन कराये तथा वस्त्र, माला, चन्दन आदिसे उनकी पूजा करे। पुरुषको दो पीताम्बर तथा स्त्रीको पीली साड़ियाँ प्रदान करे। फिर ब्राह्मणी स्त्रीको सौभाग्याष्टक-पदार्थ तथा ब्राह्मणको फल और सुवर्णनिर्मित कमल देकर इस प्रकार प्रार्थना करे—

यथा न देवि देवेशस्त्वां परित्यज्य गच्छति।

तथा मां सम्परित्यज्य पतिर्नान्यत्र गच्छतु॥

(उत्तरपर्व २६।३०)

‘देवि! जिस प्रकार देवाधिदेव भगवान् महादेव आपको छोड़कर अन्यत्र कहीं नहीं जाते, उसी प्रकार मेरे भी पतिदेव मुझे छोड़कर कहीं न जायँ।’

पुनः कुमुदा, विमला, अनन्ता, भवानी, सुधा, शिवा, ललिता, कमला, गौरी, सती, रम्भा और पार्वती—इन नामोंका उच्चारण करके प्रार्थना करे कि आप क्रमशः भाद्रपद आदि मासोंमें प्रसन्न हों।

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  • उत्तरपर्व *

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व्रतकी समासिमें सुवर्णनिर्मित कमलसहित शय्या-दान करे और चौबीस अथवा बारह द्विज-दम्पतियोंकी पूजा करे। प्रत्येक मासमें ब्राह्मण-दम्पतियोंकी पूजा विधिपूर्वक करे। अपने पूज्य गुरुदेवकी भी पूजा करे।

जो इस अनन्त-तृतीया-व्रतका विधिपूर्वक पालन करता है, वह सौ कल्पोंसे भी अधिक समयतक शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। निर्धन पुरुष भी यदि तीन वर्षोंतक उपवास कर पुष्प और मन्त्र आदिके द्वारा इस व्रतका अनुष्ठान करता है तो उसे भी यही फल प्राप्त होता है। सधवा स्त्री, विधवा अथवा कुमारी जो कोई भी इस व्रतका पालन करती है, वह भी गौरीकी कृपासे उस फलको प्राप्त कर लेती है। जो इस व्रतके माहात्म्यको पढ़ता अथवा सुनता है, वह भी उत्तम लोकोंको प्राप्त करता है।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले— महाराज! अब एक व्रत और बता रहा हूँ, उसका नाम है—रसकल्याणिनी- तृतीया। यह पापोंका नाश करनेवाला है। यह व्रत माघ मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको किया जाता है। उस दिन प्रातःकाल गो-दुग्ध और तिल-मिश्रित जलसे स्नान करे। फिर देवीकी मूर्तिको मधु और गन्नेके रससे स्नान कराये तथा जाती-पुष्पों एवं कुंकुमसे अर्चना करे। अनन्तर पहले दक्षिणाङ्गकी पूजा करे तब वामाङ्गकी। अङ्ग-पूजा इस प्रकार करे—‘ललितायै नमः’ कहकर दोनों चरणों तथा दोनों टखनोंकी, ‘सत्यै नमः’ कहकर पिण्डलियों और घुटनोंकी, ‘श्रियै नमः’ कहकर ऊरुओंकी, ‘मदालसायै नमः’ कहकर कटि-प्रदेशकी, ‘मदनायै नमः’ कहकर उदरकी, ‘मदनवासिन्यै नमः’ कहकर दोनों स्तनोंकी, ‘कुमुदायै नमः’ कहकर गरदनकी, ‘माधव्यै नमः’ कहकर भुजाओंकी तथा भुजाके अग्रभागकी, ‘कमलायै

नमः’ कहकर उपस्थकी, ‘रुद्राण्यै नमः’ कहकर भू और ललाटकी, ‘शंकरायै नमः’ कहकर पलकोंकी, ‘विश्ववासिन्यै नमः’ कहकर मुकुटकी, ‘कान्त्यै नमः’ कहकर केशपाशकी, ‘चक्रावधारिन्यै नमः’ कहकर नेत्रोंकी, ‘पुष्ट्यै नमः’ कहकर मुखकी, ‘उत्कण्ठिन्यै नमः’ कहकर कण्ठकी ‘अनन्तायै नमः’ कहकर दोनों कन्धोंकी, ‘रम्भायै नमः’ कहकर वाम बाहुकी, ‘विशोकायै नमः’ कहकर दक्षिण बाहुकी, ‘मन्मथादित्यै नमः’ कहकर हृदयकी पूजा करे, फिर ‘पाटलायै नमः’ कहकर उन्हें बार-बार नमस्कार करे।

इस प्रकार प्रार्थना कर ब्राह्मण-दम्पतिकी गन्ध-माल्यादिसे पूजा कर स्वर्णकमलसहित जलपूर्ण घट प्रदान करे। इसी विधिसे प्रत्येक मासमें पूजन करे और माघ आदि महीनोंमें क्रमशः लवण, गुड़, तेल (राई), मधु, पानक (एक प्रकारका पेय पदार्थ या ताम्बूल), जीरा, दूध, दही, घी, शाक, धनिया और शर्कराका त्याग करे। पूर्वकथित पदार्थोंको उन-उन मासोंमें नहीं खाना चाहिये। प्रत्येक मासमें व्रतकी समासिपर करवेके ऊपर सफेद चावल, गोझिया, मधु, पूरी, घेवर (सेवई), मण्डक (पिष्टक), दूध, शाक, दही, छः प्रकारका अन्न, भिंडी तथा शाकवर्तिक रखकर ब्राह्मणको दान करना चाहिये। माघ मासमें पूजाके अन्तमें ‘कुमुदा प्रीयताम्’ यह कहना चाहिये। इसी प्रकार फाल्गुन आदि महीनोंमें ‘माधवी, गौरी, रम्भा, भद्रा, जया, शिवा, उमा, शची, सती, मङ्गला तथा रतिलालसा’ का नाम लेकर ‘प्रीयताम्’ ऐसा कहे। सभी मासोंके व्रतमें पञ्चगव्यका प्राशन करे और उपवास करे। तदनन्तर माघ मास आनेपर करकपात्रके ऊपर पञ्चरत्नसे युक्त अङ्गुष्ठमात्रकी पार्वतीकी स्वर्णनिर्मित मूर्तिकी स्थापना करे। वस्त्र, आभूषण और अलंकारसे उसे सुशोभित

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