भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 421, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
उमादेवीका ध्यान करते हुए भूमिपर कुशकी शय्या बिछाकर सोये। दूसरे दिन प्रातः उठकर स्नानसे निवृत्त हो, विधिपूर्वक भगवतीका पूजन करे और यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन कराये तथा स्वयं भी मौन होकर भोजन करे। इस प्रकार भगवतीका प्रथम मासमें ईशानी नामसे, द्वितीय मासमें पार्वती नामसे, तृतीय मासमें शंकरप्रिया नामसे, चतुर्थ मासमें भवानी नामसे, पाँचवें मासमें स्कन्दमाता नामसे, छठे मासमें दक्षदुहिता नामसे, सातवें मासमें मैनाकी नामसे, आठवें मासमें कात्यायनी नामसे, नवें मासमें हिमाद्रिजा नामसे, दसवें मासमें सौभाग्यदायिनी नामसे, ग्यारहवें मासमें उमा नामसे तथा अन्तिम बारहवें मासमें गौरी नामसे पूजन करे। बारहों मासोंमें क्रमशः कुशोदक, दुग्ध, घृत, गोमूत्र, गोमय, फल, निम्ब-पत्र, कंटकारी, गोशृंगोदक, दही, पञ्चगव्य और शाकका प्राशन करे।
इस प्रकार बारह मासतक व्रतकर श्रद्धापूर्वक
भगवतीकी पूजा करे और प्रत्येक मासमें ब्राह्मणोंको दान दे। व्रतकी समाप्तिपर वेदपाठी ब्राह्मणको पत्नीके साथ बुलाकर दोनोंमें शिव-पार्वतीकी बुद्धि रखकर गन्ध-पुष्पादिसे उनकी पूजा करे और उन्हें भक्तिपूर्वक भोजन कराये तथा आभूषण, अन्न, दक्षिणा आदि देकर उन्हें संतुष्ट करे। ब्राह्मणको दो शुक्ल वस्त्र तथा ब्राह्मणीको दो रक्त वस्त्र प्रदान करे। जो स्त्री इस व्रतको भक्तिपूर्वक करती है, वह अपने पतिके साथ दिव्यलोकमें जाकर दस हजार वर्षांतक उत्तम भोगोंका भोग करती है। पुनः मनुष्य-लोकमें आनेके बाद वे दोनों दम्पति ही होते हैं और आरोग्य, धन, संतान आदि सभी उत्तम पदार्थ उन्हें प्राप्त होते हैं। इस व्रतका पालन करनेवाली स्त्रीका पति सदा उसके अधीन रहता है और उसे अपने प्राणोंसे भी अधिक मानता है। जन्मान्तरमें व्रतकर्त्री स्त्री राजपत्नी होकर राज्य-सुखका उपभोग करती है। (अध्याय २१)
अवियोगतृतीया-व्रत
राजा युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! जिस व्रतके करनेसे पत्नी पतिसे वियुक्त न हो और अन्तमें शिवलोकमें निवास करे तथा जन्मान्तरमें भी विधवा न हो ऐसे व्रतका आप वर्णन करें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! इसी विषयको भगवती पार्वतीजीने भगवान् शिवसे और अरुन्धतीने महर्षि वसिष्ठजीसे पूछा था। उन लोगोंने जो कहा, वही आपको सुनाता हूँ।
मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी द्वितीयाको पवित्र चरित्रवाली स्त्री रात्रिमें पायस भक्षण कर शिव और पार्वतीको दण्डवत् प्रणाम करे। तृतीया तिथिमें प्रातः गूलरकी दातौनसे दन्तधवन कर स्नान करे। शालि चावलके चूर्णसे शिव और पार्वतीकी प्रतिमा बनाये। उन्हें एक उत्तम पात्रमें
स्थापित कर विधिपूर्वक उनका पूजन करे। रात्रिमें जागरण कर शिव-पार्वतीका कीर्तन करती हुई भूमिपर शयन करे। चतुर्थीको प्रातः उठकर दक्षिणाके साथ उस प्रतिमाको आचार्यको समर्पित कर शिवभक्त ब्राह्मणोंको उत्तम भोजन कराकर संतुष्ट करे। ब्राह्मण दम्पतिकी भी यथाशक्ति पूजा करे।
इस प्रकार प्रतिमास व्रत एवं पूजन करना चाहिये। बारह महीनोंमें क्रमशः शिव-पार्वतीकी इन नामोंसे पूजा करनी चाहिये—मार्गशीर्षमें शिव-पार्वतीके नामसे, पौषमें गिरीश और पार्वती नामसे, माघमें भव और भवानी नामसे, फाल्गुनमें महादेव और उमा नामसे, चैत्रमें शंकर और ललिता नामसे, वैशाखमें स्थाणु और लोलनेत्रा नामसे, ज्येष्ठमें वीरेश्वर और एकवीरा नामसे, आषाढ़में त्रिलोचन
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