भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

कर एक बैल और एक गाय 'भवानी प्रीयताम्' यह कहकर ब्राह्मणको प्रदान करे। इस विधिके अनुसार व्रत करनेवाला सम्पूर्ण पापोंसे उसी क्षण मुक्त हो जाता है और हजार वर्षोंतक दुःखी नहीं होता। इस व्रतके करनेसे हजारों अग्निष्टोम-यज्ञका फल प्राप्त होता है। कुमारी, सधवा, विधवा या

दुर्भगा जो भी हो, वह इस व्रतके करनेपर गौरीलोकमें पूजित होती है। इस विधानको सुनने या इस व्रतको करनेके लिये औरोंको उपदेश देनेसे भी सभी पापोंसे छुटकारा मिलता है और वह पार्वतीके लोकमें निवास करता है।

(अध्याय २६)

आर्द्रानन्दकरी तृतीया-व्रत

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! अब मैं तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध, आनन्द प्रदान करनेवाले, पापोंका नाश करनेवाले आर्द्रानन्दकरी तृतीयाव्रतका वर्णन करता हूँ। जब किसी भी महीनेमें शुक्ल पक्षकी तृतीयाको पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़ अथवा रोहिणी या मृगशिरा नक्षत्र हो तो उस दिन यह व्रत करना चाहिये। उस दिन कुश और गन्धोदकसे स्नानकर श्वेत चन्दन, श्वेत माला और श्वेत वस्त्र धारणकर उत्तम सिंहसनपर शिव-पार्वतीकी प्रतिमा स्थापित करे। सुगन्धित श्वेत पुष्प, चन्दन आदिसे उनकी पूजा करे। 'वासुदेव्यै नमः, शंकराय नमः' से गौरी-शंकरके दोनों चरणोंकी, 'शोकविनाशिनीयै नमः, आनन्दाय नमः' से पिण्डलियोंकी, 'रम्भायै नमः, शिवाय नमः' से ऊरुकी, 'आदित्यै नमः, शूलपाणये नमः' से कटिकी, 'माधव्यै नमः, भवाय नमः' से नाभिकी, 'आनन्दकारिण्यै नमः, इन्द्रधारिणे नमः' से दोनों स्तनोंकी, 'उत्कण्ठित्यै नमः, नीलकण्ठाय नमः' से कण्ठकी, 'उत्पलधारिण्यै नमः, रुद्राय नमः' से दोनों हाथोंकी, 'परिरिभ्रण्यै नमः, नृत्यशीलाय नमः' से दोनों भुजाओंकी, 'विलासिन्यै नमः, वृषेशाय नमः' से मुखकी, 'सस्मरशीलायै नमः, विश्ववक्राय नमः' से मुसकानकी, 'मदनवासिन्यै नमः, विश्वधाग्ने नमः' से नेत्रोंकी, 'रतिप्रियायै नमः, ताण्डवेशाय नमः' से ध्रुवोंकी, 'इन्द्राण्यै नमः, हव्यवाहाय

नमः' से ललाटकी तथा 'स्वाहायै नमः, पञ्चशराय नमः' कहकर मुकुटकी पूजा करे। तदनन्तर नीचे लिखे मन्त्रसे पार्वती-परमेश्वरकी प्रार्थना करे— विश्वकायौ विश्वमुखौ विश्वपादकरो शिवाँ। प्रसन्नवदनौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरी ॥

(उत्तरपर्व २७।१३)

'विश्व जिनका शरीर है, जो विश्वके मुख, पाद और हस्तस्वरूप तथा मङ्गलकारक हैं, जिनके मुखपर प्रसन्नता झलकती रहती है, उन पार्वती और परमेश्वरकी मैं वन्दना करता हूँ।'

इस प्रकार पूजनकर मूर्तियोंके आगे अनेक प्रकारके कमल, शङ्ख, स्वस्तिक, चक्र आदिका चित्रण करे। गोमूत्र, गोमय, दूध, दही, घी, कुशोदक, गोश्रृंगोदक, बिल्वपत्र, घड़ेका जल, खसका जल, यवचूर्णका जल तथा तिलोदकका क्रमशः मार्गशीर्ष आदि महीनोंमें प्राशन करे, अनन्तर शयन करे। यह प्राशन प्रत्येक पक्षकी द्वितीयाको करना चाहिये। भगवान् उमा-महेश्वरकी पूजाके लिये सर्वत्र श्वेत पुष्पको श्रेष्ठ माना गया है। दानके समय यह मन्त्र पढ़ना चाहिये—

गौरी मे प्रीयतां नित्यमघनाशाय मङ्गला। सौभाग्यायास्तु ललिता भवानी सर्वसिद्धये ॥

(उत्तरपर्व २७।१९)

'गौरी नित्य मुझपर प्रसन्न रहें, मङ्गला मेरे पापोंका विनाश करें। ललिता मुझे सौभाग्य प्रदान

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