भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
मेघपाली ताम्बूलके समान पत्तोंवाली, मञ्जरीयुक्त एक लाल लता है, वह वाटिकाओंमें, ग्राम-मार्गमें होती है तथा पर्वतोंपर प्रायः होती है। व्यापारसे जीवन बितानेवाले वैश्यगण धान्य, तेल, गुड़, कुंकुम, स्वर्ण तथा पद (जूता, छाता, कपड़ा, अँगूठी, कमण्डलु, आसन, बर्तन और भोज्य वस्तु) आदिसे इसकी पूजा करते हैं। मेघपालीके अर्घ्यदानसे जाने-अनजाने जो भी पाप होते हैं वे नष्ट हो जाते हैं। श्रेष्ठ स्त्रियोंको शुभ देश या स्थानमें उत्पन्न मेघपालीकी फल, गन्ध, पुष्प, अक्षत, नारिकेल, खजूर, अनार, कनेर, धूप, दीप, दही और नये अङ्कुरवाले धान्य-समूहसे पूजा करनी चाहिये तथा लाल वस्त्रोंसे
उसे आच्छादित कर और अबीरसे विभूषित कर अर्घ्य देना चाहिये। वह अर्घ्य विद्वान् ब्राह्मणको समर्पण कर देना चाहिये। इस प्रकार मेघपालीकी पूजा करनेवाली नारी या पुरुष परम ऐश्वर्यको प्राप्त करते हैं तथा सुख-सौभाग्यसे समन्वित हो सौ वर्षोंतक मर्त्यलोकमें जीवित रहते हैं। अन्तमें विमानपर आरूढ़ हो विष्णुलोकको प्राप्त करते हैं और अपने सात कुलोंको निःसंदेह नरकसे स्वर्ग पहुँचा देते हैं। जो नरकके भयसे फलादिसे समन्वित अर्घ्य मेघपालीको प्रदान करता है, उसके सभी पाप वैसे ही नष्ट हो जाते हैं* जैसे सूर्यके द्वारा अन्धकार नष्ट हो जाता है। (अध्याय १६-१७)
पञ्चाग्रिसाधन नामक रम्भा-तृतीया तथा गोष्यद-तृतीयाव्रत
युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! इस मृत्युलोकमें जिस व्रतके द्वारा स्त्रियोंका गृहस्थाश्रम सुचारुरूपसे चले और उन्हें पतिकी भी प्रीति प्राप्त हो, उसे बताइये।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—एक समय अनेक लताओंसे आच्छन्न, विविध पुष्पोंसे सुशोभित, मुनि और किन्नरोंसे सेवित तथा गान और नृत्यसे परिपूर्ण रमणीय कैलास-शिखरपर मुनियों और देवताओंसे आवृत माँ पार्वती और भगवान् शिव बैठे हुए थे। उस समय भगवान् शंकरने पार्वतीसे पूछा—'सुन्दरि! तुमने कौन-सा ऐसा उत्तम व्रत किया था, जिससे आज तुम मेरी वामाङ्गिकी रूपमें अत्यन्त प्रिय बन गयी हो ?'
पार्वतीजी बोलीं—नाथ! मैंने बाल्य-कालमें रम्भाव्रत किया था, उसीके फलस्वरूप आप मुझे पतिरूपमें प्राप्त हुए हैं एवं मैं सभी स्त्रियोंकी स्वामिनी तथा आपकी अधीक्षिनी भी बन गयी हूँ।
भगवान् शंकरने पूछा—भद्रे! सभीको सौख्य प्रदान करनेवाला वह रम्भाव्रत कैसे किया जाता है ? पिताके यहाँ इसे तुमने किस प्रकार अनुष्ठित किया था ? उसे बताओ।
पार्वतीजी बोलीं—देव! एक समय मैं बाल्यकालमें अपने पिताके घर सखियोंके साथ बैठी थी, उस समय मेरे पिता हिमवान् तथा माता मेनाने मुझसे कहा—'पुत्रि! तुम सुन्दर तथा सौभाग्यवर्धक रम्भाव्रतका अनुष्ठान करो, उसके आरम्भ करते ही तुम्हें सौभाग्य, ऐश्वर्य तथा महादेवी-पदकी प्राप्ति हो जायगी। पुत्रि! ज्येष्ठ मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको स्नान कर इस व्रतका नियम ग्रहण करो और अपने चारों ओर पञ्चाग्रि प्रज्वलित करो अर्थात् गार्हपत्याग्रि, दक्षिणाग्रि, आहवनीय तथा सभ्याग्रि और पाँचवें तेजःस्वरूप सूर्याग्रिका सेवन करो। इसके बीचमें पूर्वकी दिशाकी ओर मुखकर बैठ जाओ और मृगचर्म, जट,
- इसमें वनस्पतिको देवता मानकर उसकी पूजाको विशेष महत्त्व प्रदान किया गया है। विशेषकर अथर्ववेद तथा उसके सूत्रोंमें ऐसे कई प्रकरण आये हैं। ओषधियाँ देवता ही हैं, जिनसे रोग, दुःख, पाप-शमनके साथ-साथ धर्मार्थकी सिद्धि भी होती है।
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