भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

इस प्रकार परस्पर शाप देकर और राजा संजयके द्वारा सत्कृत होकर दोनों मुनि अपने-अपने आश्रमकी ओर चले गये। तदनन्तर सातवें महीनेमें राजाको पुत्र उत्पन्न हुआ। वह कामदेवके समान अतिशय रूपवान् और पूर्वजन्मोंका ज्ञाता था। नारदजीके वरदानसे जिस स्थानपर वह मूत्र-पुरीष आदिका परित्याग करता, वहीं वह सुवर्ण हो जाता, इसलिये राजाने उसका नाम स्वर्णछीवी रखा। वह राजपुत्र सभी प्राणियोंकी बातोंको समझता था। राजा संजयने पुत्रके प्रभावसे बहुत धन प्राप्तकर राजसूय आदि यज्ञोंका विधिपूर्वक सम्पादन किया। उसने अनेक कूप, सरोवर, देवालयों आदिका निर्माण कराया। पुत्रकी रक्षाके लिये विशाल सेना भी नियुक्त कर दी।

स्वर्णछीवीके प्रभावसे राजा संजयके यहाँ स्वर्णकी ढेर सारी राशियाँ एकत्र हो गयीं। कुछ समयके बाद राजपुत्रकी अत्यन्त ख्याति सुनकर लोभवश मदोद्भूत चोरोंने स्वर्णछीवीका हरण कर लिया, परंतु जब उसके शरीरमें कहीं भी सोना नहीं देखा, तब चोरोंने उसे मारकर जंगलमें फेंक दिया। चोरोंद्वारा पुत्रके मारे जानेपर राजा बहुत दुःखी हो विलाप करने लगा। उस समय नारदजी वहाँ पुनः पधारे। नारदजीने अनेक प्राचीन राजाओंकी गाथाएँ सुनाकर राजाके शोकको दूर किया और यमलोकमें जाकर वे राजपुत्रको ले आये। पुत्रको प्राप्तकर राजा बहुत प्रसन्न हुआ और उसने नारदजीसे पूछा—‘महाराज! किस कर्मके प्रभावसे यह मेरा पुत्र स्वर्णछीवी हुआ और किस कर्मके प्रभावसे इसको पूर्वजन्मका स्मरण है?’ नारदजीने कहा—‘राजन्! इसने ‘भद्र’ नामक व्रतको विधिपूर्वक चार बार किया है। यह उसीका प्रताप है।’ इतना कहकर नारदजी अपने आश्रमको चले गये।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले— महाराज! इस व्रतके

करनेसे व्रतीका उत्तम कुलमें जन्म होता है और वह रूपवान् तथा पूर्वजन्मका ज्ञाता एवं दीर्घायु होता है। अब आप इस व्रतका विधान सुनें—इस व्रतके चार भद्र चार पादके रूपमें हैं। मार्गशीर्षमें पहला, फाल्गुनमें दूसरा, ज्येष्ठमें तीसरा और भाद्रपदमें चौथा पाद होता है। मार्गशीर्ष शुक्ल आदि तीन मास ‘विष्णुपद’ नामक भद्र सभी धर्मोंका साधक है। फाल्गुन शुक्ल आदि तीन मास ‘त्रिपुष्कर’ नामक भद्ररूप है और यह तप आदिका साधक एवं लक्ष्मीप्रद है। ज्येष्ठ शुक्ल आदि तीन मास ‘त्रिराम’ नामक भद्र है। यह सत्य और शौर्य प्रदान करता है। भाद्रपद शुक्ल आदि तीन मास ‘त्रिरंग’ नामक भद्र है, यह बहुत विद्या देनेवाला है। सभी स्त्री-पुरुषोंको इस भद्रव्रतको करना चाहिये।

राजा युधिष्ठिरने पूछा— जगत्पते! इन भद्रोंका विधान आप विस्तारपूर्वक कहें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले— महाराज! इस अतिशय गुप्त विधानको मैंने किसीसे नहीं कहा है, आपको मैं सुनाता हूँ, आप सावधान होकर सुनें—

मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी प्रारम्भिक चार तिथियाँ अत्यन्त श्रेष्ठ मानी गयी हैं। ये तिथियाँ हैं—द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी और पञ्चमी। व्रतीको प्रतिपदाके दिन जितेन्द्रिय होकर एकभुक्त रहना चाहिये। प्रातःकालमें द्वितीया तिथिको नित्यक्रियाओंको सम्पन्न कर मध्याह्नमें मन्त्रपूर्वक गोमय तथा मिट्टी आदि लगाकर स्नान करना चाहिये। इन मन्त्रोंके अधिकारी चारों वर्ण हैं, किंतु वर्णसंकरोंको इनका अधिकार नहीं है। विधवा स्त्री यदि सदाचारसम्पन्न हो तो वह भी इस व्रतकी अधिकारिणी है। सधवा स्त्री अपने पतिकी आज्ञासे यह व्रत ग्रहण करे। शरीरमें मिट्टी-लेपन करनेका मन्त्र इस प्रकार है—

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