भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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पृष्ठ 420
  • उत्तरपर्व *

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इस प्रकार देवीका पूजन कर प्रातःकाल सुवासिनी स्त्रियाँ बड़े उत्सवसे गीत-नृत्यादि करते हुए प्रतिमाको पवित्र जलाशयके समीप ले जायँ और इस मन्त्रको पढ़ते हुए विसर्जित करें —

अर्चितासि मया भक्त्या गच्छ देवि सुरालयम्।

हरकाले शिवे गौरि पुनरागमनाय च॥

(उत्तरपर्व २०।२२)

‘हे हरकाली देवि! मैंने भक्तिपूर्वक आपकी पूजा की है, हे गौरि! आप पुनः आगमनके लिये इस समय देवलोकको प्रस्थान करें।’

इस विधिसे प्रतिवर्ष, जो स्त्री अथवा पुरुष

व्रत करता है, वह आरोग्य, दीर्घायुष्य, सौभाग्य, पुत्र, पौत्र, धन, बल, ऐश्वर्य आदि प्राप्त करता है और सौ वर्षतक संसारका सुख भोगकर शिवलोक प्राप्त करता है। महादेवके अनुग्रहसे वहाँ वीरभद्र, महाकाल, नन्दीश्वर, विनायक आदि शिवजीके गण उसकी आज्ञामें रहते हैं। जो भी स्त्री भक्तिपूर्वक यह हरकाली-व्रत करती है और रात्रिके समय गीत-वाद्य-नृत्यसे जागरण कर उत्सव मनाती है, वह अपने पतिकी अति प्रिय होती है।

(अध्याय २०)

ललितातृतीया-व्रतकी विधि

राजा युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! अब आप द्वादश मासोंमें किये जानेवाले व्रतोंका वर्णन करें, जिनके करनेसे सभी उत्तम फल प्राप्त होते हैं, साथ ही प्रत्येक मास-व्रतका विधान भी बतानेकी कृपा करें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! इस विषयमें मैं एक प्राचीन वृत्तान्त सुनाता हूँ, आप सुनें—

एक समय देवता, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर, सिद्ध, तपस्वी, नाग आदिसे पूजित भगवान् श्रीसदाशिव कैलासपर्वतपर विराजमान थे। उस समय भगवती उमाने विनयपूर्वक भगवान् सदाशिवसे प्रार्थना की कि महाराज! आप मुझे उत्तम तृतीया-व्रतके विषयमें बतानेकी कृपा करें, जिसके करनेसे नारीको सौभाग्य, धन, सुख, पुत्र, रूप, लक्ष्मी, दीर्घायु तथा आरोग्य प्राप्त होता है और स्वर्गकी भी प्राप्ति होती है। उमाकी यह बात सुनकर भगवान् शिवने हँसते हुए कहा—‘प्रिये! तीनों लोकोंमें ऐसा कौनसा पदार्थ है जो तुम्हें दुर्लभ है तथा जिसकी प्राप्तिके लिये व्रतकी जिज्ञासा कर रही हो।’

पार्वतीजी बोलीं—महाराज! आपका कथन

सत्य ही है। आपकी कृपासे तीनों लोकोंके सभी उत्तम पदार्थ मुझे सुलभ हैं, किंतु संसारमें अनेक स्त्रियाँ विविध कामनाओंकी प्राप्तिके लिये तथा अमङ्गलोंकी निवृत्तिके लिये भक्तिपूर्वक मेरी आराधना करती हैं तथा मेरी शरण आती हैं। अतः ऐसा कोई व्रत बताइये, जिससे वे अनायास अपना अभीष्ट प्राप्त कर सकें।

भगवान् शिवने कहा—उमे! व्रतकी इच्छावाली स्त्री संयमपूर्वक माघशुक्ला तृतीयाको प्रातः उठकर नित्यकर्म सम्पन्नकर व्रतके नियमको ग्रहण करे। मध्याह्नके समय बिल्च और आमलकमिश्रित पवित्र जलसे स्नानकर शुद्ध वस्त्र धारण करे तथा गन्ध, पुष्प, दीप, कपूर, कुंकुम एवं विविध नैवेद्योंसे भक्तिपूर्वक भक्तोंपर वात्सल्यभाव रखनेवाली तुम्हारी (पार्वतीकी) भक्तिभावसे पूजा करे। अनन्तर ईशानी नामसे तुम्हारा ध्यान करते हुए ताँबेके घड़ेमें जल, अक्षत तथा सुवर्ण रखकर सौभाग्यादिकी कामनासे संकल्पपूर्वक वह घट ब्राह्मणको दान दे दे। ब्राह्मण उस घटस्थ जलसे व्रतकर्त्रीका अभिषेक करे। अनन्तर वह कुशोदकका आचमन कर रात्रिके समय भगवती

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