भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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पृष्ठ 418
  • उत्तरपर्व *

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बल्कल आदि धारण कर चार भुजाओंवाली एवं सभी अलंकारोंसे सुशोभित तथा कमलके ऊपर विराजमान भगवती महासतीका ध्यान करो। पुत्रि! महालक्ष्मी, महाकाली, महामाया, महामति, गङ्गा, यमुना, सिन्धु, शतद्रु, नर्मदा, मही, सरस्वती तथा वैतरणीके रूपमें वे ही महासती सर्वत्र व्याप्त हैं। अतः तुम उन्हींकी आराधना करो।'

प्रभो! मैंने माताके द्वारा बतलायी गयी विधिसे श्रद्धा-भक्तिपूर्वक रम्भा (गौरी)-व्रतका अनुष्ठान किया और उसी व्रतके प्रभावसे मैंने आपको प्राप्त कर लिया।

भगवान् श्रीकृष्ण पुनः बोले—कौन्तेय! लोपामुद्राने भी इस रम्भाव्रतके आचरणसे महामुनि अगस्त्यको प्राप्त किया और वे संसारमें पूजित हुई। जो कोई स्त्री-पुरुष इस रम्भाव्रतको करेगा, उसके कुलकी वृद्धि होगी। उसे उत्तम संतति तथा सम्पत्ति प्राप्त होगी। स्त्रियोंको अखण्ड सौभाग्यकी तथा सम्पूर्ण कामनाओंको सिद्ध करनेवाले श्रेष्ठ गार्हस्थ्य-सुखकी प्राप्ति होगी और जीवनके अन्तमें उन्हें इच्छानुसार विष्णु एवं शिवलोककी प्राप्ति होगी।

इस व्रतका संक्षिप्त विधान इस प्रकार है—व्रतीको एक सुन्दर मण्डप बनाकर उसे गन्ध-पुष्पादिसे सुवासित तथा अलंकृत करना चाहिये। तदनन्तर मण्डपमें महादेवी रुद्राणीकी यथाशक्ति स्वर्णादिसे निर्मित प्रतिमा स्थापित करनी चाहिये और गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा अनेक प्रकारके नैवेद्योंसे उनकी पूजा करनी चाहिये। देवीके सम्मुख सौभाग्याष्टक—जीरा, कडुहुंड, अपूप, फूल, पवित्र निष्पाव (सेम), नमक, चीनी तथा गुड़ निवेदित करना चाहिये। पद्मासन लगाकर सूर्यास्ततक देवीके सम्मुख बैठा रहे। अनन्तर रुद्राणीको प्रणाम कर यह मन्त्र कहें—

वेदेषु सर्वशास्त्रेषु दिवि भूमौ धरातले।

दृष्टः श्रुतश्च बहुशो न शक्या रहितः शिवः ॥ त्वं शक्तिस्त्वं स्वधा स्वाहात्वं सावित्री सरस्वती। पतिं देहि गृहं देहि वसु देहि नमोऽस्तु ते ॥

(उत्तरपर्व १८।२३-२४)

'सम्पूर्ण वेदादि शास्त्रोंमें, स्वर्गमें तथा पृथ्वी आदिमें कहीं भी यह कभी नहीं सुना गया है और न ऐसा देखा ही गया है कि शिव शक्तिसे रहित हैं। हे पार्वती! आप ही शक्ति हैं, आप ही स्वधा, स्वाहा, सावित्री और सरस्वती हैं। आप मुझे पति, श्रेष्ठ गृह तथा धन प्रदान करें, आपको नमस्कार है।'

इस प्रकार पुनः-पुनः उन्हें प्रणाम करके देवीसे क्षमा-प्रार्थना करे। अनन्तर सपत्नीक यशस्वी ब्राह्मणकी सभी उपकरणोंसे पूजा करके दान देना चाहिये। सुवासिनी स्त्रियोंको नैवेद्य आदि प्रदान करना चाहिये। इस विधानसे सभी कार्य सम्पन्न कर पाप-नाशके लिये क्षमा-प्रार्थना करे। अगले दिन चतुर्थीको ब्राह्मण-दम्पतियोंको मधुर रसोंसे समन्वित भोजन कराकर व्रत पूर्ण करना चाहिये।

पार्थ! भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी तृतीया तथा चतुर्थी तिथिको प्रतिवर्ष गोष्पद नामक व्रत करना चाहिये। स्त्री अथवा पुरुष प्रथम स्नानसे निवृत्त होकर अक्षत और पुष्पमाला, धूप, चन्दन, पिष्टक (पीठी) आदिसे गौकी पूजा करे। उनके शृंग आदि सभी अङ्गोंको अलंकृत करे। उन्हें भोजन कराकर तृप्त कर दे। स्वयं तेल और लवण आदि क्षार वस्तुओंसे रहित जो अग्निके द्वारा सिद्ध न किया गया हो उसका भोजन करे। वनकी ओर जाती तथा लौटती गौओंको उनकी तुष्टिके लिये ग्रास दे और उन्हें निम्न मन्त्रसे अर्घ्य प्रदान करे— माता रुद्राणां दुहिता वसूनां स्वसादित्यानाममृतस्य नाभिः। प्र नु बोचं चिकितुषे जनाय मा गामनागामदितिं वधिष्ट ॥

(ऋ० ८।१०१।१५)

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