भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 392, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
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अन्धकारपूर्ण रात्रिमें कल्किरूपमें उत्पन्न होंगे तथा ब्रह्माण्डके कल्याणके लिये सभी देवताओंका भी प्रादुर्भाव होगा और वे सभी देवता तथा ग्रह परमेश्वरकी स्तुति करेंगे। तब भगवान् कल्कि उन्हें कल्पों, मन्वन्तरों, अवतार-कथाओं, सनातन राधा-कृष्णकी
महिमा तथा कर्मभूमि और सभी लोकों एवं ग्रहोंकी स्थितिको बतलायेंगे। इसी प्रसंगमें श्वेतवाराहकल्पकी कथा भी कहेंगे। तदनन्तर प्रसन्न होकर पुनः प्रणाम कर वे सभी देवगण अपने-अपने स्थानोंको चले जायेंगे। (अध्याय २४-२५)
भगवान् कल्किकी विजय, सत्ययुगकी उत्पत्ति-कथा, अक्षयनवमीमें आँवलेके पूजनका माहात्म्य, अयोध्यामें महाराज वैवस्वतका प्रतिष्ठित होना तथा प्रतिसर्गपर्वका उपसंहार
व्यासजीने कहा—अनन्तर पुराणपुरुषसे उत्पन्न भगवान् कल्कि खड्ग, कवच और ढाल धारण कर दिव्य अश्वपर आरूढ़ हो दैत्यस्वरूप म्लेच्छोंको मारकर योगमार्गका आश्रय लेंगे और सोलह हजार वर्षोंतक उनकी योगाग्निसे तपायी गयी कर्मभूमि भस्मीभूत होकर निर्जीव हो जायगी। अनन्तर प्रलयंकर मेघ उत्पन्न होकर प्रलयकारी वृष्टि करेंगे और भूमि उस जलमें निमग्न हो जायगी। उस समय घोर कलियुग बलिके पास चला जायगा। कलियुगके जानेके बाद भगवान् हरि पुनः कर्मभूमिको रमणीय स्थलमयी करके यज्ञोंसे देवीका यजन करेंगे। यज्ञभाग ग्रहण करके वे देवगण शक्तिसम्पन्न हो जायेंगे और वैवस्वतमनुके पास जाकर सम्पूर्ण वृत्तान्त कहेंगे। अनन्तर कल्किके मुखसे ब्राह्मण, बाहुसे क्षत्रिय, जानुसे वैश्य और पैरसे शूद्र वर्ण उत्पन्न होंगे। ये ब्राह्मणादि क्रमशः गौर, रक्त, पीत एवं श्यामवर्णके होंगे और देवीसे शक्ति प्राप्त करके अनेक पुत्र उत्पन्न करेंगे। उस समय मनुष्य जाति-धर्मका आश्रय लेकर देवताओंका यजन करेंगे। तब धीमान् वैवस्वत विष्णुरूप उस कल्कि हरिको नमस्कार कर उनकी आज्ञासे अयोध्यामें राजपद ग्रहण करेंगे। उनकी इच्छासे जो पुत्र उत्पन्न होगा उसका नाम होगा इक्ष्वाकु। राजा इक्ष्वाकु पिता वैवस्वतके राज्यको प्राप्त कर दिव्य सौ वर्षकी आयु प्राप्त कर अन्तमें
शरीरका परित्याग कर देंगे।
जब भगवान् कल्कि ब्रह्मसत्र करेंगे, तब अङ्गोंके साथ चारों वेद मूर्तिमान् हो जायेंगे। अष्टादश पुराणोंके साथ वे वहाँ आयेंगे और वे सभी पुराणपुरुषके अंशभूत कल्किकी स्तुति करेंगे।
कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी नवमी तिथिमें गुरुवारको एक श्रेष्ठ पुरुष यज्ञकुण्डसे उत्पन्न होगा। सत्यमार्गका प्रदर्शक वह सत्ययुग नामसे कहा जायगा। ब्रह्मादि देवगण नवमी तिथिमें इस रमणीय पुरुषके आविर्भावको देखकर उस तिथिका, समस्त कर्मोंका क्षय करनेवाली तिथिके रूपमें वर्णन करेंगे। इस तिथिको जो मनुष्य आँवला-वृक्षके नीचे जिन देवताओंकी पूजा करेगा वे देवता उसके वशमें हो जायेंगे। यह नवमी अक्षयनवमी और युगादि नवमीके नामसे प्रसिद्ध है। यह लोकमङ्गलदायिनी और सभी पापोंका नाश करनेवाली है। आँवलाके वृक्षके नीचे जो मालती और तुलसीको स्थापित कर विधिपूर्वक शालग्रामकी पूजा करता है, वह पितरोंका तुसिकारक एवं जीवनमुक्त होता है। आँवला-वृक्षके नीचे जो श्राद्ध करता है, वह हजारों गया-श्राद्ध करनेका फल प्राप्त करता है और जो व्यक्ति वहाँपर होम करता है, उसे हजारों यज्ञ करनेका फल प्राप्त होता है तथा वह मरनेके बाद अनेक कुटुम्बियोंके साथ स्वर्ग प्राप्त करता है। कल्किदेवता प्रसन्न होकर
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