भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 423, कुल 654 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 423

४१२

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

कर गन्ध, पुष्प, गुग्गुल, धूप, दीप और घीमें पकाये गये नैवेद्योंसे भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करे। इसी प्रकार बारह महीनेतक पूजनकर प्रसन्नचित्त हो व्रतका उद्घापन करे। भगवान् शंकरकी चाँदीकी तथा भगवती पार्वतीकी सुवर्णकी मूर्ति बनवाकर दोनोंको चाँदीके वृषभपर स्थापित कर वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत करे। अनन्तर चन्दन, श्वेत पुष्प, श्वेत वस्त्र आदिसे भगवान् शंकरकी और कुंकुम, रक्त वस्त्र, रक्त पुष्प आदिसे भगवती पार्वतीकी पूजा करनी चाहिये। फिर शिवभक्त वेदपाठी, शान्तचित्त ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। सभीको दक्षिणा देकर उनकी प्रदक्षिणा करके यह मन्त्र पढ़ना चाहिये—

उमामहेश्वरी देवी सर्वलोकपितामहौ।

व्रतेनानेन सुप्रीतौ भवेतां मम सर्वदा॥

(उत्तरपर्व २३।२१)

‘सभी लोकोंके पितामह भगवान् शिव एवं पार्वती मेरे इस व्रतके अनुष्ठानसे मुझपर सदा प्रसन्न रहें।’

इस प्रकार प्रार्थना करके क्रोधरहित ब्राह्मणको सभी सामग्रियाँ देकर व्रतको समाप्त करे। इस व्रतको जो स्त्री भक्तिपूर्वक करती है, वह शिवजीके समीप एक कल्पतक निवास करती है। तदनन्तर मनुष्य-लोकमें उत्तम कुलमें जन्म ग्रहणकर रूप, यौवन, पुत्र आदि सभी पदार्थोंको प्राप्त कर बहुत दिनोंतक अपने पतिके साथ सांसारिक सुखोंको भोगती है, उसका अपने पतिसे कभी वियोग नहीं होता और अन्तमें वह शिव-सायुज्य प्राप्त करती है। (अध्याय २३)

रम्भातृतीया-व्रतका माहात्म्य

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! अब मैं सभी पापोंके नाशक, पुत्र एवं सौभाग्यप्रद सभी व्याधियोंके उपशामक पुण्य तथा सौख्य प्रदान करनेवाले रम्भातृतीया-व्रतका वर्णन करता हूँ। यह व्रत सपत्नियोंसे उत्पन्न क्लेशका शामक तथा ऐश्वर्यको प्रदान करनेवाला है। भगवान् शंकरने देवी पार्वतीकी प्रसन्नताके लिये इस व्रतकी जो विधि बतलायी थी, उसे ही मैं कहता हूँ।

श्रद्धालु स्त्री मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी तृतीया तिथिको प्रातः उठकर दन्तधवन आदिसे निवृत्त हो भक्तिपूर्वक उपवासका नियम ग्रहण करे। वह सर्वप्रथम व्रत-ग्रहण करनेके लिये देवीसे इस प्रकार प्रार्थना करे—

देवि संवत्सरं यावत्तृतीयायामुपोषिता।

प्रतिमासं करिष्यामि पारणं चापरेऽहनि।

तदविघ्नं मे यातु प्रसादात् तव पार्वति॥

(उत्तरपर्व २४।५)

‘देवि! मैं पूरे एक वर्षतक इस तृतीया-व्रतका

आचरण और दूसरे दिन पारणा करूँगी। आप ऐसी कृपा करें, जिससे इसमें कोई विघ्न न उत्पन्न हो।’

इस प्रकार स्त्री या पुरुष व्रतका संकल्प करे और मनमें व्रतका निश्चय कर सावधानी बतेंते हुए नदी, तालाब अथवा घरमें स्नान करे। तदनन्तर देवी पार्वतीका पूजन कर रात्रिमें कुशोदकका प्राशन करे। दूसरे दिन प्रातःकाल विद्वान् शिवभक्त ब्राह्मणोंको भोजन कराये और दक्षिणाके रूपमें सुवर्ण एवं लवण प्रदान करे। यथाशक्ति गौरीश्वर भगवान् शिवको प्रयत्नपूर्वक भोग निवेदित करे।

राजन्! पौष मासकी तृतीयामें इसी विधिसे उपवास एवं पूजनकर रात्रिमें गोमूत्रका प्राशन कर प्रभातकालमें ब्राह्मणोंको भोजन कराये और दक्षिणाके रूपमें उन्हें अपनी शक्तिके अनुसार सोना तथा जीरक दे। इससे वाजपेय तथा अतिरात्र यज्ञोंका फल प्राप्त होता है और वह कल्पपर्यन्त इन्द्रलोकमें निवासकर अन्तमें शिवलोकको प्राप्त करता है।

माघ मासके शुक्लपक्षकी तृतीयाको ‘सुदेवी’

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

भविष्य पुराण · पृष्ठ 423, कुल 654 में से · BharatKosha