भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • उत्तरपर्व *

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त्वं मृत्युं वन्दित्वा देवैः समलैर्दैत्यघातिभिः ॥ मयापि वन्दित्वा भक्त्या मामतो विमलं कुरु ॥

(उत्तरपर्व १३।६५-६६)

‘मृतिके! दुष्ट दैत्योंका विनाश करनेवाले देवताओंके द्वारा आप वन्दित हैं, मैं भी भक्तिपूर्वक आपकी वन्दना करता हूँ, मुझे भी आप पवित्र बना दें।’

अनन्तर जलके सम्मुख जाकर सफेद सरसों, कृष्ण तिल, वच और सर्वौषधिका उबटन लगाकर जलमें मण्डल अङ्कित कर ये मन्त्र पढ़ने चाहिये—

त्वमादिः सर्वदेवानां जगतां च जगन्मये। भूतानां वीरुधां चैव रसानां पतये नमः ॥ गङ्गासागरजं तोयं पौष्करं नार्मदं तथा। यामुनं सान्निहत्तं च संनिधानमिहास्तु मे ॥

(उत्तरपर्व १३।६८-६९)

ये मन्त्र पढ़कर स्नानकर शुद्ध वस्त्र पहन, संध्या और तर्पण करे। फिर घर आकर नियमपूर्वक रहे और चन्द्रोदयपर्यन्त किसीसे सम्भाषण न करे।

इसी प्रकार द्वितीया आदि तिथियोंमें कृष्ण, अच्युत, अनन्त और हषीकेश—इन नामोंसे भक्तिपूर्वक भगवान्का पूजन करे। पहले दिन भगवान्के चरणारविन्दोंका, दूसरे दिन नाभिका, तीसरे दिन वक्षःस्थलका और चौथे दिन नारायणके मस्तकका विधिपूर्वक उत्तम पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे पूजन करे और रात्रिमें जब चन्द्रोदय हो, तब शशि, चन्द्र, शशाङ्क तथा इन्दु—इन नामोंसे क्रमशः चन्दन, अगुरु, कर्पूर, दधि, दूर्वा, अक्षत तथा अनेक रत्नों, पुष्पों एवं फलों आदिसे चन्द्रमाको अर्घ्य दे। प्रत्येक दिन जैसे-जैसे चन्द्रमाकी वृद्धि हो वैसे-वैसे अर्घ्यमें भी वृद्धि करनी चाहिये। अर्घ्य इस मन्त्रसे देना चाहिये—

नवो नवोऽसि मासान्ने जायमानः पुनः पुनः। त्रिरग्रिसमवेत्तान् वै देवानाप्यायसे हविः ॥ गगनाङ्गणसद्दीप दुग्धाब्धिधमथनोद्भव।

भाभासितदिगाभोग रमानुज नमोऽस्तु ते ॥

(उत्तरपर्व १३।८६-८७)

‘हे रमानुज! आप प्रत्येक मासके अन्तमें नवीन-नवीन रूपमें आविर्भूत होते रहते हैं। तीन अग्रियोंसे समन्वित देवताओंको आप ही हविष्यके द्वारा आप्पायित करते हैं। आपकी उत्पत्ति क्षीरसागरके मन्थनसे हुई है। आपकी आभासे ही दिशा-विदिशाएँ आभासित होती हैं। गगरूपी आँगनके आप सत्स्वरूपी देदीप्यमान दीपक हैं। आपको नमस्कार है।’

चन्द्रमाको अर्घ्य निवेदित कर वह अर्घ्य ब्राह्मणको दे दे। अनन्तर मौन होकर भूमिपर पद्मपत्र बिछाकर भोजन करे। पलाश या अशोकके पत्रोंद्वारा पवित्र भूमि या शिलातलका शोधन कर इस मन्त्रसे भूमिकी प्रार्थना करनी चाहिये—

त्वत्तले भोक्तुकामोऽहं देवि सर्वरसोद्भव ॥ मदनुग्रहाय सुस्वादं कुर्वन्त्रमभूतोपमम्।

(उत्तरपर्व १३।९०-९१)

‘सम्पूर्ण रसोंको उत्पन्न करनेवाली हे पृथ्वी देवि! आपके आश्रयमें मैं भोजन करना चाहता हूँ। मुझपर अनुग्रह करनेके लिये आप इस अन्नको अमृतके समान उत्तम स्वादयुक्त बना दें।’

अनन्तर शाक तथा पक्वानका भोजन करे। भोजनके बाद आचमन करे और अङ्गोंका स्पर्श कर चन्द्रमाका ध्यान करते हुए भूमिपर ही शयन करे। द्वितीयाके दिन क्षार एवं लवणरहित हविष्यका भोजन करना चाहिये। तृतीयाको नीवार (तिन्नी) तथा चतुर्थीको गायके दूधसे बने उत्तम पदार्थोंको ग्रहण करना चाहिये। पञ्चमीको घृतयुक्त कुशरात्र (खिचड़ी) ग्रहण करना चाहिये। इस भद्रव्रतमें सावों, चावल, गायका घृत तथा अन्य गव्य पदार्थ एवं अयाचित प्रास वन्य फल प्रशस्त माने गये हैं। अनन्तर प्रातःकाल स्नानकर पितरोंका तर्पण कर ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें दान-दक्षिणा आदि

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