भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 382, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
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रचना की। सुश्रुतके अतिरिक्त इनके और भी अनेक शिष्य हुए।
इसी प्रकार बौद्धमार्गपरायण जयदेव नामक ब्राह्मण पचीस वर्षकी अवस्थावाले कृष्णचैतन्यके समीप आये। उनसे कृष्ण चैतन्यने कहा—आपके परम उपास्य गुरु उद्धेश (उड़ीसा)-निवासी जगन्नाथ हैं। अतः मुझे भी शिष्योंके साथ वहीं जाना चाहिये।
यह सुनकर कृष्णचैतन्यके भक्तोंने अपने-अपने शिष्योंको बुलाकर उनके पीछे-पीछे जगन्नाथ-क्षेत्र (उड़ीसा)-की यात्रा की। निधियाँ तथा सभी सिद्धियाँ भी उनकी सेवाके लिये उपस्थित हुई। शैव और शाक्तोंके साथ दस हजार वैष्णवोंने महाप्रभु कृष्णचैतन्यको आगे कर जगन्नाथपुरीकी ओर प्रस्थान किया। उनके आगमनको देखकर भगवान् जगन्नाथ मुनिवेशमें एक ब्राह्मणका रूप धारण कर जहाँ महाप्रभु आदि थे वहाँ आये। कृष्णचैतन्यने उनको देखकर नमस्कार कर कहा—'इस भयानक कलियुगमें आप किस मतको उचित समझते हैं, मुझे कृपापूर्वक बतायें। मैं उसे तत्त्वतः सुनना चाहता हूँ।' यह सुनकर स्वयं जगन्नाथभगवान्ने लोक-कल्याणके लिये इस प्रकार
कहा—'काश्यपसे शासित मिश्र देशमें उत्पन्न म्लेच्छोंने सुसंस्कृत हो ब्राह्मणवर्णको प्राप्त किया है। उन्होंने शिक्षा-सूत्र धारणकर उत्तम श्रेष्ठ वेदका अध्ययन कर देवाधिदेव शचीपतिकी यज्ञोद्धार पूजा की है। इससे दुःखी हो भगवान् इन्द्र श्वेतद्वीपमें मेरी शरणमें आये और देवताओंके मङ्गलके लिये उन्होंने स्तुतिद्वारा मुझे उद्वुद्ध किया। तब मैंने संसारके कल्याणके लिये कलियुगमें अवतीर्ण होनेका वर प्रदान किया और इन्द्रादिको भी द्वादश आदित्यके रूपमें पृथ्वीपर अवतरित होनेके लिये कहा। मैं सिन्धुतटमें संसारकी हितकामनासे दारुपाषाणरूपमें अवतीर्ण हुआ हूँ। स्वर्गलोकसे आये हुए इन्द्रघुघ्र नामक राजाद्वारा रचित मन्दिरमें मैं प्रतिष्ठित होऊँगा। महाप्रभु चैतन्य यहाँके प्रसादकी महिमा बतलायेंगे। यह स्थान सभी वाञ्छित फलोंको देनेवाला एवं मोक्षप्रद है। यहाँ भक्तिकी महिमा अधिक है। वर्णाका भेदभाव भक्तिके प्रवाहसे दिखायी नहीं देता। एक योजनपर्यन्त यहाँ किसी व्रत आदिकी व्यवस्था नहीं है। मैं सम्पूर्ण पापोंका विनाशक हूँ और कलिकालमें मेरा दर्शन करके मनुष्य शुद्ध हो जायगा।' (अध्याय २०)
मुनिश्रेष्ठ कण्वके उपाध्याय, दीक्षित तथा पाठक आदि दस पुत्रोंकी उत्पत्ति, चैतन्यमहाप्रभु आदि आचार्योद्धार शुद्धिपूर्वक वैष्णवधर्मका विस्तार
सूतजीने कहा—देवेन्द्र! भगवान् जगन्नाथके इन वचनोंको सुनकर कृष्णचैतन्यने भी प्रसन्नतापूर्वक कहा—'भगवन्! प्राणियोंके कल्याणके लिये आप इस कथाको कुछ और विस्तारके साथ कहें।'
जगन्नाथजी बोले—महात्मन्! प्राचीन कालमें महर्षि कश्यपके पुत्र कण्वकी आर्यावती नामकी देवकन्या पत्नी हुई। इन्द्रकी आज्ञासे दोनों कुरुक्षेत्रवाहिनी सरस्वती नदीके तटपर गये और
कण्व चतुर्वेदमय सूक्तोंसे सरस्वतीदेवीकी स्तुति करने लगे। एक वर्ष बीत जानेपर वह देवी प्रसन्न हो वहाँ आयीं और आर्योंकी समृद्धिके लिये उन्हें वरदान दिया। वरके प्रभावसे कण्वके आर्य बुद्धिवाले दस पुत्र हुए—उपाध्याय, दीक्षित, पाठक, शुक्ल, मिश्र, अग्रिहोत्री, द्विवेदी, त्रिवेदी, पाण्ड्य और चतुर्वेदी। इन लोगोंका जैसा नाम था वैसा ही गुण। इन लोगोंने नतमस्तक हो सरस्वतीदेवीको
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