भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 428, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
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व्रतकी समासिमें सुवर्णनिर्मित कमलसहित शय्या-दान करे और चौबीस अथवा बारह द्विज-दम्पतियोंकी पूजा करे। प्रत्येक मासमें ब्राह्मण-दम्पतियोंकी पूजा विधिपूर्वक करे। अपने पूज्य गुरुदेवकी भी पूजा करे।
जो इस अनन्त-तृतीया-व्रतका विधिपूर्वक पालन करता है, वह सौ कल्पोंसे भी अधिक समयतक शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। निर्धन पुरुष भी यदि तीन वर्षोंतक उपवास कर पुष्प और मन्त्र आदिके द्वारा इस व्रतका अनुष्ठान करता है तो उसे भी यही फल प्राप्त होता है। सधवा स्त्री, विधवा अथवा कुमारी जो कोई भी इस व्रतका पालन करती है, वह भी गौरीकी कृपासे उस फलको प्राप्त कर लेती है। जो इस व्रतके माहात्म्यको पढ़ता अथवा सुनता है, वह भी उत्तम लोकोंको प्राप्त करता है।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले— महाराज! अब एक व्रत और बता रहा हूँ, उसका नाम है—रसकल्याणिनी- तृतीया। यह पापोंका नाश करनेवाला है। यह व्रत माघ मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको किया जाता है। उस दिन प्रातःकाल गो-दुग्ध और तिल-मिश्रित जलसे स्नान करे। फिर देवीकी मूर्तिको मधु और गन्नेके रससे स्नान कराये तथा जाती-पुष्पों एवं कुंकुमसे अर्चना करे। अनन्तर पहले दक्षिणाङ्गकी पूजा करे तब वामाङ्गकी। अङ्ग-पूजा इस प्रकार करे—‘ललितायै नमः’ कहकर दोनों चरणों तथा दोनों टखनोंकी, ‘सत्यै नमः’ कहकर पिण्डलियों और घुटनोंकी, ‘श्रियै नमः’ कहकर ऊरुओंकी, ‘मदालसायै नमः’ कहकर कटि-प्रदेशकी, ‘मदनायै नमः’ कहकर उदरकी, ‘मदनवासिन्यै नमः’ कहकर दोनों स्तनोंकी, ‘कुमुदायै नमः’ कहकर गरदनकी, ‘माधव्यै नमः’ कहकर भुजाओंकी तथा भुजाके अग्रभागकी, ‘कमलायै
नमः’ कहकर उपस्थकी, ‘रुद्राण्यै नमः’ कहकर भू और ललाटकी, ‘शंकरायै नमः’ कहकर पलकोंकी, ‘विश्ववासिन्यै नमः’ कहकर मुकुटकी, ‘कान्त्यै नमः’ कहकर केशपाशकी, ‘चक्रावधारिन्यै नमः’ कहकर नेत्रोंकी, ‘पुष्ट्यै नमः’ कहकर मुखकी, ‘उत्कण्ठिन्यै नमः’ कहकर कण्ठकी ‘अनन्तायै नमः’ कहकर दोनों कन्धोंकी, ‘रम्भायै नमः’ कहकर वाम बाहुकी, ‘विशोकायै नमः’ कहकर दक्षिण बाहुकी, ‘मन्मथादित्यै नमः’ कहकर हृदयकी पूजा करे, फिर ‘पाटलायै नमः’ कहकर उन्हें बार-बार नमस्कार करे।
इस प्रकार प्रार्थना कर ब्राह्मण-दम्पतिकी गन्ध-माल्यादिसे पूजा कर स्वर्णकमलसहित जलपूर्ण घट प्रदान करे। इसी विधिसे प्रत्येक मासमें पूजन करे और माघ आदि महीनोंमें क्रमशः लवण, गुड़, तेल (राई), मधु, पानक (एक प्रकारका पेय पदार्थ या ताम्बूल), जीरा, दूध, दही, घी, शाक, धनिया और शर्कराका त्याग करे। पूर्वकथित पदार्थोंको उन-उन मासोंमें नहीं खाना चाहिये। प्रत्येक मासमें व्रतकी समासिपर करवेके ऊपर सफेद चावल, गोझिया, मधु, पूरी, घेवर (सेवई), मण्डक (पिष्टक), दूध, शाक, दही, छः प्रकारका अन्न, भिंडी तथा शाकवर्तिक रखकर ब्राह्मणको दान करना चाहिये। माघ मासमें पूजाके अन्तमें ‘कुमुदा प्रीयताम्’ यह कहना चाहिये। इसी प्रकार फाल्गुन आदि महीनोंमें ‘माधवी, गौरी, रम्भा, भद्रा, जया, शिवा, उमा, शची, सती, मङ्गला तथा रतिलालसा’ का नाम लेकर ‘प्रीयताम्’ ऐसा कहे। सभी मासोंके व्रतमें पञ्चगव्यका प्राशन करे और उपवास करे। तदनन्तर माघ मास आनेपर करकपात्रके ऊपर पञ्चरत्नसे युक्त अङ्गुष्ठमात्रकी पार्वतीकी स्वर्णनिर्मित मूर्तिकी स्थापना करे। वस्त्र, आभूषण और अलंकारसे उसे सुशोभित
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