भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
देवी पार्वतीका पूजन करनेपर जो फल प्राप्त होता है, उसका फल वर्णन करनेमें मैं भी समर्थ नहीं हूँ। वह पूर्वोक्त सभी फलोंको प्राप्त करता है, सभी देवताओंके द्वारा पूजित होता है तथा सौ करोड़ कल्पोंतक सभी
कामनाओंका उपभोग करता हुआ अन्तमें शिव-सायुज्य प्राप्त करता है, इसमें कोई संदेह नहीं। यह व्रत पहले रम्भाके द्वारा किया गया था, इसलिये यह रम्भाव्रत कहलाता है। (अध्याय २४)
सौभाग्यशयन-व्रतकी विधि
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! अब मैं सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले सौभाग्यशयन-व्रतका वर्णन करता हूँ। जब प्रलयके पूर्वकालमें— ‘भूभुवः स्वः’ आदि सभी लोक दग्ध हो गये, तब सभी प्राणियोंका सौभाग्य एकत्र होकर वैकुण्ठमें भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलमें स्थित हो गया। पुनः जब सृष्टि हुई, तब आधा सौभाग्य ब्रह्माजीके पुत्र दक्ष प्रजापतिने पान कर लिया, जिससे उनका रूप-लावण्य, बल और तेज सबसे अधिक हो गया। शेष आधे सौभाग्यसे इक्षु, स्तवराज, निष्पाव (सेम), राजिधान्य (शालि या अगहनी), गोक्षीर तथा उसका विकार, कुसुंभ-पुष्प (केसर), कुंकुम तथा लवण—ये आठ पदार्थ उत्पन्न हुए। इनका नाम सौभाग्याष्टक है*।
दक्ष प्रजापतिने पूर्वकालमें जिस सौभाग्यका पान किया, उससे सती नामकी एक कन्या उत्पन्न हुई। सभी लोकोंमें उस कन्याका सौन्दर्य अधिक था, इसीसे उसका नाम सती एवं रूपमें अतिशय लालित्य होनेके कारण ललिता पड़ा। त्रैलोक्य-सुन्दरी इस कन्याका विवाह भगवान् शंकरके साथ हुआ। जगन्माता ललितादेवीकी आराधनासे भुक्ति, मुक्ति और स्वर्गका राज्य आदि सब प्राप्त होते हैं।
राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! जगद्धात्री उन भगवतीकी आराधनाका क्या विधान है? उसे
आप बतलायें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको ललितादेवीका भगवान् शंकरके साथ विवाह हुआ। इस दिन पूर्वाह्नमें तिलमिश्रित जलसे स्नान करे। पञ्चगव्य तथा चन्दनमिश्रित जलके द्वारा गौरी और भगवान् चन्द्रशेखरकी प्रतिमाको स्नान कराकर धूप, दीप, नैवेद्य तथा नाना प्रकारके फलोंद्वारा उन दोनोंकी पूजा करे। इसके बाद इस प्रकार अङ्ग-पूजा करे—
‘ॐ पाटलायै नमः, ॐ शम्भवे नमः’ ऐसा कहकर पार्वती और शम्भुके चरणोंकी, ‘ॐ त्रियुगयै नमः, ॐ शिवाय नमः’ से दोनोंके गुल्फोंकी, ‘ॐ विजयायै नमः, ॐ भद्रेश्चराय नमः’ से दोनोंके जानुओंकी, ‘ॐ ईशान्यै नमः, ॐ हरिकेशाय नमः’ से कटि-प्रदेशकी, ‘ॐ कोटव्यै नमः, ॐ शूलिने नमः’ से कुक्षियोंकी, ‘ॐ मङ्गलायै नमः, ॐ शर्वाय नमः’ से उदरकी, ‘ॐ उमायै नमः, ॐ रुद्राय नमः’ से कुचद्द्वयकी, ‘ॐ अनन्तायै नमः, ॐ त्रिपुरघ्राय नमः’ से दोनोंके हाथोंकी पूजा करे। ‘ॐ भवान्यै नमः, ॐ भवाय नमः’ से दोनोंके कण्ठकी, ‘ॐ गौयै नमः, ॐ हराय नमः’ से दोनोंके मुखकी तथा ‘ॐ ललितायै नमः, ॐ सर्वात्मने नमः’ से दोनोंके मस्तककी पूजा करे।
इस प्रकार विधिवत् पूजनकर शिव-पार्वतीके सम्मुख सौभाग्याष्टक स्थापित कर ‘उमामहेश्वरी
- इक्षवः स्तवराजं च निष्पावा राजिधान्यकम्।
विकारवच्च गोक्षीरं कुसुम्भं कुंकुमं तथा। लवणं चाष्टमं तत्र सौभाग्याष्टकमुच्यते ॥ (उत्तरपर्व २५।१)
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