भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

देकर बिदा करना चाहिये। बादमें भृत्य एवं बन्धुजनोंके साथ स्वयं भी भोजन करे।

इस प्रकार तीन-तीन महीनोंतक चार भद्र-व्रतोंका जो वर्षपर्यन्त भक्तिपूर्वक प्रमादरहित होकर आचरण करता है, उसे चन्द्रदेव प्रसन्न होकर श्री, विजय आदि प्रदान करते हैं। जो कन्या इस भद्रव्रतका अनुष्ठान करती है, वह शुभ पतिको प्राप्त करती है। दुर्भगा स्त्री सुभगा

एवं साध्वी हो जाती है तथा नित्य सौभाग्यको प्राप्त करती है। राज्यार्थी राज्य, धनार्थी धन और पुत्रार्थी पुत्र प्राप्त करता है। इस भद्रव्रतके करनेसे स्त्रीका उत्तम कुलमें विवाह होता है तथा वह उत्तम शय्या, अन्न, यान, आसन आदि शुभ पदार्थोंको प्राप्त करती है और पुरुष धन, पुत्र, स्त्रीके साथ ही पूर्वजन्मके ज्ञानको भी प्राप्त कर लेता है। (अध्याय १३)

यमद्वितीया तथा अशून्यशयन-व्रतकी विधि

भगवान् श्रीकृष्ण बोले —राजन्! कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी द्वितीया तिथिको यमुनाने अपने घर अपने भाई यमको भोजन कराया और यमलोकमें बड़ा उत्सव हुआ, इसलिये इस तिथिका नाम यमद्वितीया है। अतः इस दिन भाईको अपने घर भोजन न कर बहिनके घर जाकर प्रेमपूर्वक उसके हाथका बना हुआ भोजन करना चाहिये। उससे बल और पुष्टिकी वृद्धि होती है। इसके बदले बहिनको स्वर्णलंकार, वस्त्र तथा द्रव्य आदिसे संतुष्ट करना चाहिये। यदि अपनी सगी बहिन न हो तो पिताके भाईकी कन्या, मामाकी पुत्री, मौसी अथवा बुआकी बेटी—ये भी बहिनके समान हैं, इनके हाथका बना भोजन करे। जो पुरुष यमद्वितीयाको बहिनके हाथका भोजन करता है, उसे धन, यश, आयुष्य, धर्म, अर्थ और अपरिमित सुखकी प्राप्ति होती है।

राजा युधिष्ठिरने पूछा —भगवन्! आपने बताया कि सब धर्मोंका साधन गृहस्थाश्रम है, वह गृहस्थाश्रम स्त्री और पुरुषसे ही प्रतिष्ठित होता है। पत्नीहीन पुरुष और पुरुषहीन नारी धर्म आदि साधन सम्पन्न करनेमें समर्थ नहीं होते, इसलिये आप कोई ऐसा व्रत बतायें जिसके अनुष्ठानसे

दाम्पत्यका वियोग न हो।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले —महाराज! श्रावण मासके कृष्ण पक्षकी द्वितीयाको अशून्यशयन नामक व्रत होता है। इसके करनेसे स्त्री विधवा नहीं होती और पुरुष पत्नीसे हीन नहीं होता। इस तिथिको लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णुका शय्यापर अनेक उपचारोंद्वारा पूजन करना चाहिये। इस दिन उपवास, नक्तव्रत अथवा अयाचित-व्रत करना चाहिये। व्रतके दिन दही, अक्षत, कन्द-मूल, फल, पुष्प, जल आदि सुवर्णके पात्रमें रखकर निम्नमन्त्रको पढ़ते हुए चन्द्रमाको अर्घ्य देना चाहिये—

गगनाङ्गणसम्भूत दुग्धाब्धिधमथनोद्भव।

भाभासितदिगाभोग रमानुज नमोऽस्तु ते॥

(उत्तरपर्व १५।१८)

इस विधानके साथ जो व्यक्ति चार मासतक व्रत करता है, उसको कभी भी स्त्री-वियोग प्राप्त नहीं होता एवं उसे सभी प्रकारके ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं। जो स्त्री भक्तिपूर्वक इस व्रतको करती है, वह तीन जन्मतक विधवा और दुर्भगा नहीं होती। यह अशून्य-द्वितीयाका व्रत सभी कामनाओं और उत्तम भोगोंको देनेवाला है, अतः इसे अवश्य करना चाहिये। (अध्याय १४-१५)

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