भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 422, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
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पशुपति और शक्ति नामसे, श्रावणमें श्रीकण्ठ और सुता नामसे, भाद्रपदमें भीम और कालरात्रि नामसे, आश्विनमें शिव और दुर्गा नामसे तथा कार्तिकमें ईशान और शिवा नामसे पूजा करनी चाहिये।
बारह महीनोंमें भगवान् शिव एवं पार्वतीकी प्रसन्नताके लिये क्रमशः—नील कमल, कनेर, बिल्वपत्र, पलास, कुब्ज, मल्लिका, पाढर, श्वेत कमल, कदम्ब, तगर, द्रोण तथा मालती—इन पुष्पोंसे पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार मार्गशीर्षसे व्रत प्रारम्भकर कार्तिकमें व्रतका उद्यापन करना चाहिये। उद्यापनमें सुवर्ण, कमल, दो वस्त्र, ध्वजा, दीपक और विविध नैवेद्य शिवको अर्पित कर आरती करनी चाहिये और बारह ब्राह्मणयुगलका यथाशक्ति पूजन कर सुवर्णमय शिव-पार्वतीकी मूर्ति बनवाकर
उन्हें ताम्रपात्रमें स्थापित कर उसी पात्रमें चॉसठ मोती, चॉसठ मूँगा, चॉसठ पुखराज रखकर उस पात्रको वस्त्रसे ढककर आचार्यको समर्पित करना चाहिये। अङ्गतालीस जलपूर्ण कलश, छाता, जूता और सुवर्ण ब्राह्मणोंको दानमें देना चाहिये। दीन, अन्ध और कृपणको अन्न बाँटना चाहिये। किसीको भी उस दिन निराश नहीं जाने देना चाहिये। यदि इतनी शक्ति न हो तो कुछ कम करे, किंतु वित्तशाठ्य न करे। इस व्रतके करनेसे रूप, सौभाग्य, धन, आयु, पुत्र और शिवलोककी प्राप्ति होती है तथा इष्टजनोंसे कभी वियोग नहीं होता। इस व्रतके करनेपर पतिव्रता स्त्री कभी भी पति-पुत्र, सौभाग्य और धनसे वियुक्त नहीं होती और शिवलोकमें निवास करती है। (अध्याय २२)
उमामहेश्वर-व्रतकी विधि
महाराज युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! जिस व्रतके करनेसे स्त्रियोंको अनेक गुणवान् पुत्र-पौत्र, सुवर्ण, वस्त्र और सौभाग्यकी प्राप्ति होती है तथा पति-पत्नीका परस्पर वियोग नहीं होता, उस व्रतका आप वर्णन करें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! सभी व्रतोंमें श्रेष्ठ एक व्रत है, जो उमामहेश्वर-व्रत कहलाता है, इस व्रतको करनेसे स्त्रियोंको अनेक संतान, दास, दासी, आभूषण, वस्त्र और सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। इस व्रतको अप्सरा, विद्याधरी, किन्नरी, ऋषिकन्या, सीता, अहल्या, रोहिणी, दमयन्ती, तारा तथा अनसूया आदि सभीने किया था और अन्य सभी उत्तम स्त्रियाँ भी इस व्रतको करती हैं। भगवती पार्वतीने सौभाग्य तथा आरोग्य प्रदान करनेवाले और दखिन्ना तथा व्याधिका नाश करनेवाले इस व्रतका दुर्भाग और कुरूप तथा निर्धन स्त्रियोंके हितकी दृष्टिसे मनुष्यलोकमें प्रचार किया।
धर्मपरायणा स्त्री इस व्रतमें मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी तृतीया तिथिको नियमपूर्वक उपवास करे। प्रातः उठकर पवित्र गङ्गा आदि नदियोंमें स्नान कर शिव-पार्वतीका ध्यान करती हुई यह मन्त्र पढ़े और भगवान् शंकरकी अधीन्द्रिनी भगवती श्रीललिताकी पूजा करे—
नमो नमस्ते देवेश उमादेहार्धधारक।
महादेवि नमस्तेऽस्तु हरकायार्धवासिनि ॥
(उत्तरपर्व २३।१२)
‘भगवती उमाको अपने आधे भागमें धारण करनेवाले हे देवदेवेश्वर भगवान् शंकर! आपको बार-बार नमस्कार है। महादेवि! भगवती पार्वती! आप भगवान् शंकरके आधे शरीरमें निवास करनेवाली हैं, आपको नमस्कार है।’
पुनः घर आकर शरीरकी शुद्धिके लिये पञ्चगव्य-पान करे और प्रतिमाके दक्षिण भागमें भगवान् शंकर और वाम भागमें भगवती पार्वतीकी भावना
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