भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

मुने! जीवानन्द रूपानन्दके साथ चैतन्यमहाप्रभुके चरित्रको सुनकर शान्तिपुरीमें आया। सोलह वर्षवाले कृष्ण-चैतन्यको उन दोनोंने नमस्कार कर उनका शिष्यत्व स्वीकार किया। जीवानन्द (जीवगोस्वामी)-ने षट्संदर्भ ग्रन्थकी रचना की। भक्तिमार्गमें अधिक निष्ठा होनेसे वे दोनों सर्वपूज्य हो गये। उनकी आज्ञासे कृष्णचैतन्यकी पूजा करते हुए उन्होंने वहाँ निवास किया। महामुनि रूपानन्दने (रूपगोस्वामी) गुरु चैतन्यमहाप्रभुकी आज्ञा मानकर दस हजार श्लोकवाले पुराणाङ्गभूत कृष्णखण्डकी रचना की। गुरुसेवामें तत्पर राधाकृष्णका पूजक होकर उन्होंने भी वहीं निवास किया।

कुछ समय बाद विष्णुस्वामी भी रमणीय शान्तिपुरीमें आये। उन्नीस वर्षकी अवस्थावाले कृष्णचैतन्यको नमस्कारकर उस ब्राह्मणने कहा—‘इस ब्रह्माण्डमें सभी देवताओंके पूज्य कौन देवता हैं?’ यह सुनकर महाप्रभुने कहा—‘भक्तोंपर

अनुग्रह करनेवाले महादेव सभीके पूज्य हैं। विष्णु, रुद्र, ब्रह्मा आदि देवता भी सदा उनकी पूजा करते हैं। जो विष्णुभक्त शंकराचर्यमें तत्पर रहते हैं, वे शिवके प्रसादसे उत्तम वैष्णवी भक्ति प्राप्त करते हैं। वैष्णव पुरुष होकर जो लोककल्याणकारी शंकरकी पूजा नहीं करता वह सच्चा वैष्णव नहीं है।’

यह सुनकर विष्णुस्वामी भी उनके गुणोंसे आकृष्ट हो उनके शिष्य हो गये और कृष्णमन्त्रकी उपासना करते हुए वे शिवकी आराधनामें तत्पर हो गये एवं उनकी आज्ञासे उन्होंने वैष्णवीसंहिताका वर्णन किया।

सूतजीने पुनः कहा—मुने! कृष्णपरायण मध्वाचार्य भी महाप्रभुकी विशेषताओंको जानकर रमणीय शान्तिपुरीमें आये और उन्हें नमस्कारकर शिष्य होकर उनकी आराधनामें तत्पर हो गये। (अध्याय १९)

भक्तोंसहित चैतन्यमहाप्रभुकी जगन्नाथपुरी-यात्रा एवं साक्षात् भगवान्से वार्तालाप

सूतजी बोले—शौनक! शिवभक्तिपरायण शुद्धात्मा भट्टोजिदीक्षितने श्रीमहाप्रभु कृष्णचैतन्यके पास आकर उनको नमस्कारकर उनका शिष्यत्व स्वीकार किया और उन्होंने वेदके तृतीय अङ्ग व्याकरण, जो पाणिनिसे निर्मित हो चुका था, उसकी प्रक्रियात्मक व्याख्या की और फिर उनकी आज्ञासे सिद्धान्तकौमुदीका निर्माण कर वहीं निवास किया। सूर्यपरायण वराहमिहिर नामके विद्वान् महाप्रभु चैतन्यकी बाईस वर्षकी अवस्थामें उनके समीप आये और उनके शिष्य हो गये। उनकी आज्ञासे इन्होंने अनेकों ज्योतिष ग्रन्थोंका

निर्माण किया और वहीं रहने लगे।

शिवभक्तिपरायण छन्दःशास्त्रके रचयिता वाणीभूषणने तेईस वर्षकी अवस्थावाले कृष्णचैतन्यके पास आकर उनके शिष्य होकर वहाँ निवास किया और अपने नामसे छन्दःशास्त्रका निर्माण किया तथा उन्होंने परम श्रेष्ठ राधाकृष्णका जप करते हुए आनन्दमय जीवन-यापन किया।

सूतजी पुनः बोले—मुने! ब्रह्मभक्तिपरायण धन्वन्तरि नामके एक ब्राह्मण थे। उन्होंने कृष्णचैतन्यके पास आकर उनका शिष्यत्व स्वीकार किया और वहीं रहकर कल्पवेदस्वरूप वेदाङ्गकी

१-वराहमिहिर विक्रमादित्यके दरबारी थे और उनके ग्रन्थोंपर उत्पन्न भट्ट आदिकी प्राचीन टीकाएँ हैं। महाप्रभु चैतन्यका प्रायः समय चौदहवीं शती है। अतः यहाँ किसी अन्य विशिष्ट ज्योतिषीसे भाव निकालने चाहिये, जो वराहमिहिरके सिद्धान्तोंको मानते हों। २-धन्वन्तरिके सम्बन्धमें भी वराहमिहिर-जैसा ही समझना चाहिये, क्योंकि ये भी पूर्ववर्ती हैं।

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