भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

पूर्ववर्ती मानवोंको समाप्त कर दिया। उस समय पृथ्वीपर कलिका द्वितीय चरण आ गया। इस समय किन्नरोंकी वार्ता भूतलपर वर्तमान है। वे दैत्यमय मनुष्य ढाई हाथमात्र ऊँचे हो गये और उनकी अवस्था चालीस वर्ष हुई तथा वे पक्षियोंके समान कर्महीन हो गये। कलिके द्वितीय चरणके अन्तमें न विवाह होगा, न राजा रहेंगे, न कोई उद्यमशील रहेंगे और न कर्मकर्ता रहेंगे। भोगसिंह और केलिसिंहके वंशज सवा लाख वर्षतक पृथ्वीमें रहेंगे। इसलिये हे मुनिगणो! आप सबको मेरे साथ कृष्णचैतन्यके पास चलना चाहिये।

व्यासजी बोले— हे मनो! विशालापुननिवासी वे सभी मुनिगण प्रसन्नचित्त होकर यज्ञांशके पास जायँगे और उन्हें प्रणाम कर इन्द्रलोक जानेकी अनुमति माँगेंगे। तब यज्ञांश चैतन्य, आह्लाद, योगी गोरख, शंकर आदि रुद्रांशों और राजा भर्तृहरि आदि अपने सभी शिष्यों तथा अन्य योगिजनों और विशालापुननिवासी मुनियोंके साथ विमानपर आरूढ़ होकर देवलोक चले जायँगे। तब कलिके द्वितीय चरणमें वामनांशसे उद्भूत भोगसिंह और केलिसिंह योगमार्गका अवलम्बन कर कल्पक्षेत्रमें स्थित होंगे और दैत्यवर्गकी अभिवृद्धि करेंगे।

कलिके तृतीय चरणके आनेपर किन्नरगण धीरे-धीरे पृथ्वीपर विनष्ट हो जायँगे। कलियुगके तृतीय चरणके छब्बीस हजार वर्ष व्यतीत होनेपर रुद्रकी आज्ञासे भुङ्ग-ऋषि सौरभी नामकी पत्नीसे महाबलवान् कौलकल्प नामक मनुष्योंको उत्पन्न करेंगे जो सभी किन्नरोंका भक्षण करनेवाले होंगे। उस समय कलिमें उनकी उम्र छब्बीस वर्षकी होगी। भयभीत किन्नर वामनांशकी शरणमें जायँगे और तब भोगसिंह तथा केलिसिंहके साथ कौलकल्पोंका घोर युद्ध होगा। दस वर्ष युद्ध करनेके पश्चात् भोगसिंह आदि सब पराजित हो

जायँगे। दैत्योंके साथ वामनांश (भोगसिंह, केलिसिंह) भी पातालमें चले जायँगे।

घोर कलियुगमें भुङ्ग-ऋषिकी भयंकर सृष्टि होगी। माता-बहिन, पुत्री आदिसे वे मनुष्य पशुवत् व्यवहार करेंगे। कामान्ध होकर वे सब बहुत पुत्रोंको उत्पन्न करेंगे। कलिके तृतीय चरणमें वे सृष्टियाँ भी भयंकर तिर्यक्-योनिको प्राप्त कर नष्ट हो जायँगी।

कलिके चतुर्थ चरणमें मनुष्यकी आयु बीस वर्षकी होगी और वे मरकर नरक जायँगे। उस समय जलीय और वन्य जीवोंके समान वे कन्द-मूल-फल खानेवाले हो जायँगे। जो तामिस्स आदि भयंकर नरक प्रसिद्ध हैं, वे सब कर्मभूमिमें उत्पन्न मानवोंसे भरे जायँगे।

कलियुगके चतुर्थ चरणमें उत्पन्न मनुष्योंके द्वारा इक्कीसों नरकोंमें अजीर्णता आ जायगी—नरक मनुष्योंसे भर जायँगे। तब नरक धर्मराजके पास जाकर कहेंगे कि पापियोंसे हमारे स्थान भर गये हैं। हे सुरोत्तम! जिस तरह हम लोग प्राकृतरूपमें हो जायँ आप वैसा उपाय करें। यह सुनकर धर्मराज चित्रगुप्तके साथ कलियुगके संध्याकालमें ब्रह्माके पास जायँगे और परमेष्ठि पितामह उनके साथ क्षीरसागर जायँगे तथा वहाँ जगन्नाथ देवाधिदेव वृषाकपिकी पूजा कर सांख्यशास्त्रमय स्तोत्रोंसे स्तुति करेंगे एवं रक्षाकी प्रार्थना करेंगे। इसपर वे कहेंगे—देवगणो! लोककल्याणके लिये यह कश्यप सम्भल ग्राममें जन्म लेगा और वहाँ इसका नाम होगा विष्णुयशा। इसकी पत्नीका नाम होगा विष्णुकीर्ति। विष्णुयशा कृष्णलीलाके ग्रन्थ मनुष्योंको सुनायेगा किंतु वे महाधूर्त नारकीय प्राणी उसे भयंकर दृढ़ बन्धनमें बाँधकर कारागारमें डाल देंगे, तब विष्णुकीर्तिसे संसारका कल्याण करनेवाले पूर्ण भगवान् नारायण मार्गशीर्ष मासके कृष्ण पक्षकी अष्टमीके दिन

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