भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 424, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
४१३
नामसे भगवती पार्वतीका पूजन कर रात्रिमें गोमयका प्राशन कर अकेले ही सोये। प्रातः अपनी शक्तिके अनुसार केसर तथा सोना ब्राह्मणोंको दानमें दे। इससे व्रतीको चिरकालतक विष्णुलोकमें निवास करनेके पश्चात् भगवान् शंकरके सायुज्य (मोक्ष)-की प्राप्ति होती है।
फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको 'गौरी' नामसे देवी पार्वतीका पूजन कर रात्रिमें गायका दूध पीये। प्रातः विद्वान् शिवभक्तों तथा सुवासिनी स्त्रियोंको भोजन कराकर सोनेके साथ कडुहुंड देकर बिदा करे। इससे वाजपेय तथा अतिरात्र यज्ञोंका फल प्राप्त होता है।
चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयामें भक्तिपूर्वक भगवती पार्वतीका विशालाक्षी नामसे पूजन कर रात्रिमें दहीका प्राशन करे और प्रातः कुंकुमके साथ ब्राह्मणोंको सोना प्रदान करे। विशालाक्षीके प्रसादसे व्रतकर्त्रीको महान् सौभाग्य प्राप्त होता है।
वैशाख मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको भगवती पार्वतीका 'श्रीमुखी' नामसे पूजन करे। रात्रिमें घृतका प्राशन करे और एकाकी ही शयन करे। प्रातः शिवभक्त ब्राह्मणोंको यथारुचि भोजन कराकर ताम्बूल तथा लवण प्रदान कर प्रणामपूर्वक बिदा करे। इस विधिसे पूजन करनेपर सुन्दर पुत्रोंकी प्राप्ति होती है।
आषाढ़ मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको गौरी-पार्वतीकी 'माधवी' नामसे पूजा करे। तिलोदकका प्राशन करे। प्रातःकाल विप्रोंको भोजन कराये और दक्षिणामें गुड तथा सोना दे। इससे उसे शुभ लोककी प्राप्ति होती है।*
श्रावण मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको देवी पार्वतीका 'श्रीदेवी' नामसे पूजन कर गायके
सींगका स्पर्श करे और जल पीये। शिवभक्तोंको भोजन कराकर सोना और फल दक्षिणाके रूपमें दे। इससे व्रती सर्वलोकेश्वर होकर सभी कामनाओंको प्राप्त करता है।
भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको भगवती पार्वतीका 'हरताली' नामसे पूजन करे। महिषीका दूध पीये। इससे अतुल सौभाग्य प्राप्त होता है और इस लोकमें वह सुख भोगकर अन्तमें शिवलोकको प्राप्त करता है।
आश्विन मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको देवी पार्वतीका 'गिरिपुत्री' नामसे पूजन कर तण्डुल-मिश्रित जलका प्राशन करे और दूसरे दिन प्रातः ब्राह्मणोंका पूजन कर चन्दनयुक्त सुवर्ण दक्षिणामें दे। इससे सभी यज्ञोंका फल प्राप्त होता है और वह गौरीलोकमें प्रशंसित होता है।
कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको देवी पार्वतीका 'पद्मोद्भवा' नामसे पूजन करके पञ्चगव्यका प्राशन करे तथा रात्रिमें जागरण करे। प्रभातकालमें सप्लीक सदाचारी ब्राह्मणोंको भोजन कराये और माल्य, वस्त्र तथा अलंकारोंसे उन शिवभक्त ब्राह्मणोंका पूजन करे। कुमारियोंको भी भोजन कराये।
इस प्रकार वर्षभर व्रत करनेके पश्चात् उद्यापन करना चाहिये। यथाशक्ति सोनेकी उमा-महेश्वरकी प्रतिमा बनवाकर उन्हें एक सुन्दर, अलंकृत वितानयुक्त मण्डपमें स्थापित कर सुगन्धित द्रव्य, पत्र, पुष्प, फल, घृत-पक्क-नैवेद्य, दीपमाला, शर्करा, नारियल, दाडिम, बीजपूरक, जीरक, लवण, कुसुंभ, कुंकुम तथा मोदकयुक्त ताम्रपात्रसे देवदेवेशकी विधिवत् पूजा कर अन्तमें क्षमा-प्रार्थना एवं शंख आदि वाद्योंकी ध्वनि करनी चाहिये।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! इस विधिसे
- ज्येष्ठ मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको भगवती पार्वतीका 'नारायणी' नामसे श्वेत पुष्पोंसे पूजन करे। रात्रिमें लवणका प्राशन करे। एकाकी शयन करे। प्रातःकाल शिवभक्त ब्राह्मण और सौभाग्यवती स्त्रियोंको यथाशक्ति भोजन कराये, ब्राह्मणको ताम्बूल दे और सुवर्णकी दक्षिणा देकर प्रणाम-क्षमा-प्रार्थना करे। इससे व्रतकर्ताको शिवलोक प्राप्त होता है।
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth